परिचय भारत में कृषि के उत्पादन बढ़ाने, किसानों की आर्थिक स्थिति को उन्नत करने एवं संपूर्ण अर्थव्यवस्था को सुधारने में बागवानी का विशेष महत्व है। बागवानी उत्पादन एवं विस्तार में वैश्वीकरण का मुख्य प्रभाव पड़ा है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षो में भारत में बागवानी का व्यापार प्रतिस्पर्धात्मक अवस्था में है, क्योंकि उत्पादों के अन्तराष्ट्रीय बाजार के कारण बागवानी के परम्परागत स्वरूप में परिवर्तन हो रहा है। आधुनिक तकनीकों के व्यापक एवं समुचित उपयोग से फलों व सब्जियों के उत्पादन में अर्थपूर्ण बढ़ोत्तरी हुई है। इस समय देश में फलों का उत्पादन 64 मिलियन टन है वहीं सब्जियों का उत्पादन 126 मिलियन टन हो गया है, जिससे आज हमारा देश विश्व में चीन के बाद दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। यह उत्पादन देश में भरण-पोषण के साथ-साथ पश्चिमी एशिया एवं पूर्वी यूरोप को भी निर्यात किया जा रहा है। हाल ही में हमारे देश में उगने वाले फलों की मांग यूनाइटेड किंगडम, नीदरलैंड, फ्रांस एवं जर्मनी में भी बढ़ी है। देश में बागवानी (फल एवं सब्जी उत्पादन) कुल क्षेत्रफल के सिर्फ 8.5 प्रतिशत भाग में ही की जाती है। इसकों बढ़ाने हेतु भारत सरकार के वित्तीय सहयोग से एक परियोजना ‘हार्टीकल्चर टेक्नॉलाजी मिशन’ को कुछ प्रदेशों में संचालित किया गया है, जिसमें उनको गुणवतायुक्त उत्पादन करने हेतु प्रेरित किया जा रहा है। क्योंकि बागवानी की फसल विविधता बढ़ाने से रोजगार के अवसर प्राप्त होते है तथा पारिस्थिकीय संतुलन बनाये रखने के साथ प्रति इकाई उत्पादन बढ़ाने एवं पोषण सुरक्षा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। इस समय भारत विश्व का 54 प्रतिशत आम, 24 प्रतिशत काजू, 36 प्रतिशत मटर, 23 प्रतिशत केला एवं 10 प्रतिशत प्याज उत्पादन करता है। विश्व में हमारा देश आम का सबसे ज्यादा उत्पादन करता है एवं हमारे पास आम की लगभग 1000 प्रजातियाँ उपलब्ध हैं। देश में नींबू वर्गीय फलों की बागवानी व्यवसायिक रूप से लगभग 0.45 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल में की जाती है। जिससे प्रत्येक वर्ष लगभग 3.79 मिलियन टन फलोत्पादन प्राप्त होता है। लेकिन विविध कृषि जलवायु क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के कीट व्याधियों के कारण फल वृक्षों एवं फलोत्पादन में हानि का सामना करना पड़ता है। सभी कीट व्याधियों में खरपतवार एक सबसे महत्वपूर्ण कारक है जो फल वृक्षों की रोपणी एवं बागवानी के शुरू के दिनों में जब वृक्ष छोटे-छोटे होते है, अर्थपूर्ण नुकसान करते हैं। इन फसलों के साथ प्रतिस्पर्धा का समय 3 से 4 वर्ष का है, अत: खरपतवारों की समय से रोकथाम न होने से फलोत्पादन में 34-72 प्रतिशत की हानि का सामना करना पड़ता है। खरपतवार, नींबू वर्गीय फलों की बागवानी के प्रथम अवस्था में सबसे ज्यादा प्रतिस्पर्धा करते हैं जिससे नींबू वर्गीय फलों के वृक्षों को कीड़ों एवं रोगों के आक्रमणों का सामना करना पड़ता है। फलस्वरूप नींबू वर्गीय फलों को सबसे अधिक क्षति पहुंचती है। भारत जैसे देश में जहां जलवायु तथा मृदा की विभिन्नता इतनी जटिल है कि बागानों में खरपतवारों से खतरा और भी बढ़ जाता है। यदि खरपतवारों से प्रतिस्पर्धा के समय पर ध्यान नहीं रखा गया तो खरपतवारों से फलों की उत्पादकता तो कम होती ही है, वही उनकी खाद्य सुरक्षा एवं गुणवत्ता पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए खरपतवार विज्ञान अनुसंधान निदेशालय में बागवानी में एकीकृत खरपतवार प्रबंधन पर निम्नलिखित उद्देश्यों के साथ शोध कार्य चल रहा है। खरपतवारों की पहचान कर उनके नियंत्रण की योजना बनाना। फलोद्यानों में वृक्षों के बीच की जगह का प्रभावी उपयोग कर अंतवर्तीय फसलों को उगाकर खरपतवारों का नियंत्रण करना एवं उनसे अतिरिक्त उपज प्राप्त कर आमदनी बढ़ाना। फलोद्यानों की अन्य कीट व्याधियों से सुरक्षा करना। फलोद्यानों (आम एवं नींबू) के प्रमुख खरपतवार सकरी पत्ती वाले मुख्य खरपतवार जैसे सायनोडोन डेक्टीलोन, सारघम हेलीपेन्स, डायकेन्थीयम एनुलेटम, इरेग्रेस्टिस माइनर, एंड्रोपोगान प्रजाति, ईकईनोक्लोवा कोलोना। चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार जैसे यूफो रबिया माइक्रोफाइला, कनवालवुलस आरवेंसिस, ट्राइवुलस टेरेस्ट्रीक, फ्यूमेरिया परवीफ्लोरा, सोनकस आरवेन्सीस, क्रोमोफस डीडीमस, आक्जेलिस कार्नीकुलाटा, आल्टरनेन्थरा सिसिलिस, ऐमेरेन्थस विरिडिस आदि। ये खरपतवार सामान्यत: सभी फलोद्यानों में पाए जाते है। बागवानी में एकीकृत खरपतवार नियंत्रण फलों के पौधों की रोपणी की कतारों के बीच में जैसे खुरपी, हेण्ड हो, व्हील हो के माध्यम से खरपतवारों को नष्ट किया जा सकता है। फलोद्यानों में 8 से 10 सालों तक हल चलाकर या मोटर चलित ट्रैक्टरों एवं टिलर्स के माध्यम से भी खरपतवारों का प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है। फलोद्यानों में खासकर आम के बागानों में हर दो वर्षों में ट्रैक्टर से जुताई कर खेत को खरपतवार रहित किया जा सकता है। आम व नींबू का उदाहरण लें जिनमें खरपतवार काफी संख्या में पनपते हैं। ऐसी स्थिति में आक्षांदित (कवर) फसलें या अंतवर्तीय फसलें ली जा सकती है। जिससे खरपतवारों का प्रभावी नियंत्रण होता है साथ ही साथ बागानों के शुरू की अवस्था में खाली पड़ी जगह का उचित उपयोग भी हो जाता है। तथा इससे अतिरिक्त आमदनी का जरिया भी बन जाता है। उपयुक्त अंर्तवर्तीय फसलों का चुनाव इस आधार पर करना चाहिए कि वे मृदा कटाव अवरोधी, लाभकर, मृदास्वास्थ्य हितकर, मुख्य फसल के कीट-व्याधियों के लिए एकान्तर अनाश्रयी तथा कम पोषण एवं सिंचाई जल मांगकारी होना चाहिए। अंर्तवर्तीय फसलों का चुनाव करते समय यह ध्यान रहे कि इससे मुख्य फसल की कृषि आवश्यकताओं पर विपरीत प्रभाव न पड़े। विभिन्न फलोद्यानों में ली जाने वाली अंर्तवर्तीय फसलें बगीचे में हरी खाद की फसल लेना विशेषकर उन बगीचों के लिए अधिक लाभकर है जहां मिट्टी अनुपजाऊ है एवं उसकी भौतिक दशा ठीक न हो। ये फसलें जैसे सनई, ढेंचा, बरसीम, लोबिया, मूंग, उड़द, ज्वार आदि इसके अतिरिक्त विभिन्न दलहनी फसलें जो मृदा सतह को नुकसान से बचाने हेतु उगाई जाती है जिससे अतिरिक्त आमदनी भी होती है तथा साथ ही साथ खरपतवार का प्रभावी नियंत्रण भी हो जाता है। फलोद्यानों में खरपतवार नियंत्रण की रसायनिक विधि यह एक कारगर एवं सस्ती नियंत्रण विधि है। शाकनाशी रसायनों के प्रयोग से जहां एक ओर समय से खरपतवारों का नियंत्रण किया जा सकता है, वहीं पर विपरीत परिस्थितियों में भी यह विधि काफी कारगर है। विभिन्न रसायनों के उपयोग सम्बन्धित विस्तृत जानकारी निम्नलिखित सारणी में उपलब्ध हैं: क्र.सं. शाकनाशी दर ग्राम/हें. नियंत्रित खरपतवार उपचार विधि टिप्पणी 1 पैराक्वाट (ग्रामोक्जोन/ ग्लायफोसेट) राउंडअप ग्लाइसेल 2000 सभी प्रकार के खरपतवार डायरेक्ट स्प्रे. जमीन पर फुहार तने का क्षति नहीं पहुचाती है। 2 फ्लुफ्लोरेलिन (बासलिन)/ ट्राईफ्लूरालिन (ट्रेफलॉन) 500-1000 एक वर्षीय घास कुल के खरपतवार जमीन में मिला दें नई बागवानी एवं रोपणी में 3 पेंडीमिथालीन (स्टाम्प) 500-1000 एक वर्षीय घास कुल के खरपतवार अंकुरण पूर्व पौधों के तनों के आसपास नई बागवानी एवं रोपणी में 4 2,4-डी (वीडमार) 1000-2000 एक वर्षीय चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार डायरेक्ट स्प्रे तने के आसपास नई एवं पुरानी बागवानी में 5 मेट्रीब्यूजिन (सेंकार) 500-1000 सकरी एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार अंकुरण पूर्व नई बागवानी एवं रोपणी में स्त्रोत : कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार