परिचय आम के गैर परंपरागत प्रजातियों से उच्च लाभ की प्राप्ति के लिए कीट प्रबंधन किया जाना एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है। इस फोल्डर को किसानों के मार्गदर्शन के लिए आम के कीटों की पहचान कर उनके नियंत्रण के लिए तैयार किया गया है। भुनगा (इडियोस्कोपस क्लाइपेएलिस/इडियोस्कोपस नाइटीड्यूल्स/अमराइटोड्स एटकिनसोनाई) आम का भुनगा या फुदका या लस्सी कीट आम को सर्वाधिक हानि पहुंचाता है। वयस्क तथा शिशु कीट कोमल प्ररोहों, पत्तियों, पुष्पक्रमों तथा फलों के मुलायम डंठलों का रस चूसते हैं, जिससे बौर कमजोर होते जाते हैं और छोटे फल गिरने लगते हैं। इसके अतिरिक्त ये भुनगे मधु जैसा चिपचिपा पदार्थ भी विसर्जित करते हैं, जिसके फलस्वरूप पत्तियों, प्ररोहों और फलों पर काली फफूंदी उगती है। इस तरह पौधों की सामान्य वृद्धि नहीं हो पाती है तथा फलन प्रभावित होती है। प्रबंधन जैसे ही भुनगे का प्रकोप शुरू हो एवं इनकी संख्या 5-10 प्रति बौर हो, इमिडाक्लोप्रिड का पहला छिड़काव 1 मिली. प्रति 3 ली. पानी में (जब पुष्प गुच्छ 7-10 सेमी. का हो) करें। दूसरा छिड़काव पुष्प गुच्छ खिलने से पूर्व या फल बैठने के बाद (आवश्यकतानुसार) प्रोफेनोफ़ॉस 50 ई.सी. (1.5 मी.ली. प्रति ली. पानी में) या थायामेथोक्जाम 25 डब्लू.जी. (0.5 ग्रा. प्रति ली.पानी में) का करें। ध्यान रहे की फूल पूरे खिलने के अवस्था में छिड़काव नहीं किया जाए अन्यथा परागण करने वाले कीट भी नष्ट हो जायेंगे। यदि आवश्यकता हो तो कार्बरिल (2 ग्रा. प्रति ली. पानी में) का तीसरा छिड़काव फल बड़े होने के बाद करें। इन रसायनों को फफूंदनाशक दवाओं के साथ मिला कर भी छिड़काव किया जा सकता है। ये भी ध्यान रखना चाहिए कि प्रत्येक छिड़काव में दवाएं बदल-बदल कर छिड़काव करें, अन्यथा कीड़ों में एक ही दवा का लगातार छिड़काव करने से उनमें प्रतिरोधी क्षमता बढ़ जाती है और ऐसी परिस्थिति में दवा असर करना बंद कर देती है। गुजिया (मिली बग) (ड्रोसिका मैन्जीफेरी) गुजिया (मिली बग) आम का एक प्रमुख नाशी कीट है। इस कीट की आमतौर पर पाई जाने वाली प्रजाति का नाम ड्रोसिका मैन्जीफेरी है। यह पूरे देश में आम के बागों को गम्भीर हानि पहुंचता है। इस कीट के निम्फ (बच्चे) अण्डों से निकलने के तुरंत बाद पेड़ के तने पर चढ़ना प्रारम्भ कर देते है। इनके झुण्ड के झुण्ड कोमल शाखाओं तथा बौर पर देखे जा सकते हैं। गुजिया के अनगिनत निम्फ और वयस्क इन भागों का रस चूस लेते हैं। अत्याधिक रस चूसे जाने के कारण प्रभावित भाग मुरझा कर अंत में सूख जाता है। निम्फ तथा वयस्क एक चिपचिपा द्रव्य भी निकालते है। मादा, अप्रैल-मई में पेड़ों से नीचे उतर कर भूमि की दरारों में प्रवेश कर सफेद थैलियों में करीब 400-500 तक अंडे देती है। अंडे भूमि में नवम्बर-दिसम्बर तक सुसुप्तावस्था में रहते है। छोटे-छोटे गुलाबी रंग के बच्चे भूमि में अण्डों से निकल कर दिसम्बर के अंतिम सप्ताह में आम के पौधों पर चढ़ना प्रारम्भ कर देते हैं। अच्छी धूप निकलने के समय ये अधिक क्रियाशील होते हैं। बच्चे और वयस्क मादा कीट जनवरी से मई तक बौर एवं नर्म पत्तों से खूब रस चूस कर उनको सूखा देते हैं। यदि समय पर इसका नियंत्रण नहीं किया जाता है तो उस वर्ष की पूरी फसल खराब हो सकती है। प्रबंधन खुदाई/जुताई द्वारा अक्टूबर-नवम्बर माह में खरपतवार एवं अन्य घासों को बागों से निकाल देने से सुसुप्तावस्था में रहने वाले अंडे धूप गर्मी द्वारा नष्ट कर दिए जाते हैं। दिसम्बर माह के तीसरे सप्ताह में वृक्ष के तने के आस-पास क्लोरपाइरीफ़ॉस चूर्ण (1.5%) 250 ग्राम प्रति वृक्ष मिट्टी में डालने से अण्डों से निकलने वाले निम्फ मर जाते हैं। अल्काथीन/पॉलीथीन (400 गेज) की 30 सेमी. पट्टी पेड़ के तने के चारों ओर भूमि की सतह से 50 सेमी. ऊँचाई पर दिसम्बर के चौथे सप्ताह में गुजिया के निकलने से पहले लपेटने से निम्फ का वृक्षों पर ऊपर चढ़ना रुक जाता है। पट्टी के प्रयोग से पहले तने पर मिट्टी के लेप को प्रयोग में लाया जाता है। इसके बाद इसके ऊपर अल्काथीन की पट्टी बाँधी जाती है। पट्टी के दोनों सिरे सुतली से बाँधने चाहिए। इसके बाद थोड़ी ग्रीस पट्टी के निचले धेरे पर लगाने से गुजिया को पट्टी पर नीचे से चढ़ने को रोका जा सकता है। पट्टी के नीचे वाले खुले तने पर तथा तने के आस-पास क्लोरोपाइरीफ़ॉस को कपड़े की पोटली की सहायता से डालना चाहिए। यह पट्टी बाग़ में स्थित सभी आम के पेड़ों तथा अन्य वृक्षों पर भी बाँध देनी चाहिए। पॉलीथीन की चादर पर इसके बच्चे, फिसल कर नीचे गिर जाते हैं। अगर किसी कारणवश उपरोक्त विधि न अपनाई गई हो और गुजिया पेड़ पर चढ़ गई हो तो ऐसी अवस्था में कार्बोसल्फांस 25 ई.सी. (2 मी.ली. प्रति ली. पानी में) अथवा डायमेथोएट 30 ई.सी. (2 मी.ली. प्रति ली.) का छिड़काव स्टीकर साथ निम्फ की प्रारम्भिक अवस्था में करना चाहिए। पुष्प गुच्छ मिज (इरोसोमिया इंडिका) आम के बौर का मिज, आम के प्रमुख नाशी कीटों में से एक है। इस कीट के वयस्क हानिकारक नहीं होते हैं। मादा कीट द्वार फूलों के भागों पर अविकसित फलों पर और बौर को घेरती हुई नई पत्तियों पर दिए अण्डों से 2-3 दिनों में बच्चे निकल कर पौधों के मुलायम भागों में प्रवेश कर जाते हैं। इनके द्वारा पौधों के मुलायम भागों के अंदर के भाग को खाने से प्रभावित भाग सूख कर गिर जाता है। पूर्ण विकसित शिशु-कीट भूमि में गिर कर प्यूपा में बदल जाते हैं। इस कीट के एक वर्ष में 3-4 वंश होते हैं। प्रतिकूल मौसम होने पर लार्वा भूमि में सुप्तावस्था में चले जाते हैं और अगले वर्ष जनवरी में अनुकूल मौसम के आगमन पर ही प्यूपा में बदलते हैं। आम के पौधों पर मिज के प्रकोप से तीन चरणों में हानि होती है। इसका पहला आक्रमण कली के खिलने की अवस्था में होता है। नये विकसित बौर में अंडे दिए जाने तथा लार्वों द्वारा बौर के मुलायम डंठल में प्रवेश करने से वे आगे से मुड़ जाते हैं। तत्पश्चात प्रकोप की अधिकता में बौर पूर्ण रूप से नष्ट हो जाते हैं। पूर्ण विकसित लार्वा, बौर के डंठल से निकलने के लिए छिद्र बनाते हैं। इसका दूसरा आक्रमण फलों के बनने की अवस्था में होता है। इन फलों में अंडे देने तथा लार्वों के प्रवेश करने के फलस्वरूप फल पीले पड़ कर गिर जाते हैं। तीसरा प्रकोप बौर को घेरती हुई पत्तियों पर होता है। पहला आक्रमण अत्यंत गंभीर है और इससे पूरा बौर नष्ट हो जाता है। इसके प्रकोप के फलस्वरूप बौर का विकास रुक जाता है तथा लार्वो के डंठल में प्रवेश करने से बौर टेढ़ा हो जाता है। फूलों के विकसित होने तथा फलों के बनने से पहले ही बौर सूख जाता है। प्रबंधन आम के बागों की गुड़ाई/जुताई करने से धूप और गर्मी के कारण भूमिगत लार्वा तथा प्यूपा नष्ट हो जाते हैं। अत: अक्टूबर-नवम्बर माह में यह कार्य करना चाहिए। अप्रैल-मई में कलोरपाइरीफ़ॉस चूर्ण 1.5% (250 ग्रा. प्रति वृक्ष) का मिट्टी में प्रयोग करने से भी भूमिगत लार्वा तथा प्यूपा नष्ट करने में सफलता मिलती है। डायमेथोएट 30 ई.सी. (2 मी.ली. प्रति ली. पानी में) का कली निकलने की अवस्था (फरवरी) में 15 दिनों के अंतर पर दो छिड़काव करने से इस कीट पर नियंत्रण रखा जा सकता है। डासी मक्खी (बैक्ट्रोसेरा डारसेलिस/ बै. जोनेटा/ बै. करेक्टा) डासी मक्खी आम के फल को क्षति पहुँचाने वाला अत्यंत गंभीर नाशी कीट है। पूर्वी क्षेत्र में आस्ट्रेलिया से पाकिस्तान तक इसका प्रकोप देखा जाता है। इसके प्रकोप की वजह से आम के निर्यात में गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है। इसकी तीन प्रजातियाँ आम के विकसित फलों को क्षति पहुँचाती हैं। उत्तर भारत में नवम्बर से मार्च तक शीतकाल में प्यूपा की अवस्था में यह सुप्तावस्था में रहता है। बसंत ऋतु के अंत में अप्रैल के माह में जो अन्य फल पकने वाले होते हैं, उन पर इस मक्खी का प्रकोप दिखाई पड़ता है। ग्रीष्म काल में इसकी संख्या में अत्यधिक वृद्धि हो जाती है। इस कीट का आम के अलावा दूसरे फलों पर भी प्रकोप होता है। मार्च में अमरुद के फलों पर इसका जीवन-चक्र चलता है। उसके बाद अप्रैल-मई में लोकाट, आडू आदि फलों पर और जून में नाशपाती तथा अंजीर पर तथा अंत (जून-अगस्त) में आम के फलों पर इसका प्रकोप होता है। इस कीटकी संख्या में अगस्त से सितम्बर तक धीरे-धीरे कमी होती है और अक्टूबर से दिसम्बर तक यह नगण्य हो जाती है। मादा मक्खी के विकसित फ्कों में छेद कर दिए अण्डों से निकली गिडार, फल के गूदे का भक्षण कर उसे पकने से पहले ही सड़ा देती है। प्रबंधन फलों को पकने से पहले ही तोड़ने तथा इस कीट के प्रकोप की अधिकता को कम करने के लिए समस्त गिरे हुए और मक्खी के प्रकोप से ग्रसित फलों को इकट्ठा कर नष्ट करने से अत्यधिक सफलता मिलती है। वृक्षों के आस-पास अक्टूबर-नवम्बर में गुड़ाई/जुताई करने से भूमिगत प्यूपों को नष्ट किया जा सकता है। कार्बेरिल 0.2 प्रतिशत + प्रोटीन हाड्रोलाइजेट अथवा गुड़ का शीरा 0.1 प्रतिशत के मई के पहले सप्ताह में अंडे देने से पहले की अवस्था में छिड़काव किए जाने से वयस्क डासी मक्खी को नियंत्रित किया जा सकता है। यह छिड़काव 21 दिनों के बाद दुबारा किया जा सकता है। इस मक्खी को नियंत्रित करने का अन्य उपाय मिथाइल यूजिनाल यौन गंध ट्रैप है। यौनगंध ट्रैप के लिए प्लाईवुड के 5x5x1 सेमी. आकार के गुटके को 48 घंटे तक 6:4:1 के अनुपात में अल्कोहल: मिथाइल यूजीनॉल: मैलाथियान के घोल में भिंगो कर लगाना चाहिए। यौनगंध ट्रैप को दो माह के अंतर पर बदलना तथा एकत्रित मक्खियों को निकाल कर फेंक देना चाहिए। एक हेक्टेयर के लिए 10 ट्रैप की आवश्यकता होती है। निर्यात किए जाने वाले आम को वेपर हीट ट्रीटमेंट अथवा इरेडिएशन द्वारा उपचारित किया जाना चाहिए। स्केल कीट (क्लोरोपल्विनेरिया पालीगोनाटा/एस्पीडियोट्स डेस्ट्रक्टर/ सेरेटोप्लास्टिस स्प्रे.) उत्तर प्रदेश के कुछ भागों तथा सीमावर्ती इलाकों में इसके प्रकोप में निरंतर वृद्धि होती देखी गई है। इस कीट के बच्चे (निम्फ) और वयस्क पौधों की पत्तियों तथा अन्य मुलायम भागों का रस चूस कर उनकी जीवन शक्ति कम कर देते हैं। इसके अतिरिक्त ये कीट शहद की तरह का एक चिपचिपा पदार्थ भी निकालते हैं, जिससे एक प्रकार की फफूंद (सूटी मोल्ड) की वृद्धि में सहायता मिलती है। प्रबंधन अधिक प्रभावित भागों को काट कर पृथक करके, नष्ट करने और बाद में डायमेथोएट 30 ई.सी. (2 मी.ली.) प्रति ली. के घोल का 20 दिनों के अंतराल पर दो बार छिड़काव करने से इस कीट का नियंत्रण सफलतापूर्वक किया जा सकता है। तना बेधक (बैटोसेरा रुफोमैक्यूलाटा) तना बेधक सम्पूर्ण भारत में आम को हानि पहुँचाता है। इस कीट के गिडार पेड़ों के तनों में प्रविष्ट होकर उनके अंदर के भागों को खा कर क्षति पहुँचाते हैं। गिडार, तने में ऊपर की ओर सुरंग बनाते हैं जिसके फलस्वरूप पौधों की शाखाएँ सूख जाती हैं। कीट का अधिक प्रकोप होने से वृक्ष मर भी सकता है। इसके अंडे पेड़ों के तने तथा शाखाओं की दरारों में दिए जाते हैं। गिडार, तने के अंदर प्यूपा में बदल जाते हैं। वयस्क कीट, मई-जून में वर्षा के प्रारम्भ में बाहर आते हैं तथा जुलाई-अगस्त तक इनका निकलना चलता रहता है। इसका वर्ष में केवल एक ही वंश होता है। प्रबंधन प्रभावित शाखाओं को गिडार तथा प्यूपे सहित काटकर नष्ट कर देना चाहिए। छिद्रों को साफ़ कर उनमें डाइक्लोरोवास 76 ई.सी. (5 मिली. प्रति ली. पानी में) का घोल रूई के फाहे में भिगों कर गिडार द्वारा निर्मित छिद्रों में डाल कर छिद्रों को बंद कर इन कीटों का सफलतापूर्वक नियंत्रण किया जा सकता है। शूट गॉल सिला (एसिला सिस्टेलाटा) यह कीट उत्तरी भारत में खासतौर पर उत्तर प्रदेश, उत्तरी बिहार और पश्चिमी बंगाल के तराई वाले इलाकों में एक गंभीर नाशीकीट है। इस कीट के बच्चों द्वारा पत्तियों की कलिकाओं से रस चूसने के फलस्वरूप, उनका पत्तियों के रूप में विकास नहीं हो पाता, अपितु यह शंखाकार (नुकीले) अनियमित वृद्धि में होकर अंत में सूख जाती हैं। इनकी गांठे साधारणत: सितम्बर-अक्टूबर में देखी जा सकती है। नुकीली गांठों के बनने के फलस्वरूप इसमें फल नहीं बन पाते। निम्फ शीतकाल गॉल में रह कर गुजारते हैं। इस कीट का वर्ष में केवल एक ही वंश होता है। प्रबंधन गॉल तथा उनके भीतर स्थित निम्फ को इकट्ठा करके नष्ट करने से इस कीट का नियंत्रण किया जा सकता है। कीट का सफलतापूर्वक नियंत्रण क्वीनालफ़ॉस 30 ई.सी. (2 मिली. प्रति ली. पानी में) अथवा डाएमेथोएट 30 ई.सी. (2 मिली. प्रति ली. पानी में) का घोल 15 दिनों के अंतराल पर 2 छिड़काव अगस्त के मध्य से किया जा सकता है। छिड़काव में एक ही कीटनाशक दवा का दुबारा प्रयोग ठीक नहीं है। इससे कीटों में एक ही दवा को सहन करने की क्षमता उत्पन्न हो जाती है। आम का जाला कीट (आरथेगा इवाडुसैलिस) इस कीट का प्रकोप अप्रैल माह से प्रारम्भ होता है और दिसम्बर तक चलता है। यह कीट आम को अत्यधिक हानि पहुँचाता है। अंडे अकेले या झुण्ड में पत्तियों द्वारा बने हुए जाले में दिए जाते हैं। अण्डों से निकलने के बाद लार्वे पत्तियों की सतह को खुरचकर खा लेते हैं। उसके बाद लार्वे नर्म शाखाओं और पत्तियों को लार से चिपका कर घोंसले की तरह के आकार बना लेते हैं तथा पत्तियों के हरे भाग का भक्षण करते हैं। लार्वे जाले अथवा मिट्टी में ही प्यूपा में परिवर्तित हो जाते हैं। लार्वे को जब छेड़ा जाता है तो वे भूमि पर एक झटके के साथ गिरते हैं। प्यूपा 5-6 माह सुसुप्तावस्था में रहते हैं। आमतौर से एक घोंसले में 1 से 9 लार्वा तक पाए जाते है। प्रबंधन इस कीट के नियंत्रण हेतु जालों को नीचे गिरा कर एकत्रित कर जला देना चाहिए। अप्रैल से जुलाई माह तक छंटाई करने तथा इन्हें जलाने से भी सफलता मिलती है। अक्टूबर-नवम्बर में वृक्षों के चारों ओर की जमीन की गुड़ाई (जब इस कीट का अंतिम वंश प्यूपों में परिवर्तित हो जाता है) करने से भी इसके नियंत्रण में सहायता मिलती है। यदि कीट का प्रकोप अधिक है तो क्वीनालफ़ॉस 2.0 मिली. प्रति ली. पानी में या लैम्डा साईंलोथ्रिन 5 ई.सी. (1 मिली. प्रति ली. पानी में) स्टीकर के साथ 15 दिनों के अंतराल पर दो बार छिड़काव से भी इस कीट को नियंत्रित किया जा सकता है। आम फल भेदक (डुडुवा एप्रोबोला/अरचिप्स मिकासिआना) आम फल भेदक आम का एक प्रमुख नाशीकीट है जो उत्तर प्रदेश के फल उत्पादक क्षेत्रों की एक प्रमुख समस्या है। फल भेदक फल के मध्य भाग एवं बीज दोनों को प्रभावित करता है। किन्तु यह बीज को मुख्य रूप से प्रभावित करता है जिससे फल खाने लायक नहीं रह जाता है। जिस स्थान पर फल आपस में एक-दूसरे को छू रहे होते हैं, वहां इस कीट की सुंडी जाला बना कर फलों को खाती है। नवजात सुंडी फलों की वाह्य छिलके को खाती है, जबकि उम्र बढ़ने के साथ यह फलों में छेद कर गूदे को खाती है। प्रभावित फलों से उत्पन्न श्राव कत्थई या काले चिपचिपे धब्बों के रूप में फलों पर देखा जाता है। कीट द्वारा उत्पन्न क्षति के स्थानों पर संक्रमण के पश्चात फल सड़ने लगते हैं। प्रबंधन फल विकास की प्रारंभिक अवस्था में लेम्डा साइलोथ्रिन 5 ई.सी. (1 मिली. प्रति ली. पानी) या क्वीनालफ़ॉस 25 ई.सी. (1.5 मिली. प्रति ली. पानी की दर से) छिड़काव करें। प्रथम छिड़काव के 15 दिन बाद एक और छिड़काव करें। हर छिड़काव में कीटनाशी रसायन बदलते रहें जिससे कीटों में रसायन के प्रति प्रतिरोधी क्षमता का विकास न हो। बागों से सूखी टहनियों को एवं कीट ग्रसित फलों को एकत्र कर नष्ट कर देना चाहिए। आम का थ्रिप्स कीट (स्किरटोथ्रिप्स डौरसैलिस) थ्रिप्स की 20 प्रजातियाँ आम की फसल को क्षति पहुंचाती हैं जिसमें से सिरटोथ्रिप्स डौरसैलिस उत्तर प्रदेश में अधिकता से पाया गया है। इसका प्रकोप अप्रैल माह में आरंभ होता है तथा जुलाई में नई पत्तियों के निकलने तक जारी रहता है। इसके प्रकोप से फल को भी क्षति होती है। आम की पत्तियाँ, नई कलियाँ और फूल पर इसका प्रकोप होता है। आम का थ्रिप्स कीट सतह को खरोंचकर तथा पत्ती आदि का रस खाता है जिससे छोटे फल गिर जाते हैं तथा बड़े फलों पर भूरा खुरदरा धब्बा पड़ता है। जैसे-जैसे फल परिपक्व होता हैं, फल के प्रभावित भाग में छोटी-छोटी दरारें भी दिखाई देने लगती हैं। पत्तियों का मुड़ना और बौर का सूखना भी इसी कीट द्वारा पाया जाता है। जो पत्तियाँ नई निकल रही होती हैं, उस पर इसका प्रकोप होता है। खासकर जिन बागों का जीर्णोद्धार किया गया है उसकी नई कोपलें इससे प्रभावित होती हैं। प्रबंधन नवम्बर और दिसम्बर माह में खेत की गहरी जुताई करने से इस कीट के प्यूपा जमीन से बाहर निकलते है और सूख जाते है या अन्य कीट उन्हें खा लेते है। आवश्यकतानुसार स्पाइनोसैड 44.2 एस.सी. (1 मिली. प्रति 5 लीटर पानी में) तथा साथ ही स्टीकर (भिंगोने वाला साबुन) 0.3 मिली. प्रति लीटर डाल कर अप्रैल-मई में छिड़काव करना चाहिए। 15 दिन पश्चात थायमेथाक्सम 0.3 ग्रा. प्रति ली. का छिड़काव करना चाहिए। कीटनाशकों के प्रयोग में सावधानियाँ कीटनाशी दवा का छिड़काव उस समय न करें जब फूल पूर्णरूप से खिले हों। ऐसा करने से प्रागणकर्ता कीट मर जाते हैं। कीटनाशी दवा का प्रयोग बदल-बदल कर करना चाहिए अन्यथा कीटों में दवा के प्रति प्रतिरोधकता बढ़ जाती है। स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार