परिचय भारत एक विशाल देश है जहां 6.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में लगभग 60 प्रकार की सब्जियों की खेती की जाती रही है। विश्व के सब्जी उत्पादक देशों में भारतवर्ष का दूसरा स्थान है। सब्जियाँ मानव भोजन का एक अतिमहत्वपूर्ण हिस्सा है क्योंकि इनसे विटामिन, मिनरल एवं अन्य आवश्यक पोषक तत्व प्राप्त होते हैं। सब्जी उत्पादन किसानों के लिए एक लाभकारी व्यवसाय है। इसे ज्यादा लागत वाली खेती माना जाता है क्योंकि इसमें ज्यादा संसाधनों (पानी, अरासायनिक एवं रासायनिक खाद एवं अन्य संसाधन) की आवश्यकता होती है ज्यादा संसाधनों की वजह से सब्जियों में खरपतवार की समस्या भी गंभीर होती है विशेष रूप से चौड़ी पत्ती एवं सकरी पत्ती वाले खरपतवारों से सब्जी उत्पादन क्षमता बुरी तरह प्रभावित होती है। अगर यह कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होती की सब्जियों के उत्पादन में खरपतवार एक बहुत बड़ा अवरोध है। सब्जियों में खरपतवारों के प्रकोप का स्तर, प्रक्षेत्र एवं मौसम के हिसाब से अलग-अलग जलवायु, फसल पद्धति, मृदा उत्पादन क्षमता एवं सिंचाई प्रबंधन पद्धति के अनुसार बदलता रहता है। अतएव यह आवश्यक है कि इन खरपतवारों का समय पर उचित विधि से प्रभावी नियंत्रण करके सब्जी फसलों को इनके कुप्रभाव से बचाते हुए उत्पादन एवं गुणवत्ता को बढ़ाया जाए। खरपतवारों से प्रमुख हानियाँ खरपतवारों को यदि उचित समय पर नियंत्रित नहीं किया जाए तो यह सब्जियों की उपज एवं गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित करते है। सब्जी बीज उत्पादन में ये खरपतवार न केवल उपज कम करते है बल्कि सब्जियों के बीजों के साथ खरपतवारों के बीज मिलकर उसकी गुणवत्ता को भी खराब कर देते हैं, जिससे उनका मूल्य प्रभावित होता है। खरपतवारों के प्रकार, प्रकोप का स्तर, अवधि, फसलों की प्रतिरोधक क्षमता एवं जलवायु जो कि फसल की बढ़वार एवं खरपतवारों को प्रभावित करते हैं के आधार पर किए गए शोध अध्ययन से यह पाया गया है कि इससे सब्जियों के आर्थिक उपज में निम्न स्तर तक नुकसान होता है। फसल (उपज में कमी) आलू 20-50% मटर 25-40% गाजर/मूली 30-60% प्याज/लहसुन 50-70% टमाटर 40-70% फूल गोभी/पत्ता गोभी 50-65% मिर्च 50-70% राजमा 60-70% भिण्डी 50-60% बैंगन 60-75% कीटों एवं बीमारियों को फैलाने वाले विषाणुओं के लिए खरपतवार वैकल्पिक पोषक खरपतवार न केवल मुख्य फसल के साथ पानी, प्रकाश, स्थान एवं पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा करके उनकी बढ़वार एवं उत्पादन क्षमता को प्रभावित करते हैं, बल्कि कीटों एवं बीमारियों को भी आश्रय देते हैं और उनके लिए वैकल्पिक पोषक का कार्य करते हैं। कुछ प्रमुख खरपतवार जो वैकल्पिक पोषक का कार्य करते हैं, एस प्रकार हैं। पोषक खरपतवार सम्बंधित कीट/बीमारियाँ बिसिया सैटीवा (अंकरी) सोलेनम नाइग्रम (मकोय) हेलीकोबेरपा अर्मिगेरा बैंगन के फल एवं तना बेधक कीट (ल्यूसीनोडस ओषोनैलिस) चिनोपोडियम एल्बम (बथुआ) एजिरेटस (महकुँवा) एवं लैंटाना प्रजाति एफिड सफेद मक्खी जो की येलो मोजेक वाइरस को फैलाती है फसल नींदा प्रतिस्पर्धा का क्रांतिक समय मुख्यता ज्यादातर सब्जी वाली फसलों की शुरूआती बढ़वार की गति काफी धीमी तथा उनमें खरपतवारों से प्रतिरोध की क्षमता भी कम होती है। ऐसे क्रांतिक समय में फसलों को खरपतवार के प्रकोप से बचाना अति आवश्यक होता है, क्योंकि इस समय हुआ नुकसान फसल की बढ़वार एवं उत्पादन दोनों को प्रभावित करता है। विभिन्न सब्जी फसलों की क्रांतिक अवस्था इस प्रकार है। फसल क्रांतिक अवस्था (बुवाई के बाद) प्याज/लहसुन 30-70 दिन फूल गोभी/पत्ता गोभी 30-45 दिन भिण्डी 15-30 दिन टमाटर/.मिर्च 30-45 दिन बैंगन 20-60 दिन मूली/गाजर 15-20 दिन आलू 20-40 दिन मटर 30-45 दिन राजमा 40-60 दिन लोबिया 15-30 दिन सब्जियों में पाए जाने वाले प्रमुख खरपतवार मौसम के अनुसार निम्नलिखित खरपतवार प्रमुख रूप से विभिन्न सब्जी फसलों में उगते हैं । खरीफ वैज्ञानिक नाम सामान्य नाम अमरैन्थस विरडिस जंगली चौलाई सिटैरिया ग्लाऊका बनरा एजिरेटम कोनिज्याडस महंकुवा ब्राइकेरिया इरुसिफार्मिस सिजनल घास साइप्रस रोटेंड्स मोथा कोमैलीना वेन्धालेन्सिस कनी कनकवा सेलोसिया एरजेंटिया सफेद मुर्ग साइनोडान डाकटीलान दूब डिजिटैरिया प्रजाति क्रब घास डैकटीलोकटैनियम एजिपटियम मकराघास डाइजरा एसबैंन्सिस लहसुआ इकाइनोक्लोवा कोलाना संवा इल्युसिन इंडिका कोदो फैजालिस मिनिमा पचकोटा फाइलैन्थस निरुरी हजारदाना ट्राइएन्थिमा पोरटुलैकेस्ट्रम पथरचटा रबी वैज्ञानिक नाम सामान्य नाम ऐस्फोडिलस टेनुफोलियस वन प्याजी एनागैलिस आरवेन्सिस कृष्ण नील चिनोपोडियम अल्बम बथुआ कानबोल्वुलस आरवेन्सिस हिरनखुरी साइनोडान डाकटीलान दूबघास साइप्रस रोटैंड्स मोथा कोरोनोपस डिडिमस जंगली लुसर्न युफोर्बिया हिरटा दुधी लैथारस अफाका बनमटरी मेलिलोट्स इंडिका/एल्बा सजी पीली/ सफेद आराबंकी स्प. बांदा रुमैक्स मैरेटिमस जंगली पालक चिकोरियम इन्टाइबस चिकोरी विसिया सेटाइवा अकरी एविना फेटुआ जंगली जई कस्कुटा प्रजाति अमरबेल फ्यूमैरिया पर्वीलोरा बनसोया खरपतवार नियंत्रण/प्रबंधन की विधियाँ परंपरागत खरपतवार प्रबंधन विधि (हाथ से निंदाई) वर्तमान परिवेश में काफी खर्चीली एवं समय लेने वाला होने के कारण विशेष परेशानी का कारण बनता जा रहा है। अत: आवश्यकता है कि उन्नत खरपतवारनाशियों, यांत्रिक एवं कल्चरल विधि के समन्वय से समन्वित खरपतवार नियंत्रण पद्धति को अपनाया जाए जिससे खर्च एवं समय दोनों की बचत हो तथा नींदा का नियंत्रण सही समय पर उचित तरीके से हो सकें। सुरक्षात्मक विधि नींदा नियंत्रण की तुलना में सुरक्षात्मक विधि ज्यादा सरल एवं सस्ती है, इस पद्धति को अपनाने से फसलों में खरपतवारों का प्रकोप कम होता है। इसके लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते है। (1) खरपतवार मुक्त शुद्ध एवं प्रमाणित बीज/पौध का प्रयोग। (2) गोबर व कम्पोस्ट खाद पूर्ण रूप से सड़ी हो तभी उसका प्रयोग करें अन्यथा इससे सबसे ज्यादा मात्रा में खरपतवार बीजों के खेत में आने की संभावना रहती है। (3) कृषि यंत्रों की मिट्टी एक खेत से दूसरे खेत में प्रयोग करने से पहले साफ़ कर लें। (4) खरपतवार ग्रसित क्षेत्र की मिट्टी दूसरे खेत में डालने से बचें। (5) नर्सरी के स्थान को खरपतवार मुक्त रखें। (6) खेत के आस-पास की मेड़ों, पानी के स्त्रोत व नालियों को खरपतवार मुक्त रखें। (7) जानवरों को खरपतवार प्रभावित क्षेत्र से नियंत्रित क्षेत्र में जाने से रोकें। सस्य विधि (अ) स्टेल सीड बेड विधि इसमें सब्जियों के खेत को बुवाई/रोपाई हेतु 15-20 दिन पूर्व तैयार किया जाता है। 7 से 10 दिन बाद उपयुक्त नमी एवं तापमान रहने पर काफी मात्रा में खरपतवार खेतों में निकल आते हैं जिन्हें ल्गाइफोसेट अथवा पैराक्वाट नामक रसायन के प्रयोग से सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया जाता है तथा उसके पश्चात खेतों में मिट्टी को कम से कम छेड़ते हुए बुवाई अथवा रोपाई कर काफी हद तक सब्जियों में खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है। (ब) खेत की तैयारी हेतु उचित विधि अपनाकर सब्जी उत्पादन हेतु खेत की तैयारी से पूर्व उसमें पहले के वर्षों में उगने वाले खरपतवारों का ज्ञान आवश्यक होता है क्योंकि उसी के अनुरूप खेत की तैयारी की जाती है। यदि पूर्व के वर्षों में खेत में बहुवर्षीय खरपतवारों का प्रकोप ज्यादा रहा हो तो गहरी जुताई आवश्यक होती है जिससे उनकी जड़े एवं राइजोम/कंद टूट एवं उखड़कर ऊपर आ जाए जिसे इकट्ठा कर नष्ट करे दें तथा कुछ धूप से स्वत: नष्ट हो जाते हैं। यदि वार्षिक/सीजनल खरपतवार का प्रकोप पूर्व में ज्यादा रहा हो तो कम गहरी जुताई कर सब्जियों के बीज/पौध को सतह पर बुवाई/रोपाई कर नींदा का प्रकोप कम किया जा सकता है। (स) फसल चक्र उचित फसल चक्र अपनाकर भी काफी हद तक सब्जियों में खरपतवार के प्रकोप को कम किया जा सकता है जैसे प्रतिस्पर्धा फसलें मक्का, ज्वार/बाजरा इत्यादि जैसे घनी फसलें या तेजी से बढ़ने वाली दलहन फसलें जो कि बुवाई के 30-45 दिन में काफी फ़ैल जाती है के समन्वयन से फसल चक्र बनाकर सब्जियों की खेती करने से खरपतवार कम आते है खेत को कभी भी खाली न रखें उसमें फसल लगातार लेते रहे इससे भी खरपतवार कम आते है यदि फसल चक्र दो से तीन वर्ष लगातार बनाए रखे तो यह पाया गया है कि खरपतवार काफी हद तक नियंत्रित हो जाते है। यांत्रिक विधि हाथ द्वारा निंदाई करना कठिन एवं खर्चीला होता है और सब्जियों में निंदाई अन्य फसलों की अपेक्षा कई बार करना पड़ता है। औसतन एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 40-50 मजदूरों की आवश्यकता एक बार की निंदाई हेतु होती है। सब्जियों में सामान्यता दो निंदाई की आवश्यकता होती है, परन्तु कुछ सब्जियों में जैसे मिर्च, टमाटर, प्याज एवं लहसुन में तो 3-4 निंदाई की आवश्यकता पड़ती है। अत: ऐसी परिस्थिति में कतारों में बोई गई सब्जियों में हाथ से चलाने वाले नींदा यंत्रों (ढकेलकर/खींचकर चलाने वाले) का प्रयोग कम खर्चीला एवं समय/श्रम की बचत करने वाली विधि साबित हुई है, परन्तु इसमें कंद/जड़ वाली सब्जियों (मूली, गाजर, प्याज, लहसुन) को नुकसान होने (कटने) का भी डर रहता है। सिंचाई पद्धति ड्रिप पद्धति द्वारा सिंचाई किए गए क्षेत्रों में खरपतवारों की संख्या नालियों द्वारा सिंचाई विधि की तुलना में कम पाई जाती है, ड्रिप पद्धति में फसल बेस के नजदीक नमी ज्यादा होने से उन जगहों पर खरपतवार की संख्या थोड़ी ज्यादा होती है परन्तु अन्य क्षेत्रों में खरपतवार कम उगते है। फसल बोने से पूर्व की गई सिंचाई भी ज्यादा लाभप्रद होती है बजाय बुवाई के तुरंत बाद सिंचाई करने की तुलना में। क्योंकि बुवाई पूर्व की गई सिंचाई से नमी के कारण उगने वाले खरपतवारों को खरपतवारनाशी की मदद से अथवा जुताई करके नष्ट किया जा सकता है और फिर बुवाई/रोपाई की जा सकती है जिससे खरपतवार का प्रकोप कम हो जाता है। माल्चिंग विभिन्न शोध परीक्षणों से यह पाया गया है कि प्लास्टिक फिल्म, सूखा चारा एवं फसलों के अवशेष दो कतारों के बीच फैलाना नमी बनाए रखने एवं मृदा तापमान नियंत्रित करने में फायदेमंद होता है तथा साथ-साथ खरपतवारों के प्रकोप भी काफी कम होते हैं। इसके लिए चारा अथवा फसल अवशेषों को छोटे टुकड़ों में काटकर दो कतारों के बीच खरपतवार उगने के पूर्व फैला दिया जाता है। लेकिन यह भी पाया गया है कि कुछ खरपतवार जैसे मोथा इत्यादि फिर भी निकल आते है जिसके लिए हाथ से निंदाई अथवा खरपतवारनाशी रसायन का प्रयोग करना पड़ता है। मृदा सूर्यीकरण इस विधि में नमीदार भूमि के सतह पर पतली पारदर्शी पॉलीथीन शीट को गर्मियों में 4-6 सप्ताह के लिए फैलावकर उसके चारों तरफ के किनारों को मिट्टी से अच्छी तरह से दबा दिया जाता है ताकि सूर्य की गर्मी से पॉलीथिन शीट के नीचे मिट्टी का तापमान सामान्य की अपेक्षा 8-100 सें. बढ़ जाए। यह विधि नर्सरी के लिए बहुत ही लाभदायक एवं कम खर्चीला है और इससे विभिन्न प्रकार के खरपतवार के बीज/प्रकन्द (कुछ को छोड़कर जैसे मोथा एवं हिरनखुरी इत्यादि) नष्ट हो जाते हैं। परजीवी खरपतवार ओरेबंकी, सूत्रकृमि एवं मिट्टी से होने वाली बीमारियों के जीवाणु इत्यादि भी नष्ट हो जाते हैं। यह विधि काफी व्यवहारिक एवं सफल है। रासायनिक विधि द्वारा खरपतवार प्रबंधन अलग-अलग सब्जियों के हिसाब से खरपतवारों के नियंत्रण हेतु कई शाकनाशियों की संस्तुति की गई है जो काफी कारगर है, लेकिन च्वाइस के लिए हाईली सलेक्टिव नींदानाशी की संख्या अभी भी कम है। यह विधि कारगर, श्रम एवं समय की बचत करने वाली तथा कम खर्चीली है। सब्जियों में पाया गया है कि खरपतवार को नियंत्रित करने हेतु यदि नींदानाशी का प्रयोग यांत्रिक अथवा कल्चरल विधि के समन्वय से किया जाए तो यह बहुत ही प्रभावी एवं कारगर होता है। संस्तुति किए गए नींदानाशियों का विवरण फसल के हिसाब से इस प्रकार है। क्र.सं. शाकनाशी रासायनिक मात्रा (ग्राम या मि./हें.) प्रयोग का समय प्रयोग वाली फसलें टिप्पणी रसायनिक नाम व्यवसायिक नाम 1 पेंडीमैथिलीन स्टाम्प, पेंडीगोल्ड, पेंडीलीन, धानुटाप, पेनिडा, पेंडीहब 1000-1250 बुवाई के बाद किन्तु अंकुरण से पूर्वं। प्याज, लहसुन, पत्ता गोभी, फूल गोभी, आलू, चुकन्दर, गाजर, मूली, धनिया, मेथी, जीरा, सौंफ, मटर सभी वार्षिक घासकुल एवं कुछ चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों को नियंत्रित करता है। 2 फ्लूक्लोरोलीन वासालिन 1000-1500 बुवाई के ठीक पहले मिट्टी में मिलावें। टमाटर, बैंगन, आलू, भिण्डी, लहसुन, प्याज, गाजर, धनिया, मेथी, सौंफ, जीरा, हरी मिर्च, फूल गोभी, पत्ता गोभी, मटर इत्यादि। मुख्यत: सभी प्रकार के सकरी एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों की रोकथाम करता है। 3 आक्सीफ्लोरोफैन आल्टो, गोल, आक्सीगोल्ड 200-300 बुवाई/रोपाई के तीन दिन के भीतर आलू, प्याज। सभी प्रकार के वार्षिक घासकुल एवं कुछ चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों का प्रभावी नियंत्रण। 4 ब्यूटाक्लोर मैचिटी, बीडकिल, टीअर, धानुक्लोर, विलक्लोर, ट्रैप 750-1000 बुवाई के बाद किन्तु अंकुरण से पूर्व। टमाटर, कुकुरबिट्स, आलू, गाजर। मुख्यत: घासकुल एवं कुछ चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के लिए उपयुक्त है। 5 मेट्रीब्यूजिन सेकार, लेक्सोन, टाटा मेट्री 200-350 बुवाई के बाद किन्तु अंकुरण से पूर्व। टमाटर, आलू,गाजर। घासकुल एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों पर प्रभावी नियंत्रण। 6 आक्साडायाजोन रोंस्टार 500-750 बुवाई/रोपाई के तीन दिन के भीतर। प्याज, लहसुन, टमाटर, बैगन, हरी मिर्च, लोबिया सकरी एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों पर प्रभावी नियंत्रण 7 एलाक्लोर लासो 1500-2000 बुवाई/रोपाई के तीन दिन के भीतर टमाटर, बैंगन, हरी मिर्च, मटर, कद्दूवर्गीय सब्जियां, राजमा, लोबिया। मुख्यत: वार्षिक घासकुल कुछ चौड़ी पत्ती एवं मोथा कुल के खरपतवारों को नियंत्रित करता है। नोट: (1) खरपतवार नाशी रसायन की उचित मात्रा को 500-600 ली./हेक्टेयर पानी में मिला कर छिड़काव करें। (2) छिड़काव हेतु नैपसेक स्प्रेयर एवं फ़्लैट फैन नोजल का प्रयोग करें। एकीकृत खरपतवार प्रबंधन सब्जियों के खरपतवार प्रबंधन में यह पाया गया है कि कोई भी सिर्फ एक विधि ज्यादा कारगर (आर्थिक अथवा नियंत्रण की दृष्टि से) नहीं है। अंकुरण पूर्व प्रयोग होने वाली शाकनाशी का एक निंदाई के साथ समन्वय कर प्रयोग करने से न केवल ऐ ही विधि से नियंत्रण पर निर्भरता कम हो जाती है, बल्कि ज्यादा लाभदायक परिणाम प्राप्त होते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य खरपतवार नियंत्रण में शाकनाशी की मात्रा को कम करना है जिससे इन रसायनों के पर्यावरण पर होने वाले दुष्परिणामों से बचा जा सके तथा खाद्य पदार्थो में इन रसायनों के अवशेष सीमित मात्रा में हो रहें। सावधानियाँ शाकनाशी रसायनों के प्रयोग करते समय निम्नलिखित सावधानियाँ रखनी चाहिए। शाकनाशी रसायनों की उचित मात्रा का ही प्रयोग करना चाहिए। यदि संस्तुति दर से अधिक शाकनाशी का प्रयोग किया जाता है तो खरपतवारों के अतिरिक्त फसल को भी क्षति पहुँच सकती है। शाकनाशी रसायनों को उचित समय पर छिड़कना चाहिए। अगर छिड़काव समय से पहले या बाद में किया जाता है तो लाभ की अपेक्षा हानि की संभावना रहती है। शाकनाशी रसायनों का घोल तैयार करने के लिए रसायन व पानी की सही मात्रा का उपयोग करना चाहिए। एक ही रसायन का बार-बार फसलों पर छिड़काव न करे बल्कि बदल-बदल कर करें अन्यथा खरपतवारों में लगातार उपयोग में लाने वाले शाकनाशी के प्रति प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न हो सकती है। छिड़काव के समय मृदा में पर्याप्त नमी होना चाहिए तथा पूरे खेत में छिड़काव एक समान होना चाहिए। छिड़काव के समय मौसम साफ़ होना चाहिए। यदि दवा इस्तेमाल से ज्यादा खरीद ली गई है तो उसे ठंडे, शुष्क एवं अंधेरे स्थान पर रखें तथा ध्यान रखें कि बच्चे एवं पशु इसके सम्पर्क में न आवें। प्रयोग करते समय ध्यान रखिए कि रसायन शरीर पर न पड़े। इसके लिए विशेष पोशाक दस्ताने, चश्में का प्रयोग करें अथवा उपलब्ध न होने पर हाथ में पॉलीथीन लपेट लें तथा चेहरे पर गमछा (तौलिया) बांध लें। प्रयोग के पश्चात खाली डिब्बों को नष्ट कर मिट्टी में दबा दें। इसे साफ़ कर इसका प्रयोग खाद्य पदार्थो को रखने के लिए कतई न करें। छिड़काव समाप्त होने के बाद दवा छिड़कने वाले व्यक्ति साबुन से अच्छी तरह हाथ व मुँह अवश्य धो लें। स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार