परिचय पादप पोषण मैं सूक्ष्म पोषक तत्वों की महत्ती भूमिका है जस्ता एक महत्वपूर्ण तत्व है ,इसकी पादप पोषण मैं अहम् भूमिका है । बढती जनसँख्या हेतु खाद्यान्न उत्पादन मैं वृद्धि एवं गुणवत्ता को ध्यान मैं रखते हुए गत वर्षों मैं जस्ते के शोध पर जोर दिया जा रहा है की किस प्रकार फसलों मैं जस्ते की मात्रा को बढाया जा सके जिससे मानव मैं होने वाले कुपोषण को कम किया जा सके । अतः खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि के लिए जस्ते की वृद्धि की तकनीकों का विकास अत्यंत महत्वपूर्ण है। जहां एक तरफ फसलों का उत्पादन बढ़ रहा है वही दूसरी ओर मृदा से अधिक मात्रा में पोषक तत्वों का खनन होने से मृदा उर्वरता पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। हरित क्रांति के फलस्वरूप अधिक उपज देने वाली अनाजी फसलों, जिनमें अनुवांशिक रूप से सूक्ष्म तत्वों की मात्रा कम होती है ,सूक्ष्म तत्वों की कमी वाली मृदाओं में उगाने से इनमें सूक्ष्म तत्वों की मात्रा और भी कम हो जाती है। सघन कृषि के परिणाम स्वरूप सूक्ष्म पोषक तत्वों विशेष रूप से जस्ते का खनन हो रहा है। उर्वरकों द्वारा मुख्य पोषक तत्वों की कुछ हद तक तो पूर्ती होती है परन्तु जिंक युक्त उर्वरकों के सीमित प्रयोग से मृदाओं में जस्ते की कमी लगातार बढ़ती जा रही है। अधिक उपज देने वाली प्रजातियों के दानों में भी जिंक की कमी कम होती जा रही है। जिससे अनाजों, दलहनों, व सब्जियों का उत्पादन घटने के साथ उनकी गुणवत्ता साथ-साथ पशुओं व मनुष्यों पर भी विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। अतः यह आवश्यक है की इस तत्व की कमी से होने वाले लक्षणों के बारे मैं जानकारी हो साथ ही इसे प्रभावित करने वाले कारकों के बारे में ज्ञान जस्ते के उचित प्रबंधन मैं सहायक हो सकता हैं जस्ते की पादप पोषण मैं भूमिका : जस्ता कैरोटीन व प्रोटीन संश्लेषण में सहायक है। जस्ता हार्मोन्स के जैविक संश्लेषण में सहायक है। जस्ता एन्जाइम (जैसे-सिस्टीन, इनोलेज, डाइसल्फाइडेज आदि) की क्रियाशीलता बढ़ाने में सहायक है जस्ता जस्ता क्लोरोफिल के निर्माण में उत्प्रेरक का कार्य करता है। जस्ते की कमी के सामान्य लक्षण: फसलों में जस्ते की कमी का सही समय पर निरूपण अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है। फसलों में जस्ते की कमी मृदा परीक्षण, उत्तक परीक्षण एवं पौधों में दृष्य लक्षणों के आधार पर ही जाती है। जिसमें हम पौधों में जस्ते की पूर्ति का सही समय एवं विधि की जानकारी हासिल कर सकते हैं। सामान्य तौर पर इसकी कमी से पत्तियों की शिराओं के बीच में हरिमाहीनता होने लगती है। धान मैं इसकी कमी से जो रोग होता है ,खैरा रोग के नाम से जाना जाता है। नई पत्तियों पर कांसे के रंग के धब्बे पड़ जाते हैं, इसकी कमी से गेहूँ के पौधे की पत्तियों का पीला पड़ना तथा मक्के की नई पत्तियों पर सफेद धारी बन जाना जस्ते की कमी के प्रमुख लक्षण है। सामान्यतःऐसा भी देखने में आता है कि पौधों में जस्ते तत्व की कमी होने पर पौधे में कोई दृष्य-लक्षण दिखाई नहीं देता है। इस दशा को “हिडेन हंगर“/“छुपी हुई भूख“ के नाम से जाना जाता है। ऐसी अवस्था में अगर पौधे में जस्ते तत्व की खुराक नहीं दी जाती तो फसल उत्पादन पर विपरीत असर पड़ता नई पत्तियों में अन्तः शिराओं मैं पर्ण हरिमाहीनता दिखाई देती है। जबकि शिराओं से लगा भाग हरा ही रहता है। पर्व छोटे तथा पत्तियाँ मुड़ी हुई होती है। सब्जी वाली फसलों में नई पतितयों के रंग में असामान्य रूप से परिवर्तन दिखाई देता है। पत्तियाँ चित्तीदार, मुड़ी हुई व रंगीन होती है। जस्ते की कमी से होने वाली पर्ण हरिमाहीनता लोहे की कमी के लक्षणों से मिलती है। परन्तु यह अन्तर आसानी से समझा जा सकता है क्योंकि जस्ते की कमी से पत्तियों के आधार भाग पर सफेद धब्बे से दिखते हैं जबकि लोहे की कमी से अन्तःशिराएँ , हरिमा हीनता पत्ती की पूरी लंबाई में दिखाई देती है। नीबू वर्गीय पौधों में आसामान्य अन्तःशिराओं मैं पर्ण हरिमाहीनता दिखाई देती है साथ ही पत्तियाँ आकर मैं छोटी व नुकीली और मुड़ी दिखाई देती हैं एवं फलों का बनना बहुत कम हो जाता है। दलहनी फसलों की पुरानी पत्तियों में अन्तः षिरीय पर्ण हरिमाहीनता दिखाई देती हैव साथ ही क्लोरोटिक धब्बों की बजह से उतक मृत होकर झड़ जाते हैं। धान मैं जस्ते की कमी होने के कारण धान के पौधों में सर्वप्रथम ऊपर से तीसरी-चौथी पत्ती पर कांस्य रंग के धब्बे दिखाई देते है जो बाद में आकार में बड़े होकर सम्पूर्ण पत्रफलक में फैल जाते है।कल्लों की संख्या कम हो जाती है एवं जड़ों की वृद्धि रूक जाती है। बालियों में बांझपन आ जाता है। जिससे फसल उत्पादन में कमी होती है। चना मैं बुवाई के 3-4 सप्ताह पश्चात पत्तियों पर लाल-भूरापन (जंग जैसा) दिखाई देता है। तने में दो गाँठो के बीच लंबाई कम रह जाती है। जिसके कारण पौधे छोटे-छोटे रह जाते हैं। जिंक की उपलब्धता को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक पौधों के लिए जस्ते की उपलब्धता सुनिश्चित किया जाना अत्यन्त आवश्यक होता है। मृदा में होने वाली भौतिक, रासायनिक और जैव प्रक्रियाएं जिंक की उपलब्धता को प्रभावित करती है। मृदा पी. एच. मान (अम्लीयता/क्षारीयता) जस्ते की विलेयता तथा उपलब्धता अम्लीय मृदाओं (0.6 से कम पी. एच. मान) में बढ़ जाती है। परन्तु अम्लीय मृदा में धान उगाने वाले क्षेत्रों में जस्ते की कमी देखी गई है। धान के खेत में लगातार पानी भरने से मृदा का आक्सी-अवकरण क्षमता कम हो जाती है जिससे सल्फर का अवकरण हो जाता है और जस्ते के साथ मिलकर जिंक सल्फाइड बनाती है, जो कि पानी में कम घुलनषील होता है। परिणामस्वरूप जस्ते की उपलब्धता कम हो जाती है। मृदा पी. एच. 7.0 से अधिक होने पर जस्ते की मृदा में उपलब्धता घटने लगती है। मृदा जीवांश पदार्थ मृदा जीवांश पदार्थो में उपलब्ध एलीफेटिक अम्ल, फीनाल्स, फिनोलिक अम्ल, ह्यूमिक एवं फल्विक अम्ल जस्ते के चिलेषन में सहायक होते हैं। जिससे पौधों में उसकी उपलब्धता बढ़ जाती है। जीवाणु, कार्बनिक अम्ल पैदा करते हैं जो कि आक्सीकरण अवकरण के लिए जिम्मेदार होते हैं तथा जस्ते की उपलब्धता पर भी प्रभाव डालते है। कैल्षियम युक्त अधिक नमी वाली मृदाओं में की कमी बढ़ जाती है। पानी भरने से सामान्यता जस्ते की उपलब्धता घटती है। वातावरण ठण्डा एवं नम वातावरण सामान्यतः जस्ते की उपलब्धता पर विपरीत प्रभाव डालता है। मृदा तापक्रम में बढ़ोतरी सामान्यः जस्ते की उपलब्धता को बढ़ाती है। कभी मृदा में अधिक फास्फोरस व मैंगनीज के कारण भी जस्ते की कमी दिखाई देती है। लेखन:आकांक्षा सिकरवार, योगेश सिकनिया, ,डा राहुल मिश्र ,सीमा भारद्वाज, विमल शुक्ला भा. कृ. अ. प. - भारतीय मृदा विज्ञान संसथान ,भोपाल आर.वी.एस.के.वी.वी, ग्वालियर