परिचय पंगास आज मीठे पानी में पाली जाने वाली दुनिया क तीसरी सबसे बड़ी प्रजाति है। यह प्रजाति 6-8 माह में 1.0 – 1.5 किग्रा की हो जाती है तथा वायुश्वासी होने के कारण कम घुलित आक्सीजन को सहन करने की क्षमता रखती है।भारत में आंध्रप्रदेश पंगास का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। झारखण्ड की जलवायु पंगेसियस मछली पालन के लिए अनुकूल है ।यहाँ के मौसमी तालाबों को देखते हुए 7-8 माह में ही 1.0 से 1.5 किग्रा वजन की मछली प्राप्त कर सकते हैं ।यह शार्क मछलियों की तरह चमकदार होती है तथा इसे छोटे अकार में एक्वेरियम में भी पाला जा सकता है। पंगेसियस मछलियों की विशेषताएं इसकी वार्षिक वृद्धि दर अधिक है । वायुश्वासी होने के कारण कम घुलित आक्सीजन वाले जलीय स्त्रोतों में पाली जा सकती है । इस मछली की मांग व्यापक है । अन्य मछलियों की तुलना में इसमें पतले कांटें काम होते हैं इसलिए यह प्रजाति प्रसंस्करण के लिए उपयुक्त है । इस प्रजाति में रोगनिरोधक क्षमता अधिक है। भारतीय मुख्या कार्प के साथ आसानी से पालन की जा सकती है । तालाब का चयन पंगास पालन के लिए संचयन तालाब का क्षेत्रफल 0.5 से 1.0 एकड़ तक अच्छा माना जाता हैपरन्तु 10-15 एकड़ तक क्षेत्रफल में भी इसका पालन संभव है तालाब में पानी की गहराई 1.5 – 2.0 मी.तक होनी चाहिए।अधिक गहराई वाले तालाब उपयुक्त नहीं हैं क्योंकि वायुश्वासी होने के कारण ये बार बार पानी की सतह पर आकर आक्सीजन लेती हैं।ज्यादा गहराई होने से इन्हें ऊपर आने और जाने में ज्यादा ऊर्जा खपत करनी होगी जिससे उनकी वृद्धि दर कम हो जाती है। जल की गुणवत्ता पंगास की अच्छी वृद्धि एवं अच्छे स्वास्थ्य के लिए निम्नलिखित जलीय गुणों का होना आवश्यक है तापक्रम 26-30० c पी०एच० 6.5 – 7.5 घुलित आक्सीजन >5 ppm लवणता < 2 ppt क्षारीयता 40-200 ppm कुल अमोनिया <0.5 ppm संचयन तालाबों में पालन की विधि संचयन तालाबों में डाले जाने वाली अंगुलिकाओं को आस-पास ही तैयार करना चाहिए क्योंकि दूर से अंगुलिकाओं का परिवहन कर लाना और संचयन करना काफी कठिन है। अधिक दूरी के परिवहन से मछलियों को काफी चोट आती है, एक दूसरे के कांटे उनको घायल करते हैं एवं खरोंच के कारण बीमारी होने के ज्यादा आसार होते है। सिर्फ पंगास मछली पालन (एकल पालन) हेतु 10-15 ग्राम की अंगुलिकाओं को 20,000-25,000 प्रति हे० की दर से संचित किया जा सकता है जिससे 15-20 पंगास का उत्पादन लिया जा सकता है। जब पंगास मछली का पालन कार्प मछलियों के साथ किया जाए तब इसकी संचयन दर 10,000-12,000 प्रति हे० होनी चाहिए जिसमें 10-12 टन प्रति हेक्टेयर अनुमानित उत्पादन होगा ।जैविक खाद (गोबर) का प्रयोग 1000-12000 प्रति हे० पालन अवधि में 8-10 भागों में बांटकर करना चाहिए ।रासायनिक खाद के रूप में यूरिया 5 किग्रा/एकड़ एवं सिंगल सुपर फास्फेट 6-7 किग्रा/एकड़ प्रति 3 महीने में एक बार उपयोग करना चाहिए। पूरक आहार पंगास मछली की खेती में पूरक आहार के रूप में फैक्ट्री फारमूलेटेड फ्लोटिंग फीड ही सर्वोतम है और इसके उयोग से ही वंचित उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। पंगेसियस मछली मुख्यत: पूरक आहार पर निर्भर रहती है, जिससे पालन में बहुत आसानी होती है। प्रारंभिक अवस्था में यह छोटी मछलियों, तालाब में उलब्ध काई तथा घोंघें को खाती है। बड़े होने पर यह सर्वभक्षी हो जाती है तथा तालाब में पूरक आहार को बड़े चाव से खाती है ।अगर तालाब में प्राकृतिक भोजन की उपलब्धता अच्छी हो तो पूरक आहार में खर्च काफी काम आता है ।पूरक आहार के रूप में बाजार में उपलब्ध विभिन्न कंपनियों का भोजन उपलब्ध है। मछलियों के शारीरिक भार के हिसाब से फ्लोटिंग फीड का उपयोग करने वाले किसानों की सुविधा हेतु आहार तालिका निम्न है: - मछली कस शारीरिक भार (gm) फ्लोटिंग फीड के दानों का आकार (nm) प्रतिशत भोजन (शारीरिक भार का) प्रोटीन की मात्रा भोजन में 5-10 1.5 7% 32% 10-20 2 6% 32% 20-30 2 5% 32% 30-40 3 4% 28% 50-100 3 3-5% 28% 100-200 4 2-5% 28% 200-300 4 2% 28% 300-400 4 1-5% 28% 400-600 4 1-5% 28% 600-700 4 1-5% 28% 700-800 4 1% 28% 800-1000 4 1% 24% पालान करते समय हर 15 दिन के अन्तराल में जाल चला कर तालाब में मछलियों के वजन का आकलन कर आहार मात्रा निर्धारित करनी चाहिए । पंगेशियस मछली का भोजन भींगा हुआ भोजन इस खेती के लिए उपयुक्त नहीं है ।इसकी वृद्धि के लिए सर्वोतम भोजन पानी की सतह पर तैरने वाला माना जाता है ।फ्लोटिंग फीड इस मछली के लिए ज्यादा उपयुक्त है ।भोजन में अधिक प्रोटीनयुक्त पदार्थ का उपयोग किया जाता है ।यदि पालन किसी अन्य मछली की प्रजाति के साथ हो रहा हो तो हम बैग के द्वारा भी भोजन दे सकते हैं । विशिष्टता यह अन्य कार्प मछलियों के साथ भी पाली जा सकती है ।जिन क्षेत्रों में कम लवणीय पानी उपलब्ध है वहां भी इसकी खेती की जा सकती है ।चूँकि यह अन्य मछलियों के साथ भोजन में कोई प्रतिस्पर्धा नहीं करती है, अत: इन्हें दूसरे मछलियों के साथ भी पालन किया जा सकता है । सावधानियां चूँकि यह सर्वभक्षी मछली है, अत: इन्हें नदियों में जाने से रोका जाना चाहिए ।एकल खेती में 15-20 ग्रा० की अंगुलिकाओं को 20 हजार/ हे. की दर से संचयन करने से 20-25 टन प्रति हे. की दर से संचयन करने से 20-25 टन प्रति हे. की फसल 7-8 माह में उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है । जाड़े के दिनों में विशेषकर जब तापमान 15 सेल्सियस से कम हो जाता है तो मछली तनाव में आ जाती है। खाना नहीं के बराबर खाती है जिससे इसका वजन घटने लगता है। ऐसी स्थिति में अक्टूबर माह तक मछली की निकासी कर ली जाए। विपणन चूँकि एस मछली के मांस में काँटा नहीं होता है इसलिए आसानी से इसका पीस बनाया जा सकता है ।बाजार में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है तथा अधिक उत्पादन होने पर इसे प्रोसेसिंग पर विदेशों में भी भेजा जा सकता है । पंगास पालन में ध्यान देने वाली छोटी-छोटी बातें संचयन तालाब में अधिक दूरी से परिवहन कर लाये गए अंगुलिकाओं या फ्राई को संचयन से पहले एक ड्रम में पोटेशियम परमैगनेट का 10% का घोल बनाकर 30-40 सेंकेण्ड डुबाकर निकालने के बाद संचयन करना चाहिए ।ऐसा करने पर बीमारी के संक्रमण का खतरा बहुत कम हो जाता है । अंगुलिकाओं का परिवहन न कर फ्राई का परिवहन कर अपने तालाबों में ही अंगुलिकाओं को तैयार कर संचयन करना ज्यादा बेहतर होता है । पूरक आहार के रूप में दिये जाने वाले प्रतिदिन के फीड राशन को एक बार न देकर उसे बांटकर 3 से 4 बार में भोजन देना ज्यादा लाभकारी है ।ऐसा करने से भोजन का पाचन एवं उपयोग ज्यादा अच्छा होआ है एवं वृद्धि ज्यादा होती है । हर 10 दिनों के अंतराल में 1 दिन पूरक आहार नहीं देना चाहिए ।एक दिन छुट्टी का दिन होना चाहिए ।ऐसा करने पर फीड की बचत होती है एवं वृद्धि में कोई कमी नहीं होती है तथा ऐसा करने पर मछलियों की पाचन शक्ति में भी वृद्धि होती है । सप्ताह के एक दिन मकई का दर्रा, चावल का कोढ़ा को मिलाकर भी भोजन दिया जा सकता है ।इसे कच्चा न देकर उसे अच्छी तरह मिलाकर भोजन दें ।ऐसा करने से भोजन का पाचन अच्छा होता है एवं उनके वृद्धि पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है ।किन्तु इसे कम मात्रा में दिया जाय अन्यथा इसके जाल में चिपकने का डर रहता है । एस मछली के पालन में भोजन की मात्रा जानने के लिए हर 15 दिन के अंतराल में मछलियों का औसत वजन जानते रहना चाहिए । जाड़े के मौसम के प्रारंभ में ही तालाब में उचित मात्रा में चूना का प्रयोग जरूर कर लेना चाहिए ।इससे बीमारियों के संक्रमण का खतरा कम हो जाता है । जरुरत से ज्यादा भोजन देने से हमेशा बचना चाहिए। सघन खेती में जरुरत से ज्यादा पूरक आहार देने से कभी-कभी पानी में अमोनिया की सान्द्रता बढ़ जाती है।अमोनिया की मात्रा पानी में ज्यादा हो जाने पर मछलियाँ मर भी सकती है।अत: इसे हमेशा ध्यान में रखना चाहिए। ठंडे महीने की तुलना में गर्मी के महीनों में पंगास की वृद्धि तेजी से होती है ।अत: संचयन गर्मी के शुरुआत में करना ज्यादा अच्छा है ताकि गर्मी में संचयन एवं पालन कर ठंडे के महीने में इनकी शिकारमाही एवं बाजार में बिक्री की जा सके। पंगेसियस मछली पालन का क्या हैं तरीका, देखिए इस विडियो में स्त्रोत: मत्स्य निदेशालय, झारखण्ड सरकार