<h3 style="text-align: justify;">स्लीपिंग जाएंट</h3> <p style="text-align: justify;">भारत में 19,370 जलाशय लगभग 15 राज्यों में फैले हुये हैं और इनका अनुमानित क्षेत्रफल 3.15 मिलियन हैक्टर है। इन जलाशयों को इनके क्षेत्रफल के आधार पर तीन वर्गों में बांटा गया है-बड़े, मध्यम और छोटे जलाशय। इनमें से बड़े और मध्यम जलाशय देश के कुल अंतस्र्थलीय मछली उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं। अभी तक इन जलाशयों की संभावित उत्पादन क्षमता का पूरी तरह से दोहन नहीं किया गया है इसलिए इन्हें ‘स्लीपिंग जाएंट’ भी कहा जाता है। कालांतर में इस जलाशयों की उत्पादन क्षमता को पूर्ण तौर पर प्राप्त करने लिए कई तकनीकें विकसित की गईं हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccdownlod.jpg" width="203" height="177" /></p> <h3 style="text-align: justify;">पिंजरों में मछलीपालन</h3> <p style="text-align: justify;">केज कल्चर अर्थात पिंजरों में मछलीपालन एक गहन मत्स्य उत्पादन प्रणाली , जिसके अंतर्गत मछलियों को एक घेरे में संचय कर उनका पालन किया जाता है। इससे जल का प्रवाहअवरोधरहित होता है, जल के विनियम में आसानी और कूड़ा-कर्क के हटने से उपलब्ध जल क्षेत्र का उपयोग प्रभावी रूप से हो पाता है। इस कृषि प्रणाली में लाभ का प्रतिशत अधिक होता है तथा कार्बन उत्सर्जन कम होता है। यदि प्रौद्योगिकी की दृष्टि से देखा जाये तो इस पालन पद्धति के बहुत से लाभ हैं-कम समय और थोड़े प्रयास के साथ मछलीपालन करने से मछलियों के भोजन और रोग संक्रमण की निगरानी में आसानी, खुले जल क्षेत्रों में मछलियों की शिकारी जीवों से सुरक्षा आदि।</p> <h3 style="text-align: justify;">पंगास मछलियां उपयुक्त</h3> <p style="text-align: justify;">भारत में वर्तमान समय में मीठे जल में स्थापित पिंजरों में मछलीपालन के लिए पंगास मछलियों को ही उपयुक्त माना गया है, क्योंकि इसकी वृद्धि दर अधिक होती है। इसके साथ ही सुचि कैटफिश प्रजातियों के पालन की संभावनाओं की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। देश में इन कैटफिश मछलियों की मांग बहुत अधिक है और इनका बाजार मूल्य भी कम होता है जबकि अंतर्राष्ट्रीय निर्यात बाजार में इसकी मांग कम है। अतः पिंजरों में अधिक से अधिक स्वदेशी मत्स्य प्रजातियों के पालन की अपार संभावनायें हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">लेबियो रोहिता</h3> <p style="text-align: justify;">इसी प्रकार एक अन्य स्वदेशी प्रजाति, लेबियो रोहिता को भी सालिया जलाशय में पिंजरा पालन में शामिल किया गया। इसके लिए लेबियो रोहिता की अंगुलिकाओं (30.2±2.35 ग्राम) का 10 अंगुलिका प्रति घन मीटर की दर से पिंजरों में संचयित कर 90 दिनों तक पालन किया गया। इन मछलियों को व्यासायिक फ्लोटिं फीड खिलाया गया। पालन अवधि के बाद इन मछलियों का औसत वजन 680.98±26.53 ग्राम और कुल उत्पादन 503.38 कि.ग्रा. प्रति पिंजरा दर्ज किया गया। पिंजरों में लेबियो रोहिता के शामिल करने से बायो फाउलिंग की समस्या में भी कमी आई, क्योंकि इनके भोजन की प्रकृति भी बी गोनियोनोटस के समान ही देखी गयी है।</p> <h3 style="text-align: justify;">पुंटियस सराना </h3> <p style="text-align: justify;">प्रायोगिक पालन की दशा में उच्च मूल्य वाली शाकाहारी मछली, मीडियम कार्प प्रजाति, पुंटियस सराना को ओडिशा के सालिया डैम में चार पिंजरों (6 मीटर × 4 मीटर × 4 मीटर) में संचयित किया गया था। पी. सराना की उन्नत अंगुलिकाओं (25±3.6 ग्राम) को 10 अंगुलिका प्रति घनमीटर की दर से संचयित किया गया था। लगभग 3 महीने की पालन अवधि के बाद, इनका औसत वजन 150 ग्राम और जीवितता दर 90 प्रतिशत दर्ज की गयी। प्राप्त मत्स्य उपज कुल 460 कि.ग्रा. थी। पुंटियस सराना के पालन वाले पिंजरों में बायोफाउलिंग की समस्या देखने को नहीं मिली, क्योंकि वे जमे हुये तत्वों को खा जाती हैं। इस मछली की मांग अधिक होने के कारण पिंजरा पालन में प्रजाति विविधीकरण के तौर पर इसे एक उपयुक्त प्रजाति के लिये लिया जा सकता है।</p> <p style="text-align: justify;">पी. सराना एक शाकभोजी मत्स्य प्रजाति है और इसका मुख्य भोजन पेरिफायटन है। अतः पिंजरों में बायो फाउलिंग के रूप में पेरिफायटन का जमाव होता रहता है। इसलिए पिंजरा निर्माण में यदि आसानी से उपलब्ध और कम लागत वाली बांस के फट्टों की खपच्चियों और नायलॉन जाल का प्रयोग किया जाय तो इसमें पेरिफायटन का जमाव अधिक होगा। इससे पी. सराना को पर्याप्त भोजन भी मिल सकेगा और साथ ही इनके भोजन पर होने वाले व्यय में भी कमी आएगी।</p> <h3 style="text-align: justify;">बायोफाउलिंग का नियंत्रण महत्वपूर्ण पहलू</h3> <p style="text-align: justify;">पिंजरे में मछलीपालन तकनीक में प्रजाति विविधीकरण और प्रभावी स्थान और बायोफाउलिंग का नियंत्रण महत्वपूर्ण पहलू हैं। भारत के जलाशयों में केज कल्चर के विकास के लिये स्थानीय और स्वदेशी प्रजातियों का विविधीकरण एक प्रमुख कारक के तौर पर माना जा रहा है जिससे इस तकनीक की प्रभावकारिता और भी बढ़ सकती है। इस पालन पद्धति द्वारा जलाशयों में सतत और अधिक उत्पादन को लेकर भावी योजनायें जैसे द्वितीय नीली क्रांति और प्रधानमंत्राी मत्स्य संपदा योजना को बल मिलेगा और कृषकों की आय को दोगुना करने का मार्ग प्रशस्त होगा।</p> <h3 style="text-align: justify;">बायोफाउलिंग नियंत्रण क्यों है जरूरी</h3> <p style="text-align: justify;">केज कल्चर में बायोफाउलिंग का नियंत्रण एक बड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। जब पिंजरों के जाल में पेरिफायटन का जमाव हो जाता है, तब बायोफाउलिंग की समस्या देखने को मिलती है। बायोफाउलिंग से पिंजरों के जाल छिद्र अवरूद्ध हो जाते हैं, जिससे जल का आवागमन सुगमता से नहीं हो पाता है। पिंजरे में जीवाणु संक्रमण के कारण मछलियों में रोगों का खतरा भी बढ़ जाता है। इससे मछलियों की जीवितता दर कम होने के कारण उत्पादन भी कम होने लगता है। मछलियों के भोजन ग्रहण करने की प्रकृति के आधार पर कुछ स्वदेशी प्रजातियों को भी पिंजरे में शामिल किया जा सकता है, जिससे न केवल प्रजातियों के विविधीकरण के मुद्दे का हल होगा, बल्कि बायोफाउलिंग और पेरिफायटन के जमाव का भी नियंत्रण होगा।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccdownlod.jpg" width="311" height="218" /></p> <p style="text-align: justify;">पिंजरे में मछलीपालन में पंगासियनोडोन हाइपोफथलमस (पंगास) पालन के साथ शाकभोजी प्रजाति, बार्बोनोमस गोनियोनोटस (जिसे आमतौर पर जावा पुट्टी या गोनियोनोटस के नाम से जाना जाता है) को शामिल किया गया। पिंजरों में बायोफाउलिंग की समस्या को नियंत्रित किया जा सके, इसके लिए प्रयोग ओडिशा राज्य के सालिया जलाशय में किया गया था। इसके अंतर्गत पंगास और गोनियोनोटस प्रजातियों को पांच पिंजरों में विभिन्न अनुपात में रखा गया-पिंजरा 1: पंगास और गोनियोनोटस-80:20; पिंजरा 2: पंगास और गोनियोनोटस-60:40; पिंजरा 3: पंगास और गोनियोनोटस-50:50; पिंजरा 4: पंगास और गोनियोनोटस-40:60, और पिंजरा 5: पंगास और गोनियोनोटस-20:80 का अनुपात) इसके साथ ही पिंजरा 6 में गोनियोनोटस का एकल पालन और पिंजरा 7 में पंगास का एकल पालन किया गया। इस पालन में प्रति प्रयोग के लिये दो पिंजरे लिए गए। मछलियों का संचयन घनत्व 50 मछली प्रति घन मीटर रखा गया था। यह देखा गया कि गोनियोनोटस और पंगेसियस की वृद्धि और उत्तरजीविता पिंजरा-1 ;80:20) में बहुत अधिक पाई गई तथा गोयनियोटस के साथ लगाए गए बायोफाउलिंग का विकास भी बहुत कम देखा गया। गोनियोनोटस पालित पिंजरों में प्लवक और पेरिफायटन का घनत्व भी कम पाया गया। अतः इस अध्ययन से यह संकेत मिलता है कि यदि पिंजरों में शाकभोजी प्रजाति जैसे बी. गोनियोनोटस मछली को भी 20 प्रतिशत तक शामिल किया जाय तो पिंजरों में बायोफाउलिंग की समस्या का नियंत्रण हो सकता है। इससे पंगास मछली के उत्पादन में भी वृद्धि हो सकेगी।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccdownlod.jpg" width="189" height="166" /></p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), एच.एस. स्वैन, एम.एच. रामटेके, ए. उपाध्याय, डी.के. मीना, बी.के. दास और सुनीता प्रसाद भाकृअनुप-केन्द्रीय अंतस्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर (पश्चिम बंगाल)।</p>