वर्तमान में लगातार बढ़ती आबादी और कुपोषणता दो प्रमुख समस्याएं हैं और विश्व में 800 मिलियन से अधिक लोग कुपोषण से पीड़ित हैं। वर्ष 2050 तक दुनिया की आबादी 9.6 बिलियन होने की उम्मीद है (एफएओ, वर्ष 2018)। ऐसे में इन समस्याओं के साथ विश्व के प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित रखकर सभी लोगों को खाद्य सामग्री उपलब्ध करवाना एक बहुत बड़ी चुनौती है। खाद्य और कृषि संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक मछली उत्पादन वर्ष 2016 में 171 मिलियन टन था। इसमें 47 प्रतिशत हिस्सा जलीय कृषि से आया और यह अनुमान है कि प्रति व्यक्ति जलीय खाद्य पदार्थों की खपत वर्ष 2030 में लगभग 20 प्रतिशत तक बढ़ जाएगी। इस आपूर्ति को बनाये रखने के लिए वैश्विक स्तर पर अतिरिक्त 23 मिलियन टन जलीय खाद्य उत्पादों की आवश्यकता होगी (एफएओ, वर्ष 2018)। भारत में भी मत्स्यपालन अन्य खाद्य उत्पादन क्षेत्रों की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। वर्ष 2018 में कुल मत्स्य उत्पादन 12.59 मिलियन टन था, जिसकी वार्षिक वृद्धि दर वर्ष 2012-13 में 4.9 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2017-18 में 11.9 प्रतिशत हो गयी। इसके साथ वैश्विक स्तर पर भारत, दुनिया के कुल मत्स्य उत्पादन का 6.3 प्रतिशत हिस्सा साझा कर दूसरे स्थान पर है (एनएफडीबी, वर्ष 2018)। वर्तमान में जलीय कृषि, भूख एवं कुपोषणता को खत्म करने, अतिरिक्त खाद्य की मांग को पूरा करने, स्वास्थ्य को बढ़ावा देने, गरीबी को कम करने और रोजगार के नए अवसरों को पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इन सबके बावजूद आज के समय में जलीय कृषि के सामने कुछ गंभीर समस्याएं आ रही हैं, जैसे-भूमि एवं जलीय संसाधनों के लिए बढ़ती प्रतिस्पधार्, मछलीपालन में बढ़ती लागत, विदेशी प्रजातियों की जलीय कृषि तथा उनका मूल प्रजाति पर कुप्रभाव, उच्च दर से मत्स्य बीज संवर्धन करने से रोगजनकों के अधिक फैलाव के साथ मछली की रोग प्रतिरोध क्षमता में कमी आ रही है। अनुचित मछलीपालन से जल संसाधनों में बढ़ती विषाक्तता और इनसे पर्यावरण में विभिन्न समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। इन सब समस्याओं से उबरने के लिए जलीय कृषि क्षेत्र में एक विशेष तकनीक विकसित हुई है। इससे कम क्षेत्रा में, न्यूनतम जल विनिमय के साथ मछली एवं झींगे का अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार की विशेष संवर्धन तकनीक को बायोफ्लोक तकनीक कहते हैं। यह उपरोक्त कुछ समस्याओं को हल करने और मत्स्य क्षेत्रा में नीली क्रांति लाने में सहायता कर सकती है। बायोफ्लोक तकनीक बायोफ्लोक, विभिन्न स्थूल पदार्थों जैसे शैवाल, जीवाणु, प्रोटोजोआ और अपशिष्ट पदार्थ जैसे-अप्रयुक्त खाना एवं मछली मल से बना एक समुच्चय होता है। ये सभी पदार्थ हेटरोट्रोफिक जीवाणुओं द्वारा स्रावित म्यूकस और सूक्ष्मजीवों के मैट्रिक्स में एक साथ बंधे होते हैं। बायोफ्लोक में लगभग 60 से 70 प्रतिशत कार्बनिक और 30 से 40 प्रतिशत अकार्बनिक पदार्थ होते हैं। बड़े बायोफ्लोक्स को नग्न आंखों से भी देखा जा सकता है, लेकिन अधिकांशतः ये सूक्ष्म 50 से 200 माइक्रोमीटर के होते हैं। बायोफ्लोक तकनीक की कार्य प्रणाली बायोफ्लेक एक पर्यावरण अनुकूल जलीय कृषि की एक बेहतर तकनीक है। जिसे तालाब में अपशिष्ट जल उपचार संयंत्रा के सिद्धांत पर विकसित किया गया है। सामान्यतः मछलीपालन में बाहर से दिये जाने वाले फीड का सिर्फ 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा ही मछलियां उपभोग करती हैं। लगभग 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा अपशिष्ट के रूप में पानी में रह जाता है। इसी अपशिष्ट से विकसित जटिल कार्बनिक एवं अकार्बनिक उत्पादों (अमोनिया, नाइट्रेट एवं (नाइट्राइटस) को विशेष सूक्ष्मजीवों (हेटरोट्रोफिक जीवाणुओं) द्वारा ऑक्सीकरण करके पुनःनवीनीकरण कर खाद्य पदार्थों (माइकोप्रोटीन) में प्रवर्तित कर दिया जाता है। यह माइकोप्रोटीन मछली को 20 से 30 प्रतिशत अधिक प्रोटीन देता है (एविमेलेक और कोचबा, 2009)। इस तकनीक में लगातार पानी में ऑक्सीजन (≥6पीपीएम) प्रदान की जाती है, जो सूक्ष्मजीवों को बायोफ्लेक के गठन के साथ अपशिष्ट पदार्थों के अपघटन को भी प्रेरित करने में मदद करता है। बायोफ्लेक में हेट्रोट्रोफिक जीवाणु विकसित करने के लिए पानी में कार्बनःनाइट्रोजन (सीःएन) अनुपात अनुकूलित होना बहुत आवश्यक है। एक नाइट्रोजन इकाई को आत्मसात करने के लिए लगभग 10-20 कार्बन इकाइयों की आवश्यकता होती है। इसके लिए कम प्रोटीन (20-30 प्रतिशत) वाले आहार के साथ गुड़, शक्कर, स्टार्च जैसे तत्व उपयोग कर सकते हैं। जब कार्बनःनाइट्रोजन अनुपात सही नहीं हो तो पानी की क्षारीयता संतुलित रखने के लिए चूने का उपयोग किया जाना चाहिए। बायोफ्लेक सवंर्धन तकनीक के लाभ इस तकनीक में प्राकृतिक संसाधन जैसे-जल, भूमि की आवश्यकता कम होती है, जिससे शुरुआती लागत में कमी आती है। इससे कम जगह में मछली, झींगा और रंगीन मछली का पालन अधिक घनत्वता से करके अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। इसमें उपस्थित सूक्ष्मजीव पानी की गुणवत्ता को हमेशा उचित बनाए रखते हैं। माइक्रोप्रोटीन की उपलब्धता से मछली को ऊपरी आहार कम देते हैं, जिससे आहार की लागत में कमी आती है। मछली की रोग-प्रतिरोग क्षमता में वृद्धि होती है तथा कम दवाइयों की आवश्यकता होती है। बायोफ्लेक में उपस्थित पोषक तत्व मछली की प्रजनन क्षमता को बढ़ाते हैं इस प्रकार उच्च गुणवत्ता वालेे मछली के बीज तैयार किए जा सकते हैं। बायोफ्लेक के पोषण मूल्य बायोफ्लेक की पोषणता, संवर्धित जीवों की आहार की पसंद और उसे पचाने एवं निगलने की क्षमता पर निर्भर करती है। बायोफ्लेक में उपस्थित सभी पोषक तत्वों का आकलन सारणी-1 में है। इसके अलावा यह विटामिन और खनिजों, जैसे फाॅस्फोरस एक अच्छा स्रोत है। अक्सर अमीनो अम्ल, मेथियोनिन और लाइसिन पफीड में पर्याप्त मात्रा में नहीं होते हैं, परन्तु बायोफ्लेक में इसकी पर्याप्तता शोध का अच्छा विषय है। सारणी 1. बायोफ्लेक के शुष्क वजन के आधार पर विभिन्न पोषक तत्व संदर्भ स्रोत प्रोटीन (प्रतिशत) कार्बोहाइड्रेट (प्रतिशत) लिपिड (प्रतिशत) पफाईबर (प्रतिशत) एमेंशियानो एट अल (2006 ) 30.40 29.10 0.47 0.83 कुहन एट एल (2009 ) 49.00 36.40 1.13 12.60 एमेर्सिया एट एल (2012 28.0-30.0 18.1-22.7 0.5-0.6 3.10-3.20 राजकुमार एट एल (2२०१६ 45.9-53.6 20.4-32.4 0.57-0.92 12.9-16.66 बायोफ्लेक के लिए उपयुक्त प्रजातियां बायोफ्लेक के लिए सर्वाहारी स्वभाव वाली प्रजातियों में उच्च ठोस पदार्थों के साथ खराब पानी की गुणवत्ता को सहन करने तथा पिफल्टर फीडिंग के माध्यम से पोषण प्राप्त करने की क्षमता अच्छी होती हैं। बायोफ्लेक प्रणाली की कमियां इस तकनीक में बायोफ्लेक की मात्रा और पानी की गुणवत्ता की जांच के लिए उच्च कौशलता की आवश्यकता पड़ती है। इसमें निरंतर ऑक्सीजन का प्रवाह चाहिए जिससे ऊर्जा लागत बढ़ सकती है। तालाब के तल में ठोस कार्बनिक पदार्थों के संचय से हानिकारक जीवों का प्रसार हो सकता है, जो हेट्रोट्रोफिक बैक्टीरिया को खा सकते हैं और उनकी संख्या में कमी ला सकते हैं, जिससे बायोफ्लेक की गुणवत्ता और मात्रा प्रभावित हो सकती है। स्त्राेत: खेती पत्रिका(आईसीएआर), जसप्रीत सिंह कमल सरमा तारकेश्वर कुमार और सुरेन्द्र कुमार अहिरवाल भाकृअनुप का पूर्वी अनुसंधान परिसर पटना-800014 (बिहार),नरेश राज कीर, भाकृअनुप-केन्द्रीय मात्स्यिकी शिक्षा संस्थान अंधेरी पश्चिम मुंबई-400061 (महाराष्ट्र)।