परिचय मछली पालन में प्रबंधन के दृष्टिकोण से मुख्यतः चार बिन्दुओं पर विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए जैसे तालाब प्रबंधन मत्स्य बीज प्रबंधन पूरक आहार प्रबंधन एवं रोग से बचाव संबंधी प्रबंधन। उपरोक्त चीजों के बेहतर प्रबंधन से किसान प्रति हे. मछली की पैदावार अधिक सेअधिक लेकर अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं। मछली पालन के बेहतर प्रबंधन के लिए मछलियों में होने वाली प्रचलित बीमारियोंसे मछलियों को बचाना। किसानों को इस आलेख के माध्यम से जलकृषि व्यवसायू में मछलियों मे प्रमुख रूप से होने वाली बीमारियों उनका कारण, पहचान एवं निदान के बारे में विस्तृत जानकारी देने की कोशिश की जा रही हैं । तालाब में बीमार मछलियों की पहचान शरीर के उपर लाल, उजला, नीला, काला घाव (धब्बा)दिखाई देना। पंख एवं पूछ का सड़ा एवं झड़ा हुआ दिखाई देना। मुह को पानी की सतह के उपर लाकर श्वास लेते हुए दिखाई देना । शरीर के उपर अत्यधिक म्यूकस (लसीला) पदार्थ का श्राव होना | शरीर को तालाब के किनारे घसीटना | शारीरिक संतुलन खो देना | तालाब के पानी के ऊपरी सतह पर धीरे-धीरे तैरना | समय से भोजन ग्रहण नहीं करना या भोजन ग्रहण करने की क्षमता में कमी आना | आँखे धुंधला पड़ जाना, आँखे सड़ना एवं आँख बाहर निकल आना | पेट फुला हुआ दिखाई देना | शरीर का प्रकृतिक रंग एवं चमक धुंधला हो जाना | गलफड़ा (गील) का सड़ जाना | मछलियों मे होने वाले कुछ प्रमुख रोग ई.यू.एस.रोग (एपीज़ोटीक अल्सरेटिव सिंड्रोम) ड्रॉप्सी रोग टेल सैट या फिन रौट व्हाइट स्पॉट रोग आरगुलॉसिस लरनिशोसिस सेप्रोलेगनियोसिस 1 ई.यू.एस.रोग (एपीज़ोटीक अल्सरेटिव सिंड्रोम) आजकल समान्य रूप से मछली मे पायी जानेवाली बीमारीको लाल घाव (महामारी ) के नाम से जाना जाता है जिसे वैज्ञानिक भाषा मे ई.यू.एस. रोग कहते है | 2 रोग से प्रभावित होने वाली प्रजातियाँ यह रोग प्राय सभी मीठे एवं खारे पानी मे पाये जानेवाली प्रजातियों मे पाया गया है | इस रोग से प्रभावित होनेवाली मछलियों मे गुरई, रोह ,सिंघी मांगुर, कवई टेंगरा ,नैनी ,ग्रास कार्प ,सिल्वर कार्प ,सौरा इत्यादि प्रमुख है | ईन्यू.एस.रोग से ग्रसित मछलियों की पहचान एवं रोग के कारक रोगी मछलियों की पहचान संक्रमित मछलियों के शरीर पर लाल रंग के धब्बे जैसा घाव हो जाता है और धीरे-धीरेशरीर पे फैल जाता है | संक्रमित मछली पानी के ऊपरी सतह पर उछलने लगती है | अति-संक्रमित मछलियों मे गहरे घाव होने के कारण चमड़े का ऊपरी भाग ट करगिरने लगता है | रोग के प्रमुख कारण इस रोग के प्रमुख कारण का पता अभी तक नहीं लगाया जा सका है | संक्रमित मछली के वैज्ञानिक परीक्षण में कई प्रकार के रोगाण जैसे जीवाणु ,विषाण , फफूंद , प्रोटोजोअन परजीवी इत्यादि का मिला जुला संक्रमण देखा गया है ,किन्तु वैज्ञानिकों के अनुसंधान मे “एफेनोमाईसिस इनभेडेन्स” नामक फफूंद ही इसका प्राथमिक जनक माना जाता है | ई.यू. एस. रोग का नियंत्रण वाटर सेनीटाईजर - वाटर सेनीटाईजर का छिड़काव 5 से 10 लीटर | हेक्टेयर /मीटर पानीकी गहराई के दर से करने पर यह रोग एक सप्ताह के अन्दर 80 से 90 प्रतिशत तक ठीक हो जाता है | यह दवा शहर के सभी भेटनरी दवा केन्द्र पर उपलब्ध है जहाँ से किसान इसे खरीदकर उपयोग कर सकते हैं | चूना: चूना का छिड़काव 200-600 कि. ग्रा./ हेक्टेयर/मीटर पानी की गहराई की दर से करने से इस रोग पर काबू पाया जा सकता है | चूने के छिड़काव की मात्रा पानी कीलवणता (पी.एच.)पर निर्भर करती है | पोटेशियम परमैगनेट- 2 मि . ग्रा . प्रति ली . की दर से पोटेशियम परमैगनेट एवं नमक का घोल 400 कि.ग्रा./ हेक्टेयर/मीटर पानी की गहराई की दर से सयुक्त रूप से एक -एक दिन के अन्तराल पर 6 दिनो तक करने से इस रोग पर 90 प्रतिशत नियंत्रण पाया जा सकता है| इसके अतिरिक्त ब्लीचिंग पाउडर के छिड़काव से भी यह रोग काफी हद तक नियंत्रण मेंआ जाता है | 100 कि. ग्राम चना एवं 10 कि. ग्रा. हल्दी पाउडर/हे. की दर से घोलकर 5 दिन केअन्तराल पर 3 बारे उपयोग करने पर यह रोग नियंत्रित हो जाता है । ड्रॉप्सी रोग इस रोग का जनक जीवाणु है | इस रोग को वैज्ञानिक भाषा मे “बैक्टेरियल हेमोरेजिक सेपटिसेमिया”कहते है इस रोग से प्रभावित होनेवाली प्रजातियाँ यह रोग मीठे पानी में पाये जानेवाली मछलियों जैसे रोहू, कतला, मृगल, ग्रासकार्प, कॉमनकार्प, सिल्वरकार्प इत्यादि में होती है रोगी मछलियों की पहचान संक्रमित मछलियों के शरीर के अन्दर द्रव जमा हो जाता है। संक्रमित मछलियों की प्रमुख रक्त धमनि छितर-बितर हो जाती है || रोग के कारक इस रोग के जनक “एरोमोनस हाइड्रोफिला” तथा “एरोमोनस पकटेटा” नामक जीवाणु है । डॉप्सी रोग का नियंत्रण 1 से 4 मिलीग्राम प्रति लीटर पोटेशियम परमैगनेट से 2 मिनट तक प्रति दिन एक सप्ताह तक संक्रमित मछलियों को स्नान कराने पर इस रोग पर नियंत्रण पाया जा सकता है | प्रतिजैविक (एन्टीबायोटिक) के प्रयोग से भी इस रोग पर नियंत्रण किया जा सकता है | टेल रौट या फिन रौट रोग यह बीमारी भी सामन्यतः मीठे पानी की मछलियों में काफी प्रचलित है | आमतौर पर इस बीमारी को मछलियों की पुछ सड़नेया पंख सड़ने की बीमारी के नाम से जाना जाता है | रोग से प्रभावित होनेवाली प्रजातियाँ इस बीमारी से मीठे पानी की प्रायः सभी प्रजातियाँ प्रभावित होती है | रोहू, कतला, मृगल प्रमुख रूप से प्रभावित मछलियोंमें से है | रोगी मछलियों की पहचान संक्रमित मछलियों के पुछ तथा पर (पंख) सड़ने लगते हैं | पंख पर उजले रंग की धारी दिखाई देने लगती है। टेल रौट या फिन रौट रोग के कारण एवं उनका नियंत्रण इस बीमारी का जनक “एरोमोनास सालमोनासिडा” तथा “सुडोमोनस” प्रजाति का जीवाणु है | इस रोग का नियंत्रण 10 से 20 मिली ग्रा. पोटेशियम परमैगनेट एक लीटर पानी में घोलकर संक्रमित मछलियों कोएक घंटा तक प्रति दिन डुबाने पर 7 से 10 दिनों के अन्दर यह रोग ठीक हो जाता है | 500 मिलीग्राम कॉपर सल्फेट को एक लीटर पानी में घोलकर संक्रमित मछलियों को प्रति दिन डुबोने पर 10 से 15 दिनों के अन्दर इस रोग पर काबू पाया जा सकता है | व्हाइट स्पॉट रोग यह बीमारी “प्रोटोजोवन” परजीवी के संक्रमण से होता है । इसे आमतौर पर सफ़ेद धब्बे वाले रोग के नाम से जाना जाता है । रोग से प्रभावित होनेवाली प्रजातियाँ यह बीमारी सभी प्रकार के मीठे जल की प्रजातियों मे पाया जाता है । रोगी मछलियों की पहचान अत्यधिक म्यूकस (लसीला द्रव) का श्राव संक्रमित मछलियों मे देखने को मिलता है । संक्रमित मछलियाँ अपने शरीर को तालाब के किनारे लाकर जमीनपर घसीटतीरहती है । छोटा-छोटा उजला सिष्ट (फोले) संक्रमित मछलियों के शरीर के ऊपरी भाग, पंख पर दिखाई देता है । व्हाइट स्पॉट रोग का कारण एवं निदान यह रोग "ईकथायोपथाईरस मल्टीफिलीस” प्रोटोजोवन परजीवी के संक्रमण के कारणहोता है। तालाब का पानी दूषित रहने से इस बीमारी का प्रकोप आधिक होता है। रोग का निदान 300-500 कि.ग्रा./हेक्टेयर कि दर से क्विक लाईम के छिड़काव से यह रोग ठीक होजाता है | 1:5000 फॉरमलिन का स्नान एक घंटे तक संक्रमित मछलियों को सात दिन तक कराने पर रोग पर काबू पाया जा सकता है | आऍलोसिस यह रोग "आरगुलस” परजीवी के सक्रमण से होता है । रोग से प्रभावित होनेवाली प्रजातियाँ यह बीमारी मीठे जल के सभी प्रजातियों में पाया जाता है । प्रजनक मछलियों मे आरगलस का संक्रमण काफी पाया जाता है । रोगी मछलियों की पहचान (आर्गेलोसिस) अत्यधिक म्यूकस (लसीला द्रव) का श्राव संक्रमित मछलियों मे देखने को मिलता है । संक्रमित मछलियां अपने शरीर को तालाब के किनारे लाकर जमीन पर घसीटतीरहती है । छोटा -छोटा कीड़े के रूप मे आरगलस प्रजाति संक्रमित मछलियों के शरीर के ऊपरी एवं पंख पर दिखाई देता है । आर्गेलोसिस रोग के कारण एवं निदान यह रोग "आरगुलस प्रजाति " के परजीवी के संक्रमण के कारण होता है तथातालाब के पानी के दूषित रहने से इस बीमारी का प्रकोप आधिक होता है। रोग का नियंत्रण एवं निदान साईपर मैथ्रिन या डेल्टा मैथ्रिन 10%, 500-750 मि.लि./हेक्टेयर की दरछिड़काव से यह रोग ठीक हो जाता है। 500-800 मिलि. बुटौक्स | हे. की दर से छिड़काव करने पर संक्रमित मछलियोंको बचाया जा सकता है। क्लीनर 250-300 मिलि./हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने पर संक्रमित मछलियों को बचाया जा सकता है। लरनिशोसिस रोग से प्रभावित होनेवाली प्रजातियाँ यह बीमारी मीठे पानी मे पायी जाने वाली सभी प्रजातियों मे पाया जाता है। रोगी मछलियों की पहचान अत्यधिक म्यूकस (लसीला द्रव) का श्राव संक्रमित मछलियों में देखने कोमिलता है । लंबे कीड़े के रूप मे लरनियाँ संक्रमित मछलियों के शरीर एवं पंख पर दिखाईदेता है । शरीर के उपर सड़न पैदा होना । तालाब के तलहटी मे शरीर को घसीटना । लरनिशोसिस रोग के कारण एवं निदान यह बीमारी लरनियाँ परजीवी के संक्रमण से होता है | तालाब में दूषित पानी के आगमन से इस बीमारी का प्रकोप अधिक होता है | रोग का नियंत्रण एवं निदान (लरनिशोसिस) गैमेक्सीन - 1 मिलीग्राम प्रति लीटर की दर से छिड़काव करने से संक्रमित मछलियोंको बचाया जा सकता है । डायोलेक्स या डीपटेक्स - 0.2 मिलीग्राम प्रति लीटर की दर से तालाब मे छिड़काव करने से संक्रमित मछलियों को बचाया जा सकता है । सेप्रोलेगनियोसिस (कौटन उल रोग) रोग से प्रभावित होनेवाली प्रजातियाँ यह रोग प्रायः मीठे पानी मे पायी जाने वाली सभी प्रजातियों में पाया जाता है रोग की पहचान संक्रमित मछलियों के शरीर के उपर पतले उजले रंग का माईसेलिया का दिखाई देना । संक्रमित मछलियों के शरीर एवं गील के उपर मटमैला एवं उजला धब्बा दिखाई देना । सेप्रोलेगनियोसिस रोग के कारण एवं निदान यह बीमारी सेप्रोलेगनियां पारासाईटीका नामक फुफूंद के कारण होता है । बरसात के मौसम में इस बीमारी का प्रकोप तालाब मे अधिक देखने को मिलता है । तालाब में बाहर से दूषित पानी के आगमन से यह रोग बहुत तेजी से फैलता है । रोग का नियंत्रण एवं निदान 3 प्रतिशत साधारण नमक से तालाब को उपचारित करना । 2.5 लीटर फॉरमलिन के साथ 250 ग्राम मालाकाईट ग्रीन मिलाकर 100 लीटर पानीमे घोल कर प्रति एकड़ की दर से पानी की सतह पर छिड़काव करने से यह बीमारी नियंत्रित हो जाता है । भोजन मे 5-6 दिन तक 5 से 6 ग्राम नमक प्रति किलोग्राम भोजन की दर से मिलाकर खिलाने से यह रोग नियंत्रित हो जाता है । तालाब मे दवा की मात्रा का निर्धारण • दवा की मात्रा (कि. ग्राम/ ली. में ) तालाब के पानी का आयतन X दवा का सान्द्रण (मिली ग्राम/ली.)___1000 उदाहरण एक ऐसा तालाब जिसकी गहराई 100 मी. चौराई 100 मी एवं औसत गहराई 2 मी . हो तो पोटेशियम परमैगनेंट दवा का सान्द्रण यदि 1 मिलीग्राम /ली. है तो कुल पोटेशियम परमैगनेट दवा की मात्रा क्या होगी ? तालाब के पानी का क्षेत्रफल = लंबाई X चौराई =100 मी.- 100मी.=10,000 वर्ग मी. तालाब के पानी का आयतन =लंबाई X चौराई X गहराई =100 मी.- 100 मी. x2 मी.=20,0000 क्यूबिक मी. तालाब मे दवा की मात्रा (की.ग्राम/ली. में)= 2000 x 1 / 1000 = 20 कि. ग्राम मछलियों के उचित स्वास्थ्य एवं रोग के बचाव के लिए प्रमुख सुझाव उत्तम गुण वाले मछ्ली के बीज (फिंगरलीग) की जाँच कर तालाब मे संवर्धन करना चाहिए | तालाब के चारो तरफ साफ-सुथरा रखना चाहिए | तालाब के पानी का समय-समय पर जाँच करवाना चाहिए | प्रति तीन वर्ष पर तालाब को सुखाकर आधा फीट मिट्टी तालाब से निकाल कर बाँध पर रखना चाहिए | यह मिट्टी साग-सब्जी के लिए बहुत उपयुक्त है। मछलियों के स्वास्थ्य की जाँच समय -समय पर करनी चाहिए | बीज को तालाब मे डालने से पहले अनावश्यक मछलियों को जाल से निकाल लेना चाहिए | जब आकाश मे बादल हो उस समय मछलियों को पूरक आहार नहीं डालना चाहिए | अगर बीमार मछलीया मरना शुरू हो जाए तो उसे तालाब से निकाल कर फेकना के बजाए गड्ढ़े मे गाड़देना चाहिए | जब पानी का रंग हरा हो जाए और पानी बदबू करने लगे तो पूरक आहार का प्रयोग बंद कर देना चाहिए | समय समय पर चुने का उपयोग करते रहना चाहिए जिससे पानी की गुनवता मछली के अनुकूल बनी रहे। गर्मी के समय मे महीने में एक बार एवं जाड़े के समय महीने में दो बार जाल चलाए | प्रोजेक्ट मैनेजमेंट यूनिट मत्स्य निदेशालय पटना, बिहार