<p style="text-align: justify;">देश की अर्थव्यवस्था, जनता की पोषण जरूरत और आजीविका सुरक्षा में मीठाजल कृषि का महत्वपूर्ण योगदान है। वर्ष 2018 में वैश्विक मछली उत्पादन का अनुमान लगभग 179 मिलियन टन (कुल अनुमानित विक्रय मूल्य 401 बिलियन अमरीकी डॉलर) था, जिसमें से जलकृषि से उत्पादन 82 मिलियन टन (मूल्य 250 बिलियन अमरीकी डॉलर) (एफएओ, वर्ष2020) था। वतर्मान में भारत, चीन के बाद दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा मत्स्य उत्पादक आरै दूसरा सबसे बड़ा जलकृषि देश है। वर्ष2017-18 के दारैान कुल मत्स्य उत्पादन अंतर्देशीय क्षेत्र से 8.92 मिलियन मीट्रिक टन आरै समुद्री क्षेत्र से 3.69 मिलियन मीट्रिक टन (डीएएचडीएफ, वर्ष2018-19) के योगदान के साथ 12.61 मिलियन मीट्रिक टन दज र्किया गया है। 1980 के मध्य में अंतर्देशीय मात्स्यिकी में 34 प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ मीठाजल कृषि हाल के वर्षों में लगभग 80 प्रतिशत तक बढ़ गयी है।</p> <p style="text-align: justify;">भारत में कार्प, मीठाजल कृषि का मुख्य आधार है। तीन भारतीय प्रमुख कार्प, कतला (कतला-कतला), रोहू (लेबियो रोहिता) और मृगल (सिरहिनस मृगला), कुल मीठाजल मत्स्य उत्पादन का 70 से 75 प्रतिशत तक योगदान करते हैं। इसके बाद सिल्वर कार्प, ग्रास कार्प, कॉमन कार्प और कैटफिश, 25 से 30 प्रतिशत का योगदान देने वाला दूसरा महत्वपूर्ण समूह है। वर्तमान में आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में अधिकांश व्यावसायिक कृषक 90 प्रतिशत राेहू और 10 प्रतिशत कतला का उपयोग करके अपने तालाब में कार्प पॉलीकल्चर पद्धति को अपना रहे हैं।</p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 100%;"> <h3>भाकृअनुप-सीफा द्वारा 'जयंती रोहू' का प्रसार </h3> <p style="text-align: justify;">अनुसंधान उत्पाद को अंतिम उपयागेकर्ताओं तक पहुंचाने में प्रभावी प्रसार प्रणाली का होना बहुत ही अनिवार्य है। 'जयंती रोहू को भारत के 16 विभिन्न राज्यों में मछली किसानों और हैचरी मालिकों द्वारा उच्च स्वीकृति स्तर के साथ प्रसारित किया गया है। भाकृअनपु-सीफा में स्थित प्रजनन केंद्रों से प्रत्येक वर्ष 20 मिलियन से अधिक स्पॉन विभिन्न राज्यों में वितरित किए जा रहे हैं। देश में जयंती रोहू के बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु भाकृअनुप-सीफा की तकनीकी सहायता से विभिन्न राज्यों में गुणक इकाइयों (मल्टीप्लायर यूनिट) की स्थापना की गई हैं। गुणक इकाई के रूप में ग्यारह व्यावयायिक कार्प हैचरी/संस्थानों के साथ समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इसमें किसानों को उन्नत रोहू(जयंती) बीज की आपूर्ति करने और उन्हें नस्ल की शुद्धता बनाए रखने के लिए कानूनी अधिकारों को भी अनुलेखित किया है। मल्टीप्लायर इकाइयों/हैचरी प्रबंधकों को बेहतर स्टॉक की शुद्धता बनाए रखनी होगी, क्योंकि स्थानीय रोहू स्टॉक के साथ मिश्रण से मछलियों में मंद विकास होगा।</p> </td> </tr> </tbody> </table> <p style="text-align: justify;">यह अनुमान है कि 2.36 मिलियन हैक्टर के तालाबों और टैंकों के उपलब्ध क्षेत्र का लगभग 40 प्रतिशत ही उपयोग किया जा रहा है और मीठाजल कृषि के तहत क्षेत्र के विस्तार की एक विशाल गुंजाइश मौजूद है। जलीय कृषि के माध्यम से मछली उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रजातियां और प्रणाली विविधीकरण महत्वपूर्ण दृष्टिकोण हो सकते हैं। प्रेरित कार्प प्रजनन और स्थिर तालाबों तथा टैंकों में पॉलीकल्चर की तकनीकों ने वस्तुतः मीठाजल कृषि क्षेत्र में क्रांति का सूत्रपात किया है। आनुवंशिक साधनों के माध्यम से मछलियों के नस्ल सुधार ने आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण लक्षणों जैसे वृद्धि रोग प्रतिरोधक क्षमता आदि के लिए योज्य आनुवंशिक वैविध्यता का दोहन करके मछली उत्पादन को बढ़ाया है। इस संदर्भ में, भाकृअनुप-सीफा द्वारा विकसित जयंती रोहू (आनुवंशिक रूप से उन्नत रोहू) का उपयोग स्थायी जलकृषि उत्पादन की दिशा में एक प्रमुख भूमिका निभा सकता है। </p> <p style="text-align: justify;">मत्स्य पालन की उत्पादन लागत में 5-10 प्रतिशत मत्स्य बीज का खर्च आता है और अच्छी गुणवत्ता वाले बीज का संचयन जलकृषि क्षेत्र के विस्तार के लिए अपरिहार्य है। कई पालन पद्धतियां जैसे कि खराब गुणवत्ता वाले मत्स्य बीज का संचयन और एक ही हैचिंग पूल में एक ही समय में कार्प के मिश्रित प्रजनन से संकर बीज का उत्पादन होता है, जो आनुवंशिक रूप से निम्न माना जाता है। इसके परिणामस्वरूप मछलियों में धीमी वृद्धि कम उत्पादन और किसानों को कम लाभ होता है।</p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 100%;"> <h3 style="text-align: justify;">आनुवंशिक रूप से उन्नत रोहू, जयंती</h3> <p style="text-align: justify;">भारत में पहली बार रोहू का चयनात्मक प्रजनन वर्ष 1992 में सीपफा द्वारा इंस्टीट्यूट ऑफ एक्वाकल्चर रिसर्च (एक्वाफोरस्क), नॉर्वे के सहयोग से शुरू किया गया, जिसमें वृद्धि के लिए आनुवंशिक रूप से रोहू को उन्नत बनाने के लिए अधिदेश दिया गया था। रोहू (लेबियो रोहिता) को इसकी उच्च उपभोक्ता पसंद, बहुप्रजाति कार्प संवर्धन प्रणाली में खराब वृद्धि के प्रदर्शन और रोगों के लिए संवेदनशीलता के कारण चयनित प्रजनन उद्देश्य के लिए उम्मीदवार प्रजाति के रूप में चुना गया था। रोहू के चयनित प्रजनन के लिए संस्थापक आधार आबादी को पांच नदी स्रोतों, अर्थात, गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्रा, सतलज, गोमती और इसके अलावा छठे स्टॉक के रूप में भाकृअनुप-सीफा के फार्म स्टॉक से एकत्रकिया गया। चयनित प्रजनन प्रोटोकॉल को संयुक्त चयन विधि के माध्यम से किया गया और हर साल औसतन 50-60 फूल-सिब फैमिली का उत्पादन किया गया। पीढ़ी दर पीढ़ी रोहू को उन्नत किया जाता है और इस उन्नत रोहू को ‘जयंती’ के रूप में जाना जाता है। इसे पहली बार वर्ष 1997 में भारतीय स्वतंत्राता की 50वीं वर्षगांठ (स्वर्ण जयंती) के दौरान जारी किया गया था।</p> </td> </tr> </tbody> </table> <p style="text-align: justify;">अधिकांश कार्प हैचरी में अंतःप्रजनन तनाव (इनब्रीडिंग डिप्रेशन) पाया गया है। इसका मुख्य कारण प्रजनक मछलियों की पुनरावृति के बिना एक ही प्रजनक मछलियों के बार-बार उत्प्रेरित प्रजनन में उपयोग का होना है। भारत में अधिकांश हैचरी में आनुवंशिक मानदंडों का अभाव है, जो खराब गुणवत्ता वाले मछली के बीज से लगभग 30 प्रतिशत उत्पादन हानि का कारण है। इस प्रकार, आनुवंशिक रूप से उन्नत मत्स्य बीज खराब गुणवत्ता वाले बीज की समस्या को दूर करने के लिए एक उपयुक्त विकल्प के रूप में काम कर सकता है। यह मत्स्य संवर्धन के तहत अन्य देसी प्रजातियों को प्रभावित किए बिना प्रति इकाई क्षेत्र में उच्च पैदावार में भी योगदान देता है। उच्च आनुवंशिक लाभ के साथ आनुवंशिक रूप से उन्नत नस्ल को अपनाने से मछली उत्पादन एवं लाभप्रदता में वृद्धि मछलियों की कीमत में कमी, खपत में वृद्धि और मत्स्य किसान की अर्थव्यवस्था में सुधार होगा। </p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccdownload.jpg" width="450" height="220" /></p> <h3 style="text-align: justify;">जयंती रोहू हैचरी </h3> <p style="text-align: justify;">रोहू (एल. रोहिता) के फूल-सिब फैमिली का उत्पादन और आनुवंशिक रूप् से उन्नत रोहू स्पॉन का बड़े पैमाने पर उत्पादन भाकृअनुप-केंद्रीय मीठाजलजीवपालन अनुसंधान संस्थान, कौशल्यागंगा, भुबनेश्वर, भारत में निर्मित एक विशेष हैचरी में किया गया है। हैचरी कॉम्प्लेक्स में छह इकाइयां होती हैं यानी ओवरहेड टैंक, स्पॉनिंग पूल, नर ब्रूड पिफश सिस्टर्न, निषेचित अंडों के इन्क्यूबेशन के लिए विशेष एक्रेलिक ग्लास जार, हैचिंग कलेक्शन सिस्टर्न और बड़े पैमाने पर निषेचित अंडों के इन्क्यूबेशन के लिए सर्कुलर हैचिंग पूल। इस हैचरी को अलग-अलग फुल-सिब फैमिली स्पॉन यानी निषेचित अंडे से स्पॉन बनाने के लिए विकसित किया गया हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">डिजाइन और फैमिली रखरखाव</h3> <p style="text-align: justify;">एक नेस्टेड निषेचन डिजाइन (एक मादा एवं दो नर मछली या इसके विपरीत) का उपयोग किया गया। प्रत्येक वर्ष निषेचन आवटंन याजेना के अनुसार फुल-सिब फैमिली का उत्पादन किया गया। इसे करीबी रिश्तेदारों के निषेचन से बचाने के लिए एक खाते में पूर्ण विवरण रखा जाता है, जिससे अंतःप्रजनन दबाव को कम किया जा सके। फुल-सिब फैमिली को विभाजित नर्सरी तालाब में अलग से तब तक पाला जाता है, जब तक ये टैगिंग करने लायक न हो जाएं। पैसिव इंटिग्रेटेड ट्रांसपोंडर (पीआईटी)टैग के साथ मछलियों को टैगिंग किया गया जो अलग-अलग फैमिली से अंगुलिका (फिंगरलिंग) की पहचान के लिए इस्तेमाल किया गया। 10 से 15 ग्राम आकार के फिंगरलिंग को टैग किए जाने के बाद तालाबों में पालन के लिए सचंयन किया गया और समय-समय पर मछलियों के विकास का विश्लेषण किया गया।</p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 100%;"> <h3>‘जयंती रोहू’ के पालन से किसानों को लाभ</h3> <ul> <li>इस प्रजाति के उत्पादन की लागत बहुत अधिक नहीं है, क्योंकि इसमें उच्च प्रोटीन फीड की आवश्यकता नहीं होती है और इसे 25 प्रतिशत प्रोटीन स्तर के साथ स्थानी रूप से निर्मित वनस्पति आधारित आहार के साथ संवर्धित किया जा सकता है।</li> <li>‘जयंती रोहू’ सभी संवर्धन पद्धति के तहत तटस्थ और प्रभावी है।</li> <li>आहार के दैनिक राशन को शरीर के वजन का 2-3 प्रतिशत की दर से दो किस्तों में दिया जा सकता है। प्रत्येक मछली से उच्च पैदावार प्राप्त करने के लिए मध्यम संचयन घनत्व अर्थात 6000-7000फिंगरलिंग प्रति हैक्टर होना चाहिए। आवधिक स्वास्थ्य निगरानी भी आवश्यक है।</li> <li>स्थानीय रोहू की तुलना में विपणन योग्य आकार प्राप्त करने में 2 महीने से कम समय लगता है।</li> <li>आकर्षक रंग के कारण बाजार में जयंती रोहू की बेहतर कीमत मिलती है।</li> <li>यह आनुवंशिक रूप से संशोधित जीव (जीएमओ) नहीं है, जिसके कारण यह जलीय पर्यावरण की जैव विविधता के लिए हानिकारक नहीं है।</li> </ul> </td> </tr> </tbody> </table> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : खेती पत्रिका(आईसीएआर),अविनाश रसाल, खुंटिया मुर्मू, मधुलिता पटनायक, धनंजय कुमार वर्मा, जे.के. सुन्दराय और कांता दास महापात्रा, भाकृअनुप-केंद्रीय मीठाजलजीवपालन अनुसंधान संस्थान, काैशल्यागंगा, भुबनेश्वर-751002(ओडिशा)</p> <p style="text-align: justify;"> </p>