<h3 style="text-align: justify;">नई उम्मीदवार प्रजाति</h3> <p style="text-align: justify;">लुप्तप्राय मीठा जल मत्स्य प्रजाति चिताला-चिताला को विभिन्न प्रांतों में अलग-अलग स्थानीय नामों से जाना जाता है जैसे-पश्चिम बंगाल में चीतन, सलतुल-असोम में, नगपाई-मणिपुर में और मोई-उत्तर प्रदेश में। भारतीय उपमहाद्वीप में नदी के मत्स्य पालन का महत्वपूर्ण घटक इसे माना जाता है। यह सबसे व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण खाद्य मछलियों में से एक है। वर्तमान में यह लुप्तप्राय प्रजाति के तहत सूचीबद्ध है। चिताला को सजावटी मछली भी माना जाता है। मछली बाजार की उच्च मांग और मीठे पानी की जलीय कृषि प्रणाली के लिए नई उम्मीदवार प्रजाति के रूप में इसे प्राथमिकता दी गई है। चिताला 2-3 कि.ग्रा./प्रति वर्ष तक बढ़ सकती है और अधिकतम 14 कि.ग्रा. तक वजन प्राप्त करने में सक्षम है। यह नोटोपटेरिडे फैमिली से संबंधित है और एशिया, भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, थाईलैंड और इंडोनेशिया देशों के मृदुजल में भी वितरित है। यह मछली विशेष रूप से अपने स्वादिष्ट मांस की गुणवत्ता और पोषण मूल्य के लिए जानी जाती है। बंगाल, ओडिशा, असोम और इसके पड़ोसी राज्यों में इसकी अत्यधिक कीमत (700 रुपये प्रति कि.ग्रा.) है। यह आमतौर पर मांसाहारी और कीटभक्षी है। ये कभी-कभी क्रस्टेशियस और प्लवक का भी भोजन करती हैं। प्राकृतिक जल में बीजों की अनुपलब्धता और इस मछली के कृत्रिम प्रजनन में कठिनाई के कारण, प्रजातियों के व्यावसायीकरण या सरंक्षण की दिशा में बहुत ज्यादा सफलता हासिल नहीं हो सकी है। संरक्षण मूल्यांकन के अनुसार भारत में इसके स्टाॅक में पिछले 15 वर्षों में लगातार गिरावट (70 प्रतिशत) आई है।</p> <h3 style="text-align: justify;">चिताला पालन</h3> <p style="text-align: justify;">भारतीय प्रमुख कार्प मछली के साथ-साथ चिताला के पालन को विकसित करने का प्रयास किया गया है। प्रजनन प्रोटोकॉल को विकसित करने के लिए कुछ किसानों द्वारा किए गए कुछ प्रयासों को छोड़कर कुछ खास प्रयत्न देखने में नहीं आए हैं। प्राकृतिक जल में बीजों की अनुपलब्धता और इस मछली के कृत्रिम प्रजनन में कठिनाई के कारण इस प्रजाति के व्यावसायीकरण या संरक्षण की दिशा में ज्यादा कुछ हासिल नहीं किया जा सका है। अतः लुप्तप्राय प्रजाति के संरक्षण के विचार को ध्यान में रखते हुए इस मछली को तालाब में पालन हेतु सफलतापूर्वक प्रजनन का कार्य करवाया गया, जो कि एक महत्वपूर्ण विषय है। चिताला</p> <p style="text-align: justify;">प्रजाति की 2-3 वर्ष की (12 मादा, 24 नर) मछलियों को भगीरथी, पुनरबहवा, गंगा और महानंदा नदी से एकत्र किया गया। उन्हें इन प्रक्षेत्रों से एल्यूमीनियम हांडी में ले जाया गया और एक प्लास्टिक पूल में रखा गया। इन ब्रूड मछलियों को, जिनका वजन 1.35-2.91 कि.ग्रा. तथा आकार 81 से 90 सें.मी. तक था, को स्टॉकिंग तालाब (क्षेत्र 2 हैक्टर, औसत गहराई 1 मीटर) में रखा गया। ब्रूड मछलियों को एक पॉलीकल्चर सिस्टम में रखा गया और शरीर के वजन के अनुपात में 4 प्रतिशत तक चार महीने तक छोटे जीवित झींगे के साथ छोटी मछली, चावल की भूसी और सरसों की खली (2:1) का आहार दिया गया। 4 महीने के पालन-पोषण के बाद मछलियों को प्रेरित प्रजनन के लिए काफी परिपक्व पाया गया। इनमें नर और मादा को आसानी से भेद नहीं किया जा सकता। </p> <p style="text-align: justify;">अधिकतम मामलों में मादा मछलियां नर मछलियों की तुलना में लंबाई में बड़ी होती हैं। मादा ब्रूडर दिखाती है और नर की तुलना में भारी पेट और पंख के आधार पर कोई चिन्हित रंग नहीं पाया जाता है। पूरी तरह से परिपक्व मादा का पेट भारी होता है और बहता हुआ ओवा दिखाती है। परिपक्व नर में पेट भारी नहीं होता और मूत्र-जननांग पैपिला पतला, मांसल तथा कठोर होता है। </p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccdownlod.jpg" width="330" height="165" /></p> <p style="text-align: justify;">परीक्षण के दौरान बार-बार ड्रैग नेटिंग द्वारा स्टॉकिंग तालाब से ब्रूड स्टॉक एकत्र किए, पृथक्करण के लिए नायलॉन हापा में अलग-अलग रखा। आठ मादा और 16 नर मछलियों को चुना गया। इनका 2:1 अनुपात ;नरःमादा) में पालन किया गया। प्रयोगों के लिए बरसात के दौरान बाढ़ के पानी से घिरा हुआ मौसम तैयार किया गया। कृत्रिम हार्मोन ‘ओवाप्रिम’ के साथ हाइपोफिसेशन किया गया। इस हार्मोन की तीन अलग-अलग खुराकों का परीक्षण किया गया और प्रत्येक प्रयोग और प्रत्येक खुराक एक-एक बार नर और मादा को दी गई। प्रत्येक सेट में दो नर होते हैं और एक मादा होती है। मानसून के दौरान किए गए प्रत्येक सेट के लिए कृत्रिम प्रजनन पूल तैयार किया गया। लकड़ी की नाव (सतह क्षेत्र 48.5 वर्ग फीट के साथ 8 × 4 × 2.5 फीट) के अंदर प्रजनकों को रखा गया। निषेचन के लिए आवश्यक कृत्रिम सब्स्ट्रेटम प्रदान किये गये। नर एवं मादा मछलियों की देखभाल की गयी। इंजेक्शन के 14-18 घंटे के बाद पीछा करने का व्यवहार सामने आया और मादा ने अंडे देना और नर के मिल्ट जारी करना शुरू कर दिया और मछलियों को हटा दिया गया। प्रजनन पुल में इन्हें धोया गया। अंडे प्रकृति में चिपकने वाले होते हैं इसलिए अंडे की सुरक्षा के लिए यह सुविधा अच्छी है। अंडों की गिनती करके निषेचन दर का अनुमान लगाया गया। उर्वरित अंडे स्पष्ट रूप से पूर्ण चमकदार थे। हैचिंग दर का अंडों के यादृच्छिक रूप से गिनने के बाद सातवें दिन अनुमान लगाया गया। नाव की सतह पर पूरी तरह से हैचिंग प्रक्रिया देखी गई थी। 13-14 दिनों के बाद आगे की देखभाल के लिए अगले 15 दिनों तक के लिए हैचलिंग्स को नायलॉन हापा में स्थानांतरित कर दिया गया। पूरक फीड उबले अंडे का पेस्ट था।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccdownlod.jpg" width="267" height="167" /></p> <p style="text-align: justify;">कुल शरीर के वजन के 8 प्रतिशत पर जर्दी और छोटे आकार के झींगा (1:1) प्रदान किए गए। उसके साथ जूप्लंकटन की अलग से भी आपूर्ति की गयी। ब्रूडस्टॉक तालाब के मानक निम्नवत थेः हवा का तापमान (3±2.2 डिग्री सेल्सियस), पानी का तापमान (3±12.2 डिग्री सेल्सियस), पी-एच मान 7.5±0.23, भंग ऑक्सीजन (8±2.3 पीपीएम)। इस प्रकार विकसित तकनीकों का अनुसरण करके मत्स्यपालक अपनी आय में अधिक वृद्धि कर सकते हैं। कार्प के साथ मत्स्य पालन एक सफल कदम हो सकता है। इसके व्यावसायीकरण की तरफ अग्रसर होने से इसका बीज भी आसानी से उपलब्ध हो सकता है। इस दृष्टिकोण से इस लुप्तप्राय मछली के संरक्षण के लिए प्राकृतिक आवास केप्टिव प्रजनन, स्थापित करने की आवश्यकता है।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिका(भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद), एस.एम. श्रीवास्तव और विकास साहू भाकृअनुप-राष्ट्रीय मत्स्य आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, लखनऊ (उत्तर प्रदेश) </p>