आंद्रता के बढ़ने पर विशेषकर वर्षा ऋतु के प्रारंभ होते ही वातावरण में फफूंद के जीवाणु फैलने लगते हैं। मछली के अंडे, स्पान तथा नवजात शिशु तथा धायल बड़ी मछलियां फफूंद से जल्दी संक्रमित होते हैं। वास्तव में फफूंद द्वितीय रोगजनक है जो अनुकूल मौसम में शरीर के धायल अंगों पर आश्रय पाकर फलते-फूलते हैं। सेप्रोलिग्नीयोसिस सेप्रोलिग्नीयोसिस पैरालिसिका नामक फफूंद से होता है जाल चलाने तथा परिवहन के दाैरान मत्स्य बीज के धायल हो जाने से फफूंद धायल शरीर पर चिपक कर फैलने लगता है। तथा त्वचा पर सफेद जालीदार सतह बनाता है। यह सबसे धातक रोग है। लक्षण जबड़े फूल जाते हैं अंधापन आने लगता है। पैक्टोरलफिन एवं काँडलफिन के जोड़ पर खून जमा हो जाता है। रोगग्रस्त भाग पर रूई के समान गुच्छे उभर आते है। मछली कमजोर तथा सुस्त हो जाती है। उपचार 3 प्रतिशत नमक का धोल या1:1000 भाग पोटाश के धोल या 1:2000 कैल्शियम सल्फेट के धोल में ५ मिनट तक डुबोने तथा इस रोग के समाप्त होने तक दोहराने से लाभ होता है। ब्रेकियोमाइसिस इसका आक्रमण गलफड़ों पर होता है, जिससे गलफड़े रंगहीन हो जाते हैं जो कुछ समय उपरांत सड़-गल कर गिर जाते हैं। उपचार 250 पी.पी.एम. का फार्मिलिन धोल बनाकर मछली को स्नान दें। 3 प्रतिशत सामान्य नमक के धोल में मछली को विशेषकर गलफड़ों को धोना चाहिए। जल का 1-2 पी.पी.एम. कॉपर सल्फेट (नीला थोथा) से उपचार करना चाहिए। पोखर में 15-25 पी.पी.एम. की दर से फार्मिलिन डालें। स्त्राेत : मछुआ कल्याण एवं मत्स्य विकास विभाग, मध्यप्रदेश सरकार।