<h3>एपीजुएटिक अलसरेटिव सिण्ड्रोम (ई.यू.एस.)</h3> <p style="text-align: justify;">गत 22 वर्षों से यह रोग महामारी के रूप में भारत में फैल रहा है। सर्वप्रथम यह रोग 1983 से त्रिपुरा राज्य में प्रविष्ट हुआ तथा वहां से सम्पूर्ण भारत वर्ष में फैल गया। वर्षा काल के बाद ठीक ऋतु के प्रारंभ में सर्वप्रथम तल में रहने वाली सँवल, मांगूर ,सिंधी बाम, सिंधाड़, कटरंग तथा स्थानीय छोटी छिलके वाली मछलियां इस रोग से प्रभावित होती है। कुछ ही समय में पालने वाली कार्प मछलियां जैसे- कतला, रोहू तथा मिरगल मछलियां भी इस रोग की चपेट में आ जाती है।</p> <p style="text-align: justify;">इस महामारी के प्रारंभ में मछली की त्वचा पर जगह जगह खून के धब्बे उभरते हैं जो बाद मे चोट के गहरे धावों में तबदील हो जाते है तथा उनसे खून निकलने लगता है। चरम अवस्था में हरे लाल धब्बे बढ़ते हुए पूरे शरीर पर यहां वहां कर गहरे अलसर में परिणीत हो जाता है। विषेष रूप से सिर तथा पूंछ के पास वाले भाग पर । पंख तथा पूंछ गल जाती है तथा अततः शीध्र ब्यापक पैमाने पर मछलियां मर कर किनारे दिखाई देने लगती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">कारण</h3> <p style="text-align: justify;">यह रोग पोखर ,जलाशय तथा नदी में रहने वाली मछलियों में फैल सकता है, परन्तु इस रोग का प्रकोप खेती की जमीन के समीपवर्ती तालाबों में ज्यादा देखा गया है, जहां वर्षा के पानी में खाद , कीटनाषक इत्यादि घुलकर तालाब में प्रवेष करते है। साधरणतः कीटनाषक के प्रभाव से मछली की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। पानी मे प्रदूषण अधिक होने पर अमोनिया का प्रभाव बढ़ जाता है तथा पानी में आक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। यह परिस्थिति इस रोग के बैक्टिरिया के लिए अनुकूल होती है, जिससे ये तेजी से बढ़ते है तथा प्रारंभ में त्वचा पर धब्बे के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं जोकालांतर में गहरे अलसर का रूप धारण कर लेते हैं। </p> <p style="text-align: justify;">इस रोग के फैलने में अनेक कारक अपना योगदान देते है, जिसमें वायरस , बैक्टिरिया तथा फँगस (फफूंद) प्रमुख है।</p> <h3 style="text-align: justify;">बचाव के उपाय</h3> <ol style="text-align: justify;"> <li>पूर्व में रोगग्रस्त प्रजनकों जो बाद में भले ही स्वस्थ्य हो जाते हैं ऐसे प्रजनकों से मत्स्य बीज उत्पादित नहीं करना चाहिए।</li> <li>तालाब के किनारे यदि कृषि भूमि है तो तालाब के चारों ओर बाँध बना देना चाहिये, ताकि कृषि भूमि का जल सीधे तालाब में प्रवेश न करें।</li> <li>वर्षा के बाद जल का पी.एच. देखकर या कम से कम 200 किलो चूने का उपयोग करना चाहिए।</li> <li>शीत ऋतु के प्रारभिक काल में ऑक्सीजन कम होने पर पम्प, ब्लोवर से पानी में ऑक्सीजन को प्रवाहित करना चाहिए।</li> </ol> <p style="text-align: justify;">प्रति एकड़ 5 किलो मोटे दाने वाला नमक डालने से कतला व अन्य मछलियों को वर्षा पश्चात् मछली में अन्य होने वाले रोग से सुरक्षा की जा सकती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">उपचार</h3> <ul style="text-align: justify;"> <li style="text-align: justify;">अधिक रोगग्रस्त मछली को तालाब से अलग कर देना चाहिए तथा तालाब में कली का चूना (क्विक लाइम) जो कि ठोस टुकड़ो में हो 600 किलो प्रति हेक्टर/मीटर की दर से जल में तीन सप्ताहिक किश्तों में डालने से रोग तीन सप्ताह में नियंत्रित हो जाती है।</li> <li style="text-align: justify;">चूने के उपयोग के साथ-साथ ब्लीचिंग पाउडर 1 पी.पी.एम. अर्थात् 10 किलो प्रति हेक्टर/मीटर की दर से तालाब में डाला जाना कारगर सिद्ध होता है। कम मात्रा में या छोटे पोखर में मछली ग्रसित हो तो पोटेषियम परमेग्नेट 0.5 से 2.0 पी.पी.एम. के धोल में 2 मिनट तक स्नान लगातार 3-4 दिन तक कराने से लाभ होता है। </li> <li style="text-align: justify;">सिफेक्स- केन्द्रीय स्वच्छ जल संवर्धन संस्थान (सीफा) भुवनेष्वर के वैज्ञानिकों ने अल्सरेटिव सिन्ड्रोम के उन्मूलन हेतु दवा बनाई है जो एक्वावेट लेबारेटरीज राँची द्वारा बेची जाती है। प्रति हेक्टर/ मीटर 1 लीटर की दर से पानी का उपचार आवश्यकतानुसार किया जा सकता है। प्रति लीटर इसका मूल्य रू. 950/- के लगभग है।</li> </ul> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : मछुआ कल्याण एवं मत्स्य विकास विभाग, मध्यप्रदेश सरकार।</p>