परजीवी जनित रोग आंतरिक परजीवी, मछली के आंतरिक अंगों जैसे से शरीर गुहा, रक्त नलिका, वृक्क आदि में रोग फैलाते है होते है जबकि बाह्य परजीवी मछली के चर्म,गलफड़ों, पंखों आदि को रोग ग्रस्त करते हैं। ट्राइकोडिनोसिस लक्षण यह बीमारी ट्राइकोडीना नामक प्रोटोजोआ परजीवी से होती है जो मछली के गलफड़ों व शरीर के बाह्य सतह पर रहता है। संक्रमित मछली में शिथिलता, भार में कमी तथा मरणासन्न अवस्था आ जाती है। गलफड़ों से अधिक श्लेष्म श्रावित होने से श्वसन में कठिनाई होती है। उपचार निम्न रसायनों के घोल में संक्रमित मछली को 1-2 मिनिट डुबाकर रखा जाता है। 1.5 प्रतिशत सामान्य नमक घोल 25 पी.पी.एम. फार्मेलिन 10 पी.पी.एम. काँपरसल्फेट (नीला थोथा) घोल माइक्रो एवं मिक्सोस्पोरीडिएसिस लक्षण माइक्रोस्पोरीडिएसिस रोग मुख्यतः अंगुलिका अवस्था में अधिक होता है ये कोशिकाओं में तन्तुमय कृमिकोष बनाकर रहते है तथा उत्तको को भारी क्षति पहुंचाते है मिक्सोस्पोरीडिएसिस रोग मछली के गलफड़ों व चर्म को संक्रमित करता है। उपचार इनकी रोकथाम के लिए कोई औषधि पूर्ण लाभकारी सिद्ध नहीं हुई है। अतः रोग ग्रस्त मछली को बाहर निकाल देते हैं मत्स्य बीज संचयन के पूर्व चूना, ब्लीचिंग पावडर से पानी को रोगाणुमुक्त करते हैं। सफेद धब्बेदार रोग लक्षण यह रोग इक्थियोथिरिस प्रोटोजोन द्वारा होता है इसमें मछली की त्वचा, पंख व गलफड़ों पर छोटे सफेद धब्बे हो जाते हैं। ये उत्तकों में रहकर उतको को नष्ट कर देते हैं। उपचार 0.1 पी.पी.एम. मेलाकाइट ग्रीन + 50 पी.पी.एम. फार्मलिन में 1.2 मिनिट तक मछली को डुबाते हैं। पोखर में 15 से 25 पी.पी.एम. फार्मेलिन हर दूसरे दिन रोग समाप्त होने तक डालते हैं। डेक्टाइलो गाइरोसिस व गाइरो डेक्टाइलोसिस लक्षण यह कार्प एवं हिंसक मछलियों के लिए घातक है। डेक्टाइलोगायरस मछली के गलफड़ों को संक्रमित करते हैं इससे ये बदरंग, शरीर की वृद्धि में कमी व भार में कमी जैसे लक्षण दर्शाते हैं। गाइरोडेक्टाइलस त्वचा पर संक्रमित भाग की कोशिकाओं में धाव बना देता है जिससे शल्कों का गिरना, अधिक श्लेषक एवं त्वचा बदरंग हो सकती हैं। उपचार पी.पी.एम. पोटेषियम परमेगनेट के घोल में 30 मिनिट तक रखते हैं 1. 1:2000 का ऐसिटिक एसिड के धोल एवं 2 प्रतिशत नमक धोल मे बारी-बारी से 2 मिनिट के लिए डूबावें। तालाब में मेलाथियाँन 0.25 पी.पी.एम. सात दिन के अंतर में तीन बार छिड़कें। आरगुलौसिस लक्षण यह रोग आरगुलस परजीवी के कारण होता हैयह मछली की त्वचा पर गहरे धाव कर देते हैं जिससे त्वचा पर फफूंद व जीवाणु आक्रमण कर देते हैं व मछलियां मरने लगती हैं। उपचार 1. 500 पी.पी.एम.पोटेशियम परमेगनेट के धोल में 1 मिनिट के लिए डूबाए. 0.25 पी.पी.एम. मेलेथियाँरन को 1-2 सप्ताह के अंतरराल में 3 बार उपयोग करें। स्त्राेत : मछुआ कल्याण एवं मत्स्य विकास विभाग, मध्यप्रदेश सरकार।