मछलियाँ भी अन्य प्राणियों के समान प्रतिकूल वातावारण में रोगग्रस्त हो जाती हैं। रोग फैलते ही संचित मछलियों के स्वभाव में प्रत्यक्ष अंतर आ जाता है। फिर भी साधारणतः मछलियां रोग-व्याधि से लड़ने में पूर्णतः सक्षम होती है। लक्षण रोग ग्रस्त मछलियों के लक्षण बीमार मछली समूह में न रहकर किनारे पर अलग-थलग दिखाई देती है, वह शिथिल हो जाती हैं। बेचैनी, अनियंत्रित तैरती हैं। अपने शरीर को बंधान के किनारे या पानी में गड़े बाँस के दूंठ से बार-बार रगड़ना। पानी में बार-बार कूद कर पानी को छलकाना । मुँह खोलकर बार-बार वायु अन्दर लेने का प्रयास करना। पानी में बार-बार गोल-गोल धूमना। भोजन न करना। पानी में सीधा टंगे रहना। कभी-कभी उल्टी भी हो जाती है। मछली के शरीर का रंग फीका पड़ जाता है। चमक कम हो जाती है तथा शरीर पर श्लेष्मिक द्रव के स्त्राव से शरीर चिपचिपा चिकना हो जाता है। कभी-कभी आँख, शरीर तथा गलफड़े फूल जाते हैं। शरीर की त्वचा फट जाती है तथा उससे खून लगता है। गलफड़े (गिल्स) की लाली कम हो जाना, उनमें सफेद धब्बों का बनना। शरीर में परजीवी का वास हो जाता है। उपरोक्त कारणों से मछली की बाढ़ रूक जाती है तथा कालान्तर में तालाब में मछली मरने भी लगती है। रोग के कारण रासायनिक परिवर्तन पानी की गुणवत्ता, तापमान, पी.एच. आँक्सीजन, कार्बन डाई आक्साइड आदि की असंतुलित मात्रा मछली के लिए घातक होती है। मछली के वर्ण्य पदार्थ जल में एकत्रित होते जाते है व मछली के अंगों जैसे गलफडे, चर्म, मुखगुव्हा के सम्पर्क में आकर उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं। कार्बनिक खाद, उर्वरक या आहार आवश्यकता से अधिक दिए जाने से विषैली गैसें उत्पन्न होती हैं जो नुकसा दायक होती हैं। बहुत से रोगजनक जीवाणु व विषाणु पानी में रहते हैं जब मछली प्रतिकूल परीस्थिति में कमजोर हो जाती है तो जीवाणु/विषाणु उस पर आक्रमण करके रोग ग्रसित कर देते हैं। स्त्राेत : मछुआ कल्याण एवं मत्स्य विकास विभाग, मध्यप्रदेश सरकार।