महाशीर संवर्धन रैचिंग अर्थात् संवर्धन को ऐसी मत्स्य-पालन प्रणाली के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसमें तरुण महाशीरों को पानी में असुरक्षित भोजन पर छोड़ दिया जाता है। इस प्रकार इनका आकार-प्रकार बाजार में बेचने योग्य हो जाता है। रैचिंग, मछलियों के पुनः प्रसार की प्रभावपूर्ण विधि है। रैचिंग के संबंध में बिलकुल भी भ्रम में पड़ने की आवश्यकता नहीं है कि मत्स्य वृद्धि या प्रत्यारोपण अथवा इसके भंडार में वृद्धि को क्या कहा जाता है। रैचिंग का अर्थ है नदियों और जलाशयों में जीरों व अंगुलिकाओं को उन स्थानों पर छोड़ा जाना जहां पर वयस्क मछलियां उनके विस्थापन के समय उन तक न पहुंच सकें। रैचिंग संकटग्रस्त मछलियों के समयब( और आशाजनक रूप से पुनर्वासन का कार्य हो सकता है। महाशीर के लिए उपयुक्त हैचरी तकनीकियों का अभाव तथा इसके बीजों के पालन की प्रमुख समस्या महाशीर पालन के कार्य में एक बड़ी बाधा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के शीतजल मात्स्यिकी अनुसंधान निदेशालय ने सुनहरी महाशीर के बीज उत्पादन की पहल की है और इन बीजों को भारत सहित विश्व के अन्य देशों की नदियों धाराओं और जलाशयों में संचयित किया गया है, ताकि महाशीर मत्स्य उत्पादन में वृद्धि हो। इसके साथ ही साथ इस निदेशालय ने इस प्रजाति के जननद्रव्य को समाप्त होने से बचाने के लिए इसे सुरक्षित भी रखा है। हैचरी में उत्पादित बीजों को पश्चिम बंगाल, सिक्किम व हरियाणा राज्य के मत्स्य विभागों के साथ-साथ अन्य संस्थानों को भी हस्तांतरित किया जाता है। इस प्रजाति के बीजों को पापुआ न्यू गिनी की रामू तथा स्पिक नदियों में भी संचयित किया गया है। वर्ष 2001 में निदेशालय द्वारा इसके बीजों का उत्तराखण्ड के कुमाऊं क्षेत्र की श्यामलाताल झील में संचयन किया जहां आज ये पर्याप्त मात्र में पफूल-फल रही हैं और पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन रही हैं। इसी प्रकार के कार्यक्रमों को उन सभी क्षेत्रों में भी आयोजित किया जाना चाहिए, जहां महाशीर पर्याप्त मात्र में विद्यमान है। महाशीर बीज उत्पादन सफल मत्स्य पालन कार्यक्रम हेतु फार्म के लिए स्थल का चुनाव बहुत महत्वपूर्ण है। फार्म के विकास तथा उसकी उपलब्ध जल की मात्र की क्षमता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। महाशीर पालन के विभिन्न स्तरों पर जल की मात्र के संबंध में आदर्श शर्तें नीचे दी गई हैंः जहां तक सम्भव हो सके हैचरी के लिए स्थान अधिक ऊंचाई पर तथा एसेी जगह होना चाहिए, जहां पर पानी का समुचित प्रवाह हो तथा बाढ़ वाले क्षेत्र से बिल्कुल सुरक्षित हो। हैचरी-फार्म के लिए भू-क्षेत्र और जल आपूर्ति कम ढलान वाली व समान तापीय स्तर वाली होनी चाहिए तथा साथ ही प्रग्रहण क्षेत्र पर कम से कम मानवीय गतिविधियां होनी चाहिए। हैचरी निर्माण के लिए ऐसे स्थल को वरीयता देनी चाहिए, जहां पर जल आपूर्ति का गुरूत्व फार्म एवं हैचरी की ओर हो। हैचरी का जल स्रोत अच्छे प्रकार का एवं पर्याप्त मात्र में होना चाहिए। पानी का स्रोत या तो झरने की तरफ लिम्नाक्रेीनी अथवा रिओक्रेनी या फिर ऐसे नालों-धाराओं का हो सकता है, जिनमें गाद एवं कार्बनिक तत्वों की मात्र बहुत कम हो। हैचरी को होने वाली जल की आपूर्ति प्रदूषित नहीं होनी चाहिए, जिससे कि मछलियों को किसी भी प्रकार की हानि न पहुंचे। महाशीर पालन के लिए झरनों का पानी बहुत आदर्श स्रोत होता है। इस पानी में तापमान के स्तर पर उतार-चढ़ाव नहीं होता। पानी में तापमान, प्रजनन के दौरान 20-25 डिग्री सेल्सियस तथा पालन-पोषण के समय थोड़ा अधिक होना चाहिए। व्यापक पैमाने पर सुनहरी महाशीर के बीज उत्पादन के लिए उसके प्रजनक भंडारों का या तो फार्म में या फिर प्राकृतिक जल स्रोतों में उपलब्ध होना पूर्व प्राथमिकता है। इस प्रजाति के बारे में यह कहा जाता है कि ये कुछ अन्तराल में गुणात्मक आधार पर अंडे देती हैं। परिपक्व प्रजनक, प्रजननकाल में नदियों झीलों, धाराओं और जलाशयों में तेज गति से जाती हुई नजर आती हैं। इनको फॉसा जाल के द्वारा पकड़कर स्ट्रिपिंग विधि से प्रजनन के लिए उपयोग किया जाता है। मछली की यह प्रजाति कृत्रिम प्रजनन के लिए अंड प्रस्फुटन और अंगुलिकाओं के पोषण हेतु नियंत्रित वातावरण में भी व्यावहारिक है। अंडों और जीरों के पालन-पोषण के लिए हैचरी एक छत के नीचे तथा अनेक ट्रफों व टैंकों की व्यवस्था सहित होनी चाहिए। हैचरी ऐसी होनी चाहिए,जिसका निर्माण वास्तव में इसी उद्देश्य केलिए किया गया हो। फर्श सीमेंट का बना होना चाहिए, ताकि उसमें पानी साफ करने की व्यवस्था हो। हैचरी को सूर्य की किरणों के सीधे प्रवेश से सुरक्षित होने के साथ-साथ, इसका साफ-सुथरे कार्य स्थल पर होना चाहिए। सहायक सुविधाएं हैचरी में अंडों के उद्भवन भंडार सामग्री के पालन-पोषण के अतिरिक्त विभिन्न विश्लेषण एवं हैचरी कार्य के संचालन के लिए एक प्रयोगशाला तथा हैचरी उपकरणों को रखने के लिए एक भंडार का होना भी नितांत आवश्यक है। अंडजनन के समय तैयार मादा महाशीर की परिपक्वता का अंदाज उसके कोमल पेट को छूकर, गुहा का गुलाबी रंग देखकर व इसके गर्भाशय पर हल्का दबाव देकर लगाया जा सकता है कि वह अंडे देने के लिए तैयार है या नहीं। नर मछली में इसके गुहा के पास जब हल्का दबाव दिया जाता है तो शुक्र रस (मिल्ट) का तेज प्रवाह इसके परिपक्व होने की पुष्टि करता है। अंड दोहन प्रक्रिया निषेचन एवं उर्वरण हेतु केवल महाशीर के जीवित प्रजनकों का ही प्रयोग किया जाना चाहिए। जब वे जाल में फंसे हुए हों तो । आवर परिपक्व प्रजनकों से अंडों को तुरंत निकाल दिया जाना चाहिए, ताकि उन्हें किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे। आमतौर पर मछलियों से अंडों का दोहन उर्वरण ‘शुष्क विधि’ द्वारा किया जाता है। इसमें अंडों का दोहन एक सूखे पात्र या बेसिन में किया जाता है। इन अंडों का कृत्रिम निषेचन या तो दो व्यक्ति विधि या पिफर किसी अनुभवी व्यक्ति द्वारा किया जाता है। पूर्णतः परिपक्व मछली या प्रजनक के पेट पर हल्के से दबाकर अंड की एक धारा निकलती है। इस प्रक्रिया को अनेक बार तब तक दोहराया जाता है, जब तक परिपक्व अंडे पूरी तरह बाहर नहीं निकल जाते। कभी-कभार अंड दोहन के समय अंडों के साथ कुछ रक्त भी आ जाता है, जो कुछ अंडों के अपरिपक्व होने से अधिक दबाव डालने आदि के कारण हो सकता है। इसके पश्चात अंडों का दोहन तुरंत बंद कर देना चाहिए। महाशीर के अंडे का रंग हल्के पीले से लेकर चमकीले नारंगी रंग का तथा उनका व्यास 2.5 से 3.5 मि.मी. होता है। सामान्यतः अंडों का रंगीनपन मछली के आवास स्थलों को सूचित करता है। ताजे दोहित अंडे प्राकृतिक रूप में तब तक चिपचिपे होते हैं, जब तक कि वे पानी में रहकर कठोर नहीं हो जाते। अंडों का निषेचन अंडों को दोहने के पश्चात समान कार्य विधि से नर मछली का शुक्र रस निकाला जाता है। 2-3 मादाओं से निकाले गए अंडों के पर्याप्त मात्र में निषेचन के लिए एक चम्मच शुक्र रस पर्याप्त होता है। दोनों लिंगों के उत्पादों के मिश्रण के पश्चात उनको निषेचन के लिए तुरन्त एक स्थान पर रखा जाता है। पात्र के अन्दर अंडों को सूर्य की प्रत्यक्ष किरणों से उचित प्रकार ढककर रखा जाना चाहिए और कुछ समय के लिए उसको हिलाना-डुलाना नहीं चाहिए। अंडों को पानी में 30-40 मिनट तक कठोर होने के लिए छोड़ देना चाहिए। इसके पश्चात बार-बार धोने के उपरान्त अतिरिक्त शुक्र रस और अन्य बाहरी पदार्थ धुल जाते हैं। पानी में कठोरीकरण के पश्चात निषेचित अंडे 3.5-4.0 मि.मी. तक के हो जाते है। निषेचीकरण दर का मूल्यांकन ‘एसिटिक एसिड विधि’ द्वारा किया जाता है तथा कठोरीकृत अंडों को 5 प्रतिशत ग्लेशियल एसिटिक एसिड के मिश्रण में 24 घण्टे के लिए रख दिया जाता है। अंकुरक्षम अंडे पारदर्शी हो जाते हैं, जबकि अनिषेचित अंडे कभी भी पारभाषी हो सकते हैं। परिपक्व प्रजनकों का उद्भवन करने के लिए उनका रखरखाव उचित प्रकार से किया जाना चाहिए, ताकि 90 प्रतिशत से अधिक निषेचन हो सके। अंडों का परिमाणन एवं उद्भवन हैचरी में निषेचित अंडों की कुल संख्या के रखरखाव तथा विभिन्न स्तरों पर उनकी उत्तरजीवितता व परिमाणन के मूल्यांकन हेतु उनका एक लेखा तैयार कर लिया जाता है। महाशीर के संबंध इसके लिए आयतीन और भारमितीय दोनों प्रकार की पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है। सामान्यतः सुनहरी महाशीर के अंडों की संख्या प्रति लीटर 35-60 तथा भार 60-100 अंडे/ग्राम के मध्य होता है। अंडों के कठोरीकरण की प्रकिया के पूर्ण होने तथा निषेचित अंडों का संख्यात्मक मूल्यांकन करने के पश्चात उनको हैचरी में सेने, उद्भवन एवं पालन-पोषण के लिए हस्तांतरित किया जाता है। हैचरी के अन्दर निषेचित अंडों को सूर्य की सीधी किरणों से बचाकर उचित प्रकार से सुरक्षित रखना चाहिए। इन निषेचित अंडों को पर्याप्त ऑक्सीजनयुक्त (7.5-9.0 मि.ग्रा./ लीटर) साफ व ताजे पानी की निरंतर आपूर्ति में उद्भिद किया जाता है। महाशीर के अंडों के उदभवन के लिए जल का तापमान 20-25 डिग्री सेल्यियस अधिक सुविधाजनक रहता है। हैचरी के अनुकूलतम वातावरण में 20-25 डिग्री सेल्यियस पर उद्भवन तथा 10-12 दिनों में 80-95 घण्टों में अंडपीत का पूर्ण अवशोषण हो जाता है। अंडों एवं जीरों का हवाई परिवहन सुदूरवर्ती क्षेत्रों में महाशीर के बीजों का वितरण एक गीली रूई में रखकर हवाई परिवहन द्वारा किया जाता है। पानी में कठोरीकरण प्रकिया के पश्चात अंडों को गीली रूई में 2-3 परतों में सावधानीपूर्वक प्लास्टिक के बक्से में पंक्तिबद्ध रखा जाता है। अंडों को सेने का समय कम से कम 80 घण्टों का होता है। अंडों को सेने का कार्य सामान्य प्रकिया के द्वारा किया जाता है। खाली आंतों वाली मछली, भरी आंतों की अपेक्षा ऑक्सीजन का उपभोग कम करती है। परिवहन के लिए पाचन के दौरान उत्पादित खराब पानी, अमोनिया, यूरिया आदि का प्रयोग किया जाता है। परिवहन से पूर्व मछलियों को अत्यधिक तनाव का अभ्यस्थ हो जाना चाहिए। मत्स्य परिवहन के लिए विभिन्न आकार-प्रकार के प्लास्टिक बैगों अथवा कंटेनरों का, जो कि पीवीसी फाइबर ग्लास (एफआरपी), लोहे या एल्मुनियम आदि से निर्मित हों, का प्रयोग में लाना चाहिए। अनुकूलन एवं परिवहन का समय बहुत अधिक लम्बा हो तो मछलियों को संक्रमण से बचाने के लिए 20-40 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी में प्रतिरोधी (एंटीबायोटिक) दवाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है। 0.03 प्रतिशत किचन साल्ट के प्रयोग द्वारा परिवहन के दौरान मछलियों में तनाव संवेदनशीलता और क्रियाशीलता कम हो जाती है। परिवहन के दौरान आवश्यकता से अधिक अर्थात ओवर लोडिंग से बचना चाहिए। परिवहन के पश्चात मछलियों को छोड़ते समय पानी की गुणवत्ता और तापमान का समान होना बहुत आवश्यक है। स्त्राेत : खेती पत्रिका(आईसीएआर), देबाजीत सर्मा निदेशक, भाकृअनुप-शीतजल मात्स्यिकी अनुसंधान निदेशालय, भीमताल, नैनीताल (उत्तराखण्ड)।