चूने का प्रयोग यह पोषक तत्व कैल्षियम उपलबध कराने के साथ जल की अम्लीयता पर नियंत्रण रखता है। हानिकारक धातुओं को अवक्षेपित करता है। विभिन्न परजीवियों के प्रभाव से मछलियों को मुक्त कराता है तथा तालाब के धुलनषील ऑक्सीजन स्तर को ऊंचा उठाता है। नाईट्रोजन उर्वरकों के लगातार उपयोग से तथा जैविक पदार्थो से उत्पन्न अम्लों के कारण मिट्टी की अम्लीयता बढ़ जाती है। फलस्वरूप अम्लीयता की अवस्था में डाला गया फाँस्फोरसयुक्त उर्वरक निरर्थक चला जाता है। अतः उर्वरकों के पूर्ण उपयोग के लिए अम्लीयता को उदासीनता के स्तर तक लाना आवष्यक है। चूने की मात्रा मिट्टी की अम्लीयता के आधार पर निष्चित की जाती है। मिट्टी का पी.एच. मान । मिट्टी का प्रकार चूने की मात्रा कि.ग्रा./हे. 0.4-5.0 अत्यधिक अमलीय 2000 5.0-6.0 मध्यम अमलीय 1200 6.0-6.5 कम अमलीय 1600 6.5-7.5 सामान्य से करीब 250 से 350 अत्यधिक क्षारीय मिट्टी (पी.एच.8.5 से अधिक) को गोबर की उचित मात्रा 20-30 टन प्रति हेक्टर के प्रयोग से या जिप्सम के 5-5 टन प्रति हेक्टर के प्रयोग से मत्स्यपालन के योग्य पी.एच. पर लाया जा सकता तली में अधिक मात्रा में कार्बनिक पदार्थ के जमा होने पर उपचार तालाब के तल में अधिक मात्रा में कार्बनिक पदार्थ हो जाने पर अक्सर विभिन्न प्रकार की जहरीली गैसें पैदा होती है, जो मछली के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती है। अतः तालाब को सुखाकर तली की एक पर्त निकाल देना चाहिए तथा 1 टन प्रति हेक्टर चूना डालकर 15 दिवस के लिए तल को सूर्य की किरण दिखाना चाहिये। यदि तालाब से पानी निकालना संभव न हो तो तल को समय-समय पर रेकिंग करते रहना चाहिए तथा 1 टन चूना प्रति हेक्टर प्रति वर्ष किस्तो में डालना चाहिये। तालाब के जलीय पौधों का उन्मूलन जलीय वनस्पतियां तालब में उपलब्ध पोषक तत्वों का शोषण कर तालाब की उत्पादकता कम करती है। जलीय वनस्पतियां मछली के शत्रु को प्रश्रय देती है। ये तालाब के ऑक्सीजन के संतुलन को प्रभावित करती है तथा मत्स्याखेट के समय जाल चलाने में बाधा उत्पन्न करती है। इनकी अधिकता से सूर्य की किरणें तालाब की तली तक नहीं पहुंच पाती है, जिससे मछलियों की बाढ़ प्रभावित होती है। इसलिये मत्स्य पालन के पूर्व जलीय वनस्पतियां का उन्मूलन कर देना चाहिये। तालाब में पाई जाने वाली विभिन्न प्रकार की जलीय वनस्पतियों को मुख्यतः तीन वर्गों में बांटा जा सकता है सतह पर तैरने वाली वनस्पतियां जलकुम्भी, पिस्टीया, लेमना पौलीरीजा, लेमना माइनर, बोल्फिया ऐजोला इत्यादि वनस्पतियां इस श्रेणी में आती है। जलकुम्भी पिस्टीया ऐजोला बोल्फिया लेमना पौलीरीजा लेमना माइनर 2. जलमग्न वनस्पतियां विभिन्न प्रकार के शैवाल ओटेलिया, वैलिस्नेरिया, हाइड्रीला, सिरेटोफाइलम, लैगारोसिफोन, कारा तथा अन्य वनस्पतियां जो जल की सतह से नीचे ही रहती है इस श्रेणी में आती है। ओटेलिया नीलम्बिया वैलिस्नेरिया 3 तालाब के किनारे उथले तथा गहरे जल में पाई जाने वाली जड़दार जलीय वनस्पतियां लिमनैथियम, आइपोमिया, पुसिया, मार्सीलिया कमल इत्यादि। आइपोमिया मार्सीलिया पुसिया लिमनैथियम जलीय वनस्पतियों के उन्मूलन की विभिन्न विधियाँ (क) यंत्र अथवा हाथ से निकालना यह विधि छोटे तालाबों के लिये काम में लाई जाती है। मजदूरों द्वारा हाथ से जलीय वनस्पति की सफाई की जाती है। यंत्र विधि में मजदूरों द्वारा हंसिया या कटीले तारों की मदद से जलीय वनस्पति की सफाई की जाती है। आजकल मषीने भी जलीय वनस्पति की सफाई के लिये उपलब्ध है। (ख) रासायनिक खरपतवार नाषक दवाओं द्वारा विनाष एवं विघटन यह विधि प्रभावषाली है, इनका प्रयोग अधिक जलक्षेत्रों वाले तालाबों में किया जाता है, रासायनिक विधि में जलीय वनस्पतियां मरकर तालाब की तली में बैठ जाती है, तथा कार्बनिक खाद के रूप में काम आती है और तालाब की उत्पादकता बढ़ाती है। कभी-कभी ज्यादा मात्रा में जलीय वनस्पतियों के मरने से इनके विघटन के कारण जल में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। नीचे दी गई सारिणी द्वारा किस वनस्पति नाषक का कितनी मात्रा में किन वनस्पतियों पर प्रयोग करना चाहिये उल्लेख किया जा रहा है। जलीय वनस्पतियाँ खरपतवार नाषक मात्रा उपयोग विधि जलकुम्भी 2-4 डी 10 कि.ग्रा./हे. पत्तियों पर छिड़काव (स्प्रे) कमल एवं लिली 2-4 डी 5-10 " पत्तियों पर छिड़काव (स्प्रे) ओटेलिया, बेलिसनेरिया 2-4 डी 5-10 " जड़ों की निकासी का छिड़काव जली घांस डालापान (प्रारंभिक 2-4 डी 5-10 " पत्तियों पर छिड़काव (स्प्रे) जलीय घांस पैराक्वाट 2 कि.ग्रा/हे. पत्तियों पर छिड़काव (स्प्रे) फ्लेंकटानिक,जलीय फिलामेन्ट एल्गी,जलमग्न वनस्पतियाँ अमोनिया 10-15 पी.पी.एम जड़ निकासी कर छिड़काव माइक्रोसिस्टिस डाइयूरान 0.1-0.3 " जड़ निकासी कर छिड़काव पिस्टिया अमोनिया 1 प्रतिषत एक्वस पत्तियों पर छिड़काव पिस्टिया पैराक्वाट 0.2 कि.ग्रा./हे पत्तियों पर छिड़काव सलविनिया पैराक्वाट 0.4 कि.ग्रा./हे. पत्तियों पर छिड़काव सलविनिया अमोनिया 2 प्रतिषत घोल 0.25 वेटिंग एजेन्ट पत्तियों पर छिड़काव जैविक नियंत्रण विधि साधारणतः तालाबों में अक्सर जल में डूबी हुई वनस्पतियाँ हाइड्रीला, नाजा, सेरेटोफाइलम देखने को मिलती है। ये सभी जलीय वनस्पतियाँ ग्रासकार्प भोजन के रूप में ग्रहण करती है। ग्रास कार्प मछली जैविक नियंत्रण में बहुत उपयोगी है, ग्रासकार्प के 200 मिलीमीटर या इससे बड़ी साइज के मत्स्य बीज संचय करना उपयुक्त है। जल के सतह पर तैरने वाली वनस्पतियाँ जैसे लेमना, ऐजाला, स्पायरोडेला, वोल्फिया आदि भी ग्रासकार्प द्वारा ग्रहण की जाती है। मांस भक्षी तथा अनचाही मछलियों का उन्मूलन बारहमासी तालाबों में अनेक प्रकार की मांसाहारी तथा अनचाही मछलियां रहती है मांसाहारी मछलियां मत्स्य बीज को हानि पहुंचाती है जबकि अनके छोटी-छोटी अनचाही मछलियां भोजन सम्बन्धी स्पर्धा कर नुकसान पहुंचाती हैं। जिन्हें यदि सम्भव हो तो बार-बार जाल चलाकर मांसभक्षी तथा अनचाही मछलियों को निकाल देना चाहिये। जल निष्कासन विधि:- जिन तालाबों में जल का पूर्ण निष्कासन तथा पुनः आपूर्ति प्रबंध होतालाब के सम्पूर्ण जल को निकालकर इन मछलियों को पकड़ लिया जाता है तथा कुछ समयतालाब को सूखने के लिये छोड़ लिया जाता है। विष प्रयोग विधिः- ऐसे तालाबों में जिसमें जल निष्कासन तथा जलप्लावन की सुविधा नहीं है।गहराई अधिक होने के कारण बारबार जाल द्वारा भी शत-प्रतिषत मछलियों को निकालना संभव नहीं होता है, वहां विष प्रयोग की विधि अपनाई जाती है। (क) महुआ खली:- महुआ खली को 200 से 250 पी.पी.एम. (दस लाख भाग में एक भाग) या 2000 किलोग्राम से 2500 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से डालने से तालाब की सारी मछलियाँ मारी जा सकती है। खली का चूर्ण समरूप ढंग से तालाब में फैला दिया जाता है। जाल को तालाब के एक छोर से दूसरे छोर तक खींचा जाता है। इस कार्य को 5-6 बार तक जारी रखा जाता है, विष से प्रभावित मछलियाँ बेजान होकर सतह पर आ जाती है। अतः सतह पर आ जाने से उनको पकड़ना आसान हो जाता है। महुआ खली के प्रयोग से मारी गई मछलियाँ पूरी तरह खाने योग्य होती है। जल में इसका विषैलापन करीब पन्द्रह दिन रहता है। तत्पष्चात यह जैविक खाद में बदल जाता है। मछली बीज का संचय विष का प्रभाव समाप्त हो जाने पर ही किया जाता है। (ख) अमोनियाः- एन हाइड्रा अमोनिया 20 से 25 पी.पी.एम. की दर से उपयोग करने पर प्रभावषाली होता है। विष का प्रभाव 4 से 6 सप्ताह तक होता है। (ग) ब्लीचिंग पाउडर:- ब्लीचिंग पाउडर का 25-30 पी.पी.एम. घोल 3-4 घंटे के अन्दर उपयोग करने पर अनचाही मछलियों का उन्मूलन किया जा सकता है। पाउडर को पानी में घोला जाता है तथा धोल को जल के सतह पर तुरन्त डाला जाता है। 3-4 घंटे बाद जाल चलाकर मछलियों को बाहर निकाल लिया जाता है। तालाब में खाद का प्रयोग तालाब में मछली के प्राकृतिक भोजन का उत्पादन, जैविक (कार्बनिक) एवं रासायनिक (अर्काबनिक) खाद का उपयोग कर बढ़ाया जा सकता है उसमें उचित मात्रा में समय-समय पर फाँस्फोरस नाइट्रोजन और पोटाष खाद डाला जाता है। तालाब में खाद डालने के बाद पोषक तत्व जल में घुलकर मिल जाते हैं तथा कुछ तालाब की तली की मिट्टी द्वारा बांध लिये जाते हैं और धीरे-धीरे जल और सूर्य की प्रक्रिया से मछली को पोषक तत्व के रूप में जल में उपलब्ध होते रहते हैं। इन उपलबध पोषक तत्वों एवं सूर्य की किरण प्रक्रिया से वनस्पति प्लवकों एवं जन्तु प्लवकों की उत्पत्ति होती है, जो मछलियों के लिये प्राकृतिक खाद्य पदार्थ है जिन्हें खाकर मछलियां तेजी से बढ़ती है। तालाब में खाद के अच्छे उपयोग के लिए लगभग एक सप्ताह के पहले 250 से 300 किलोग्राम प्रति हेक्टर बिना बुझा चूना (भूरा चूना) डालने की सलाह दी जाती है। जैविक और रासायनिक खाद दोनों ही तरह का समन्वित उपयोग लाभदायक होता है, पहले प्रतिमाह जैविक खाद का प्रयोग करना चाहिये और उसके 15 दिनों के बाद रासायनिक खाद डालना चाहिए। मत्स्यबीज संचयन के 15 दिन पूर्व प्रारंभिक मात्रा 5 हजार किलोग्राम ताजा गोबर प्रति हेक्टयर की दर से डालना चाहिये। दूसरे माह से प्रतिमाह 555 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से डाला जाता है तथा यूरिया 18 किलोग्राम या कैल्षियम अमोनियम नाइट्रेट 36 किलोग्राम, सिंगल सुपरफास्फेट 30 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से प्रतिमाह डाला जाता है। सतह पर हरी काई पैदा हो जाये तो खाद न डाले। जब महुआ खली का उपयोग किया जाए तो प्रारंभिक मात्रा गोबर खाद नहीं डालना चाहिये। गोबर खाद को तालाब के किनारे ढेर बनाकर डाला जाता है ताकि खाद शनै:-षनै पानी में धुलती रहे। उर्वरीकरण सारिणी खाद मात्रा कि.ग्रा. प्रति हेक्टर तीन या चार हेतु मात्र कि.ग्रा./हे. छ: प्रजाति के मत्स्य पालनहेतु मात्र कि.ग्रा./हे. रिमार्क गोबर 5000 किलो ग्राम 5000 किलो ग्राम प्रारंभिक किस्त गोबर 555 किलो ग्राम 555 किलो ग्राम मासिक किस्त यूरिया या 18 किलो ग्राम 36 किलो ग्राम मासिक किस्त अमोनियम सल्फेट या 36 किलो ग्राम 72 किलो ग्राम मासिक किस्त किस्त कैल्षियम अमोनियम नाइट्रेट 36 किलो ग्राम 72 किलो ग्राम मासिक किस्त सिंगल सुपरफास्फेट या 30 किलो ग्राम 60 किलो ग्राम मासिक किस्त ट्रिपल सुपरफास्फेट 12 किलो ग्राम 24 किलो ग्राम मासिक किस्त मत्स्य बीज संचय मिश्रित मछली पालन का मुख्य उद्देष्य कम से कम समय में न्यूनतम लागत पर ज्यादा से ज्यादा खाने योग्य मछलियां का उत्पादन करना है। इस उद्देष्य की पूर्ति उचित मात्रा में मत्स्यबीज का संचय कर उनके अधिक वृद्धि के लिए जैविक और रासायनिक खादों का एवं कृत्रिम भोजन का उपयोग करके प्राप्त किया जा सकता है। मछली पालन में मछलियों की भोजन की आदतें, इनकी बढ़ने की क्षमता एवं रहन-सहन की जानकारी होना जरूरी है ताकि तालाब के प्रत्येक जल स्तर पर पाये जाने वाले खाद्य पदार्थ का भोजन के रूप में उपयोग कर सके क्रं प्रजातियों के नाम भोजन ग्रहण की सतह भोजन 1 कतला ऊपरी सतह प्रमुख सूक्ष्म जन्तु प्लवक 2 सिल्वर कार्प ऊपरी सतह वनस्पति प्लवक एवं सूक्ष्म शैवाल 3 रोहू मध्य सतह जैविक पदार्थो एवं वनस्पतियों के टुकड़े 4 ग्रास कार्प मध्य सतह सतह शैवाल एवं जलीय वनस्पतियां 5 मृगल निचला सतह सड़े-गले जीव जन्तु के अवषेष,जैविक पदार्थ, कीचड़ 6 कॉमनकार्प निचला सतह सड़ते-गलते जैविक पदार्थ, कीड़े- मकोड़े, कृमि, प्लवकीय शैवाल मत्स्य बीज संचयन एवं प्रजाति का अनुपात जलक्षेत्र में संचय किए जाने वाले मत्स्य बीज की आपस में तालमेल होना आवष्यक है, जो तालाबों की स्थिति पर निर्भर करता है। जिन तालाबों में वनस्पति प्लवक अपेक्षाकृत अधिक है, तो सिल्वरकार्प का अनुपात कतला से अधिक रखना चाहिए। अधिक गहरे तालाबों में जहां अधिक जलीय वनस्पतियां पायी जाती हैं, वहां रोहू का अनुपात अधिक रखना चाहिए, क्यों कि ऐसे तालाबों में रोहू की वृद्धि तीब्र देखी जाती है। पुराने तालाबों में जहां तल में जैविक पदार्थ काफी अधिक मात्रा में उपलब्ध है, उनमें तल में रहने वाली मछलियां मृगल तथा कामनकार्प का अनुपात अपेक्षाकृत अधिक रखना चाहिए। ऐसे तालाबों में शैवाल तथा अन्य जलमग्न जलीय वनस्पतियां उपलब्ध हैं वहां ग्रास कार्प का संचय किया जा सकता है। इनकी संख्या तालाब में उपलब्ध जलीय वनस्पतियों की मात्रानुसार रखी जानी चाहिए। तालाब में परिपूरक आहार जैविक तथा रासायनिक खाद निर्धारित मात्रा मे उपयोग करने पर मत्स्य बीज की संख्या सामान्यतः प्रति हेक्टर 5000 फिंगरलिंग तथा मिश्रित मत्स्य पालन में 10,000 हजार फिंगरलिंग संचय किया जा सकता है। तालाब पूर्ण तैयार होने के उपरांत विभिन्न मत्स्य प्रजातियों का संचयन प्रति हेक्टर की दर से निम्न अनुपात में करते हैं: प्रजाति छः प्रजाति संचयन अनुपात । चार प्रजाति संचयन अनुपात तीन प्रजाति का संचयन अनुपात कतला 20% 40% 40% सिल्वर कार्प 20% - - रोहू 20% 30% 30% ग्रास कार्प 15% - - मृगल 15% 20% 30% कामनकार्प 10% 10% - तालाब में गोबर खाद छोड़ने के पन्द्रह दिन बाद मत्स्य बीज छोड़ना चाहिए। तालाब से भरपुर उत्पादन के लिए छ: प्रकार की मछलियों का बीज या चार प्रकार की या तीन प्रकार की मछलीबीज का संयोजन अलग-अलग अनुपात में छोड़ा जा सकता है। शहडोल जिले में सामान्यतः तीन प्रकार की प्रजाति के मत्स्य बीज का संचयन कर मत्स्य पालन का कार्य किया जा रहा है। परिपूरक आहार केवल खाद डालने से ही मछली का उत्पादन अधिक नहीं प्राप्त किया जा सकता है। मछलीपालन में कम से कम समय में और न्यूनतम लागत पर अधिक से अधिक खाने योग्य मछलियां पैदा की जाए, इसलिये यह आवष्यक है कि तालाबों में खाद डालने के साथ ही संचित मछलियों को बाहर से परिपूरक आहार दिया जाए। बाहर से भोजन देने में निम्नलिखित बातों का ध्यान देना आवष्यक है सपाच्य हो। आहार मछलियों के लिए रूचिकर हो। मछलियों की मांसपेषियों के निर्माण लागत न्यूनतम हो, तथा आसानी से उपलब्ध हो। उपरोक्त बातों को देखते हुए कृत्रिम भोजन हेतु साधरणतः जिन सामग्रियों का उपयोग किया जाता है, इनमें सरसों की खली, गेहूं का चोकर, चावल की भूसी, सोयाबीन, मक्का इत्यादि वनस्पति मूल के पदार्थ हैं, जिनका मछलियों के लिए परिपूरक आहार के रूप में उपयोग करते हैं। जन्तु मूल के आहार के रूप में रेषम के कीड़ों के प्यूपा, मछलियों को चूरा फिष मील हड्डी का चूर्ण, मुर्गियों के अण्डे, केकड़े, घोंघे इत्यादि परिपूरक आहार के रूप में ब्यवहार किया जाता है। परिपूरक आहार की दी जाने वाली मात्रासाधारणतः सरसो या मूंगफली की खली तथा चांवल की भूसी या गेहूं का चोकर बराबर अनुपात में मिश्रण बना संचित मछलियों के कुल वजन का एकसे दो प्रतिषत मात्रा रोजाना दिया जाता हैं। प्रतिदिन निम्न मात्रा में परिपूरक आहार दिया जाना चाहिए अवधि 6 प्रजातियां 4 प्रजातियां 3 प्रजातियां पहले तीन माह 3 किलो ग्राम 2 किलो ग्राम 2 किलो ग्राम दूसरे तीन माह 6 किलो ग्राम 5 किलो ग्राम 4 किलो ग्राम तीसरे तीन माह 9 किलो ग्राम 8 किलो ग्राम 6 किलो ग्राम चौथे तीन माह 12 किलो ग्राम 10 किलो ग्राम 8 किलो ग्राम योग-12 माह 2700 किलो ग्राम 2250 किलो ग्राम 1800 किलो ग्राम ग्रासकार्प मछलियों के लिए परिपूरक आहार के रूप में जलीय वनस्पति, जैसे-एजोला लेम्ना, स्पाइरोडेला, वरसीम, हाइड्रीला, नाजा, सिरेटोफाइलम इत्यादि देना चाहिए। परिपूरक आहार देने में निम्नलिखित बातें ध्यान देने योग्य है आहार तब देना चाहिए जब पहले दिया गया आहार मछलियों द्वारा उपभोग कर लिया गया हो। परिपूरक आहार प्रातःकाल में देना चाहिए। खली एवं कोढ़ा या फिषफूड का मिश्रण बैग में भरकर तालाब में लकड़ी के स्टैण्ड में बांध देना चाहिए। बैग में छोटे-छोटे छेद कर देना चाहिए, जिससे मछलियां आसानी से भोजन ग्रहण कर सकें और भोजन का दुरूपयोग भी न हो।