विभूतीनाथ मंदिर नेपाल की सीमा से सटे हिमालय पर्वत श्रेणी में उत्तर प्रदेश उत्तरी क्षेत्र में जनपद श्रावस्ती स्थित है। जिसका मुख्यालय भिनगा है। महाभारत काल में पाण्डव द्वारा 12 वर्ष वनवास तथा एक वर्ष अज्ञातवास में व्यतीत किया गया था। वनवास के दौरान उन्होनें कुछ समय सोहेलवा नामक वन क्षेत्र में व्यतीत किया था। उस समय भीम द्वारा एक गांव की स्थापना की गयी जिस कारण उस गांव को भीम गांव के नाम से जाना जाता था। बाद में यह अपना नाम बदलते-बदलते भिनगा हो गया। भीम गांव से उत्तर दिशा में 36 किमी0 की दूरी पर हिमालय क्षेत्र में एक शिव आधार शिला रखी जो कि विभूतिनाथ नाम से प्रसिद्ध है। हजारों की संख्या में श्रद्धालु प्रति वर्ष मंदिर दर्षनाथ आते है। सावन माह में बहुत बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर आकर भगवान शिव की पूजा एवं अराधना करते हैं। सुहेलदेव वन्यजीव अभयारण्य 452 वर्ग किमी0 के क्षेत्र में फैला सुहेलदेव वन्यजीव प्राणी अभयारण्य भारत-नेपाल सीमा के पास जनपद बलरामपुर और श्रावस्ती में स्थित है 220 वर्ग किमी0 के बफर क्षेत्र के साथ सुहेलदेव वन्यजीव अभयारण्य 1988 में स्थापित किया गया था। अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर स्थित यह अभयारण्य पूर्व से पश्चिम तक लगभग 120 किमी. भूमि की पटरी पर लम्बाई में और 06 से 08 किमी. की चाैड़ाई में स्थित है। इसके उत्तर में नेपाल के जंगल है और एक साथ मिलकर दोनों एक इकाई के रूप में अवस्थित है। इस वन्यप्राणी अभयारण्य में तुलसीपुर, बहरवा, बनकटवा पूर्वी सुहेलवा क्षेत्र, पश्चिम सुहेलवा क्षेत्र और सम्मलित बफर क्षेत्र में भावर और रामपुर क्षेत्र सम्मलित हैं। इस प्राकृतिक वनों में विशाल प्राकृतिक वनों में विशाल प्राकृतिक संसाधन एवं जैव विविधता मौजूद है। सुहेलवा वन्यप्राणी अभयारण्य बौद्ध परिपथ एक महत्वपूर्ण केन्द्र श्रावस्ती के पास स्थित है और काफी संख्या में बौद्ध यात्री अभयारण्य की दक्षिणी सीमा पर अवस्थित इस पवित्र स्थल पर आते हैं। बौद्ध यात्री श्रावस्ती से ही बौद्ध परिपथ के अन्य महत्वपूर्ण स्थलों कपिलवस्तु, लम्बिनी और कुशीनगर को जाते हैं। जमीनदारी उन्मूलन अधिनियम 1952 लागू होने से पहले अभयारण्य का अधिवेशन वन क्षेत्र बलरामपुर के महाराज के व्यक्तिगत सम्पत्ति थी और इसे बलरामपुर स्टेट के नाम से जाना जाता था। जमीनदारों उन्मूलन के उपरान्त में जंगल उ.प्र. राज्य में मिला दिये गये। अभयाण्य की एक अन्य विशेषता थारू जनजाति के लोगों का इसमें निवास होता है। मंगोलायड नाक नक्स वाले लोग काफी पहले से यहाँ रहते हैं और अपने अस्तित्व तथा आजीवका के लिए पूर्वतया वन क्षेत्र पर निर्भर है। इन वन क्षेत्रों में प्रमुख रूप से खैर एवं शीशम के पेड़ाें की बहुतायत है। जामुन के भी वृक्ष है जिगना, हलडू, फलढू आदि के पौधें भी अच्छी मात्रा में हैं। वन्य जीवों में बाघ तेदुएं, चीतल, भालू, भेड़िए, सियार, खरगोश, जंगली, सुअर, सांभर, बन्दर, लंगूर, अजगर, उद्बिलाव आदि सामान्य रूप से पाये जाते हैं। विभिन्न प्रकार के पक्षी जैसे ब्लैक पैरिट बटेर, किंग फिशर, मैना, बाझ, नाइटिंगेल, कोयल तथा उल्लू भी इस वन क्षेत्र में पाये जाते हैं। इस अभयारण्य क्षेत्र में चित्तौड़गढ़, कोहरगढ़, भगवानपुर, गिरगिया, खैरमान और रजियामाल जैसे कई जलश्रोत तथा जलाशय हैं। ये जलक्षेत्र बड़ी मात्रा में स्थानीय तथा प्रवासीय परिन्दों को आकर्षित करते है अभयारण्य के सभी जलक्षेत्रों में से चित्तौड़गढ़, भगवानपुर और रजियाताल सर्वाधिक मनोहारी दृश्य प्रस्तुत करते हैं। कच्ची कुटी महेट क्षेत्र में दो टीले हैं। इन्हीं के बीच खुदाई से प्राप्त कच्ची कुटी की उल्लेखनीय संरचना है। यह पक्की कुटी के दक्षिण पूर्व में आगे जाकर कुछ मीटर की दूरी पर अवस्थित है यहां खुदाई में बोधिसत्व का एक चित्र प्राप्त हुआ था जिसके निचले हिस्से पर अंकित आलेख से इस ढ़ाचे के कुषाण कालीन होने का पता चलता है विभिन्न साक्ष्य यह प्रदर्शित करते हैं कि बाद में इस स्थल का कई बार मरम्मत और निर्माण कार्य हुआ। इस स्थल के बारे में दो अलग-अलग मत हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार यह स्थल ब्राहमण मंदिर से सम्बन्धित है। वही दूसरी समूह के विद्वान चीनी यात्री फाहियान एवं हवेनसांग का संदर्भ देते हुए इसको सुदेत के स्टूप (अनथपिंण्डक) से सम्बन्धित बताते हैं। यह ढ़ाचा दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व की शुरूआत से लेकर बारवही शताब्दी ईशा पूर्व की संरचनाओं के अवशेषाें को प्रदर्शित करता है। ढ़ाचें से कई सतहे है जो इसके पहचान के कार्य को जटिल बना देती है। दृष्टिगत ढ़ाचों की प्रकृति और स्थल पर पाये गये प्राचीन वस्तुओं से यह प्रतीत होता है कि कुषाण काल के बौद्ध स्तूप के ऊपर गुप्त काल का मंदिर बाद में बना है। यहां बना रास्ता इस ढ़ांचे को नौशहरा एवं बेदमारी नाम के द्वारों से जोड़ता है। पक्की कुटी पक्की कुटी महेट क्षेत्र में पाये गये सबसे बड़े टीले में से एक है। इसकी पहचान अंगुलीमाल स्तूप (गुफा) के अवषेष के रूप में की गयी है। जिसका जिक्र प्रसिद्ध चीनी यात्री फाहियान एवं हवेनसांग द्वारा भी किया गया है तथा कनिंगघम द्वारा भी किया गया है। जबकि कुछ अन्य विद्वान इसका सम्बन्ध बुद्ध के सम्मान में बनाये गये विधि कक्ष के अवषेष से बताते है। माना जाता है कि इसका निर्माण प्रसेनजीत द्वारा किया गया था। बाद में इस संरचना में बहुत से परिवर्तन हुआ और नयी चीजे भी जोड़ी गयी । यह आयताकार आधार पर बना हुआ है बरमदार स्तूप प्रतीत होता है। खुदाई के दौरान ढ़ाचें में स्तम्भों और नालियों के सहयोग से संरक्षित करने की कोशिश की गयी थी। अवशेष ढ़ांचे की संरचना का सामान्य प्रारूप विभिन्न कालों में हुए निर्माण कार्यों के अवशेषाें को प्रदर्शित करता है जिसमें सबसे प्राचीन कुषाण से सम्बन्धित माने जा सकते हैं। विपश्यना ध्यान केन्द्र राज्य हाइवे संख्या 26 पर स्थित यह ध्यान केन्द्र जेतवन पुरातत्व क्षेत्र के निकट बुद्ध इंटर कालेज के सामने स्थित है। किसी भी स्थान की तुलना में जेतवन में बुद्ध द्वारा सर्वाधिक समय (24 वर्ष काल) व्यतीत करने के कारण ध्यान सीखने की इच्छा रखने वालों और अनुभवी ध्यानकर्ताओं दोनों के लिए काफी उचित होने के तौर पर सुझाये जा सकते हैं। इस केन्द्र पर साल में दो बार दस दिवसीय कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। यह कार्यक्रम पूरी तरह से आवासीय है और प्रत्येक कार्यक्रम में लगभग 50 प्रशिक्षाणार्थी भाग ले सकते हैं।