सुखंती उराँव- प्रेरणा स्त्राेत सुखंती उराँव एवं धर्मपद उराँव, गुमला प्रखंड के डुमरडीह पंचायत के पहाड़ में बस जाना गाँव के निवासी हैं। इनका परिवार, आस-पास के क्षेत्र लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत है। वर्तमान में इनका मुख्य पेशा बकरी पालन, खेती-बारी है। आज से तेइस साल पहले तक इनका परिवार, पहाड़ और जंगल में से जलावन के लिए लकड़ी काट कर गुमला और टोटो के दुकानों में बेच कर अपने परिवार के लिए नमक, तेल, अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरे करने की कोशिश में था। रोजमर्रे का न्यूनतम खर्चा छोड़ कुछ भी ना निकल पाता था। पारंपरिक खेती में बदलाव पहाड़ी इलाके में पानी न रोकने के कारण और पारंपरिक तरीके से खेती करने से इनका परिवार बमुश्किल 6 से 7 माह के अनाज के तौर पर खरीफ खेसारी और धान उपज कर पाता था। कभी कभी बीमार पड़ने पर धान महाजनों के पास बेचकर कुछ रुपयों का जुगाड़ करते थे। गाँव में सभी पुरुष हड़िया पीकर पूरा दिन नशे में धुत्त रहते थे। गाँव में ही गाँव की दीदी(महिला) शराब तैयार करते थे। और गाँव के दादा लोग उसे सेवन करके नशे में रहते थे। लक्ष्मी महिला मंडल का गठन 24.11.1999 की सुबह, इनके जीवन में खुशियों की सौगात लेकर आया। किसी ने यह सोचा कि एक छोटा सा कदम सभी गाँव वालों के जीवन में मील का पत्थर साबित होगा। इसी दिन जाना गाँव में पहला स्वयं सहायता समूह का गठन हुआ था। स्वयं सेवी संस्था, प्रदान ने गाँव में महिला और पुरुष की मीटिंग रखी और गाँव में एकजुटता की बात की और महिला लोगों को सशक्त करने हेतु आपस में मिलकर महिला समूह गठन करने की बात की। सबसे पहले लक्ष्मी महिला मंडल का गठन हुआ और सभी महिलाओं को महिला मंडल की जरूरतों और बचत करने हेतु प्रशिक्षण मिला। सुखंती दीदी का अपने समूह की लेखापाल करने हेतु चयन किया गया और प्रशिक्षण दिया गया। इसके बाद सबसे पहले सुखंती दीदी ने प्रदान से प्रशिक्षण लेकर उन्नत धान और श्री विधि सेधान की खेती की और इससे धान की उपज 7 माह से बढ़कर 1 साल तक हो गयी। प्रशिक्षण से आया बदलाव सुखंती दीदी ने खुद अपने गाँव में सभी को उन्नत और श्री विधि धानके ऊपर प्रशिक्षण दिया तो सबके घान की पैदावार बढ़ गयी। प्रदान संस्था द्वारा, सब्जी उत्पादन क्षेत्र (APC) हेतु सभी गांव की महिला और पुरुष को प्रशिक्षण दिया गया और महिला समूह के दीदी लोगो ने सब्जी के तौर पर टमाटर और सेम को । चुनी और एकसाथ नेट घर बनाकर खेती की। रबी एवं गरमा फसल का प्रशिक्षण दिया जिसमे सुखंती उराँव ने बढ़ चढ़कर भाग लिया। प्रशिक्षण उपरांत इन्होने खरीफ सब्जी लगाने की तैयारी की एवं 12000 रुपये तक आमदनी की। प्रोत्साहित होकर इन्होने उसी वर्ष रखी फसल की योजना बनायी। उन्नत तरीके से नकदी फसल जैसे टमाटर, सेम, फूलगोभी. आलू, मटर इत्यादि का उत्पादन किया। जिन खेतो से सुखंती उराँव के परिवार का भरण-पोषण मुश्किल हो रहा था उसी खेत से धान का उपज 3 गुना बढ़ गयी। ये तो शुरुआती दौर था । बदलाय तो वर्ष 2009 से शुरू हुआ। गाँव के 80 प्रतिशत परिवार स्वयं सहायता समूह से जुड़ चुके थे। प्रधान संस्था मे 2009 में विशेष स्वर्ण जयंती ग्रामीण स्वरोजगार योजना तहत और जाना गाँव की समेकित प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन पद्धति से बकरी पालन शरु किया। इस काम में भी राखंती ने अगुवाई की और सुचती दीदी ने पशु सहायक के रूप में प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। बकरी पालन की शुरुआत वर्ष 2009 में सुखंती दीदी ने 5 माँ बकरी से बकरी का पालन शुरु किया । उन्नत निधि में जमीन से 35 ऊँचा बांस का मचान बनाया और उसी में बकरी पालना शुरू किया बकरी को साल भर टीकाकरण और कृमिकरण करने के लिए मी प्रशिक्षण मिला। बकरी एवं बकरा का मरने की संख्या भी कम हो गयी। बकरा को खस्सी बनाने हेतु प्रशिक्षण दिया गया। वर्तमान में खस्सी बेचकर साल में 70000 से ८०००० रूपया तक कमा लेती हैं। इसके अलावा सुखन्ती दीदी देसी मुर्गी पालन कर सालाना 4000 रुपया कमा लेती है और घर में खाने के लिए पर्याप्त देसी अंडा भी सभी समय उपलब्ध हो जाती है। अन्य नई शुरुआत सुखंती दीदी की अगुवाई में गांव के सभी महिला मंडल की सदस्य मिलकर गायनशा बंदी और चरवाही की रैली बड़े ही जम के की। उसके उपरांत आज के समय पर गाँव में एक भी परिवार शराब नहीं बेचता है एवं बली परवाही में रोक लग गयी है। आज सुखंती दीदी ने प्रदान एवं NIRD (National Institute of Rural Development, Hyderabad) से प्रशिक्षाग लेकर एक स्वावलंबी महिला किसान और गुमलालाक स्तर पर आजीविका की मास्टर ट्रेनर है। साथ ही दीदी ने अलग अलग गांव में खेती बारी, बकरी पालन, महिला समूह की ऑडिट आदि के मुख्य ट्रेनर के साथ प्रशिक्षण देती है। प्रशिक्षणकर्ता हाल ही में झारखण्ड सरकार की नयी पहल योजना बनाओ अभियान में सुखंती दीदी ने सामुदायिक प्लानर के रूप में एस. आर.टी मेम्बर से 5 दिन का प्रशिक्षण लेने के बाद अपने गाँव में तीन दिन की प्लानिंग की और ग्राम सभा में भी योजनाओं की बात की। आज के दिन सुसंती दीदी सभी दृष्टिकोण से सुखी है। उन्होंने सुख-सुविधा के सारे साधन जुटा लिए है। सभी बच्चों के विश्राम के लिए अलग-अलग बिस्तर एवं चौकी. सबके पास अपनी साईकिल है। सुखंती दीदी ने अपना भी मोपेड खरीद लिया है और वो हर गाँव घूम के आजीविका के ऊपर ट्रेनिंग देती है। दीदी ने छोटे बेटे मोतीलाल को संत जोसेफ बोडिंग स्कूल, कोनवीर में नामांकन करा दिया है। जिंदगी बदलने वाले अनुभव एक पहाड़ी आदिवासी दीदी ने महिला मंडल से जुड़ कर खुद की और गाँव वालों की जिन्दगी बदल कर रख दी। गुमला जिलों की यह पहाड़ी आदिवासी दीदी सुखंती उपाय) महिला सशक्तिकरण का एक जीताजागता उदाहरण और प्रेरणा है। स्त्राेत : गुमला जिला प्रशासन, गुमला, झारखंड।