<h3 style="text-align: justify;">पूर्व स्थिति</h3> <p style="text-align: justify;">सफलता की यह कहानी है गुमला जिला के पालकोट प्रखंड स्थित गुड़मा गाँव के कुसुम महिला मंडल की। कुसुम महिला मंडल का गठन प्रदान के मार्गदर्शन से 2002 में हुआ था। वर्ष 2013 में यह समूह महिला विकास मंडल, बाघिमा का सदस्य बना। सभी 17 सदस्य गरीब परिवार से आते हैं। खेती-बारी के अलावा उनके पास आजीविका का कोई दूसरा विकल्प नहीं था। मानसून के समय सभी धान की खेती करते थे, पर बाकी समय सूखी लकड़ी बेचकर वे सभी अपना घर चलाते थे। ऐसी विषम परिस्थिति में उन्हें कभी- कभी दोनों समय भरपेट खाने की भी व्यवस्था नहीं हो पाती थी। </p> <h3 style="text-align: justify;">नई शुरुआत</h3> <p style="text-align: justify;">NRLM के अंतर्गत मार्च 2014 में उन्हें चक्रीय निधि के रूप में 15000 रुपये की राशि प्राप्त हुई। इस राशि का काम शुरू किया। उपयोग समूह के सभी सदस्यों ने अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए किया, लेकिन आजीविका की समस्या अब भी बनी हुई थी। महिला विकास मंडल, बाघिमा के प्रशिक्षित सी. आर. पी. दीदी द्वारा उनके समूह का माइक्रो प्लान तैयार किया गया और उन्हें रोजगार के अन्य विकल्प ढूँढने के लिए प्रोत्साहित किया गया। </p> <h3 style="text-align: justify;">पावराेटी बनाने का सुझाव</h3> <p style="text-align: justify;">चक्रीय निधि प्राप्त करने के छह महीने बाद कुसुम महिला मंडल को सामुदायिक निवेश निधि के रूप में 50000 रुपये प्राप्त हुए। इस राशि का उपयोग माइक्रो-प्लान के अनुसार सभी दीदी को आजीविका के लिए करना था, लेकिन मानसून के बाद पैसा प्राप्त होने के कारण दीदी लोग को यह समझ में नहीं आ रहा था कि इतनी बड़ी राशि का उपयोग कैसे करें। फिर उस राशि को सूद समेत ग्राम संगठन में वापस भी करना था, इसलिए मंडल ने पूरी राशि को ग्राम संगठन में वापस करने का निर्णय ले लिया ताकि उन्हें सूद न देना पड़े। ऐसे समय में मंडल की ही एक सदस्य जो सी. आर. पी. का भी काम करती है, उन्होंने पावरोटी बनाने का सुझाव सभी दीदी को दिया, लेकिन दीदी सब को इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी। साथ में उन्हें डर भी था कि अगर पैसा लगाने के बाद काम सफल नहीं हुआ तो वे लोग मूल-सूद कैसे चुकायेंगे। फिर उन्होंने ग्राम संगठनऔर फेडरेशन में यह बात रखी। समूह के इस विचार को प्रोत्साहन मिला तथा उन्हें सूद और मूल वापसी के लिए 15 महीना का समय दिया गया। इसके बाद समूह के सदस्यों ने गुमला में पावरोटी बनाने वाले लोगों से मिलकर उनसे प्रशिक्षण लिया और पावरोटी बनाने का काम शुरू किया।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC.jpg" width="215" height="123" /></p> <h3 style="text-align: justify;">कुसुम महिला मंडल </h3> <p style="text-align: justify;">समूह के एक सदस्य ने बताया कि पावरोटी बनाने का भट्टा तैयार करने में लगभग 30000 रुपये खर्च हुए और एक सप्ताह के प्रशिक्षण में रोज दिन के एक हजार रुपये और आने-जाने का खर्च मिला कर लगभग 10000 लगे। शेष राशि से उन्होंने कच्चा माल खरीदा और इस तरह मार्च 2015 से उन्होंने पावरोटी बनाना शुरू किया। फेडरेशन ने भी उसे प्रोत्साहित किया और उस साल के महाधिवेशन में समूह को एक स्टाल बना कर दिया ताकि दीदी सब अपने उत्पाद को प्रदर्शित कर सकें। महाधिवेशन में शामिल सभी अतिथियों और अन्य समूहों के सदस्यों ने कुसुम महिला मंडल के काम की प्रशंसा की। मेला में समूह के उत्पाद को हाथों-हाथ लिया गया और आधे घंटे के अंदर ही उनका सारा पावरोटी बिक गया। इससे दीदी लोगों का मनोबल बढ़ा और उन्होंने नियमित रूप से पावरोटी बनाना शुरू कर दिया। समूह ने सामूदायिक निवेश निधि का पूरा पैसा छह महीने के अन्दर ही ग्राम संगठन को सूद समेत वापस कर दिया।</p> <h3 style="text-align: justify;">पाव राेटी की मांग में बढ़ाेत्तरी </h3> <p style="text-align: justify;">समूह द्वारा बनाया गयी पावरोटी की इतनी मांग है कि उनका सारा सामान गाँव के आस-पास ही बिक जाता है। उन्हें बाजार ले जाने की आवश्यकता ही नहीं होती । समूह के सदस्यों ने बताया कि इस काम में शामिल दीदी लोगों को प्रतिदिन के हिसाब से 100 से 150 रुपये तक की आय होती है। जिससे उनके रोजमर्रा की जरूरतों की पूर्ति हो जाती है। हालाँकि खेती-बारी और अन्य कामों के कारण दीदी सब रोजाना पावरोटी नहीं बना पाती है । लेकिन अब समूह ने निर्णय लिया है कि दिन के हिसाब से मजदूरी तय कर वे कुछ दीदी को रोजाना काम पर लगायेंगी जिससे कि नियमित रूप से पाव का उत्पादन कर सके।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : गुमला जिला प्रशासन, गुमला, झारखंड।</p>