<div id="MiddleColumn_internal"> <h3 style="text-align: justify;">बालकों की देखरेख और संरक्षण के साधारण सिद्धांत</h3> <p style="text-align: justify;">अध्याय 2</p> <p style="text-align: justify;">यथास्थिति, केंद्रीय सरकार, राज्य सरकारें, बोर्ड और अन्य अभिकरण इस अधिनियम के में अनुसरित किए जाने उपबंधों को क्रियान्वित करते समय निम्नलिखित मूलभूत सिद्धांतों द्वारा मार्गदर्शित होंगे, अर्थात् -</p> <p style="text-align: justify;">(i) निर्दोषिता की उपधारणा का सिद्धांत: किसी बालक के बारे में, अठारह वर्ष की आयु तक यह उपधारणा की जाएगी कि वह किसी असद्भावपूर्ण या आपराधिक आशय के दोषी नहीं है।</p> <p style="text-align: justify;">(ii) गरिमा और योग्यता का सिद्धांत: सभी मनुष्यों के साथ समान गरिमा और अधिकारों के साथ बर्ताव किया जाना चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;">(iii) भाग लेने का सिद्धांत: प्रत्येक बालक को सुने जाने का और उसके हितों को प्रभावित करने वाली सभी आदेशिकाओं और विनिश्चयों में भाग लेने का अधिकार प्राप्त है और बालक के दृष्टिकोण पर बालक की आयु और परिपक्वता को सम्यक ध्यान में रखते हुए विचार किया जाएगा।</p> <h3 style="text-align: justify;">सर्वोत्तम हित का सिद्धांत</h3> <p style="text-align: justify;"><span style="text-align: justify;">(iv) </span>बालक के संबंध में सभी विनिश्चय मुख्यतया इस विचारणा पर आधारित होंगे कि वे बालक के सर्वोत्तम हित में हैं और बालक के लिए अपनी पूर्ण शक्तता को विकसित करने में सहायक हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;"><span style="text-align: justify;">कौटुंबिक जिम्मेदारी का सिद्धांत</span></h3> <p style="text-align: justify;"><span style="text-align: justify;"> </span>(v) बालक की देखरेख, उसका पोषण और उसका संरक्षण करने की प्राथमिक जिम्मेदारी जैविक कुटुंब या, यथास्थिति, दत्तक अथवा पालक माता-पिता की है।</p> <h3 style="text-align: justify;">सुरक्षा का सिद्धांत</h3> <p style="text-align: justify;"><span style="text-align: justify;">(vi) </span>यह सुनिश्चित करने के लिए कि बालक सुरक्षित है और देखरेख तथा संरक्षण-पद्धति के संपर्क में रहते हुए और उसके पश्चात् उसकी कोई अपहानि, उससे दुव्र्यवहार या बुरा बर्ताव नहीं किया जाता है, सभी उपाय किए जाने चाहिए</p> <h3 style="text-align: justify;">सकारात्मक उपाय</h3> <p style="text-align: justify;"><span style="text-align: justify;">(vii) </span>सभी स्रोतों को, इसके अंतर्गत वे भी हैं जो कुटुंब और समुदाय के हैं, कल्याण की प्रोन्नति, पहचान के विकास को सुकर बनाने और बालकों की असुरक्षा को कम करने के लिए समावेशित और समर्थकारी वातावरण उपलब्ध कराने और इस अधिनियम के अधीन मध्यक्षेप की आवश्यकता के लिए गतिमान किया जाना चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">गैर-कलंकीय शब्दार्थों का सिद्धांत</h3> <p style="text-align: justify;"><span style="text-align: justify;">(viii) </span>किसी बालक से तात्पर्यित आदेशिक प्रतिक्ल या अभियोगात्मक शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">अधिकारों का अधित्यजन न किए जाने का सिद्धांत</h3> <p style="text-align: justify;"><span style="text-align: justify;">(ix) </span>बालक के किसी अधिकार का किसी भी प्रकार का अधित्यजन अनुज्ञेय या विधिमान्य नहीं है चाहे उसकी ईप्सा बालक द्वारा की गई हो या बालक की ओर से कार्य करने वाले व्यक्ति या किसी बोर्ड या समिति द्वारा की और किसी मूल अधिकार का प्रयोग न किया जाना अधित्यजन की कोटि में नहीं आएगा।</p> <h3 style="text-align: justify;"><span style="text-align: justify;">समानता और विभेद न किए जाने का सिद्धांत </span></h3> <p style="text-align: justify;"><span style="text-align: justify;">(x) </span>किसी बालक के विरुद्ध किसी भी आधार पर, जिसके अंतर्गत लिंग, जाति, नस्ल, जन्म-स्थान, नि:शक्तता भी है, किसी का विभेद नहीं किया जाएगा और पहुंच, अवसर और बर्ताव में समानता प्रत्येक बालक को दी जाएगी।</p> <h3 style="text-align: justify;">एकांतता और गोपनीयता के अधिकार का सिद्धांत</h3> <p style="text-align: justify;"><span style="text-align: justify;">(xi) </span>प्रत्येक बालक को सभी साधनों द्वारा और संपूर्ण न्यायिक प्रक्रिया में अपनी एकांतता और गोपनीयता की संरक्षा करने का अधिकार प्राप्त होगा।</p> <h3 style="text-align: justify;">अंतिम अवलंब के उपाय के रूप में संस्थात्मकता का सिद्धांत</h3> <p style="text-align: justify;"><span style="text-align: justify;">(xii) </span>बालक को युक्तियुक्त जांच करने के पश्चात् अंतिम अवलंब के उपाय के रूप में संस्थागत देखरेख में रखा जाएगा।</p> <h3 style="text-align: justify;">संप्रत्यावर्तन और प्रत्यावर्तन का सिद्धांत</h3> <p style="text-align: justify;"><span style="text-align: justify;">(xiii) </span>किशोर न्यायिक पद्धति में प्रत्येक बालक को शीघ्रातिशीघ्र अपने कुटुंब से पुन: मिलाने का और उसी सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक प्रास्थिति में, जिसमें वह इस अधिनियम के क्षेत्राधीन आने के पूर्व रहता था, प्रत्यावर्तित होने का, जब तक कि ऐसा प्रत्यावर्तन और संप्रत्यावर्तन उसके सर्वोत्तम हित में हो, अधिकार प्राप्त होगा।</p> <h3 style="text-align: justify;">नए सिरे से शुरुआत करने का सिद्धांत</h3> <p style="text-align: justify;"><span style="text-align: justify;">(xiv) </span>किशोर न्याय पद्धति के अधीन किसी बालक के पिछले सभी अभिलेख को, विशेष परिस्थितियों के सिवाय, समाप्त कर दिया जाना चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">अपयोजन का सिद्धांत</h3> <p style="text-align: justify;"><span style="text-align: justify;">(xy) </span>विधि का उल्लंघन करने वाले बालकों से न्यायिक कार्यवाहियों का अवलंब लिए बिना, जब तक कि वह बालक या संपूर्ण समाज के सर्वोत्तम हित में न हो, निपटने के उपायों को बढ़ावा दिया जाएगा।</p> <h3 style="text-align: justify;">नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत</h3> <p style="text-align: justify;"><span style="text-align: justify;">(xvi) </span>इस अधिनियम के अधीन न्यायिक हैसियत में कार्य करते हुए सभी व्यक्तियों या निकायों द्वारा ऋजुता के बुनियादी प्रक्रियात्मक मानकों का, जिनके अंतर्गत निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार, पक्षपात के विरुद्ध नियम और पुनर्विलोकन का अधिकार भी है, पालन किया जाना चाहिए।</p> स्रोत: <a class="external_link ext-link-icon external-link" title="नए विंडोज में खुलने वाली अन्य वेबसाइट लिंक" href="https://legislative.gov.in" target="_blank" rel="noopener"> विधि और न्याय मंत्रालय, भारत सरकार </a></div>