भारत में बाल विवाह बाल विवाह पर रोक संबंधी कानून सर्वप्रथम सन् 1929 में पारित किया गया था। बाद में सन् 1949, 1978 और 2006 में इसमें संशोधन किए गए। इस समय विवाह की न्यूनतम आयु बालिकाओं के लिए 18 वर्ष और बालकों के लिए 21 वर्ष निर्धारित की गई है। भारत में बाल विवाह चिंता का विषय है। बाल विवाह किसी बच्चे को अच्छे स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा के अधिकार से वंचित करता है। ऐसा माना जाता है कि कम उम्र में विवाह के कारण लड़कियों को हिंसा, दुर्व्यवहार और उत्पीड़न का अधिक सामना करना पड़ता है। कम उम्र में विवाह का लड़के और लड़कियों दोनों पर शारीरिक, बौद्धिक, मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक प्रभाव पड़ता है, शिक्षा के अवसर कम हो जाते हैं और व्यक्तित्व का विकास सही ढंग से नही हो पाता है। हांलाकि बाल विवाह से लड़के भी प्रभावित होते हैं। लेकिन यह एक ऐसा मुद्दा है जिससे लड़कियां बड़ी संख्या में प्रभावित होती हैं। 18-29 (46 प्रतिशत) आयु वर्ग में करीब आधी महिलाएं और 21-29 (27 प्रतिशत) पुरुषों में एक चौथाई से ज्यादा का विवाह कानूनी तौर पर तय न्यूनतम् आयु तक पहुंचने से पहले ही विवाह हो जाता है। माना जाता है कि कम उम्र के विवाह के मुख्य कारणो में सांस्कृतिक चलन, सामाजिक परम्पराएं और आर्थिक दबाव गरीबी और असमानता है। केन्द्र सरकार ने 1929 के बाल विवाह निषेध अधिनियम को निरस्त करके और उसके स्थान पर 2006 में अधिक प्रगतिशील बाल विवाह निषेध अधिनियम लाकर हाल के वर्षों में इस प्रथा को रोकने की दिशा में काम किया है। इसके अंतर्गत उन लोगों के खिलाफ कठोर उपाय किये गये हैं जो बाल विवाह कि इजाजत देते हैं और उसे बढ़ावा देते हैं। इस अधिनियम के अंतर्गत 21 वर्ष से कम आयु के पुरुष और 18 वर्ष से कम आयु की महिला के विवाह को बाल-विवाह के रुप में परिभाषित किया गया है।। यह कानून नवम्बर 2007 में प्रभावी हुआ। राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों द्वारा प्रदान की गई सूचना के अनुसार अब तक 24 संघ राज्य क्षेत्रो/राज्यों ने नियम बनाये हैं और 20 संघ राज्य क्षेत्रों/राज्यों ने बाल-विवाह निषेध अधिकारियों की नियुक्ति की है। केन्द्र सरकार लगातार राज्य सरकारों से बाल-विवाह निषेध अधिकारियों कि नियुक्ति करने की बात कहती रहती है। बच्चों के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना 2005 में बाल-विवाह को समाप्त करने का लक्ष्य शामिल है। लड़कियों सहित बच्चों के संरक्षण के लिए भारत द्वारा कि गई प्रमुख पहलों में बच्चों के अधिकारों के संरक्षण के लिए 2007 में राष्ट्रीय आयोग कि स्थापना करना शामिल है ताकि बच्चों के अधिकारों को सही तरीके से और उनसे जुड़े कानून और कार्यक्रम का प्रभावी तौर पर लागू किये जा सकें। संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम बाल-विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 है। इसका विस्तार संपूर्ण भारत में है; और यह भारत से बाहर तथा भारत सभी नागरिकों को भी लागू होता है- परंतु इस अधिनियम की कोई बात पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्र के रेनोंसाओं को लागू नहीं होगी। यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे और भिन्न-भिन्न राज्यों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी और किसी उपबंध में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति निर्देश का किसी राज्य के संबंध में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस राज्य में उस उपबंध के प्रवृत्त होने के प्रति निर्देश है। परिभाषाएं इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,— ‘बालक' से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसने, यदि पुरुष है तो, इक्कीस वर्ष की आयु पूरी नहीं की है और यदि नारी है तो, अठारह वर्ष की आयु पूरी नहीं की है; ‘बाल-विवाह" से ऐसा विवाह अभिप्रेत है जिसके बंधन में आने वाले दोनों पक्षकारों में से कोई बालक है; विवाह के संबंध में ‘बंधन में आने वाले पक्षकार’ से पक्षकारों में से कोई भी ऐसा पक्षकार अभिप्रेत है जिसका विवाह उसके द्वारा अनुष्ठापित किया जाता है या किया जाने वाला है; ‘बाल-विवाह प्रतिषेध अधिकारी’ के अन्तर्गत धारा 16 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त बाल-विवाह प्रतिषेध अधिकारी भी है : ‘जिला न्यायालय’ से अभिप्रेत है ऐसे क्षेत्र में, जहां कुटुंब न्यायालय अधिनियम, 1984 (1984 का 66) की धारा 3 के अधीन स्थापित कुटुंब न्यायालय विद्यमान है, ऐसा कुटुंब न्यायालय और किसी ऐसे क्षेत्र में जहां कुटुंब न्यायालय नहीं है, किंतु कोई नगर सिविल न्यायालय विद्यमान है वहां वह न्यायालय और किसी अन्य क्षेत्र में, आरंभिक अधिकारिता रखने वाला प्रधान सिविल न्यायालय और उसके अंतर्गत ऐसा कोई अन्य सिविल न्यायालय भी है जिसे राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे न्यायालय के रूप में विनिर्दिष्ट करे जिसे ऐसे में अधिनियम के अधीन कार्रवाई की जाती है : ‘अवयस्क" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसके बारे में वयस्कता अधिनियम, 1875 (1875 का 9) के उपबंधों के अधीन यह माना जाता है कि उसने, वयस्कता प्राप्त नहीं की है। बाल-विवाहों का, बंधन में आने वाले पक्षकार के, जो बालक है, विकल्प पर शून्यकरणीय होना प्रत्येक बाल-विवाह जो चाहे इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व या पश्चात् अनुष्ठापित किया गया हो, विवाह बंधन में आने वाले ऐसे पक्षकार के, जो विवाह के समय बालक था, विकल्प पर शून्यकरणीय होगा - परंतु किसी बाल-विवाह को अकृतता की डिक्री द्वारा बातिल करने के लिए, विवाह बंधन में आने वाले ऐसे पक्षकार द्वारा ही, जो विवाह के समय बालक था, जिला न्यायालय में अर्जी फाइल की जा सकेगी। यदि अर्जी फाइल किए जाने के समय, अर्जीदार अवयस्क है तो अर्जी उसके सरंक्षक या वाद-मित्र के साथ-साथ बाल-विवाह प्रतिषेध अधिकारी की मार्फत की जा सकेगी। इस धारा के अधीन अर्जी किसी भी समय किंतु अर्जी फाइल करने करने से पूर्व फाइल की जा सकेगी। इस धारा के अधीन अकृतता की डिक्री प्रदान करते समय जिला न्यायालय, विवाह के दोनों पक्षकारों और उनके माता-पिता या उनके संरक्षकों को यह निदेश देते हुए आदेश करेगा कि वे, यथास्थिति, दूसरे पक्षकार, उसके माता-पिता या संरक्षक को विवाह के अवसर पर उसको दूसरे पक्षकार से प्राप्त धन, मूल्यवान वस्तुएं, आभूषण और अन्य उपहार या ऐसी मूल्यवान वस्तुओं, आभूषणों, अन्य उपहारों के मूल्य के बराबर रकम और धन लौटा दे - परंतु इस धारा के अधीन कोई आदेश तब तक पारित नहीं किया जाएगा जब तक कि संबद्ध पक्षकारों को जिला न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने और यह कारण दर्शित करने के लिए कि ऐसा आदेश क्यों नहीं पारित किया जाए, सूचनाएं न दे दी गई हों। बाल-विवाह के बंधन में आने वाली महिला पक्षकार के भरण-पोषण और निवास के लिए उपबंध धारा 3 के अधीन डिक्री प्रदान करते समय, जिला न्यायालय बाल-विवाह के बंधन में आने वाले पुरुष पक्षकार को और यदि ऐसे विवाह के बंधन में आने वाला पुरुष पक्षकार अवयस्क है, तो उसके माता-पिता या सरंक्षक को, विवाह के बंधन में आने वाली महिला पक्षकार को, उसके पुनर्विवाह तक, भरण-पोषण का संदाय करने के लिए निदेश देते हुए अंतरिम या अंतिम आदेश भी कर सकेगा। संदेय भरण-पोषण की मात्रा का अवधारण जिला न्यायालय द्वारा, बालक की आवश्यकताओं, अपने विवाह के दौरान ऐसे बालक द्वारा भोगी गई जीवन शैली और संदाय करने वाले पक्षकार की आय के साधनों को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा। भरण-पोषण की रकम का मासिक या एकमुश्त राशि के रूप में संदाय करने का निदेश दिया जा सकेगा। यदि धारा 3 के अधीन अर्जी देने वाला पक्षकार विवाह के बंधन में आने वाली महिला पक्षकार है तो जिला न्यायालय उसके पुनर्विवाह तक उसके निवास के लिए उपयुक्त आदेश भी कर सकेगा। बाल-विवाह से जन्मे बालकों का भरण-पोषण और अभिरक्षा जहां बाल-विवाह से जन्मे बालक हैं, वहां जिला न्यायालय ऐसे बालकों की अभिरक्षा के लिए समुचित आदेश करेगा। इस धारा के अधीन किसी बालक की अभिरक्षा के लिए कोई आदेश करते समय, बालक के कल्याण और सर्वोत्तम हितों पर जिला न्यायालय द्वारा, सर्वोपरि ध्यान दिया जाएगा। बालक की अभिरक्षा के लिए किसी आदेश में, दूसरे पक्षकार की, ऐसे बालक तक ऐसी रीति से, जो बालक के हितों को सर्वोत्तम रूप से पूरा करती हो, पहुंच के लिए समुचित निदेश, और ऐसे अन्य आदेश, जो जिला न्यायालय बालक के हित में उचित समझे, सम्मिलित हो सकेंगे। जिला न्यायालय विवाह के किसी पक्षकार या उनके माता-पिता या संरक्षक द्वारा बालक के भरण-पोषण का उपबंध करने के लिए समुचित आदेश भी कर सकेगा। बाल-विवाहों से जन्में बालकों की धर्मजता इस बात के होते हुए भी कि बाल-विवाह धारा 3 के अधीन अकृतता की डिक्री द्वारा बातिल कर दिया गया है, डिक्री किए जाने के पूर्व ऐसे विवाह से जन्मा या गर्भाहित प्रत्येक बालक, चाहे वह इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व या पश्चात् पैदा हुआ हो, सभी प्रयोजनों के लिए धर्मज बालक समझा जाएगा। जिला न्यायालय की धारा 4 और धारा 5 के अधीन जारी किए गए आदेशों को उपांतरित करने की शक्ति जिला न्यायालय को धारा 4 या धारा 5 के अधीन और यदि परिस्थितियों में कोई परिवर्तन है जो अर्जी के लंबित रहने के दौरान किसी भी समय और अर्जी के अंतिम निपटारे के पश्चात् भी किसी आदेश में जोड़ने, उसे उपांतरित या प्रतिसंहृत करने की शक्ति होगी। वह न्यायालय जिसमें अर्जी दी जानी चाहिए धारा 3, धारा 4 और धारा 5 के अधीन अनुतोष प्रदान करने के प्रयोजन के लिए अधिकारिता रखने वाले जिला न्यायालय में उस स्थान के ऊपर जहां प्रतिवादी या बालक निवास करता है या जहां विवाह अनुष्ठापित किया गया था या जहां पक्षकारों ने अंतिम रूप से एक साथ निवास किया था या जहां अर्जीदार अर्जी पेश करने की तारीख को निवास कर रहा है, अधिकारिता रखने वाला जिला न्यायालय सम्मिलित होगा। बाल-विवाह करने वाले पुरुष वयस्क के लिए दंड जो कोई, अठारह वर्ष से अधिक आयु का पुरुष वयस्क होते हुए, बाल-विवाह करेगा, वह, कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से, दंडनीय होगा। बाल-विवाह का अनुष्ठान करने के लिए दंड जो कोई किसी बाल-विवाह को संपन्न करेगा, संचालित करेगा, या निदिष्ट करेगा, या दुष्प्रेरित करेगा, वह जब तक यह साबित न कर दे कि उसके पास यह विश्वास करने का कारण था कि वह विवाह बाल-विवाह नहीं था, कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने से भी, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा। बाल-विवाह के अनुष्ठान का संवर्धन करने या उसे अनुज्ञात करने के लिए दंड जहां कोई बालक बाल-विवाह करेगा, वहां ऐसा कोई व्यक्ति जिसके भारसाधन में चाहे माता-पिता अथवा संरक्षक या किसी अन्य व्यक्ति के रूप में अथवा अन्य किसी विधिपूर्ण या विधिविरुद्ध हैसियत में, बालक है, जिसके अंतर्गत किसी संगठन या व्यक्ति निकाय का सदस्य भी है, जो विवाह का संवर्धन करने के लिए कोई कार्य करता है या उसका अनुष्ठापित किया जाना अनुज्ञात करता है या उसका अनुष्ठान किए जाने से निवारण करने में उपेक्षापूर्वक असफल रहता है, जिसमें बाल-विवाह में उपस्थित होना या भाग लेना सम्मिलित है, कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने से भी, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा : परंतु कोई स्त्री कारावास से दंडनीय नहीं होगी। इस धारा के प्रयोजनों के लिए, जब तक कि इसके प्रतिकूल साबित नहीं हो जाता है यह उपधारणा की जाएगी कि जहां अवयस्क बालक ने विवाह किया है वहां ऐसे अवयस्क बालक का भारसाधन रखने वाला व्यक्ति विवाह अनुष्ठापित किए जाने से निवारित करने में उपेक्षापूर्वक असफल रहा है। कतिपय परिस्थितियों में किसी अवयस्क बालक के विवाह का शून्य होना जहां कोई बालक, जो अवयस्क है, विवाह के प्रयोजन के लिए,- विधिपूर्ण संरक्षक की देखरेख से बाहर लाया जाता है या आने के लिए फुसलाया जाता है; या (ख) किसी स्थान से जाने के लिए बलपूर्वक बाध्य किया जाता है या किन्हीं प्रवंचनापूर्ण साधनों से उत्प्रेरित किया जाता है; या विक्रय किया जाता है, और किसी रूप में उसका विवाह कराया जाता है या यदि अवयस्क विवाहित है और उसके पश्चात् उस अवयस्क का विक्रय किया जाता है या दुव्यापार किया जाता है या अनैतिक प्रयोजनों के लिए उसका उपयोग किया जाता है, वहां ऐसा विवाह अकृत और शून्य होगा। बाल-विवाहों को प्रतिषिद्ध करने वाला व्यादेश जारी करने की न्यायालय की शक्ति इस अधिनियम में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, यदि प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट या महानगर मजिस्ट्रेट का बाल-विवाह प्रतिषेध अधिकारी के आवेदन पर, या किसी व्यक्ति से परिवाद के माध्यम से या अन्यथा सूचना प्राप्त होने पर यह समाधान हो जाता है कि इस अधिनियम के उल्लंघन में बाल-विवाह तय किया गया है या उसका अनुष्ठान किया जाने वाला है, तो ऐसा मजिस्ट्रेट ऐसे किसी व्यक्ति के, जिसके अंतर्गत किसी संगठन का सदस्य या कोई व्यक्ति संगम भी है, विरुद्ध ऐसे विवाह को प्रतिषिद्ध करने वाला व्यादेश निकालेगा। उपधारा (1) के अधीन कोई परिवाद, बाल-विवाह या बाल-विवाहों का अनुष्ठापन होने की संभाव्यता से संबंधित व्यक्तिगत जानकारी या विश्वास का कारण रखने वाले किसी व्यक्ति द्वारा और युक्तियुक्त जानकारी रखने वाले किसी गैर-सरकारी संगठन द्वारा, किया जा सकेगा। प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट या महानगर मजिस्ट्रेट का न्यायालय किसी विश्वसनीय रिपोर्ट या सूचना के आधार पर स्वप्ररेणा से भी संज्ञान कर सकेगा । अक्षय तृतीया जैसे कतिपय दिनों पर, सामूहिक बाल-विवाहों के अनुष्ठापन का निवारण करने के प्रयोजन के लिए, जिला मजिस्ट्रेट उन सभी शक्तियों के साथ, जो इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन बाल-विवाह प्रतिषेध अधिकारी को प्रदत्त हैं, बाल-विवाह प्रतिषेध अधिकारी समझा जाएगा। जिला मजिस्ट्रेट को बाल-विवाहों के अनुष्ठापन को रोकने या उनका निवारण करने की अतिरिक्त शक्तियां भी होंगी और स प्रयोजन के लिए, वह सभी समुचित उपाय कर सकेगा और अपेक्षित न्यूनतम बल का प्रयोग कर सकेगा। उपधारा (1) के अधीन कोई व्यादेश किसी व्यक्ति या किसी संगठन के सदस्य या व्यक्ति संगम के विरुद्ध तब तक नहीं निकाला जाएगा जब तक कि न्यायालय ने, यथास्थिति, ऐसे व्यक्ति, संगठन के सदस्यों या व्यक्ति संगम को पूर्व सूचना न दे दी हो और उसे/या उनको व्यादेश निकाले जाने के विरुद्ध हेतुक दर्शित करने का अवसर न दे दिया हो - परंतु किसी अत्यावश्यकता की दशा में, न्यायालय को, इस धारा के अधीन कोई सूचना दिए बिना, अंतरिम व्यादेश निकालने की शक्ति होगी। उपधारा (1) के अधीन जारी किए गए किसी व्यादेश की, ऐसे पक्षकार को, जिसके विरुद्ध व्यादेश जारी किया गया था, सूचना देने और सुनने के पश्चात् पुष्टि की जा सकेगी या उसे निष्प्रभाव किया जा सकेगा। न्यायालय, उपधारा (1) के अधीन जारी किए गए किसी व्यादेश को या तो स्वप्रेरणा पर या किसी व्यथित व्यक्ति के आवेदन पर विखण्डित या परिवर्तित कर सकेगा । जहां कोई आवेदन उपधारा (1) के अधीन प्राप्त होता है, वहां न्यायालय आवेदक को, या तो स्वयं या अधिवक्ता द्वारा, अपने समक्ष उपस्थित होने का शीघ्र अवसर देगा, और यदि न्यायालय आवेदक को सुनने के पश्चात् आवेदन की पूर्णतः या भागतः नामंजूर करता है तो वह ऐसा करने के अपने कारणों को लेखबद्ध करेगा। जो कोई, यह जानते हुए कि उसके विरुद्ध उपधारा (1) के अधीन व्यादेश जारी किया गया है, उस व्यादेश की अवज्ञा करेगा, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी अथवा जुर्माने से, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से, दंडनीय होगा- परंतु कोई स्त्री कारावास से दंडनीय नहीं होगी। व्यादेशों के उल्लंघन में बाल-विवाहों का शून्य होना धारा 13 के अधीन जारी किए गए व्यादेशों के उल्लंघन में, चाहे वह अंतरिम हो या अंतिम, अनुष्ठापित किया गया कोई बाल-विवाह प्रारंभ से ही शून्य होगा। अपराधों का संज्ञेय और अजमानतीय होना दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय अपराध संज्ञेय और अजमानतीय होगा। बाल-विवाह प्रतिषेध अधिकारी राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, संपूर्ण राज्य या उसके ऐसे भाग के लिए, जो उस अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, बाल-विवाह प्रतिषेध अधिकारी के नाम से ज्ञात, किसी अधिकारी या अधिकारियों की नियुक्ति करेगी, जिसकी अधिकारिता, अधिसूचना में विनिर्दिष्ट क्षेत्र या क्षेत्रों पर होगी। राज्य सरकार, समाज सेवा में विख्यात किसी स्थानीय सम्मानीय सदस्य या ग्राम पंचायत या नगरपालिका के किसी अधिकारी से या सरकार के अथवा किसी पब्लिक सेक्टर के उपक्रम के किसी अधिकारी से या किसी गैर-सरकारी संगठन के किसी पदाधिकारी से बाल-विवाह प्रतिषेध अधिकारी की सहायता करने के लिए अनुरोध कर सकेगी और, यथास्थिति, ऐसा सदस्य, अधिकारी या पदाधिकारी तद्नुसार कार्रवाई करने के लिए बाध्य होगा। बाल-विवाह प्रतिषेध अधिकारी का यह कर्तव्य होगा कि वह— बाल-विवाहों के अनुष्ठापन का ऐसी कार्रवाई करके, जो वह उचित समझे निवारण करे ; इस अधिनियम के उपबंधों का उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों के प्रभावी अभियोजन के लिए साक्ष्य संग्रह करे ; बाल-विवाह के अनुष्ठापन का संवर्धन करने, सहायता देने या होने देने में अन्तर्वलित न होने के लिए व्यष्टिक मामलों में सलाह दे या क्षेत्र के निवासियों को साधारणतया परामर्श दे ; बाल-विवाह के परिणामस्वरूप होने वाली बुराई के प्रति जागृति पैदा करे; बाल-विवाहों के मुद्दे पर समाज को सुग्राही बनाए ; ऐसी नियतकालिक विवरणियां और आंकड़े दे, जो राज्य सरकार निर्देशित करे ; और ऐसे अन्य कृत्यों और कर्तव्यों का निवहन करे, जो राज्य सरकार द्वारा उसे समनुदेशित किए जाएं। राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसी शताँ और परिसीमाओं के अधीन रहते हुए, बाल-विवाह प्रतिषेध अधिकारी को किसी पुलिस अधिकारी की ऐसी शक्तियां विनिहित कर सकेगी जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाएं और बाल-विवाह प्रतिषेध अधिकारी ऐसी शक्तियों का, ऐसी शतों और परिसीमाओं के अधीन रहते हुए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाएं, प्रयोग करेगा । बाल-विवाह प्रतिषेध अधिकारी को धारा 4, धारा 5 और धारा 13 के अधीन और धारा 3 के अधीन बालक के साथ आदेश के लिए न्यायालय को आवेदन करने की शक्ति होगी। बाल-विवाह प्रतिषेध अधिकारियो का लोक सेवक होना बाल-विवाह प्रतिषेध अधिकारी भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थान्तर्गत लोक सेवक समझे जाएंगे। सद्धावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए किसी नियम या किए गए किसी आदेश के अनुसरण में सद्धावपूर्वक की गई या किए जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही बाल-विवाह प्रतिषेध अधिकारी के विरुद्ध नहीं होगी। नियम बनाने की राज्य सरकार की शक्ति राज्य सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी। इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखा जाएगा। 1955 के अधिनियम संख्यांक 25 का संशोधन हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 18 के खंड (क) के स्थान पर निम्नलिखित खंड रखा जाएगा, अर्थात्:- ‘(क) धारा 5 के खंड (iii) में विनिर्दिष्ट शर्त के उल्लंघन की दशा में, कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा अथवा दोनों से । निरसन और व्यावृत्ति बाल-विवाह अवरोध अधिनियम, 1929 (1929 का 19) इसके द्वारा निरसित किया जाता है। ऐसे निरसन के होते हुए भी, इस अधिनियम के प्रारंभ पर उक्त अधिनियम के अधीन लंबित या जारी सभी मामले और अन्य कार्यवाहियां, जारी रहेंगी और निरसित अधिनियम के उपबंधों के अनुसार इस प्रकार निपटाई जाएंगी मानो यह अधिनियम पारित न हुआ हो। स्रोत: विधि और न्याय मंत्रालय, भारत सरकार