परिचय शिक्षक के रूप में आप प्रायः सोचते होंगे कि क्या विद्यार्थी वास्तव में आपके शिक्षण प्रयासों के फलस्वरूप सीख रहे हैं। विद्यार्थियों के चेहरों के हाव भाव अथवा उनकी भागीदारी को देखकर कुछ अनुमान लगाना तो संभव है। लेकिन जब आप टेस्ट (परीक्षा) लेते हैं तो संभवतः यह पता चले कि कुछ विद्यार्थी ही आपकी अपेक्षानुसार प्रगति कर रहे हैं, और अन्य बहुतों के लिए-अधिगम अपर्याप्त अथवा दोषपूर्ण है। यदि आपको अपने कार्य का अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं होता, तो शायद आप निराशा का अनुभव करें। यदि कक्षा में शिक्षण बाद के विषयों की ओर अग्रसर हो गया हो तो प्रायः स्थिति में सुधार लाना संभव नहीं हो पाता। कभी-कभी बाद में पढ़े जाने वाले विषय भी ठीक से, नहीं सीखे जा सकते हैं, क्योंकि पूर्व अधिगम आवश्यक आधार प्रदान नहीं करता। आप शायद यह भी अनुभव करें कि आपके शिक्षार्थी अधिगम में न ही रूचिपूर्वक भागीदारी कर रहें हैं, और न ही वे उसके लिए आवश्यक जिम्मेदारी ले रहे हैं। आपको लगता है कि स्वयं प्रयास करने के लिए आपको उन्हें किसी न किसी प्रकार प्रेरित करना होगा, लेकिन यह कैसे किया जाये, इस बारे में आप स्वयं आश्वस्त नहीं हैं। स्वयं को इस निरंतर तनाव से बचाने के लिए आप क्या कर सकते हैं? समस्त विश्व में यह अनुभव किया जा रहा है कि शिक्षक को इस नैराश्य से बचाने का एक तरीका यह है, कि आकलन निर्माणात्मक रूप में किया जाये जो अधिगम को वास्तव में बेहतर बनाने में उसकी मदद करता है। इस प्रणाली को भारत में सतत एवं समग्र मूल्यांकन (सी. सी. ई) के नाम से जाना जाता है, जिसके विषय में प्रायः अनेक भ्रम हैं। वर्तमान में जिस तरह से सी. सी. ई. का क्रियान्वयन किया जा रहा है, उससे अधिगम में जितनी मदद होनी चाहिए उतनी नहीं मिल पा रही है। जब सी. सी. ई. को सही रूप से समझा जाता है तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह आकलन की परंपरागत विधियों से सर्वथा भिन्न है। प्रस्तुत पठन सामग्री द्वारा हम यह स्पष्ट करने का प्रयास करेंगे कि मूल्यांकन की इस भिन्न प्रणाली द्वारा हम विद्यार्थियों और शिक्षकों दोनों की सहायता कैसे कर सकते हैं। सही अधिगम तथा इसी कारण शब्द “सतत” इसका एक महत्वपूर्ण भाग है। पहले हम इस भाग पर चर्चा कर लेते हैं, और उसके बाद “समग्र” भाग पर चर्चा करेंगे। यहाँ यह स्पष्ट करना उचित होगा कि सतत आकलन विद्यार्थियों का बार बार टेस्ट लेना मात्रा नहीं है। पारंपरिक रूप से किया गया परीक्षण अक्सर विद्यार्थियों एवं शिक्षक दोनों के लिए अत्यन्त तनावमय और बोझिल होता है। सी. सी. ई. अधिगम में केवल तब ही सहायता कर सकता है जब कक्षाकक्ष से विद्यार्थी और शिक्षक दोनों के लिए ही चिंता, तनाव और बोझ को अत्यधिक कम कर दिया जाए और शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को आक्रामक न बनाने के साथ-साथ भय मुक्त कर दिया जाए। सतत आकलन को समझने के लिए, किसी चिकित्सक की कल्पना कीजिए जो किसी रोगी का उपचार लंबे समय से कर रहा हो। आरंभ में चिकित्सक रोगी की स्थिति का निदान करता है और चिकित्सा आरंभ करता है। लेकिन वह निरंतर यह ध्यान भी रखता है कि उपचार संतोषजनक परिणाम दे भी रहा है या नहीं। यदि वर्तमान उपचार अपेक्षित परिणाम नहीं देता तो वह उपचार नीति में बदलाव करता रहता है। शिक्षक के पास रोगी नहीं होते, जिनकी बिमारी की स्थिति में सुधार लाने की आवश्यकता होती है, लेकिन उसके सामने विविध अधिगम आवश्यकताओं एवं शैली वाले शिक्षार्थी होते हैं जिन सभी को सीखना अथवा प्रगति करनी चाहिए। इस प्रकार से यह एक अपेक्षित बदलाव है, जो रोगी के 'ठीक होने के समान है। शिक्षक भी लगभग किसी चिकित्सक की तरह निदानात्मक तकनीक का उपयोग करके अपने शिक्षण में सामंजस्य बिठाने का प्रयास करता है। समय-समय पर वह अधिगम में अंतरालों का अवलोकन करता है और अपने शिक्षण की प्रभाविकता का परीक्षण भी करता है। तदनुसार, वह अपनी शिक्षण तकनीक का विकास करता है। यह बेहद विचारणीय और गतिशील प्रक्रिया है। चूंकि यहाँ अधिगम के विभिन्न स्तरों पर स्थित अनेक शिक्षार्थी हैं जो शिक्षक द्वारा किए गये प्रत्येक कार्य पर अपनी प्रतिक्रिया भिन्न-भिन्न तरह से व्यक्त करते रहते हैं, अतएव अपने विद्यार्थियों के बारे में अपने पूर्वज्ञान का उपयोग करके, शिक्षक निरंतर सक्रिय विश्लेषण कर निर्णय लेते रहते हैं। सी. सी. ई. में एक ऐसे शिक्षक की अवधारणा है जो विचारशील अभ्यासकर्ता है। वह एक ऐसा व्यक्ति है जो विद्यार्थियों के साथ किए गए पारस्परिक विचार विमर्श पर निरंतर न्तिन करता रहता है। क्या सतत मूल्यांकन बेहद कठिन प्रतीत हो रहा है? वास्तव में अच्छे शिक्षकों ने हमेशा से ही इसका प्रभावी रूप से उपयोग किया है। यहाँ हम इसके कुछ महत्वपूर्ण आयामों पर विशेष बल दे रहे हैं, ताकि यह दर्शाया जा सके कि अधिगम को सशक्त बनाने में यह कैसे सहायक हो सकता है। सी.सी.ई से संबंधित महत्वपूर्ण शब्दावली को समझना सबसे पहले हम आकलन एवं सी.सी.ई से जुड़ी महत्वपूर्ण शब्दावली पर चर्चा करते हैं। महत्वपूर्ण है कि हम यह न भूलें कि प्रत्येक शैक्षणिक परिचर्चा का मुख्य उद्देश्य अधिगम को समझाना और उसमें सहायता करना है न कि अधिगम का मात्र औपचारिक मापन। शिक्षण अधिगम के दौरान किया गया आकलन, शिक्षक को विद्यार्थी के बारे में कुछ ऐसा संकेत प्रदान करता है, जिस पर तत्काल कार्यवाई करके अधिगम में बढ़ोतरी की जा सकती है, विशेष कर ऐसी स्थिति में जब विद्यार्थी कठिनाइयाँ महसूस कर रहे हों और उन्हें अतिरिक्त मदद की जरूरत हो। सतत आकलन में हमेशा ऐसे औपचारिक परीक्षणों की आवश्यकता नहीं होती जो प्रत्येक विद्यार्थी को एक साथ दिए जाएँ। अक्सर कई बार तो विद्यार्थियों को पता ही नहीं चलता कि उनका आकलन किया जा रहा है। अतएव सतत का अर्थ अधिक संख्या में औपचारिक परीक्षण नहीं है। एक अन्य मुख्य मिथक का संबंध निर्माणात्मक (फार्मेटिव) और समेकित (सम्मेटिव) शब्दों से है। अधिकांश विद्यालयों के प्रगति पत्रों में प्रत्येक तिमाही में शिक्षक प्रायः निर्माणात्मक आकलन दर्ज करते हैं, जिसमें परियोजना कार्य और अन्य क्रियाकलाप सम्मिलित होते हैं। वास्तव में आकलन प्रगति पत्रों (रिपार्ट कार्डो) में उल्लेख के लिए नहीं है। शब्द निर्माणात्मक मूलतः निर्माण' शब्द से आता है जिसका आशय है अधिगम प्रक्रिया का निर्माण। इन आकलनों की रूपरेखा शिक्षण अधिगम प्रक्रिया के दौरान विद्यार्थियों की प्रगति का लेखा जोखा रखने व इसमें सुधर के उद्देश्य से तैयार की जाती है (इसे अधिगम के लिए आकलन भी कहते है)। निर्माणात्मक रूप से विद्यार्थी की सहायता करने के लिए शिक्षक, उसके अधिगम से संबंधित किसी भी जानकारी का उपयोग कर सकते हैं, उदाहरण के लिए, लिखित कार्य, मौखिक उत्तर अथवा विद्यार्थी का सरल अवलोकन। पूर्व निर्धारित समय अथवा पाठ्यचर्या के किसी निश्चित अंश के पठन-पाठन के बाद विद्यार्थी के अधिगम की संपूर्ण दक्षता की जानकारी प्राप्त करने के लिए समेकित आकलन किया जाता है (इसे अधिगम का आकलन अथवा मूल्यांकन भी कहते हैं)। समेकित शब्द का तात्पर्य संपूर्ण अधिगम के अनुमान लगाने से है। आकलन और मूल्यांकन एक दूसरे से अदल बदल कर उपयोग कर लिया जाता है। इन शब्दों के अर्थ में कुछ अंतर है। आकलन मुख्य रूप से विद्यार्थियों के अधिगम के समय गुणवत्ता पर राय बनाने का प्रयत्न करता है। (तथ्य यह है कि ‘आकलन जिसे अंग्रेजी में Assessment कहते हैं का वास्तविक अर्थ है पास में बैठना’, यह लैटिन के as sedere से निकला है)। मूल्यांकन एक निश्चित अवधि के शिक्षण के बाद वास्तविक उपलब्ध स्तर पर केन्द्रित होता है। इस स्तर तक कैसे और क्यों पहुंचा गया, मूल्यांकन का इससे कोई लेना देना नहीं है। यह तो पूर्व निर्धारित कसौटी के आधार पर विद्यार्थियों के कार्य की गुणवत्ता को आँकता है और गुणवत्ता को उचित मानक मूल्य (उदाहरण के लिए, अंक अथवा ग्रेड) से दर्शाता है। आकलन अधिकारिक प्रक्रियोन्मुखी अथवा निर्माणात्मक होता है जबकि मूल्यांकन उत्पादोन्मुखी अथवा समेकित होता है। शब्द 'समग्र को भी अक्सर गलत समझ लिया जाता है। यह इशारा करता है कि बच्चे के बारे में संपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया जाए। इसका अर्थ है कि बच्चे के व्यक्तित्व को संपूर्णता में समझा जाए, उदाहरण के लिए, अधिगम के प्रति उसकी अभिव्यक्ति, सामाजिक प्रभाव, भावात्मक स्वास्थ्य, प्रेरणा, शारीरिक स्वास्थ्य, कमज़ोरियाँ और शक्तियाँ इत्यादि। कुछ संशय इससे संबंधित भी है कि पाठ्यचर्या और सह-पाठ्यचर्या क्षेत्रों में किसे रखा जाए। कला शिक्षा, स्वास्थ्य और शारीरिक शिक्षा, कार्यशिक्षा को अक्सर सह-पाठ्यचर्या क्षेत्र माना जाता है, जबकि भाषा, गणित, पर्यावरण अध्ययन, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान को पाठ्यचर्या अध्ययन संबंधी क्षेत्र माना जाता है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 उपरोक्त सभी को पाठ्यचर्या के ही क्षेत्र मानती है, क्योंकि पाठ्यचर्या (नियोजित अधिगम की पूर्णता) को विद्यार्थियों की केवल अध्ययन संबंधी उपलब्धियों से कहीं अधिक विस्तृत रूप में देखा जाता है। विद्यालयों के परंपरागत व्यवहारों से यह समझ में आता है कि अधिकारी एवं शिक्षकगण मानते हैं कि मूल्याकंन का उद्वेश्य बच्चों का वर्गीकरण अथवा उनकी उपलब्धियों की एक दूसरे से तुलना करना है। यह संभवतया अभिभावकों के दबाव की वजह से है। इस तरह से परीक्षण का कार्य बच्चे के अधिगम सुधार में सहायक होने के बजाए, बच्चे की कमजोरियों अथवा जो वह नहीं जानता, को उजागर करना भर हो जाता है। सी. सी. ई का वास्तविक भाव है पाठ के दौरान निरंतर होने वाले आकलनों और शिक्षण के लंबे खंडों अथवा इकाइयों की समाप्ति के बाद किए जाने वाले मूल्यांकनों, दोनों ही के द्वारा, विद्यार्थी के अधिगम में बढ़ोतरी करना। यह इस बात पर जोर देता है कि छात्र की उपलब्धि की तुलना अन्य विद्यार्थियों की उपलब्धि से करने के बजाए उसकी अपनी पूर्व उपलब्धि के साथ ही की जाए। - एक अन्य मिथक का संबंध अंकों और ग्रेडों से है। अक्सर, शिक्षाविद यह मान लेते हैं कि अंक संख्यात्मक अथवा अधिगम उत्पाद दर्शाते हैं, और ग्रेड गुणात्मक होते हैं जो अधिगम प्रक्रिया के बारे में बताते हैं। चूंकि शिक्षकों को आदत तो अंकों की ही है अतः वह पहले अंक देकर, उसे बाद में ग्रेड में बदल देते हैं। यह अंक और ग्रेड, दोनों के ही दोषपूर्ण उपयोग को दर्शाता है। अंक और ग्रेड दोनों ही बच्चे की उपलब्धि की मूल्यांकित राय है। यह अधिगम को एक अंक अथवा ग्रेड दे देते हैं जिसे अक्सर बाद के इस्तेमाल के लिए दस्तावेजों में दर्ज कर लिया जाता है। यह छात्रों की उपलब्धि की गुणात्मक प्रकृति ही है जो अधिगम प्रक्रिया निष्पादन में निर्माणात्मक रूप से बदलाव करने में शिक्षक की मदद करती है। अंक/ ग्रेड देने और दर्ज करने का विद्यार्थियों के अधिगम के लिए कोई मूल्य नहीं है। सी. सी. ई. में दस्तावेजों की भूमिका को व्यापक तौर पर गलत समझा जा रहा है। बहुत से शिक्षकों को लगता है कि सी. सी. ई में उन्हें बच्चे की प्रगति को अधिसंख्य मानकों पर, दैनिक, साप्ताहिक अथवा निरंतर रूप से दर्ज करने की आवश्यकता है। यह तो सतत आकलन की भावना के बिल्कुल विपरीत है। शिक्षकों को हर समय, बच्चे को आकने की आवश्यकता नहीं है, न ही उन्हें विद्यार्थियों की प्रगति का विस्तृत दस्तावेज तैयार करने और उसे अन्य लोगों को दिखाने की ही आवश्यकता है। सतत आकलन शिक्षक को और बेहतर तरीके से पढ़ाने में मदद करने के लिए है और उसे केवल वही दर्ज करने की आवश्यकता है जो शिक्षण अधिगम को सुधारने में वास्तव में उपयोगी हो। कक्षा में अक्सर यह देखने के लिए कि शिक्षण तकनीक कितनी अच्छी तरह से काम कर रही है, शिक्षक एक-एक छात्र को आँकने की बजाए केवल शिक्षणप्रक्रियाओं को भी आँक सकते हैं। सी. सी. ई में गलती से यह भी सोच लिया जाता है कि प्रत्येक बच्चे की कक्षोन्नति की ही जाती चाहिए, चाहे उसने कुछ सीखा हो अथवा नहीं। सी. सी. ई की वास्तविक भावना है कि प्रत्येक बच्चे को उचित प्रक्रियाओं द्वारा के अवसर मिले और साथ ही जब भी उसे कठिनाइयां आएं, उसकी मदद की जाए। इसका अर्थ है कि यदि शिक्षक विद्यार्थी का आकलन करके, उसकी सहायता के लिए ऐसे तरीके तैयार करता है कि विद्यार्थी निरंतर सीखता रहे तो सत्र के अंत में ऐसी परिस्थिति ही नहीं उत्पन्न होगी कि विद्यार्थी ‘असफल' हो जाए। यह तथ्य है कि राज्यों में फेल न करने की नीति की शुरूआत बहुत पहले हो गई थी लेकिन बिना किसी ऐसी निर्माणात्मक सहायता के जो इसे सफल बना सके। सी. सी. ई में एक अन्य भ्रांतिपूर्ण दृष्टिकोण यह भी है कि सतत एवं समग्र दोनों ही आकलनों का बोझ और समस्त जवाबदेही शिक्षकों को ही लेने की आवश्यकता है। इससे यह कार्य असंभव प्रतीत होता है और शिक्षक भी गैर यथार्थवादी उम्मीदों का अत्याधिक बोझ महसूस करता है। इसके विपरीत सी. सी. ई का उद्देश्य तो वास्तव में शिक्षक का बोझ कम करना है। यह तो सीखने की जिम्मेदारी समान रूप से विद्यार्थियों को भी देता है। इसका अर्थ यह है कि बच्चों को अपने स्वयं के कार्य/एवं अपने सहपाठियों के कार्यों के आकलन और एक दूसरे को सीखने की प्रक्रिया में मदद की जिम्मेदारी देनी होगी। ऐसे विद्यार्थी जो अधिक गति से सीख लेते हैं, शिक्षक की मदद के लिए अच्छे स्रोत साबित हो सकते हैं। इस प्रकार से अधिगम में साझेदारी और समूह कार्य शिक्षक का बोझ कम करने के महत्वपूर्ण साधन बन जाते हैं। सी. सी.ई का ‘समग्र' भाग शिक्षा के उद्देश्यों का प्रत्येक कथन, शैक्षिक क्षमताओं के अतिरिक्त विभिन्न निजी गुणों के बारे में भी बताता है। लेकिन दसवीं का प्रमाण पत्र, प्रभावी तौर पर विषयों का केवल ग्रेड अथवाअंक-पत्र मात्र है। सी. सी. ई का समग्र भाग, विद्यार्थियों के अधिगम की संपूर्णता को पाठ्यचर्या का केन्द्र बनाता है। शिक्षक प्रत्येक विद्यार्थी की निजी, शैक्षिक और सामाजिक विशेषताओं के विकास का अवलोकन और पोषण करता है। इस प्रकार स्वभाविक है कि कक्षाओं में विद्यार्थियों का अविरत आकलन (विशेषकर अवलोकन के माध्यम से) लगभग समग्र ही होगा। शिक्षकों को विकास के प्रत्येक पहलू पर ध्यान देने की आवश्यकता है। फिर भी यह मान लेना महत्वपूर्ण है कि इनमें से बहुत सी विशेषताओं को थोड़े समय में नहीं परखा जा सकता है और कुछ को ठोस’ सबूत के आधार पर दर्ज नहीं किया जा सकता। उत्साह, सहयोग, धैर्य, एकाग्रता, रूचि, प्रेरणा, उपयोगिता और पर्यावरण एवं अन्य के प्रति संवेदनशीलता जैसी विशषताओं को तो केवल कई महीनों के अवलोकन के बाद ही देखा जा सकता है और तब भी यह दूसरों को प्रमाण सहित नहीं दिखाई जा सकती। विद्यार्थियों के संपूर्ण व्यक्तित्व और विद्यार्थियों की वद्धि में यह कैसे योगदान करते हैं इसे समझने के लिए इनका अवलोकन तो केवल शिक्षक ही कर सकता है। व्यक्तित्व के पहलुओं के लिए औपचारिक परिक्षणों को बनाना बेहद कठिन हैं। इन पहलुओं पर प्रगति देखने के लिए, अनौपचारिक तरीके अधिक अपनाने चाहिए। मित्रवत और भय रहित तरीके से किया गया साथियों द्वारा आकलन और स्वआकलन यहाँ बहु उपयोगी हो सकता है। शिक्षण-अधिगम परिस्थितियों उदाहरण हम यहाँ पर शिक्षण-अधिगम परिस्थितियों के कुछ उदाहरण दे रहे हैं जिनमें सततअंक-पत्र मात्र है। सी. सी. ई का समग्र भाग, विद्यार्थियों के अधिगम की संपूर्णता को पाठ्यचर्या का केन्द्र बनाता है। शिक्षक प्रत्येक विद्यार्थी की निजी, शैक्षिक और सामाजिक विशेषताओं के विकास का अवलोकन और पोषण करता है। इस प्रकार स्वभाविक है कि कक्षाओं में विद्यार्थियों का अविरत आकलन (विशेषकर अवलोकन के माध्यम से) लगभग समग्र ही होगा। शिक्षकों को विकास के प्रत्येक पहलू पर ध्यान देने की आवश्यकता है। फिर भी यह मान लेना महत्वपूर्ण है कि इनमें से बहुत सी विशेषताओं को थोड़े समय में नहीं परखा जा सकता है और कुछ को ठोस’ सबूत के आधार पर दर्ज नहीं किया जा सकता। उत्साह, सहयोग, धैर्य, एकाग्रता, रूचि, प्रेरणा, उपयोगिता और पर्यावरण एवं अन्य के प्रति संवेदनशीलता जैसी विशषताओं को तो केवल कई महीनों के अवलोकन के बाद ही देखा जा सकता है और तब भी यह दूसरों को प्रमाण सहित नहीं दिखाई जा सकती। विद्यार्थियों के संपूर्ण व्यक्तित्व और विद्यार्थियों की वद्धि में यह कैसे योगदान करते हैं इसे समझने के लिए इनका अवलोकन तो केवल शिक्षक ही कर सकता है। व्यक्तित्व के पहलुओं के लिए औपचारिक परिक्षणों को बनाना बेहद कठिन हैं। इन पहलुओं पर प्रगति देखने के लिए, अनौपचारिक तरीके अधिक अपनाने चाहिए। मित्रवत और भय रहित तरीके से किया गया साथियों द्वारा आकलन और स्वआकलन यहाँ बहु उपयोगी हो सकता है। स्त्राेत: पूर्व प्राथमिक शिक्षा के लिए दिशा-निर्देश,राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी), श्री अरविंदाे मार्ग, नई दिल्ली।