परिचय छोटे बच्चों के अधिकतम विकास और वृद्धि के लिए उनके स्वास्थ्य, पोषण, सुरक्षा और शिक्षा की आवश्यकताओं को पूरा किया जाना आवश्यक है। प्रारंभिक बाल्यावस्था की सेवाएं देने के लिए लक्ष्यों का अभिसरण और विभिन्न क्षेत्रों, जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सरंक्षण द्वारा समग्र बाल विकास की साझा समझ होनी चाहिए। सभी हितधारकों, जैसे नीति नियोजकों, प्रशासकों, क्रियान्वयन कर्ताओं, प्रदाताओं, अभिभावकों और समुदाय के बीच ऊर्ध्व अभिसरण (vertical convergence) होना चाहिए और साथ ही विभिन्न मंत्रालयों, विभागों तथा विभागों के उप-विभागों, चिकित्सा, स्वास्थ्य, देखभाल और प्रारंभिक शिक्षा के विभिन्न घटकों को सँभालने वालों में सम-स्तर अभिसरण (horizonal convergence) होना चाहिए। गुणवत्तापूर्ण पूर्व-प्राथमिक विद्यालय कार्यक्रम को सुनिश्चित करने हेतु, विभिन्न कार्यों के लिए विकासात्मक समन्वयन और अभिसरण महत्वपूर्ण है। प्रशासनिक राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर पूर्व-प्राथमिक विद्यालय कार्यक्रम को लागू करने की योजना, प्रबंध और समीक्षा के लिए एक उपयुक्त समन्वयन और अभिसरण पद्धति स्थापित करनी चाहिए। सभी संबंधित मंत्रालय, जैसे— मानव संसाधन विकास मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य त्रालय, जल मंत्रालय, शहरी विकास और पंचायती राज मंत्रालय, इसके अंग होने चाहिए। कार्यक्रम लागू करने के लिए उपयुक्त नियोजन और समय पर वित्तीय संसाधनों जैसे— जनशक्ति, आधारभूत संरचना और शिक्षण-अधिगम सामग्री के आवंटन को राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर सुनिश्चित किया जाना चाहिए। विद्यालय शिक्षा अधिकारियों और आई.सी.डी.एस. अधिकारियों के बीच राज्य, ज़िला और ब्लॉक स्तर पर नियमित अंतर-विभागीय बैठकें आयोजित होनी चाहिए और इनमें आधारभूत स्तर पर सुधार के बारे में कार्रवाई बिंदु निकलने चाहिए। राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एन.सी.टी.ई.),राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एन. सी.ई.आर.टी.), राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (एन.आई.पी.सी.सी.डी.), राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (एस.सी.ई.आर. टी.), डी.आई.ई.टी., विश्वविद्यालय, गैर-सरकारी संगठन (एन.जी.ओ.) और निजी क्षेत्र, टेक्निकल पार्टनर्स आदि एजेंसियों जिनके पास प्रारंभिक शिक्षा में तकनीकी विशेषता और अनुभव हैं, का एक संसाधन समूह बनाया जाना चाहिए जो बच्चों के साथ-साथ शिक्षक-प्रशिक्षण कार्यक्रमों, अनुसंधान करने और संसाधन सामग्री तैयार करने में मदद कर सके और पाठ्यचर्या विकसित कर सकें। राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर ई.सी.सी.ई. परिषद का गठन किया जाना चाहिए जैसाकि ई.सी.सी.ई. राष्ट्रीय नीति 2013 में दर्शाया गया है। पूर्व-प्राथमिक और प्राथमिक विद्यालय एक ही परिसर में या बिल्कुल पास स्थित होने चाहिए। पूर्व-प्राथमिक के समय का प्राथमिक विद्यालय के साथ सही तालमेल होना चाहिए। प्राथमिक विद्यालय के प्राचार्य/प्रधानाध्यापक को पूर्व-प्राथमिक विद्यालय शिक्षा घटक का उत्तरदायित्व दिया जाना चाहिए। प्राथमिक विद्यालय के शिक्षकों में से एक को सशक्त संबंध विकसित करने, गुणवत्तापूर्ण और सहज पारगमन (पूर्व-प्राथमिक विद्यालय से प्राथमिक स्कूलमें) सुनिश्चित करने के लिए प्रभारी बना देना चाहिए। पूर्व-प्राथमिक विद्यालयों और प्राथमिक विद्यालयों मेंसंसाधनों को साझा किया जाना चाहिए। वार्षिक दिवस, खेलकूद दिवस, प्रात:कालीन सभा आदि जैसी गतिविधियाँ मिलकर की जानी चाहिए। प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण सभी अधिकारियों और चयनित निकायों तथा विभिन्न नागरिक समाज निकायों के सदस्यों के लिए पूर्व-प्राथमिक शिक्षा पर अभिविन्यास और क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। पूर्व-प्राथमिक और प्राथमिक स्तर पर बच्चों के अधिगम और विकास के मध्य संबंधों पर समझ बनाने के लिए पूर्व-प्राथमिक शिक्षकों, आँगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, प्राथमिक शिक्षकों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण के लिए संयुक्त प्रयास किए जाने चाहिए। क्षमता निर्माण और पूर्व-प्राथमिक कार्यक्रम को लागू करने के लिए शिक्षा मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, डी.आई.ई.टी., एम. एल. टी. सी.,आँगनवाड़ी प्रशिक्षण केंद, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान की विभिन्न संसाधन एजेंसियों की भी साझेदारी होनी चाहिए। क्लस्टर संसाधन केंद्र, ब्लाक संसाधन केंद्र, बाल विकास परियोजना अधिकारी, सुपरवाइज़रों आदि द्वारा ऑनसाइट मार्गदर्शन तथा अकादमिक मदद उपलब्ध करायी जानी चाहिए। पूर्व-प्राथमिक शिक्षकों, आँगनवाड़ी कार्यकताओं और अन्य संबंधित अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, डी.आई.ई.टी., बी.आर.सी., एम.एल.टी.सी., आँगनवाड़ी प्रशिक्षण केंद्र और सी.आर.सी. की आधारभूत संरचनाओं का उपयोग किया जाना चाहिए। निगरानी और देखरेख पूर्व-प्राथमिक विद्यालय कक्षा-कक्ष प्रक्रियाओं और कार्यप्रणालियों की संयुक्त निगरानी और देखरेख होनीचाहिए। प्रधानाध्यापक को मौके पर ही शिक्षकों को मार्गदर्शन देना चाहिए। प्रधानाध्यापक को सुरक्षा और शिक्षा की गुणवत्ता का ध्यान रखना चाहिए। पूर्व-प्राथमिक विद्यालय परिसर में ऐसा कोई बच्चा नहीं होना चाहिए जिसकी देखरेख न हो। शिक्षकों और सहायकों को चाहिए कि वे विभिन्न खेल क्षेत्रों का अवलोकन तथा देखरेख करें। पूर्व-प्राथमिक विद्यालय के बच्चों के अभिभावक, विद्यालय प्रबंध समिति (SMC) के सदस्य होने चाहिए। इस समिति के सदस्यों को पूर्व-प्राथमिक कार्यक्रम की देखरेख करनी चाहिए और इसके सुचारु संचालन में मदद करनी चाहिए। पूर्व-प्राथमिक विद्यालय निरीक्षकों, क्षेत्रीय या मंडल स्तरीय शिक्षा अधिकारियों, जिला शिक्षा अधिकारियोंऔर राज्य शिक्षा अधिकारियों को चाहिए कि वे नियमित रूप से पूर्व-प्राथमिक विद्यालय परिसरों का दौरा करें और पूर्व-प्राथमिक विद्यालय गतिविधियों की गुणवत्ता का अवलोकन करें। सभी अधिकारियों को पूर्व-प्राथमिक विद्यालय कार्यक्रम का उद्देश्य समझना चाहिए। पूर्व-प्राथमिक विद्यालय निरीक्षक को चाहिए कि वह पूर्व-प्राथमिक विद्यालयों का 3 माह में कम से कम एक बार दौरा करें और जिला शिक्षा अधिकारी को रिपोर्ट करें। दौरे अर्थपूर्ण होने चाहिए और उन्हें प्रत्येक विद्यालय में पर्याप्त समय बिताना चाहिए। इन दौरों के समय, शिक्षकों का अभिविन्यास किया जाना चाहिए और उन्हें पूर्व-प्राथमिक शिक्षा में हुए नये परिवर्तनों की जानकारी दी जानी चाहिए। रौमिला सोनी (सहायक प्रवक्ता प्रारंभिक शिक्षा विभाग)