परिचय व्यक्तिगत स्वच्छता प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण है। सफ़ाई व स्वच्छता संबंधी अच्छी आदतें यदि बचपन में ही खेल-खेल में सिखाई जाएँ, तो बच्चे इसे सदैव याद रखते हैं और उनका नियम से पालन भी करते हैं क्योंकि जीवन के प्रथम पाँच से छह वर्ष आदतों को सीखने के बुनियादी वर्ष (habit formation years) होते हैं। “अपने हाथ धो लो। चलो अपने दाँतों को ब्रुश करो। साबुन से हाथ धोकर आओ।"ये कुछ बातें हैं जो अक्सर माता-पिता बार-बार दोहराते रहते हैं। बच्चे रेत में खेलते हैं, ज़मीन पर गिरे खाद्य पदार्थ उठाकर जल्दी से मुँह में डाल लेते हैं, अकसर अपनी उँगलियों को नाक और मुँह में डालते रहते हैं। किंतु माता-पिता यह कभी नहीं देखते कि बच्चे हाथ कैसे धो रहे हैं, दाँतों में ब्रुश कैसे कर रहे हैं, साबुन को भली प्रकार मल रहे हैं या नहीं। जब बात छोटे बच्चों की अपनी स्वयं की देखभाल एवं स्वच्छता की आती है, तब हम देखते हैं कि अकसर छोटे बच्चे इनकी आवश्यकता और महत्व को नहीं समझते और यह स्वाभाविक भी है। कि इस उम्र में बच्चों में यह समझ बन भी नहीं सकती। अच्छे और बेहतर स्वास्थ्य के लिए हमें चाहिए कि छोटे बच्चों को सही समय पर जीवन की शुरुआती देखभाल एवं स्वच्छता के लिए अवलोकन व गतिविधियों के माध्यम से घर में और नर्सरी स्कूल में सिखाया जाए। इन्हीं शुरुआती वर्षों में हाथों को भली-भाँति धोना, विशेष रूप से भोजन से पहले, बाद में तथा खाँसी और जुकाम होने के समय अपने नाक व मुँह को रुमाल से ढकना और हाथों को साफ़ पानी से भली प्रकार से धोना आदि बातों को सीखना-सिखाना बहुत आवश्यक है। अच्छी स्वच्छता संबंधी आदतों को घर और स्कूल में खेल-खेल में सीखना बहुत महत्वपूर्ण है । इससे छोटे बच्चों को स्वच्छता के महत्व के बारे में पता चलेगा और उनकी व्यक्तिगत स्वच्छता में दिलचस्पी भी बढ़ेगी। चाहे बच्चे घर पर रहें या स्कूल में, बच्चों को व्यक्तिगत स्वच्छता का महत्व बताने के लिए और उन्हें साफ़, स्वच्छ और स्वस्थ रहने के लिए आप नए-नए तरीके व गतिविधियाँ खेल द्वारा करा सकते हैं। कुछ बच्चे पानी की धार के नीचे हाथ रख कर जल्दी से धो लेते हैं, किंतु हमें उन्हें बताना ही नहीं है, बल्कि करके दिखाना है कि हमें अपने हाथों को कम से कम 20 से 30 सेकेंड तक अच्छी तरह साबुन से मल कर धोना चाहिए। यहाँ शरीर की स्वच्छता से तात्पर्य हमारे शरीर की सफ़ाई और उसकी समुचित देखभाल से है। जब हम अपने शरीर की सफ़ाई की बात करते हैं तो उसमें शरीर के सभी अंगों की सफ़ाई और साफ़-सुथरे कपड़े भी शामिल होते हैं। आमतौर से छोटे बच्चों का यह न समझ पाना स्वाभाविक है कि उन्हें अपनी व्यक्तिगत स्वच्छता को कैसे बनाए रखना है और यह क्यों महत्वपूर्ण है। स्वच्छता संबंधी आदतों की शिक्षा परिवार से ही शुरू होती है और आगे चलकर बच्चे अपने आप इन सफ़ाई के नियमों का पालन करने लगते हैं। इसी कारण परिवार की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। बच्चों में सही स्वच्छता संबंधी आदतों को विकसित करने के लिए परिवार और प्री-स्कूल की बहुत बड़ी भूमिका होती है। छोटे बच्चे जब तक इन आदतों को भली प्रकार अपनी दिनचर्या में ढाल नहीं लेते, तब तक बड़े होने तक परिवारजनों और प्री-स्कूल के शिक्षकों को इन अच्छी आदतों को अपनाने में उनकी सहायता करनी है।। साफ़-सुथरे बच्चे अपनी कक्षा व स्कूल में सबको अच्छे लगते हैं और स्वयं भी अच्छा अनुभव करते हैं। व्यक्तिगत स्वच्छता के अंतर्गत सबसे पहले शरीर की सफ़ाई है। बच्चे को प्रतिदिन स्नान करने और हाथ धोने का महत्व बताएँ। सफ़ाई की आदतों में सबसे महत्वूपर्ण प्रतिदिन नहाना और भोजन से पहले और टॉयलेट का उपयोग करने के बाद, भली प्रकार हाथ धोना सीखना है। इसी में नियमित रूप से बालों को धोना, शैम्पू करना, तेल लगाना भी शामिल है। दूसरी व्यक्तिगत स्वच्छता मुँह, दाँत आदि की स्वच्छता (oral hygiene) है, जिसमें नियमित रूप से अपने दाँत साफ़ रखना आवश्यक है। चर्चा, कहानी व कविता के माध्यम से बताएँ कि सुबह एक बार तथा रात में भोजन करने के बाद दाँतों को अच्छी तरह से साफ़ करना चाहिए। बच्चों को हर भोजन के बाद सही ढंग से कुल्ला करना सीखना चाहिए। बच्चों को सही तरीके से ब्रुश करना बताएँ। इसे आप कहानी व कविता के माध्यम से रोल प्ले' या अभिनय करके भी बता सकते हैं।व्यक्तिगत स्वच्छता में तीसरी बात साफ़-सुथरे कपड़े पहनना है । बच्चों को बताएं कि उन्हें प्रतिदिन अंदर के वस्त्र बदलने चाहिए यानि धुले हुए वस्त्र पहनने चाहिए।इन शुरुआती वर्षों में बच्चों को बुनियादी स्वच्छता की अवधारणाओं (basic hygiene concepts) से अवगत कराना भविष्य में उन्हें एक स्वस्थ जीवन शैली अपनाने के लिए एक आधार देगा। स्वच्छता की अनिवार्यता जिस प्रकार से हम अपने बच्चों को साइकिल चलाना सिखाते हैं या कोई खेल सिखाते हैं, उसी प्रकार हमें अपने बच्चों को शुरुआती पाँच से छह वर्षों में स्वच्छता की आदतों को खेल-खेल में सिखा देना चाहिए, जैसे- ठीक से नहाना, हाथों को मलकर अच्छी तरह धोना, दाँतों को दो बार सही तरीके से ब्रुश करना, बालों को नियमित रूप से साफ़ करना व कंघी करना और टॉयलेट या शौचालय का उचित रूप से उपयोग करना। शरीर की स्वच्छता संबंधी गतिविधियों का स्वरूप स्वयं के शरीर की देखभाल करना तथा उसे साफ़ रखना बच्चे के लिए एक मजेदार खेल या क्रिया होनी चाहिए न कि कोई काम । शरीर की सफ़ाई व स्वच्छता संबंधी गतिविधियाँ स्वयं के शरीर की देखभाल करना तथा उसे साफ़ रखना बच्चे के लिए एक मजेदार खेल या क्रिया होनी चाहिए न कि कोई काम ।शरीर की सफ़ाई व स्वच्छता संबंधी गतिविधियाँ हमारी दिनचर्याऔर रोज़मर्रा के जीवन से जुड़ी हुई हैं। ये 4 से 8 वर्ष तक के बच्चों के लिए हैं। ये गतिविधियाँ सरल से कठिन के स्वरूप में दी गई हैं। आप इनमें से अपने बच्चों की आयु एवं विकास के अनुसार चयन कर सकते हैं तथा स्वयं भी सृजित कर सकते हैं।इस भाग में मुख्य रूप से स्वयं के शरीर की देखभाल और स्वच्छता संबंधी गतिविधियों का उल्लेख किया गया है जैसे- खेल, चर्चा, कहानी, कठपुतली के खेल,कविता-गीत,प्रश्नोत्तरी, पज़ल्स आदि करके सीखने वाली बहुत-सी गतिविधियाँ हैं।इनके अलावा कुछ वर्कशीट भी दी गई हैं जो आप फ़ोटोकॉपी करके बच्चों को दे सकते हैं। बच्चों का लगातार अवलोकन और आकलन शिक्षक हमेशा यह ध्यान रखें कि गतिविधियाँ कराते समय बच्चों का अवलोकन करना बहुत ज़रूरी है तथा साथ-साथ आकलन भी करें जिससे अध्यापक को यह पता चलता रहेगा कि बच्चे कैसे सीख रहे हैं, उन्हें कब मार्गदर्शन की आवश्यकता है और कब उन्हें स्वतंत्र छोड़ना है। इसके लिए आप कोई चेक-लिस्ट आदि भी बना सकते हैं। सुझावात्मक संकेतक साफ़-सफ़ाई और स्वच्छता-संबंधी आदतों को सीखने व सिखाने के कुछ संकेतक अपने शरीर की देखभाल और स्वच्छता-संबंधी आदतों को अपने दैनिक व्यवहार में दर्शाते हैं, जैसे- साफ़-सफ़ाई से भली प्रकार हाथ धोते हैं, धोने के बाद साफ़ कपड़े/नेपकिन से पोंछते हैं, शौचालय का सही तरीके से उपयोग करते हैं, साफ़ धुले कपड़े, जुराबें, यूनीफ़ॉर्म पहनते हैंऔर दाँतों को नियमित रूप से दो बार ब्रश करते हैं। आयु उपयुक्त गतिविधियों/कार्यों के लिए ज़िम्मेदारी दर्शाते हैं (उदाहरण के लिए, खेल के बाद खिलौने व सामग्री अपनी जगह वापिस रखना, भोजन या टिफ़िन खाने के बाद अपनी जगह साफ़ रखना।) सफ़ाई और स्वच्छता संबंधित बातों को दिनचर्या का हिस्सा बनाते हैं। जैसे खाने से पहले एवं बाद में हाथ धोते हैं। रुमाल/टिशु पेपर का नाक पोंछते/खाँसते समय उपयोग करते हैं। शौचालय जाने के बाद हाथ अच्छी तरह से धोते हैं। स्वच्छता संबंधी चीज़ों के नाम जानते हैं तथा उनके उपयोग के बारे में बताते हैं, जैसे साबुन,टूथपेस्ट, टूथब्रश, आदि। खाँसते समय अपना मुँह कपड़े / रुमाल से ढकते हैं। हृषिकेश सेनापति रौमिला सोनी सहायक प्रवक्ता प्रारंभिक शिक्षा विभाग निदेशक राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्नयी (नयी दिल्ली अप्रैल, २०१६)