परिचय माल पहाड़िया जनजाति के दो वर्गों में से एक है। दूसरा वर्ग सौरिया पहाड़िया के नाम से जाना जाता है। इन दोनों जनजातियों को दो अलग अलग जनजाति के रूप में मान्यता दी गई। क्योंकि दोनों के सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक व्यवस्था में अंतर पाया जाता है। फिर इन दोनों के बीच विवाह शादी का भी संबंध नहीं होता है। यहाँ पर यह जिक्र करना भी उचित लगता है कि माल पहाड़िया के एक उपवर्ग के रूप में कुमार भाग पहाड़िया को माना गया है। माल पहाड़िया और कुमार भाग के बीच विवाह होता है। माल पहाड़िया मुख्यत: संथाल परगना में रहते हैं। छिटपुट रूप से पूर्वी और पश्चिमी सिंहभूम, लोहरदगा तथा कुछ अन्य जिलों में पाये जाते हैं। भौगोलिक दृष्टि से इनका निवास स्थल बहुत उपयुक्त नहीं है। इनका इलाका पहाड़ी, जंगली है और जलवायु के दृष्टि से भी बहुत उपयुक्त नहीं है। रिजले ने माल पहाड़िया को द्रविड़ जनजाति माना है। प्रजातीय दृष्टि से इन्हें प्रोटो – आस्ट्रोलॉयड समूह में रखा गया है। बुचानन हैमिल्टन ने माल पहाड़ियां का संबन्ध मालेर (सौरिया पहाड़िया) से बतलाया है किन्तु डाल्टन महोदय का विचार है कि माल पहाड़िया राजमहल के पहाड़ी लोगों से बिल्कुल असंबंधित है। बॉल महोदय ने भी इसका समर्थन करते हुए कहा है कि माल पहाड़िया राजमहल हिल के असल पहाड़िया से आकृति, रीति रिवाज और भाषा के दृष्टि से बिल्कुल अलग है। विवाद कुछ भी हो आज पहाड़िया जनजातीय के अंतर्गत सौरिया और माल को रखा जाता है। जनसंख्या 1941 की जनगणना के अनुसार माल पहाड़िया को कुल आबादी 40,148 थी जो 2011 में 1,35,797 हो गयी इससे स्पष्ट पता चलता है कि माल पहाड़िया की जनसंख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। निम्नलिखित तालिका से इनकी जनसंख्या पर पूरा प्रकाश पड़ता है। तालिका – 1 वर्ष 1941 1961 1971 1981 1991 2001 2011 पुरूष - 22,750 24,424 39,810 - 58,067 67,791 महिला - 22,673 24,212 39,512 - 57,026 68,006 कुल 40,148 45,423 48,636 79,322 79,154 1,15,093 1,35,797 उपरोक्त तालिका पर ध्यान देने से पता चलता है कि माल पहाड़िया के बीच लिंग अनुपात बहुत सन्तुलित है। इस तालिका के विश्लेषण से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि 1961 और 1971 के बीच के दशक में आबादी में वृद्धि मंद गति से हुई किन्तु उसके बाद के दशक में (2001 – 2011) तेजी से वृद्धि हुआ है। माल पहाड़िया के वितरण पर एक दृष्टि डाला जाय तो यह पता चलता है कि ये मुख्यतः संथाल परगना में ही निवास करते आये हैं। 1981 की जनगणना के अनुसार केवल संथाल परगना में इनकी जनसंख्या 75,210 है जो लगभग 95 प्रतिशत है। 1961 की जनगणना में माल पहाड़िया के वितरण दर्शाते हुए अंकित किया गया है कि इनकी जनसंख्या भागलपुर में 10742, सहरसा में 511, पूर्णिया में 228 तथा सिहंभूम 71 थी। संथाल परगना में माल पहाड़िया मुख्यतः दुमका के दुमका, रानीश्वर मशलिया, जामा, जरमूंडी, रामगढ़, गोपीकंदर, काठीकुंड तथा शिकारीपाड़ा में पाया जाते हैं। माल पहाड़िया की भाषा माल्टो है। जो द्रविड़ परिवार से मानी जाती है। माल्टो भाषा का प्रयोग माल पहाड़िया के अतिरिक्त सौरिया पहाड़िया में भी करते हैं। 1951 की जनगणना के अनुसार माल्टो बोलने वालों की संख्या 23,857 थी जो 1961 में बढ़कर 83,233 हो गई। भाषा की यह विभिन्नता भी पहाड़िया को अन्य जनजातियों से अलग करता है। उराँव द्वारा बोली जानी वाली कुडूख भाषा भी द्रविड़ परिवार की है पर वह भी माल्टो से भिन्न है। माल पहाड़िया की सामाजिक संरचना पर दृष्टिपात करने से स्पष्ट पता चलता है कि इनके बीच गोत्र नहीं पाया जाता है। यह झारखण्ड के अन्य जनजातियों सामाजिक संरचना के पृष्ठभूमि में एक विशेषता रखता है। इनके बीच पारिवारिक विभाजन पाया जाता है, जैसे डेहरी, ग्रही, मंझिए, लाया, पूजार आदि। डेहरी वर्ग का व्यक्ति बराबर डेहरी रहता है उसी प्रकार गृह विभाजन का सदस्य सदा ग्रही बना रहता है। इस प्रकार के विभाजन से उनके बीच समूहों का निर्माण होता है जिसे भ्रातृदल, के समकक्ष माना जा सकता है। इनके बीच गोताद्र का अभाव है। ये पारिवारिक विभाजन माल पहाड़िया का विभिन्न समूहों में तो बांट देता है किन्तु वैवाहिक संबंध के निर्धारण में इसकी कोई भूमिका नहीं होता यद्यपि लोग अपनी विभाजन की अपेक्षा दुसरे विभाजन में वैवाहिक संबंध करना पसंद करते है। फिर भी इन विभाजनों को गोत्रीय विभाजन नहीं कहा जा सकता है। वस्तुतः यह विभाजन व्यवासायिक विभाजन है। विवाह संबंध के लिए इनके यहाँ नातेदारी समूह पर ध्यान दिया जाता है। सौरिया पहाड़िया की तरह माल पहाड़िया भी मातृय - पितृय पक्ष दोनों ओर तीन पुश्त तक विवाह नहीं करते। नातेदारी व्यवस्था जनजातियों के बीच परिवार और विवाह से संबंधित होते हैं। नातेदारी और रक्त धमनियों और विवाह संबंधियों दोनों को सम्मिलित किया जाता है। माल पहाड़िया के बीच एक खास नातेदारी समूह के व्यक्तियों के लिए एक ही प्रकार के संबोधन का प्रयोग होता है। पिता के लिए अबा और माता के लिए अइया शब्द का प्रयोग होता है। उसी प्रकार दादा के लिए बड़अब्बा और नानी के लिए बड़अइया इस्तेमाल होता है। पिता के बड़े भाई और उनकी पत्नी तथा माता के बड़े भाई और उनकी पत्नी के समान संबोधन क्रमशः पीपो और पेनि है। चाचा के लड़के लड़कियां तथा मामा के लड़के लड़कियों के लिए समान संबोधन का प्रयोग होता है, बड़े को बाचा और छोटे को नुना तथा बड़ी को बाई और छोटी को नूनी कहते हैं। फूवा के लड़के लड़कियों के लिए भी इन्हीं शब्दों का प्रयोग होता है। फिर से सौतेली माँ के लिए, पिता के छोटी बहन के लिए, माँ की छोटी बहन के लिए और छोटी चाची के लिए एक ही शब्द काली या अली प्रयोग होता है। इस प्रकार माल पहाड़िया के बीच वर्गात्मक संबंध सूचक संज्ञाएँ पाई जाती हैं। माल पहाड़िया बीच परिवार प्राथमिक और मूल भूत सामाजिक इकाई है। सौरिया पहाड़िया की तरह माल पहाड़िया परिवार प्राय: एकल परिवार होता है जिसमें पुरूष, उसके स्त्री तथा उसकी बच्चे होते है। विशेष स्थितियों में सौतेले बच्चे या गोद ली हुई संतान भी पाई जाती है। गोत्र की अनूपस्थिति के कारण निकट संबंध पर आधिक ध्यान दिया जाता है। किन्तु यह तीन पीढ़ी तक ही महत्वपूर्ण माना जाता है। वैवाहिक संबंध द्वारा दो परिवार के सभी रक्त संबंधी एक सूत्र में बंध जाते हैं। जिनके फलस्वरूप दोनों पक्षों की एक सम्मिलित नातेदारी स्थापित हो जाती है जो विभिन्न सन्दर्भों में भिन्न भिन्न रूप में प्रकट होते हैं। कुछ संबंधियों के बीच में परिहार संबंध पाया जाता है, जैसे भैंसुर, ज्येष्ठ सास, को देखना या उनको छूना वर्जित है। सास श्वसुर के प्रति भी परिहार संबंध पाया जाता है। माल पहाड़िया के परिवार पितृसत्तात्म्क होता है। पिता घर का मुख्य होता है और धन संपति का उतराधिकार पुरूष वर्ग में ही चलता है अर्थात पिता के बाद संपति के अधिकारी पुत्र ही है। संपति में लकड़ियों को हिस्सा नहीं मिलता है। केवल उनके परिवरिश होती है। विधवा को भी संपति में हिस्सा नहीं दिया जाता है किन्तु भरण पोषण की व्यवस्था की जाती है। पिता की मृत्यु के बाद अंचल संपति के द्वारा पुत्रों के बीच बराबर होता है किन्तु कुछ क्षेत्रो में बड़े लकड़े को कुछ अधिक दिया जाता है। पुश्तैनी मकान बड़े लड़के को मिलता है जिसके साथ माँ भी रहती है। यदि माल पहाड़िया को पुत्र न हो तो उसकी जमीन की अधिकारिनी उसकी लड़की होती है। यदि वह अपने पति के साथ उसी गाँव में रहती है। अन्यथा वह संपति किसी पुरूष नातेदारी को मिल जाता है। किसी नातेदार की अनुपस्थिति में ऐसी संपति गाँव की जरूरत मंद आदमी को इस जमीन की बंदोबस्ती भी कर देता है। विवाह माल पहाड़िया की जीवन में जन्म – विवाह और मृत्यु विशेष और महत्वपूर्ण अवसर माने जाते हैं। विवाह एक आवश्यक संस्था है और जब लड़के विवाह योग्य हो जाते हैं तो लड़का का पिता कन्या ढूँढता है अपने पुत्र के विवाह के लिए कन्या खोजने में वह एक बिचौलिया का सहायता लेता है जिसे सिद्धूदार कहते हैं। माल पहाड़िया के बीच कई तरह के विवाह प्रचलित हैं, जैसे – कन्या मूल्य देकर विवाह बल पूर्वक विवाह या प्रेम विवाह गोलट विवाह सेवा विवाह दत्तक विवाह सबसे अधिक प्रचलित और लोकप्रिय विवाह कन्या मोल देकर करने की है। इस विवाह में लड़के के पक्ष से बात चलायी जाती है। इसमें सिद्धू की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। लड़की पसंद होने पर उसको उपहारस्वरूप कुछ रूपये और माला (हार) दिया जाता है यदि लड़की इसे स्वीकार कर लेती है तो विवाह तय समझा जाता है। सिद्धू का उचित स्वागत होता है। बाद में कन्या मूल्य तय की जाती है। कन्या मूल्य को माल पहाड़िया पौन टका या बंदी कहते है कन्या मूल्य और नगद समान रूप में लिया जाता है। कन्या मूल्य तय होने पर विवाह की तारीख निर्धारित की जाती है। विवाह के अवसर पर विशेष रूप से दोनों पक्षों के द्वारा शराब तैयार की जाती है। जिसे ये अपनी भाषा में पचोई या मांड कहते हैं। कन्या मूल्य स्थान स्थान पर भिन्न होता है। कन्या मूल्य में रूपये के अतिरिक्त लड़की के लिए उसकी माता और भाई के लिए कपड़ा, चावल, दाल, तेल, मसाला, तंबाकू तथा एक सुअर भी दिया जाता है। किन्तु कपड़ा और नगद लड़के के पिता के द्वारा विवाह के दिन दिया जाता है। माल पहाड़िया और सौरिया पहाड़िया में लड़के के द्वारा एक चटाई भी दी जाती है। जिसका प्रयोग विवाह संस्कार के लिए होता है। विवाह के दिन लड़का अपने स्वजनों के साथ लड़की के गाँव जाता है। इस यात्रा में नाच – गान, ढोल - नगाड़े भी बजते जाते हैं। कन्या पक्ष वाले बारात का स्वागत करते हैं तथा उन्हें प्रीतिभोज दिया जाता है। लड़का – लड़की दोनों चटाई पर बैठते हैं और लड़का तीन बार लड़की के मांग में सिंदूर लगाता है। और कुछ पैसा उपहार के रूप में देता है। इसके बाद कन्या वहां पर सभी उपस्थित वर पक्ष के लोगों को प्रणाम करती है। इस तरह के कर्मकांड कुमार भाग पहाड़िया में भी विवाह के समय होता है। विवाह के बाद कन्या वर के साथ उसे घर जाती है। जहाँ वर – पक्ष वाले प्रीति - भोज देते हैं। इस अवसर पर नए दम्पति के वैवाहिक जीवन के सफलता के लिए डेहरी एक मुर्गी की बलि चढ़ाता है। सिद्धू को कुछ कपड़ा, कुछ नगद पैसा और एक बर्तन में चावल की शराब उसके पारिश्रमिक के रूप में दिया जाता है। दुसरे प्रकार का विवाह बलपूर्वक या प्रेम विवाह है। इस प्रकार के विवाह में प्रेमी – प्रेमिका से किसी विवाह या भोज के अवसर पर मिलता है और उसे लेकर अपने गाँव भाग जाता है। इस तरह के विवाह माल पहाड़िया के कुछ क्षेत्र में देखने को मिलते हैं। ये दंपति पति – पत्नी की तरह तब तक रहते हैं जब कन्या के पिता कन्या मूल्य के मांग करने लड़का के पास नहीं पहुँच जाते, कन्या मूल्य दिया जाता है और उनको खिलाया – पिलाया जाता है फिर वे अपने घर वापस लौट जाते हैं। तीसरे प्रकार का विवाह गोलट है यह विवाह बहुत साधारण होता है। इसमें दोनों पक्ष के लड़के – लड़कियों को अदला – बदली होता है। कोई कन्या मूल्य नहीं दिया जाता। इस तरह का विवाह माल पहाड़िया में बहुत कम पाए जाते हैं। इस प्रकार का विवाह सौरिया पहाड़िया के बीच भी पाया जाता है। सेवा विवाह मुख्यत: कन्या मूल्य ने देने के विवशता के कारण होता है। जब कोई कन्या मूल्य का प्रबंध नहीं कर पाता तो वह अपने होने वाले श्वसुर के घर में तब तक काम करता है जब तक अपनी सेवा से कन्या मूल्य देने लायक नहीं कमा लेता है। जब व्यक्ति को संतान के रूप में पुत्र नहीं होता है, जो उसके संपति का उत्तराधिकारी बन सके तब वह अपनी लड़की के लिए किसी लड़के को दत्तक के रूप में अपना लेता है। ऐसे विवाह को दत्तक विवाह या घर जमाई विवाह कहते हैं क्योंकि विवाह के बाद पति पत्नी के ही घर में रहता है और अपने श्वसुर के कामकाज में सहायता करता है। अपने परिजनों से अलग होकर श्वसुर के साथ रहने के कारण उसे वर मूल्य दिया जाता है। इस तरह के विवाह माल पहाड़िया में पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त भी माल पहाड़िया समाज में दो प्रकार के विवाह और भी मिलते हैं – देवर – भौजाई विवाह और जीजा - साली विवाह। देवर भौजाई विवाह में बड़े भाई के मरने के बाद उसके पत्नी से छोटा भाई विवाह कर लेता है जिसके लिए कोई कन्या मूल्य नहीं देना पड़ता है। जीजा - साली विवाह में अपनी पत्नी की छोटी बहन से व्यक्ति शादी करता है और इसमें कन्या मूल्य कम देना पड़ता है। माल पहाड़िया के बीच तालाक की व्यवस्था है किन्तु सौरिया पहाड़िया की तरह बहुत प्रचलित नहीं है। तलाक प्राय: विचारों की भिन्नता, स्त्री के बाँझपन, पत्नी की अविश्वानियता या उसकी आलसी प्रकृति के आधार पर होता है। आलसीपना के आधार पर तलाक विरले ही होता है तलाक देने की प्रक्रिया बड़ी सरल है जब दंपति तलाके के लिए निश्चिय कर लेते हैं, गाँव के पंचयत को सूचित कर दिया जाता है। पंचायत में भैयाद के लोग जमा होते हैं और दोनों के पक्षों की बातों को सुनते हैं। फिर तलाक की स्वीकृति दे देतें है। इसका तरीका यह है कि दंपति अपने हाथ में सखुआ पत्ता लेते हैं और उनको दो टूकड़ों में फाड़ देते हैं जो उनके अलगाव का प्रतिक होता है। क्योंकि फटे पत्ते फिर से जुड़ नहीं सकते। यदि तलाक का प्रस्ताव पति की ओर से होता है तो विवाह के समय दिए हुए कन्या मूल्य की वापसी का अधिकार खो देता है। पत्नी को या कन्यापक्ष को कन्या मूल्य लौटाने का दायित्व नहीं रहता है। किन्तु जब तलाक के लिए पत्नी पहल करती है तो उसे कन्या मूल्य वापस करना पड़ता है। जब विवाह के बाद कोई बच्चा हो जाता है तो साधारणतया पत्नी को तलाक की स्थिति में कन्या मूल्य नहीं लौटाना पड़ता। माल पहाड़िया में विधवा विवाह का भी प्रचलन है। प्राय: विधवा को दुसरे के साथ विवाह करने की सामाजिक स्वीकृति भोज के बाद ही मिलती है। अगर मृत पति का कोई छोटा भाई है और विवाह करने का इच्छुक है तो ऐसी शादी हो सकती है। अन्यथा वह अपने पिता के घर वापस लौट सकती है और अपनी इच्छानुसार कहीं भी शादी का सकती है। विधवा को कुछ मूल्य कम मिलता है और एक बार से अधिक विधवा हो जाने पर कन्या मूल्य घटता जाता है। माल पहाड़िया के जीवन में जन्म का अवसर भी महत्वपूर्ण है। बच्चे के जन्म के पहले से ही गर्भवती स्त्री पर काफी ध्यान दिया जाता है। गर्भवती स्त्रियों को जंगल में या झरना या सोता के पास जाना मना रहता है। उनका ऐसा विश्वास है कि इन स्थानों पर प्रेतात्मा छिपी रहती है जो गर्भवती स्त्री पर आक्रमण कर सकती है। और बच्चे को मार सकती है। ऐसे में माल पहाड़िया स्त्रियाँ बच्चे को जन्म देने के पूर्व तक अपना सारा काम - काज करती रहती है। सौरिया महिलाएं भी इसी प्रकार बच्चे के जन्म के पहले तक अपने दैनिक कामों में लगी रहती हैं। प्रसव के समय स्त्री की सास, उसकी माँ या कोई बूढ़ी औरत देखभाल करती है। बच्चे के नाल काटने के लिए बांस के चाकू का प्रयोग किया जाता है। प्रसूति के दरवाजे के पास आग भी जलाया जाता है। इस अवसर पर पांच दिनों के लिए छूत माना जाता है और इस छूत की अवधि में पति या और भी लोग उसे नहीं छूते हैं और न उसके हाथ से किसी तरह का खाने – पीने का चीज लेते हैं। इस समय में पति स्वयं अपना भोजन बनाता है और पत्नी को भी भोजन देता है बनाकर। पांच दिनों तक छूत मानने का रिवाज दुमका दामिन के माल पहाड़ियों के बीच है, किन्तु इस क्षेत्र में बारह पांच से लेकर नौ दिनों तक छूत माना जाता है। इस तरह की प्रथा सौरिया और कुमार भाग में भी पाया जाता है। छूत की अवधि खत्म होने पर नयी माँ स्नान करती है और सब कपड़ों को धोती है। इसी प्रकार पति भी वस्त्र को धोता है और स्नान करता है। छोटे बच्चे का मुंडन उसके पिता या उसके मामा के द्वारा किया जाता था किन्तु अब यह काम नाई करता है स्नान आदि के बाद स्त्री घर पर प्रवेश करती है और नए बर्तनों में परिवार के लिए भोजन पकाती है। पूरा भी साफ कर दिया है और छूत परिवार के लिए समाप्त होता है। किन्तु गाँव के लिए यह छूत एक या दो महीने के लिए बना रहता है, जब वह व्यक्ति पूरे गाँव के लिए पूरे गाँव को भोज देता है। भोज में एक बकरा, एक दो मुर्गी, चावल और शराब जरूरी है। बिना इस भोज को दिए नवजात शिशु का पिता गाँव के किसी समारोह या पूजा में शरीक नहीं हो सकता है। शुद्धता - संस्कार के बाद माल पहाड़िया बच्चे का नामकरण करते हैं। इसके लिए कोई विशेष प्रक्रिया नहीं अपनायी जाती है। बच्चे के मुंडन के बाद बच्चे के कान में बच्चे के पिता या माता के द्वारा उसका नाम धीरे से कह दिया जाता है। बच्चों का नामकरण प्राय: दादा – दादी के नाम पर होता है। इसके अलावे भी बच्चे को एक नाम दिया जाता है। जो पुकारू नाम होता है। ऐसा विश्वास है की असली या सही नाम को जान लेने के बाद दुष्ट आत्माएं माँ बच्चे को अहित का सकती है। इसलिए रक्षा के लिए एक पुकारू नाम भी दिया जाता है। मृत्यु उपरांत रीति विधि मृत्यु माल पहाड़िया के लिए विशेष अर्थ रखता है। वे ऐस मानते हैं कि मृत व्यक्ति मरने के बाद भी परिवार के साथ रहता है इसीलिए अपने घर में मृत पूर्वजों को चूल्हा के पास विशेष स्थान दिया जाता है। उसकी पूजा की भी जाती है और बलि चढ़ायी जाती है। मृत्यु के बाद शव को खाद पर रखकर श्मशान तक ले जाया जाता है। एक गड्ढे में पेड़ों की टहनियों और पत्तों को बिछाकर लाश रख दी जाती है और फिर ऊपर से पत्तियों और डालियों से लाश को ढंक दिया जाता है। तब ऊपर से मिट्टी डाल दी जाती है। कब्र में मृतक के कपड़े लत्ते, बिछावन तथा उसके द्वारा उपयोग किए गये बर्त्तन आदि भी रख दिए जाते हैं। कब्र के ऊपर एक बड़ा पत्थर रख दिया जाता है और उसके ऊपर टूटी हालत में चारपाई रख दी जाती है। मृत आत्मा की शांति के लिए चावल, मांस या एक - दो अंडे भी दिया जाता है कुछ भागों में माल पहाड़िया लाश को जलाते हैं। लाश का सर उत्तर की तरफ रहता है और सबसे पहले अग्नि सिर की ओर दी जाती है। जलती चिता पर एक या दो अंडे फेंक दिए जाते हैं और नीचे जमीन पर मृतक के नाम पर भात और मुर्गी का मांस रख दिया जाते है। इस दिनों के बाद मृत्यु संस्कार किया जाता है। जब लोग हजामत कराते हैं और भात मुर्गी का मांस मृतक के नाम में चढ़ाया जाता है। दुमका अनुमंडल में कब्र के ऊपर आदमी का पुतला जलाया जाता है। यह कर्मकांड मृत्यु संस्कार के अभिन्न अंग माना जाता है। इसके बाद गाँव के लोगों और रिश्तेदार को भोज दिया जाता है। इस अवसर पर नाच - गान भी होता है। एक वर्ष के बाद फिर बड़ा भोज दिया जाता है जिसमें कई बकरे, मुर्गे, सुअरें काटे जाते हैं। नाच – गान होता है और काफी मात्रा में पचोई (शराब) पिया जाता है। नाच गान कई दिनों तक चलता है। इस अवसर पर सभी तरह छूत और स्वच्छंदता देखने को मिलती है। ऐसे ही मौके पर लड़के – लड़कियों खुल्लम – खुला नाच – गान करते हैं और भाग भी जाते हैं और विवाह भी कर लेते हैं। इस प्रकार अपने अभिभावकों को कन्या मूल्य देने से बचा लेते हैं। अर्थव्यवस्था पहाड़ और जंगलों में रहने वाले माल पहाड़िया के जीविकापार्जन के मुख्य साधन शिकार, खाद्य संग्रह और स्थानान्तरण खेती है। इसके अतिरिक्त वनोपज की बिक्री द्वारा भी कुछ कमाई कर लेते हैं। वनोपजा में मुख्यत: जलावन, बांस, पत्ती कंदमूल अधि हैं जिन्हें हाट बाजार में बेच कर आय प्राप्त करते हैं फिर भी इस जनजाति की जीविका की मुख्य साधन कुरवा खेती है। पहाड़ में बाड़ी भूमि को हल – बैल से जोतते हैं। इस भूमि में बाजरा, अरहर और मकई उपजाते हैं कुरवा खेत बाड़ी मेहनत और लगन से ये तैयार करते हैं। पहाड़ की ढाल पर जंगल के एक भू – भाग का चुनाव पौष महीने (दिसम्बर – जनवरी) में करते हैं। डोली या दाव से पेड़ों को काट देते हैं पेड़ काटते समय जमीन से तीन – चार फीट खूँटी छोड़ देते हैं और छोटी छोटी झाड़ियों को सुखने के लिए छोड़ देते हैं। चैत (फरवरी मार्च) के महीने में उसमें आग लगा देते हैं और छोटी – छोटी झाड़ियों राख को जमीन पर बिछा देते हैं। फिर छह से दस इंच को दूरी पर खनती (जोगोरी) छेद कर देते हैं। खनती, लकड़ी, या लोगे का बना हुआ होता है जिसे जोगोरी कहते हैं इस भूमि में तीसरे साल जमीन अनुपजाऊ हो जाती है इसलिए माल पहाड़िया जंगल के नए खंड के खोज करते हैं और वहां खेती शुरू कर देते हैं। इस प्रकार माल पहाड़िया जंगल के एक टुकड़े को पेड़ उगने के लिए छोड़ देते हैं और दुसरे टुकड़े पर खेती करते हैं। कुरुवा खेत में अच्छी उपज हो जाती है। और दुमका दामिन में तो खूब अच्छी फसल उगाई जाती है। किन्तु, इसके लिए जंगली जमीन के बड़े भूभाग की जरूरत होती है। माल पहाड़िया की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। ये कर्ज में डूबे रहते हैं और इनकी माली हालत दयनीय रहती है। ये महाजन से कर्ज लेते हैं जिसके लिए भारी सूद देना पड़ता है कर्ज के कारण ही इनकी आर्थिक स्थिति बिगडती चली जाती है। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने पहाड़िया की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए विशेष कल्याण योजना चलायी हैं। उनके पुर्नवास के लिए भी योजना चलायी जा रही है जिसका मुख्य उद्देश्य उनको मैदानों में बसाने और खेती के योग्य भूमि देना तथा सहायता देकर एक नए जीवन की शुरूआत करना है। यहाँ पर यह भी उल्लेखनीय है कि कुछ माल पहाड़िया मजदूरी तथा नौकरी करके भी जीविका कमाने लगे हैं। कुछ लघु कुटीर उद्योग द्वारा भी कम लेते हैं। ये चटाई, खटिया- मचिया आदि बनाकर हाट – बाजार में बेचते हैं। जिससे थोड़ी आमदनी हो जाती है। जमीन का मालिक पिता होता है। किन्तु खेती करने के लिए लड़कों में बाँट देता है। लड़के पति के साथ खेती करते हैं या स्वतंत्र रूप से खेती कर अपना जीविकापार्जन करते हैं। किन्तु, भूमि पर उनका अधिकार पिता के मृत्यु के बाद होती है। माल पहाड़िया थोड़ा शिकार करते हैं और मछली भी पकड़ते हैं। देशी – शराब भी बनाते हैं। शराब की बिक्री भी घर या हाट में करते हैं। हाट जनजातीय जीवन में विशेष भूमिका अदा करता है। सप्ताह में एक बार या दो बार विभिन्न स्थानों पर हाट लगता है। साप्ताहिक हाट में माल पहाड़िया विशेषकर माल पहाड़िया औरतें जाती हैं और खरीद – बिक्री करती हैं। कुछ गांवों में माल पहाड़िया टिकर कोयला ( लड़की कोयला) तैयार करते हैं और बाजार में बेचते हैं। इनके क्षेत्र में रामपुर के हाट में कोयले की खूब बिक्री होती है। कंदमूल संग्रह करते हैं किन्तु उसका प्रयोग अपने खाने के लिए ही करते हैं। रोजी – रोटी की खोज में माल पहाड़िया पश्चिम बंगाल तक चले जाते हैं जहाँ किसी तरह की मजदूरी करके कुछ कमा लेते हैं और फिर अपने घर वापस आ जाते हैं इनके आर्थिक जीवन में पशुधन का भी महत्व है। पशुओं का एक संस्कृतिक पहलू भी है। ये गाय, बैल, बकरी, सुअर और मुर्गी भी पालते हैं। सुअर का विशेष सांस्कृतिक महत्व है। सुअर को कन्या मूल्य में दिया जाता है। उनका मांस भी खाते हैं और जरूरत पड़ने और सुअर का मांस हाट में बेचते भी हैं। सुअर इनकी आर्थिक और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतिक माना जाता है। मुर्गी के अण्डों की बिक्री होती है और खाया भी जाता है। देवताओं पर बलि में भी मुर्गे और अण्डों का प्रयोग होता है। माल पहाड़िया कुत्ता भी पालते हैं जिससे रखवाली का काम लिया जाता है। माल पहाड़िया की आर्थिक स्थिति इनके घरों और घरेलू सामानों से भी झलकती है। इनके घर प्राय: झोंपड़ीनुमा होते हैं जिनकी दीवारें घास की टट्टियों और लकड़ी से बनी होती हैं। छप्पर भी घास- फूस से बनी रहती है। इसके लिए कासी, धो, कुसुम्ब, सिन्दूआर, फूरो तथा सखुआ और पनककट्ठा, की लकड़ी का प्रयोग करते हैं। माल पहाड़िया का घर 8 -9 फीट लंबा, 6-7 फीट चौड़ा तथा 7-9 फीट ऊँचा होता है। बांस की खपची और लकड़ी की कूंडे की सहायता से दिवार खड़ी की जाती है जिसे मिट्टी से लीप दिया जाता है। घर में खिड़कियाँ नहीं होती। टाटी लगा दरवाजा होता है। इनके बरामदे बांस की फट्टी से घिरे रहते हैं। इनकी झोंपड़ी से इनकी गरीबी प्रकट होती है। इनके घर में भी अधिक उत्पादन या उपस्कर या उपस्कर नहीं होते। कुछ मिट्टी के बर्त्तन या पीतल – अल्युमिनियम के बर्त्तन पाए जाते हैं। इनके घरों में ओखल जरूर होता है। झाड़ू, सूप, टोकरी, खनता प्राय: सभी घरों में मिलता है। सोने केलिए साधारण खटिया और खजूर की चटाई इनके घरों में पायी जाती है। शिकार करने के लिए तीर – धनुष आदि तथा मछली पकड़ने के लिए चटो या कुम्बनी टाटा छोटा जाल इनके घरों पाया जाता है। माल पहाड़िया औरतें नहाने धोने के लिए मिट्टी का प्रयोग करती हैं जो इनकी गरीबी का कहानी दुहराता है। माथा धोने के लिए भी मिट्टी का प्रयोग होता है। अब साबुन का प्रयोग भी पढ़े लिखें या नौकरी करने वाले माल पहाड़िया करने लगे हैं। अपने रोगों का इलाज भी गरीबी के कारण जड़ी – बूटियों से कर लेते हैं। अंग्रेजी दवा का प्रयोग या डॉक्टर की सहायता सेवा इनके आर्थिक सामर्थ्य के बाहर है। माल पहाड़िया के आर्थिक जीवन में क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था की भी एक भूमिका है। इनके पड़ोसी संथाल तथा अन्य लोग हैं। जिनके खेतों में ये मजदूरी भी करते हैं। इनके आस – पास जंगली पाए जाते हैं जिससे अनके प्रकार की वस्तुएं प्राप्त होती हैं जिनसे आर्थिक लाभ मिलता है। इनके निवास स्थल से दूर या निकट के क्षेत्र में साप्ताहिक हाट लगते हैं। जो इनके आर्थिक और समाजिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। हाटों में खरीद – बिक्री के अलावे अपने लोगों से मिलना – जुलना, विचार – विमर्श करना तथा शादी – विवाह की बात भी तय करना इनके लिए आम और जरूरी बात है। ऊपर कहा जा चुका है की माल पहाड़िया के घरेलू उत्पादन जैसे मिट्टी के घड़े, बर्तन, कृषि औजार तथा संगीत यंत्र जैसे – मंदर, बांसुरी, ढोलक इत्यादि उसके कमजोर आर्थिक पक्ष को उजागर करते हैं, उसी तरह वेशभूषा तथा इनकी स्त्रियों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले आभूषण जो बहुत सस्ते और साधारण होते हैं जो इनके आर्थिक दुर्बलता को ही प्रदर्शित करते हैं, माल पहाड़िया महिलाओं द्वारा प्रयोग में लाये जानेवाला मुख्य आभूषण टाढ़, बाजु, लोलक, करला, फूली पाजेब, हंसुली, खील, पुटकी आदि हैं। ये आभूषण बाजार से ख़रीदे जाते हैं और सस्ते किस्म के होते हैं। माल पहाड़िया पुरूष भी कुछ आभूषण का प्रयोग करते हैं। सिंगार के लिए फूल – पत्ती का भी प्रयोग करते हैं। इनके वस्त्र भी साधारण होते हैं। पुरूष धोती, अंगरखा और गमछा का प्रयोग करते हैं। बाजार से अब कमीज खरीद कर भी पहनते हैं। चादर का भी प्रयोग होता है। उत्सव और समारोह के अवसर पर या नृत्य के समय मोर का पंख का भी प्रयोग करते है। छोटे बच्चे केवल लंगोटी पहनते हैं। औरतें साड़ी पहनती हैं। ऊपरी भाग को छिपाने के लिए एक वस्त्र अंगरखा पहनती हैं। सचमुच माल पहाड़िया पुरूष स्त्री दोनों बहुत साधारण और कम वस्त्र का प्रयोग करते हैं। इनके बीच गोदना बहुत प्रचलित है। इनके रहन – सहन, खान – पान तथा इनके भौतिक संस्कृति से बिल्कुल स्पष्ट होता है। कि वे प्राय: नितांत गरीब होते हैं। इनका भोजन भी इनकी गरीबी की ओर संकेत करता है। इनका मुख्य भोजन मकई, बरबटी और बाजरा है। महुआ, इमली, केंद, कटहल आदि भी इनके भोजन के अंतर्गत आते हैं। ये पक्षी, खरहा आदि भी खाते हैं। सुअर और बकरे का मांस, मुर्गी का मांस कभी – कभी खाते हैं। जंगली फल फूल विशेषकर बेर – महुआ इनके भोजन का महत्वपूर्ण अंश होता है। महुआ और खजूर से शराब भी बनाकर पीते है और बेचते भी हैं। धर्म जिस परिवेश में माल पहाड़िया निवास करते हैं और सदियों से निवास करते आये हैं, उस वातावरण में जो जगलों से आच्छादित और पहाड़ों से घिरा है उनके लिए भूत या प्रेतात्मा की कल्पना बिल्कुल स्वाभाविक है। उनका विचार और विश्वास है की उनका सारा परिवेश ऐसी प्रेतात्माओं से भरा हुआ है जो मनुष्य के शक्ति और सामर्थ्य से परे है। जीवन से मृत्यु तक इन प्रेतात्माओं को प्रसन्न रखने के लिए वे तात्पर्य रहते हैं। एक बात यहाँ उल्लेखनीय यह है कि भोजन के लिए या जीविका के लिए मनुष्य प्रकृति - वातावरण – मनुष्य और प्रकृति में एक निरंतर संघर्ष चला आ रहा है। मनुष्य के जीवन के क्रियाकलापों के पीछे भोजन का खोज मुख्य उद्देश्य रहा है। भोजन का साधन फसल और शिकार है और दोनों में सफलता और प्रचुरता के लिए इन प्रेतात्माओं का सहयोग आवश्यक है। इसलिए अच्छी खेती, अच्छी उपज और काफी मात्रा में शिकार की प्राप्ति के लिए इनकी प्रार्थना और पूजा करना इनका आवश्यक धार्मिक अंग बन चुका है। इनका विश्वास है कि इनके परिवेश से चारों ओर ऐसी प्रेतात्मा निवास करती है और इनके सारी क्रियाकलापों को नियंत्रित करने की शक्ति रखती हैं। उनके प्रसन्नता से ही इनको सफलता मिल सकती है, विभिन्न तरह के लाभ हो सकते है और इनके नराजगी से असफलता मिल सकती है, अनेक हानियाँ हो सकती है तथा ये रोग और मृत्यु के शिकार हो सकते हैं। इनकी धारणा है कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं हैं। बल्कि मृत्यु के बाद भी जीवन है। इस प्रकार इनका पुनर्जन्म में विश्वास है। इसलिए इनकी आस्था है कि इनके पूर्वज जो मर चुके हैं, जरूरत के क्षणों में इनकी सहायता कर सकते हैं। इसलिए हर अवसर पर अपने पूर्वजों को याद करते हैं और कुल देवता या पूर्वजों की पूजा करते हैं। पूर्वज पूजा इनके धर्म का केंद्र बिन्दु हैं। लगभग सभी अवसरों पर जैसे - जन्म, विवाह और मृत्यु तथा फसल बोने और काटने के समय भी अनेक देवी - देवता, प्रेतात्मा के साथ पूर्वज पूजा करते हैं और बलि चढ़ाते हैं। माल पहाड़िया का सबसे बड़ा देवता धरती ग्रामीण गोसाई है जो एक पेड़ के नीचे एक पत्थर के रूप में होते हैं। इनको बसुमति गोसाई या बेरू गोसाई भी कहते हैं। ये देवता वस्तुत: सूर्य होता है जिसे मुंडा या उराँव के बीच सिंगबोंगा कहते हैं। दुमका दामिन क्षेत्र के बाहर काली की पूजा अधिक प्रचलित है पाकुड़ का दामिन क्षेत्र और गोड्डा में कई तरह की पूजा होती है। जिनमें बीची एराई, गंगी, एराई, घाघरा पूजा या ओसरी एराई इत्यादि मुख्य हैं। बीची एराई जेठ के महीने में कुरवा खेती में बीज डालने के समय में की जाती है। इसमें एक अंडे की बलि चढ़ाई जाती है। यह व्यक्तिगत पूजा है। गंगी पूजा भादो में होती है। इस पूजा के लिए प्रत्येक शराब, माड़ या ताड़ी चूवाई जाती है। सबसे पहले गाँव का डेहरी या नादो कुरिया या जोहार थान में पूजा करते हैं और एक अंडा, एक चेंगना (काला), अरवा चावल और सिंदूर चढ़ाता है। इसके बाद ग्रामीण गूमो गोसाई की पूजा करते हैं। डेहरी को पचोई या माड़ी दिया जाता है। इसके बाद ही गंगी को खाने के लिए प्रयोग किया जाता है। घघरा पूजा अघन महीने में होती है पूजा से एक दिन पहले जोहार थान में एक कांदो (लकड़ी का मचिया) रख दिया जाता है, उसको ठीक से साफ कर दिया जाता है और वहां डेहरी के पत्नी जिसे कोतवारी कहा जाता है, भात पकाती है। वह अपने को पूजा के दिन स्वच्छ और पवित्र रखती है और जमीन पर सोती है। पूजा के दिन डेहरी और कोतवार के साथ ग्रामीण माड़ी का एक बर्तन, एक सुअर, एक बकरा, दो मुर्गी और चार अंडा लेकर आते हैं और इसकी बलि चढ़ाई जाती है। सुअर और बकरे की बलि दो अलग - अलग हथियार से डेहरी खुद करता है और मुर्गी की बलि भी वही करता है। जब सुअर काटा जाता है तो दो अंडे और बकरे की बलि दी जाती है तो फिर दो अंडे को चढ़ाया जाता है। इसी कांदो पर कांदो गोसाई निवास करते हैं। कांदो गोसाई को दो मिट्टी के प्याले में भात से भरकर नए सूप में रखकर चढ़ाया जाता है। बलि दिये गये पशु और पक्षी को पकाया जाता और ग्रामीणों में बांटा जाता है। बकरे का अगला पैर डेहरी को दिया जाता है। उसे वह अपने घर में पकाता है और ग्रामीणों के साथ खाता है। गाँव के लोग अपने साथ डेहरी के घर माड़ी लेकर जाते है। अगले दिन ग्रामीण व्यक्तिगत रूप से नाद गुमो की पूजा करते हैं। एक चेंगना की बलि देते हैं। शिवतकरेनी और गौहाल के पास शिवतककरनी को एक अंडे की बलि देते हैं इसके बाद ही वे घाघरा को खाते हैं। माघी पूजा माल पहाड़िया का सबसे महत्वपूर्ण पूजा है। कुमारभाग पहाड़िया भी इस पूजा को सबसे अधिक महत्व देते हैं। इसे ओंसरी पूजा की तरह सामूहिक रूप से मनाया जाता है। इस पूजा के लिए तीन बकरे और सात अंडे ख़रीदे जाते हैं। एक बकरा चौराहे पर एक तरफ काटा जाता है और दूसरा बकरा दूसरी तरफ काटा जाता है। तीसरे बकरे की बलि जाहेर थान में दिया जाता है। एक साल में डेहरी एक बकरे की बलि जाहेर थान या चूटो कुरिया में चढ़ाता है और दुसरे साल सभी ग्रामीण मिलकर पूजा करते हैं और बलि चढ़ाते हैं। उस दिन कोतवारी प्रत्येक घर से माड़ी लाती है और गाँव के सभी सदस्य उसका उपभोग करते हैं। बाल पशु पकाया जाता है और सभी ग्रामीणों को उसमें हिस्सा मिलता है। इसका अगला पैर डेहरी को दिया जाता है जिससे वह अपने घर में पका कर अन्य लोग के साथ खाता है। सबसे पहले डेहरी को गोड़ाईत दोने में माड़ी देता है। फिर प्रत्येक घर का मुख्य यही काम गोमो गोसाई के आगे अपने घर में करता है। माघी पूजा धरती पूजा है और धरती माई की पूजा का जिक्र डाल्टन ने भी भूईदेली के नाम से किया है। ओ मेली ने भी इसका उल्लेख किया है। तात अरीये (आम पूजा) पूजा जेठ महीने में होता है। यह पूजा भी जाहेरथान में डेहरी द्वारा होती है। इसके लिए एक मुर्गी, सात अंडे, सिंदूर, अरवा चावल और दो तीन पत्ती सहित आम पूजा के काम में लाया जाता है। सामूहिक पूजा समाप्त होने के बाद लोग व्यक्तिगत रूप से अपने घरों में में नादगोमो या गोमो गोसाई के आगे पूजा करते हैं और बलि चढ़ाते हैं। गोमो गोसाई का स्थान चूल्हा के पास होता है। यह पूजा मृत पूर्वजों के नाम पर की जाती है और माल पहाड़िया के बीच ऐस विश्वास है कि पूजा के बिना लोग सूख – शांति से नहीं रह सकते हैं। इन सभी पूजाओं में ग्रामीण के साथ – साथ मंझिए, डेहरी, कोतवारी और गोड़ाईत हर घर में जमा होते है। डेहरी लकड़ी की मचिया (कांदो) पर बीच में बैठते है और गाँव के लोग दूसरी तरफ बैठते हैं। गोड़ाईत माड़ी बांटता है और दरवाजे की चारों और नाचता है। यह काम हर घर में दोहराया जाती है। दुमका अनुमंडल के आम पहाड़िया आषाढ़ में बीजोरोपण के पहले पितृ देव और मोहरभूत की पूजा करते हैं। पितृ देव के लिए सात मुर्गी और दो अंडे तथा मोहरभूत के लिए दो लाल मुर्गी की बलि दी जाती है। माघी पूजा में लगभग सभी देवी देवताओं की पूजा होती हैं। धर्म देव पर एक सुअर और एक बकरा की बलि दी जाती है लेकिन जोकदेव के लिए दो उजले कबूतर और दो अंडे की बलि दी जाती है। जोकदेव गाँव का संरक्षक है। साथ ही वह पहाड़, जंगल और जलाशय का मालिक माना जाता है। वह एक पत्थर के रूप में प्रतिस्थापित रहता है उसे सहायक को दो काला मुर्गा चढ़ाया जाता है और उसका दूसरा सहायक जो जलाशय में रहता है उसको एक काला मुर्गा बलि चढ़ाया जाता है। बी. बी. वर्मा ने माल पहाड़िया के बीच बाघराई और सापराई नाम से दो देवताओं की स्थिति को स्वीकारा है जो बाघ और सांप को नियंत्रित करते है। डेहरी का पद अब वंशानुगत हो गया है। डेहरी के मरने पर बड़ा बेटा उसका स्थान ले लेता है और अगर उसका कोई पुत्र नहीं होता तो नए पुजारी का चुनाव अलौकिक ढंग से किया जाता है उसी तरह कोतवारी का भी चुनाव होता है। इनके धार्मिक अनूष्ठानों को ध्यान से देखने पर स्पष्ट हो जाता है कि पूर्वज पूजा इनके धर्म का केंद्र बिन्दु है। यद्यपि अन्य देवी देवताओं की पूजा करते हैं। पशु, मुर्गी अंडे आदि की बलि देकर उन देवताओं को खुश रखने की कशिश करते हैं। इस प्रकार माल पहाड़िया का जीवन सभी अवसरों पर पूजा और लिए चढ़ाने में लगा हरता है। क्योंकि इनका प्रबल विश्वास है कि इसके बिना वे सूखी और स्वस्थ नहीं रह सकते। राजनितिक संगठन सौरिया पहाड़िया की तरह माल पहाड़िया के बीच राजनैतिक संगठन की इकाई गांव है। जो गांव के स्तर पर उनके समाजिक, धार्मिक और राजनैतिक जीवन को नियंत्रित और संचालित करता है। गाँव का मुख्य मांझी कहलाता है। कई गाँवों को मिलाकर संगठन बनाया जाता है जिसका मुखिया सरदार कहलाता है। पहले सरदार को सरकारी मान्यता प्राप्त थी और उन्हें कुछ भत्ता भी दिया जाता था अब सरदार का परंपरागत पद लुप्त सा हो रहा है और सारा काम खुद सरकार करती है। मांझी गाँव का अभिभावक होता है। उसकी सहायता के लिए प्रमाणिक और गोड़ाईत होते है। वह मांझी के द्वारा दिए गए जिम्मेवारी या काम को करता है और उसकी अनुपस्थिति में ग्रामीण पंचायत की बैठक में काम करता है। पहले मांझी का चुनाव ग्रामीणों के द्वारा होता था किन्तु अब वंशानुगत हो गया है। गोड़ाईत का भी पद वंशानुगत बन गया है। मांझी गाँव से कर वसूलता है और उसमें से कुछ गोड़ाईत को भी देता है। गाँव में पंचायत होती और उस पंचायत में गाँव के सभी वरीय सदस्य (ग्रामीण) रहते है और उसका सभापतित्व मांझी करता है। इसमें गोड़ाईत उसकी मदद करता है। मांझी के राय से गोड़ाईत ही पंचायत की बैठक बुलाता है। वहीँ पंचायत में किसी भी शिकायत या मुकदमे को फैसला के लिए प्रस्तुत करता है। इस परंपरागत पंचायत के निर्णय का उल्लंघन करने के साहस पहले किसी में नहीं होता था किन्तु अब सरकारी पंचायतों के स्थापना के बाद परम्परागत पंचायत कुछ कमजोर पड़ने लगे। फिर भी माल पहाड़िया क्षेत्र या बीच में अधिकांशत: पुरानी पंचायतों को भी सहारा लिया जाता है। पंचायत अपने निर्णय में कई तरह के सजा देती और जुर्माना भी करती है। व्यभिचार और लड़की भागने के जुर्म में बहुत भारी जुर्माना किया जाता है और इस जुर्माने के पैसे को पूजा या ग्राम्य भोज के काम में लाया जाता है। इनके बीच बीटलाहा की प्रथा नहीं है। पंचायत के फैसले को मनाना अनिवार्य हो जाता है, नहीं तो उल्लंघन करने वाले को समाज में कोई स्थान नहीं रह जाता। इसलिए पंचायत के अवहेलना करने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पाता। गाँव के झगड़े और समस्याओं का निपटारा ग्राम पंचायत के स्तर पर मांझी द्वारा किया जाता है। किन्तु अंतग्राम्य झगड़े या विवाद इस पंचायत के क्षेत्र में नहीं आता है। ऐसे विवादों को सरदार के पास भेज दिया जाता है। अब तो माल पहाड़िया क्षेत्र में सरकारी पंचायत काम करने लगी है। किन्तु इन पंचायतों में उनका प्रतिनिधित्व नहीं के बराबर है। इसलिए ग्राम पंचायत या अंतग्रामीण पंचायत जहाँ मुखिया या सरदार उनके बीच का होता है। उनमें उनका ज्यादा विश्वास है। लेकिन जहाँ मुखिया सरपंच दूसरी जाति या वर्ग के हैं उनमें उनकी कोई रुचि नहीं होती है ऐसे पंचायतों को वे अजनबी समझते हैं और उससे भय खाते हैं, वे अकसर ग्राम सेवकों के दुर्व्यवहार और अत्याचार के शिकायत करते रहते हैं। उनके मन में ऐसी धारणा बन गई है कि कर्ज देने वाले सेठ साहूकारों की तरह ये भी उनका शोषण करते हैं। यह सही है कि सरकारों के पंचायत को कुछ लोग सिद्धांतहीन हो सकते हैं किन्तु उन्हीं के कारण माल पहाड़िया कटु अनुभव मिला है। सरकारी पंचायत में पहाड़िया को अधिक प्रतिनिधित्व देकर उनके विश्वास को प्राप्त किया जा सकता है और सरकारी पंचायत को लोकप्रिय बनाया जा सकता है। सामाजिक परिवर्तन परिवर्तन तो प्रत्येक समाज में समय के साथ होता रहता है। जनजातीय समाज में भी बहुत प्राचीन काल से कुछ - न – कुछ परिवर्तन होते रहते है। किन्तु परिवर्तन की गति बहुत धीमी और अस्पष्ट रही है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पूरे देश में एक सामाजिक परिवर्तन की लहर चली है और जनजातीय समुदाय भी इससे अछूता नहीं रहा है। यातायात के विकास, शिक्षा, संचार के प्रसार तथा बाह्य संपर्क के कारण बदलाव तेजी से आये हैं किन्तु माल पहाड़िया का क्षेत्र अभी अनेक सुविधाओं से वंचित है। आवागमन की दुर्लभता बनी हुई जिसके कारण माल पहाड़िया का संपर्क क्षेत्र का बहुत विस्तार नहीं हुआ फिर भी हाट – बाजार में जाने के क्रम में बाहर गैर - आदिवासी व्यापारी के संपर्क आने से उनके रहन – सहन, खान – पान, वेश - भूषा और और सोचने के ढंग में परिवर्तन आया है। बाजार में मिलने वाली बहुत चीजें जो पहले माल पहाड़िया के पहुँच के बाहर थी, आसानी से मिलने लगी है और माल पहाड़िया स्त्रियाँ लहंगा – चोली भी इस्तेमाल करने लगी है। घरेलू उपादान में नए – नए समान आने लगे। मिट्टी के बर्तन के साथ अल्यूमूनियम के बर्तन, चाय की प्यालीयां कुछ माल पहाड़िया परिवार में देखने को मिलते हैं। कन्या मूल्य के संस्थापक स्वरूप में भी कुछ परिवर्तन आया है। वधू मूल्य की राशि काफी बढ़ी है, विवाह के नियम भी शिथिल पढ़ने लगे हैं और पहाड़िया के अन्य वर्गो में भी विवाह संबंध होने लगा है। आर्थिक कमजोरी के कारण दूर दराज काम करने के लिए चले जाने पर विभिन्न अवसरों पर नातेदारी की भूमिका निभाने भी कठिन हो गया है। नातेदारी संबंधों में शिथिलता और औपचारिकता पनपने लगी है। परंपरागत पंचातय की शक्ति क्षीण हो जाने से इनमें उच्चश्रृंखलता और अपराध की प्रवृति बढ़ी है। विभिन भाषी के लोगों के संपर्क में आने के कारण माल पहाड़िया भी बाहरी भाषाओँ को बोलने लगी है। गैर आदिवासी संपर्क के कारण इनके धार्मिक जीवन पर भी प्रभाव पड़ा है। अब वैज्ञानिक और तार्किक प्रवृति में वृद्धि हो रही है जो आधुनिकता के देन है इसके फलस्वरूप जनजातीय जीवन में ऐसे पूजा – उपसना रुचि ली जाने लगी है जिसका संबंध लघु परंपराओं से न होकर वृहत परंपराओं से है। यह तो तथ्य है कि जनजाति समाज, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ा रहा है और उनके संस्कृतिक जीवन में ऐसा बदलाव आता रहा है जो उनकी संस्कृति के अच्छाईयों को दबाता या मिटाता रहा है। आधुनिकता के चक्कर में इनके बीच कुछ ऐसी प्रवृतियाँ बढ़ी हैं जिससे इनके समाज में आर्थिक कठिनाइयाँ गंभीर हुई हैं, मानसिक क्षोभ बढ़ा और राजनैतिक उथल – पुथल हुए हैं। पिछड़ी अवस्था में पायी जाने वाली जनातियों में भी माल पहाड़िया बहुत पिछड़ी जाति हैं। सभी दृष्टियों से पिछड़े होने के कारण ही इन्हें आदिम जनजाति की श्रेणी में रखा गया है। इनकी समस्याएँ और जनजातियों की समस्याओं से अधिक है। जिस क्षेत्र में ये रहते हैं वहां अभी भी आवागमन के साधन बहुत कम हैं इसलिए यातायात की सुविधा सबसे बड़ी समस्या है। इनके बीच पीने योग्य पानी भी नहीं मिलता है। पेय जल की समस्या बहुत बड़ी है। जिसके फलस्वरूप इनके स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ता है। शैक्षणिक संस्थाओं का अभाव इनके बीच फैली अशिक्षा का कारण है साथ ही आर्थिक तंगी के कारण है। साथ ही वर्त्तमान शिक्षा पद्धति में इन्हें किसी प्रकार के धनात्मक सहयोग या लाभ के अभाव भी इसके लिए जिम्मेवार है। इनका पेशा कुरुवा खेती है लेकिन उससे इनका बसर – गुजर नहीं हो सकता है इसलिए ये अनेक कामों में भी लगे रहते हैं। पेट की भूख और गरीबी की चोट इन्हें घर से बहुत दूर भी ले जाती है जहाँ मजदूरी करके कुछ कमाते हैं। जमीन और अपने समाज के प्रति इनका मोह, अपनी रीति – रिवाजों और परंपरा के प्रति इनका आस्था तथा शैक्षणिक और बौद्धिक अपरिपक्वता इन्हें नए ढंग के जीवन जीने के लिए न इन्हें अवसर दे पाता है न साहस दे पाता है। इसी कारण सरकार द्वारा इनके लिए चलायी जा रही योजनाओं में इनकी कोई रुचि नहीं है। सरकार का ध्यान जनजातियों की कल्याण की तरफ है लेकिन कल्याण योजनाओं की कार्यान्वयन पद्धति से अधिक लाभ जनजातियों को, विशेषकर जो अधिक पिछड़े और सीधे – सरल हैं, विशेष लाभ नहीं मिल पाया है। संथाल – पहाड़िया सेवा मंडल भी कल्याण कार्यों में लगी एक संस्था है। लेकिन इसके द्वारा भी माल पहाड़िया को विशेष लाभ नहीं हुआ पहाड़िया जाति की शिक्षा के लिए एक शैक्षिक योजना बनी है जिसके तहत अनेकों विद्यालय, आवासीय विद्यालय, छात्रावास का निर्माण हुआ है और छात्रवृत्ति का निर्माण हुआ है और छात्रवृत्ति का प्रावधान किया गया है। केवल सरकार द्वारा इनकी समस्याओं का निराकरण नहीं हो सकता है। कल्याण योजनाओं की सफलता के लिए जनजातियों का सहयोग और गैर सरकारी संस्थाओं की सहायता जरूरी है। यह सही है कि इनके कल्याण के लिए बहुत कुछ किया गया है। जिससे विकास एवं आधुनिकीकरण के फलस्वरूप इनके खान – पान, वेश – भूषा, रहन – सहन एवं सोचे – विचार में बदलाव आ रहा है। स्त्रोत: कल्याण विभाग, झारखण्ड सरकार