भूमिका झारखंडी समाज की संरचना आदिवासी सदान की संभागिता से हुई है। दोनों की प्रकृति और संस्कृति एक है भाषा भले भिन्न हो। यहां का नाचना, गाना और बजाना आदिम प्रकृति की हैं। सदियों से इनके ये खूबसूरत नृत्य, गीत की परंपरा यथावत चली आ रही है। आधुनिक सभ्यता, शिक्षा, विदेशी प्रभाव व वाह्याडम्बर की विकृतियों के जल प्रलय में ये झारखंड के भूमिपुत्र सदान-आदिवासी, अपने अनुरूप नृत्य-गीत की परंपरा को सुरक्षित व अक्षुण्ण बनाए हुए हैं। आदिवासी-सदान एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों ही कृषि जीवी हैं, प्रकृति के अनुगामी हैं, झारखंड की दो आंखें हैं। एक के बिना दूसरा अधूरा है। सदान समुदाय, समाज संपोषक है। विभिन्न समाजोपयोगी वस्तुओं का निर्माता भी यही है। सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति भी यही करता है। एक अन्न देता है दूसरा वस्त्र। एक जल देता है तो दूसरा पात्र (घड़ा आदि) एक हल देता है तो दूसरा फल। नृत्य गीत का सबसे बड़ा सहयोगी है। वादन यंत्र। इन वाद्य यंत्रों के निर्माता भी प्राय: ये सदान ही है। एक उदाहरण यथेष्ट होगा। मांदर झारखंड का सर्वाधिक लोकप्रिय मधुर वाद्य यंत्र। इसका प्रथम निर्माता खोल बनाने वाला कुम्हार होता है। दूसरा मोची जो, चमड़ा, छाने बांधने के लिए बना देता है। तीसरा है रंगरेज, जो उसे रंग-रोगन कर सुंदर रूप देता है। चौथा है गोड़ाइत महली, नायक (घासी) जो उसको छाने, लेप चढ़ाने या अंतिम रूप देने का काम करता है। तब जाकर मांदर अखरा की शान बनता है। इसके बोल रसिकों को अखरा का दीवाना बना देता है। जैसे वीन की आवाज से नाग खिंचे चले जाते हैं। नाच का सबसे बड़ा साथी मांदर ही होता है। आदिवासी-सदान सहिया बनकर रहते हैं। एक दूसरे के सुख-दुख में संभागी होते हैं। इनका यह सहियारों संबंध इनके नृत्य-संगीत के अखरा में भी दिखाई देता है। तभी तो मुंडा, खड़िया आदि के लोक गीतों में सदानी गीतों का भी भरमार है और सदियों से ये सादरी गीत न केवल अखरा-जतरा, पर्व-त्योहार बल्कि संस्कार जैसे विवाह शादी के अवसर में गीत भी सुने जा सकते हैं।सदानी के माठा, जदुरा आदि में आदिवासी छाप है तो जनजातियों के नाच, गीत व बाजा में सदानी की। सदान समाज के प्रमुख नृत्य सदान समाज के प्रमुख नृत्य है - फगुआ, डमकच, लहसुआ, ठढ़िया, डंइडधरा, लुझरी, उधउवा, रसकिर्रा, पहिल, सांझा, अधरतिया, भिनसरिया, उदासी, पावस, मरदानी, झूमर, जनानी झूमर, बंगला झूमर, अंगनइ, मंडा या भगतिया नृत्य, माठा, जदुरा, सोहराई, रास, पइका, नटुआ, कली घोड़ा नाच, छव नृत्य मइटकोड़न, पइनकाटन आदि। डमकच नृत्य सबसे लोकप्रिय कोमल नृत्य-गीत डमकच को माना जाता है। इसके नृत्य, गीत, रंग, सरस, मधुर, सरल एवं लचकदार होते हैं। वाद्य के ताल नृत्य में उत्तोजना उत्पन्न करते हैं। मूलत: यह स्त्री प्रधान नृत्य गीत हैं। परंतु पुरुष भी इसमें सम्मिलत हो जाते हैं। महिलाएं नृत्य के लिए कतार में हाथ से हाथ जोड़ कर कदमों की कलात्मक चाल से नृत्य करती है। लचकने, झुकने, सीधा होने की नृत्य मुद्र से गायनाहा तथा बजनिया में उत्साह बढ़ जाता है। इसमें महिला नर्तकों के दो दल होते हैं। एक दल गीत उठाता है तब बजाने वाले अपनी साज छोड़ देते हैं। उसके बाद दूसरा दल उन गीतों की लड़ियों को दुहराता है। किसी-किसी इलाके में मात्र महिलाएं डमकच नाचती हैं तो कहीं-पुरुष भी सम्मिलत होकर अर्थात महिलाओं से जुड़ कर नृत्य करते हैं। डमकच प्राय: घर के आंगन में खेला जाता हैं। घर परिवार के लोग मिल कर नृत्य करते हैं। इसमें मांदर, ढोल, ढांक नगाड़ा, शहनाई, बांसुरी, ठेचका, करताल, झांझ आदि बजाए जाते हैं। कहीं-कहीं आंगन के पींडा या कोने से अर्थात् नृत्य मंडली से बाहर बाजे बजाए जाते हैं। राग, लय, ताल तथा कदमों की चाल इनमें बदल जाती है। बजनिया और गायनहा के दो दल हो जाते हैं। डमकच नृत्य गीत रस से सराबोर कर देने वाला नृत्य है। डमकच नृत्य विवाह-शादी तय हो जाने के बाद तथा वर-कन्या के घर-आंगन में रात्रि में होता है। डमकच खेलने वालों के लिए डमकच हंड़िया सदानों के घरों में भी उठाया जाता है तथा खेलने वालों को एक-एक कटोरा डमकच हंड़िया थकान मिटाने के लिए पिलाया जाता है। यह नृत्य देव उठान से प्रारंभ होकर रथ यात्रा की समाप्ति तक चलता है। वेशभूषा सामान्य से कुछ विशेष होती है। जब हल्की रोशनी या चांदनी रात में नृत्य गीत चलता है तो पूरे गांव में मधु घुल जाता है। डमकच के कई भेद हो जाते हैं। जैसे- जशपूरिया, असममिया, झुमटा आदि। जनानी झूमर नृत्य यह महिला प्रधान नृत्य है महिलाएं दलों में एक दूसरे के हाथों में हाथ उलझा कर कदम से मिलाकर कलात्मक पद संचालन करते हुए लास्य-लोच से युक्त कभी झुकती कभी नृत्य की गति को तीव्र करती हैं। गायनाहा (गाने वाले) बजनिया (बजाने वाले) नाचने वालियों के मधय में होते हैं। इन्हें घेर का वृत्ताकार एक से अधिक दल झोंकता (दुहराता) है। तभी नृत्य आरंभ हो जाता है। गति उठाने के समय वाद्य तनिक क्षण के लिए शांत हो जाते हैं। महिलाएं सामान्य श्रृंगार किए रहती हैं। लेकिन कली की तरह नहीं। आगे की महिला करताल लिए रहती हैं। यही नृत्य का नेतृत्व करती है। रागों के बदलने के साथ इनके नृत्य की मुद्राएं कदम बदल जाते हैं। जिनका शेष महिलाएं अनुकरण करती हैं। जनानी झूमर के भी वादक पुरुष ही होते हैं। इस नृत्य में भी कई भेद-उपभेद हैं। इस श्रेणी के नृत्य में अंगनइ प्रमुख है। कली नृत्य इसे नचनी, खेलड़ी नाच भी कहते हैं। इसमें नर्तकी भरपूर श्रृंगार किए रहती है। बालों की केश सज्जा निराली होती है। उस पर मुकुट पहनी रहती है। चेहरे को सौंदर्य प्रसाधनों से लैस कर दी रहती है। बालों में चांदी के आभूषण तथा गजरे, कानों में बालियां या झुमके झूलते रहते हैं। हाथों में रंग-बिरंगी लहंठी, चूड़ी, कंगन, बाला, गले में चंद्रहार और फूलों की माला। छींटदार चमकीली चोली, साड़ी झिलमिलाती हुई होती है। पैरों में आलता तथा घुंघरू बंधे हुए रहते हैं। हाथों में आकर्षक रूमाल हवा में राग, लय लाल, नृत्य के अनुरूप लहराने के लिए पकड़ी रहती है। मुख में पान और सदा विराजमान मुस्कान जान डाल देते हैं। रासलीला की राधिका की भांति नृत्य के केंद्र में सुशोभित रहती है। संख्या एक या अधिक भी रहती है। अखरा के मध्य में काली नृत्य करती है। इसे चारों ओर से झुमराहा, गायनाहा, बजनिया रसिक घेरे रहते हैं। इसमें सामान्य महिला नहीं भाग लेती है। कभी नृत्य में नगाड़े, ढांक, ढोल, मांदर, शहनाई आदि बजते हैं। प्राय: श्रृंगार और भक्तिपरक गीतों में राधा-कृष्ण प्रसंग के गीतों की प्रधानता रहती है। यह नृत्य भी राजे-महाराजे, पुराने जमींदार तथा झुमराहा रसिकों के अखरा, आंगन या बारादरी में होता है। यह नृत्य अन्य क्षेत्र के प्रचलित बाई नृत्य या मुजरा आदि की तरह अशिष्ट नहीं होता। कली नृत्य ऐसे ही नृत्य का शिष्ट झारखंडी (नर्तकी) ही रहती हैं। कली फूल के खिलने की सुंदरता को प्रतिबिम्बित करती है। इसी से इस सौंदर्य भरे नृत्य को कली नाच कहा जाता है। परंतु नर्तक कली का स्पर्श नहीं करते। कली नाच में कोई भी दर्शक सम्मिलत हो सकता है। जबकि दाई के मुजरे में ऐसा नहीं होता। दर्शक मात्र इसमें देख कर आनंद ले सकते हैं। कली नृत्य की तरह सम्मिलत होकर नहीं। कली नाच में दर्शक, वादक, गायक, नर्तक को अलग कर देखा ही नहीं जा सकता। सभी इस नृत्य के सहभागी रहते हैं जो इन्हें अशिष्ट नहीं देते। कली स्वतंत्र रूप में पुरुष समूह में नृत्य करती है परंतु पुरुष स्पर्श नहीं होता न ही उनसे जुड़कर या हाथ पकड़ कर नाचती है। कली नृत्य का समावेश स्वतंत्र रूप के अतिरिक्त फगुआ, मरदानी, झूमर, रास, पइका, घोड़ा नाच, नटुआ नाच में भी होता है। स्रोत व सामग्रीदाता: संवाद, झारखण्ड