परिचय छोटानागपुर को झरनों और चट्टानी नदियों का क्षेत्र कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी। आबादी बढने के साथ ही वनों में वृक्षों कीसघनता भले कम हो गई हो मगर रैयती जमीन पर अब भी हरियाली बरकरार है। इन्हीं प्राकृतिक छटाओं के बीच यह जलप्रपात रांची से करीब 34 किलो मीटर दूर दक्षिण पूर्व में कांची नदी पर स्थित है। यह जलप्रपात करीब 144 फीट की उंचाई से गिरता है। इसमें दस धाराएं हुआ करती थीं। इसलिए इसका नाम दशम पड़ा। दशम फॉल रांची-टाटा मार्ग पर तैमारा गांव के पास है। यह झरना खूबसूरत प्राकृतिक नजारों से घिरा हुआ है। मुण्डारी में पानी को 'दाअ' और स्वच्छ को 'सोअ' कहते हैं। झरने से गिरता हुआ उज्जवल पानी बडा स्वच्छ दिखता है। स्वच्छ पानी का झरना 'दाअसोअ' से 'दासोम' और बाद में 'दशम ' हो गया। जाडे क़ा मौसम पर्यटन के लिए उपयुक्त होता है। इसलिए दशम जल प्रपात मं भी जाडे क़े दिनों में अधिक पर्यटक आते हैं। वैसे यहां रोज कुछ -न- कुछ लोग आते रहते हैं। रविवार या छुट्टियों के दिन पर्यटकों की संख्या अधिक होती है। फरवरी से अप्रैल के बीच का समय दशम फॉल घूमने के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। इसकी प्रसिद्धि दशम घाघ के रूप में भी है। यह झरना खूबसूरत प्राकृतिक नजारों से घिरा हुआ है। इसकी प्रसिद्धि दशम घाघ के रूप में भी है। धीरे-धीरे यहां पर्यटकों के आने की संख्या बढ़ रही है और उन्हें कई तरह की सुविधाएं भी मुहैया कराई जा रही है। क्षेत्र विशेष जानकारी यह क्षेत्र लाह उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है, कहा जाता है कि विश्व की 36 प्रतिशत लाह इस क्षेत्र में उत्पन्न होती है। पलास या बेर अथवा कुसुम के चार पांच वृक्षों पर भी लाह की सफल फसल उगा लेने वाला आदिवासी किसान वर्ष भर के लिए खुशहाल हो जाता है। दस किलोमीटर रास्ते के किनारे और आसपास के गांवों में मुख्य रूप से सिर्फ मुण्डा आदिवासी बसे हुए हैं। करीब 40 प्रतिशत इस आदिम जनजाति के सदस्यों ने धर्म परिवर्तिन कर लिया है। ईसाई होने के बाद इनका नाम भले विदेशी हो गया है, मगर ये बोलते मुण्डारी भाषा ही हैं। बाहरी लोगों से ये सदान (खडी हिंदी का स्थानीय संस्करण) में बोलते हैं, लेकिन सदान बोली सभी मुण्डा नहीं बोल पाते। लाह के अलावा ये लोग मडुआ, बाजरा, सरगुजा आदि की खेती करते हैं। सीढीनुमा खेतों में पौधों की हरियाली देखते ही बनती है। साल, सिद्धा, केंद आदि वृक्षों से घिरे वन के बीचों बीच झरना का नजारा देखने के लिए रास्ते में कुछ-कुछ दूरी पर रेलिंगयुक्त प्लेटफार्म बने हुए हैं। जंगल और पहाडियों के बीच से एक नदी बहती है, जो यहां आकर काफी ऊंचाई से, लगभग 45 मीटर की ऊंचाई से गिर कर आगे बढ ज़ाती है। इतनी ऊंचाई से भी नदी का पानी यदि सीधे गिरता तो उतना आकर्षक नहीं लगता, ऊंचाई से गिरते पानी के रास्ते में बडे-बडे चट्टानों से टकराने के कारण पानी का रंग-ढंग बदल जाता है और मनमोहक झरना बन जाता है। (स्रोत: इंडिया वाटर पोर्टल) सावधानियाँ यहां आने वाले पर्यटकों को सख्त हिदायत दी जाती है कि वह जलप्रपात की धारा में नहाएं नहीं, या नहाते वक्त खास सावधानी बरतें। दशम फॉल में पर्यटकों को विशेष सावधानी की सलाह दी जाती है क्योंकि जलप्रपात वेग से गिरता है वहाँ जाना खतरनाक हो सकता है। हां, फॉल के गिरने के बाद जब वह आगे बढता है तो इसमें स्नान का किया जा सकता है। लेकिन यहां स्नान में बहुत सावधानी की जरूरत है। पानी के वेग से चट्टानों के बीच अनेक खतरनाक गङ्ढे बन गये हैं, जो पानी से ढंके होने के कारण दिखते नहीं हैं और जहां फंसना जानलेवा साबित हो सकता है। दशम फॉल से निकला पानी आगे करीब 50-60 मीटर जाने के बाद समतल नदी का रूप ले लेता है। बीच-बीच में कहीं-कहीं चट्टानों का मिलना असंभव नहीं, क्योंकि पूरा छोटानागपुर ही चट्टान पर बसा है। स्रोत: झारखण्ड का राजकीय वेबसाइट, झारखण्ड सरकार