<div id="MiddleColumn_internal"> <h3 style="text-align: justify;">भूमिका</h3> <p style="text-align: justify;">2014 में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार संयुक्त रूप से भारत और पाकिस्तान के दो लोगों को संयुक्त रुप से दिया गया था। इस पुरस्कार के लिए भारत में बाल अधिकारों के लिए कार्य करने वाले कैलाश सत्यार्थी और लड़कियों</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-right" title="" src="https://static.vikaspedia.in/media/images_hi/education/93893e92e93e92894d92f-91c94d91e93e928/93094b91a915-91c93e92891593e93093f92f93e902-1/mmn.jpg/@@images/fd3d8901-32d4-46b6-b6bf-7041b2e3975a.jpeg" alt="" /></p> <p style="text-align: justify;">की पढ़ाई के लिए संघर्ष करने वाली पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई को चुना गया। मदर टेरेसा के बाद शांति का नोबेल पुरस्कार पाने वाले सत्यार्थी दूसरे भारतीय हैं। पुरस्कार के रूप में 11 लाख डॉलर (करीब 6 करोड़ 74 लाख रुपये) दी गई।</p> <p style="text-align: justify;">कैलाश सत्यार्थी भारत में एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) का संचालन करते हैं। यह एनजीओ बाल श्रम और बाल तस्करी में फंसे बच्चों को मुक्त कराने की दिशा में कार्य करता है। नोबेल पुरस्कारों की ज्यूरी ने उस समय कहा था कि, 'नार्वे की नोबेल कमेटी ने बच्चों और युवाओं पर दबाव के विरुद्ध और सभी बच्चों को शिक्षा मुहैया कराने के लिए किए गए संघर्षो को देखते हुए कैलाश सत्यार्थी और मलाला यूसुफजई को 2014 का नोबेल शांति पुरस्कार देने का फैसला किया गया।'</p> <p style="text-align: justify;">नोबेल कमेटी ने कहा था कि 'बचपन बचाओ आंदोलन' नामक एनजीओ चलाने वाले सत्यार्थी ने गांधी जी की परंपरा को कायम रखा है और वित्तीय लाभ के लिए बच्चों के शोषण के खिलाफ कई शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों की अगुआई की ।</p> <h3>मलाला युसुफ़ज़ई का परिचय <strong> </strong></h3> <p style="text-align: justify;"><img class="image-right" title="मलाला युसुफ़ज़ई" src="https://static.vikaspedia.in/media/images_hi/education/93893e92e93e92894d92f-91c94d91e93e928/93094b91a915-91c93e92891593e93093f92f93e902-1/mm.jpg/@@images/3d2ed552-bd23-4bb3-acc7-afdc605eafce.jpeg" alt="मलाला युसुफ़ज़ई" /></p> <p style="text-align: justify;">मलाला युसुफ़ज़ई का जन्म 12 जुलाई 1997 हुआ । वह बच्चों के अधिकारों की कार्यकर्ता होने के लिए जाना जाता है। वह पाकिस्तान के ख़ैबर-पख़्तूनख़्वा प्रान्त के स्वात जिले में स्थित मिंगोरा शहर की एक छात्रा है। 13 साल की उम्र में ही वह तहरीक-ए-तालिबान शासन के अत्याचारों के बारे में एक छद्म नाम के तहत बीबीसी के लिए ब्लॉगिंग द्वारा स्वात के लोगों में नायिका बन गयी। अक्टूबर 2012 में, मात्र 14 वर्ष की आयु में अपने उदारवादी प्रयासों के कारण वे आतंकवादियों के हमले का शिकार बनी, जिससे वे बुरी तरह घायल हो गई और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में आ गई।</p> <p style="text-align: justify;">मलाला युसुफ़ज़ई मिंगोरा, जो स्वात का मुख्य शहर में रहती है। मिंगोरा पर तालिबान ने मार्च २००९ से मई २००९ तक कब्जा कर रखा था, जब तक की पाकिस्तानी सेना ने क्षेत्र का नियंत्रण हासिल करने के लिए अभियान शुरू किया। संघर्ष के दौरान, ११ साल की उम्र में ही मलाला ने डायरी लिखनी शुरू कर दी थी। वर्ष २००९ में छद्म नाम "गुल मकई" के तहत बीबीसी ऊर्दू के लिए डायरी लिख मलाला पहली बार दुनिया की नजर में आई थी। जिसमें उसने स्वात में तालिबान के कुकृत्यों का वर्णन किया था और अपने दर्द को डायरी में बयां किया। डायरी लिखने की शौकीन मलाला ने अपनी डायरी में लिखा था, 'आज स्कूल का आखिरी दिन था इसलिए हमने मैदान पर कुछ ज्‍यादा देर खेलने का फ़ैसला किया। मेरा मानना है कि एक दिन स्कूल खुलेगा लेकिन जाते समय मैंने स्कूल की इमारत को इस तरह देखा जैसे मैं यहां फिर कभी नहीं आऊंगी।'</p> <p style="text-align: justify;">मलाला ने ब्लॉग और मीडिया में तालिबान की ज्यादतियों के बारे में जब से लिखना शुरू किया तब से उसे कई बार धमकियां मिलीं। मलाला ने तालिबान के कट्टर फरमानों से जुड़ी दर्दनाक दास्तानों को महज ११ साल की उम्र में अपनी कलम के जरिए लोगों के सामने लाने का काम किया था। मलाला उन पीड़ित लड़कियों में से है जो तालिबान के फरमान के कारण लंबे समय तक स्कूल जाने से वंचित रहीं। तीन साल पहले स्वात घाटी में तालिबान ने लड़कियों के स्कूल जाने पर पाबंदी लगा दी थी। लड़कियों को टीवी कार्यक्रम देखने की भी मनाही थी।‍ स्वात घाटी में तालिबानियों का कब्‍जा था और स्‍कूल से लेकर कई चीजों पर पाबंदी थी। मलाला भी इसकी शिकार हुई। लेकिन अपनी डायरी के माध्‍यम से मलाला ने क्षेत्र के लोगों को न सिर्फ जागरुक किया बल्कि तालिबान के खिलाफ खड़ा भी किया। तालिबान ने वर्ष २००७ में स्‍वात को अपने कब्‍जे में ले लिया था। और लगातार कब्‍जे में रखा। तालिबानियों ने लड़कियों के स्‍कूल बंद कर दिए थे। कार में म्‍यूजिक से लेकर सड़क पर खेलने तक पर पाबंदी लगा दी गई थी। उस दौर के अपने अनुभवों के आधार पर इस लड़की ने बीबीसी उर्दू सेवा के लिए जनवरी, २००९ में एक डायरी लिखी थी। इसमें उसने जिक्र किया था कि टीवी देखने पर रोक के चलते वह अपना पसंदीदा भारतीय सीरियल राजा की आएगी बारात नहीं देख पाती थी।</p> <p style="text-align: justify;">वर्ष 2009 में न्‍यूयार्क टाइम्‍स ने मलाला पर एक फिल्‍म भी बनाई थी। स्‍वात में तालिबान का आतंक और महिलाओं की शिक्षा पर प्रतिबंध विषय पर बनी इस फिल्‍म के दौरान मलाला खुद को रोक नहीं पाई और कैमरे के सामने ही रोने लगी। मलाला डॉक्‍टर बनने का सपना देख रही थी और तालिबानियों ने उसे अपना निशाना बना दिया। उस दौरान दो सौ लड़कियों के स्‍कूल को तालिबान से ढहा दिया था। वर्ष 2009 में तालिबान ने साफ कहा था कि 15 जनवरी के बाद एक भी लड़की स्‍कूल नहीं जाएगी। यदि कोई इस फतवे को मानने से इंकार करता है तो अपनी मौत के लिए वह खुद जिम्‍मेदार होगी।</p> <p style="text-align: justify;">जब स्‍वात में तालिबान का आतंक कम हुआ तो मलाला की पहचान दुनिया के सामने आई और उसे बहादुरी के लिए अवार्ड से नवाजा गया। इसी के साथ वह इंटरनेशनल चिल्‍ड्रन पीस अवार्ड (2011) के लिए भी नामित हुई। (2011 में वे नहीं जीत पाईं, लेकिन बाद में 2013 में उन्हें यह अवार्ड भी मिला)।</p> <p style="text-align: justify;">पाकिस्तान की ‘न्यू नेशनल पीस प्राइज’ हासिल करने वाली 14 वर्षीय मलाला यूसुफजई ने तालिबान के फरमान के बावजूद लड़कियों को शिक्षित करने का अभियान चला रखा है। तालिबान आतंकी इसी बात से नाराज होकर उसे अपनी हिट लिस्‍ट में ले चुके थे। संगठन के प्रवक्ता के अनुसार,‘यह महिला पश्चिमी देशों के हितों के लिए काम कर रही हैं। इन्‍होंने स्वात इलाके में धर्मनिरपेक्ष सरकार का समर्थन किया था। इसी वजह से यह हमारी हिट लिस्ट में हैं। अक्टूबर 2012 में, स्‍कूल से लौटते वक्‍त उस पर आतंकियों ने हमला किया जिसमें वे बुरी तरह घायल हो गई। इस हमले की जिम्‍मेदारी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) ने ली। बाद में इलाज के लिए उन्हें ब्रिटेन ले जाया गया जहाँ डॉक्टरों के अथक प्रयासों के बाद उन्हें बचा लिया गया। तालिबान के हमले में जीवन को दांव पर लगाने के बाद भी मलाला ने पाकिस्तान जैसे देश में बाल अधिकारों और बालिका शिक्षा के लिए अपना संघर्ष साथ जारी रखा। नोबेल पुरस्कार की घोषणा के वक्त मलाला बर्मिघम के स्कूल में पढ़ाई कर रही थी। मलाला पिछले साल भी नोबेल शांति पुरस्कार की दौड़ में थीं। कमेटी ने कहा, 'अपनी कम उम्र के बावजूद मलाला ने लड़कियों की शिक्षा के लिए कई साल संघर्ष किया है।</p> <p style="text-align: justify;">उन्होंने यह साबित किया है कि बच्चे और युवा भी अपनी स्थिति को सुधारने में योगदान कर सकते हैं।' उन्होंने सर्वाधिक खतरनाक स्थिति में यह सब किया है। अपने नायक सरीखे व्यक्तित्व के कारण मलाला लड़कियों के शिक्षा के अधिकार की अग्रणी प्रवक्ता बन गई हैं।</p> <p style="text-align: justify;">17 वर्षीय मलाला नोबेल पुरस्कार जीतने वाली सबसे कम उम्र की शख्सियत हैं। इसके पहले सबसे कम उम्र में नोबेल पुरस्कार पाने वाले ऑस्ट्रेलिया मूल के ब्रिटिश वैज्ञानिक लॉरेंस ब्रेग थे जिन्हें 25 साल की उम्र में अपने पिता के साथ 1915 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला था।</p> <h3 style="text-align: justify;">मलाला युसुफ़ज़ई को मिले पुरस्कार और सम्मान</h3> <p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">अर्जेंटीना में अंतर्राष्ट्रीय काव्य महोत्सव 2013 के दौरान मलाला को सम्मान मिला ।</p> <p style="text-align: justify;">पाकिस्तान का राष्ट्रीय युवा शांति पुरस्कार - 2011</p> <p style="text-align: justify;">अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में शांति को बढ़ावा देने के लिए उसे साहसी और उत्कृष्ट सेवाओं के लिए, उसे पहली बार 19 दिसम्बर 2011 को पाकिस्तानी सरकार द्वारा 'पाकिस्तान का पहला युवाओं के लिए राष्ट्रीय शांति पुरस्कार मलाला युसुफजई को मिला था। मीडिया के सामने बाद में बोलते हुए, उसने शिक्षा पर केन्द्रित एक राजनितिक दल बनाने का इरादा रखा। सरकारी गर्ल्स सेकेंडरी स्कूल, मिशन रोड, को तुरंत उसके सम्मान में मलाला युसुफजई सरकारी गर्ल्स सेकेंडरी स्कूल नाम दिया गया।</p> <p style="text-align: justify;">अंतरराष्ट्रीय बच्चों की वकालत करने वाले समूह किड्स राइट्स फाउंडेशन ने युसुफजई को अंतर्राष्ट्रीय बाल शांति पुरस्कार के लिए प्रत्याशियों में शामिल किया, वह पहली पाकिस्तानी लड़की थी जिसे इस पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया। दक्षिण अफ्रीका के नोबेल पुरस्कार विजेता डेसमंड टूटू ने एम्स्टर्डम, हॉलैंड में एक समारोह के दौरान २०११ के इस नामांकन की घोषणा की, लेकिन युसुफजई यह पुरस्कार नहीं जीत सकी और यह पुरस्कार दक्षिण अफ्रीक़ा की 17 वर्षीय लड़की ने जीत लिया यह पुरस्कार बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था हर साल एक लड़की को देती है।</p> <p style="text-align: justify;">अंतर्राष्ट्रीय बाल शांति पुरस्कार (2013)</p> <p style="text-align: justify;">नीदरलैंड के किड्स राइट्स संगठन ने इसकी जानकारी देते हुए बताया कि आगामी छह सितंबर को हेग में आयोजित होने वाले एक समारोह में वर्ष 2011 का नोबल शांति पुरस्कार हासिल करने वाली महिला अधिकार कार्यकर्ता तवाकुल रहमान मलाला को बाल शांति पुरस्कार से सम्मानित करेंगी। किड्स राइट्स संगठन उन लोगों को सम्मानित करता है जो कि बाल अधिकारों के लिए कोई विशेष कार्य करते हैं। इससे पहले बहादुर मलाला सयुंक्त राष्ट्र में नोबल शांति पुरस्कार के प्रतियोगी के तौर पर जुलाई में भाषण दे चुकी हैं।</p> <p style="text-align: justify;">साख़ारफ़ (सखारोव) पुरस्कार (2013)</p> <p style="text-align: justify;">मलाला युसुफ़जई को यूरोसंसद द्वारा वैचारिक स्वतन्त्रता के लिए साख़ारफ़ पुरस्कार प्रदान किया गया है। बच्चों के शिक्षा के अधिकार के लिए संघर्ष में महती भूमिका निभाने के लिए उन्हें यह पुरस्कार दिया गया है</p> <p style="text-align: justify;">मैक्सिको का समानता पुरस्कार (2013)</p> <p style="text-align: justify;">मलाला यूसुफजई को इक्वेलिटी एंड नान डिस्क्रिमीनेशन का अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार दिये जाने की घोषणा हुई है। मैकिसको में भेदभाव निरोधक राष्ट्रीय परिषद की ओर से जारी बयान में यह जानकारी दी गई। बयान में कहा गया है कि मलाला को यह पुरस्कार मानवाधिकारों की रक्षा के लिए उसके प्रयासों विशेषतया जाति, उम्र, लिंग में भेदभाव किए बिना शिक्षा के अधिकार के लिए संघर्ष को देखते हुए दिया जा रहा है।</p> <p style="text-align: justify;">संयुक्त राष्ट्र का 2013 मानवाधिकार सम्मान (ह्यूमन राइट अवॉर्ड)</p> <p style="text-align: justify;">संयुक्त राष्ट्र ने मलाला यूसुफजई को 2013 का मानवाधिकार सम्मान (ह्यूमन राइट अवॉर्ड) देने की घोषणा की। यह सम्मान मानवाधिकार के क्षेत्र में बेहतरीन उपलब्धियों के लिए हर पांच साल में दिया जाता है। इससे पहले यह सम्मान पाने वालों में नेल्सन मंडेला, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जिम्मी कार्टर व एमनेस्टी इंटरनैशनल आदि शामिल हैं। मलाला के अतिरिक्त पांच अन्य को भी इस अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है।</p> <h3 style="text-align: justify;">कैलाश सत्यार्थी का परिचय <strong> </strong></h3> <p style="text-align: justify;">कैलाश सत्यार्थी का जन्म 11 जनवरी, 1954 को विदिशा, मध्य प्रदेश में हुआ। बाल अधिकारों के लिए 1980 में इलेक्ट्रिकल इंजीनियर की नौकरी छोड़ दी।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-right" src="https://static.vikaspedia.in/media/images_hi/education/93893e92e93e92894d92f-91c94d91e93e928/93094b91a915-91c93e92891593e93093f92f93e902-1/jj.jpg" width="222" height="135" /></p> <p style="text-align: justify;">वे अब तक 80 हजार बाल मजदूरों को<span style="text-align: justify;"> </span>मुक्त करा चुके हैं। कैलाश सत्यार्थी ने बाल मजदूरी के खिलाफ वैश्विक मार्च बनाया, जो अनेक देशों में सक्रिय है। उन्हें 1994 में रगमार्क की स्थापना का भी श्रेय है जो अब गुड वेव के रूप में जाना जाता है। यह दक्षिण एशिया में एक तरह का बाल श्रम मुक्त का सामाजिक प्रमाण-पत्र है। उन्हें पहले भी कई बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया गया था।</p> <h3 style="text-align: justify;"><span style="text-align: justify;">कैलाश सत्यार्थी के कार्य </span></h3> <p style="text-align: justify;">यह बात 5 जून 2004 की है। गोंडा के कर्नलगंज कस्बे में सर्कस लगा था। इसमें बाल श्रमिक किशोरियों के काम करने की गूंज पूरे देश में गूंजी थी। वजह थे कैलाश सत्यार्थी। यह कैलाश का ही जुनून था, जो उन्होंने जान की बाजी लगा 11 किशोरियों को मुक्त कराया। यही नहीं, कर्नलगंज कोतवाली में यौन उत्पीड़न, बंधुआ मजदूर निषेध अधिनियम समेत 16 मुकदमे भी दर्ज हुए थे।</p> <p style="text-align: justify;">कर्नलगंज में चल रहे एक सर्कस में बाल श्रमिक किशोरियों के शोषण की सूचना कुछ जागरूक नागरिकों ने गैर सरकारी संगठन 'बचपन बचाओ आंदोलन' के प्रमुख कैलाश सत्यार्थी को दी थी। इसके बाद अगले ही दिन वह दिल्ली से कर्नलगंज पहुंच गए। इसकी भनक सर्कस संचालकों को हो गई। कैलाश सत्यार्थी जब किशोरियों से जानकारी हासिल कर रहे थे, तभी उन पर हमला बोल दिया गया। लोग बताते हैं कि उन्हें सरियों और डंडों से दौड़ा-दौड़ा कर पीटा था। प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो उनकी कनपटी पर तमंचा तक तान दिया गया था। यही नहीं, शेर को छोड़ने के लिए पिंजरा तक खोल दिया था, मगर एक अफसर ने उसे किसी तरह बंद कर दिया। इस घटना में सत्यार्थी और उनके सहयोगी काफी जख्मी हो गए थे। उनका इलाज गोंडा में कराया गया था। यह पूरा वाकया काफी सुर्खियों में रहा था। इसके बाद पुलिस प्रशासन हरकत में आया था।</p> <p style="text-align: justify;">इस मामले में कर्नलगंज कोतवाली में बंधुआ मजदूर निषेध अधिनियम समेत अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था। इस दौरान बाल श्रम करने वाली नेपाल, दार्जिलिंग व अन्य स्थानों से भगाकर लाई गई 11 किशोरियों को भी मुक्त कराया गया था। यही नहीं, दुष्कर्म का मामला भी दर्ज हुआ था।</p> <p style="text-align: justify;">करीब तीन दशक से बाल अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता और गैर सरकारी संगठन बचपन बचाओ आंदोलन के प्रमुख कैलाश सत्यार्थी को शांति का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। सत्यार्थी ने इस सम्मान को ऐसे बच्चों को समर्पित किया है, जो बाल श्रम के शिकार हैं।</p> <p style="text-align: justify;">उनका मानना है कि यह सम्मान एक व्यक्ति का या मेरा नहीं है। मैंने बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए संघर्ष शुरू किया था। इसलिए यह सम्मान पूरी दुनिया के उन करोड़ों बच्चों को समर्पित है, जो बाल श्रम से प्रभावित हैं। यह सवा सौ करोड़ भारतीयों और लोकतंत्र का सम्मान है।भविष्य में और देशों में भी बाल श्रम के खिलाफ आवाज उठाना चाहते हैं। भारत में आज भी बाल मजदूरी और चाइल्ड ट्रैफिकिंग बड़े स्तर पर हो रही है इसे रोकने के लिए संघर्ष जारी रखना चाहते हैं । 80 हजार से ज्यादा बच्चों की जिंदगी बदलने वाले कैलाश सत्यार्थी को भोपाल गैस त्रासदी के राहत अभियान और बच्चों के लिए काम करने को लेकर दुनिया का ये सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला है।</p> <p style="text-align: justify;">पिछले दो दशकों से वे बालश्रम के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं और इस आंदोलन को वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए जाने जाते हैं।</p> <p style="text-align: justify;">कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि ये सम्मान सवा सौ करोड़ भारतीयों का सम्मान है। ये भारत के लोकतंत्र की जीत है जिसकी वजह से भारत से ये लड़ाई आरंभ हुई और आज दुनिया में हम जीत रहे हैं। ये उन बच्चों की भी जीत है जो अपनी जिंदगी बदलने के कड़े संघर्ष में जुटे हैं।</p> <p style="text-align: justify;">स्रोत: स्थानीय समाचार पत्र ।</p> </div>