परिचय होमी जहांगीर भाभा भारत के प्रमुख वैज्ञानिक और एक महान स्वप्नदृष्टा थे। उन्हें देश में परमाणु उर्जा कार्यक्रम का शिल्पकार कहा जाता है। भाभा ने कुछ वैज्ञानिकों की सहायता से भारत में परमाणु क्षेत्र में अनुसंधान का कार्य शुरू किया और मार्च 1944 में नाभिकीय उर्जा पर अनुसंधान आरम्भ किया। उन्होंने नाभिकीय विज्ञान में तब कार्य आरम्भ किया जब श्रृंखला अभिक्रिया का ज्ञान नहीं के बराबर था और नाभिकीय उर्जा से विद्युत उत्पादन की कल्पना को कोई मानने को तैयार नहीं था। भारत को परमाणु शक्ति बनाने के मिशन में प्रथम कदम के तौर पर उन्होंने 1945 में मूलभूत विज्ञान में उत्कृष्टता के केंद्र टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (टी.आई.एफ.आर.) की स्थापना की। डॉ. भाभा एक कुशल वैज्ञानिक, प्रतिबद्ध इंजीनियर होने के साथ-साथ एक समर्पित वास्तुशिल्पी, सतर्क नियोजक एवं निपुण प्रबन्धक थे। वे ललित कला व संगीत के प्रेमी थे। उन्होंने देश के परमाणु कार्यक्रम के भावी स्वरूप की ऐसी मजबूत नींव रखी, जिसके चलते भारत आज विश्व के प्रमुख परमाणु संपन्न देशों की कतार में पूरी शान से खड़ा है। उन्होंने समय से पहले ही परमाणु ऊर्जा की असीम क्षमता और विभिन्न क्षेत्रों में उसके उपयोग की संभावनाओं को परख लिया था। होमी जहांगीर भाभा का जन्म 30 अक्टूबर 1909 को मुम्बई के एक सम्पन्न पारसी परिवार में हुआ था। भाभा परिवार लम्बे समय से शिक्षा क्षेत्र से जुड़ा था। होमी के दादा का नाम भी होमी जहाँगीर भाभा था। वे मैसूर राज्य में शिक्षा विभाग के महानिरीक्षक थे। होमी के पिता जहाँगीर होरमसजी भाभा ने ऑक्सफर्ड में पढ़ाई की थी। बाद में वे वकील बने। उनकी माता मेहरीन, सर दिनशॉ मानेकजी पेटिट की पोती थीं। सर दिनशॉ मुंबई में अपने लोकोपकारी कार्यों के लिये जाने जाते थे। होमी की बुआ मेहरबाई की शादी जमशेदजी नसेरवानजी टाटा के बड़े बेटे सर दोराब जमशेदजी टाटा से हुई थी। होमी जहांगीर भाभा की प्रारंभिक शिक्षा होमी भाभा ने मुंबई के कैथड्रल और जॉन केनन स्कूल से पढ़ाई की थी। पंद्रह वर्ष की उम्र में सीनियर कैम्ब्रिज परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने एल्फिस्टन कॉलेज मुंबई और रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस से बी.एस-सी. पास किया। भौतिक शास्त्र में उनकी अत्यधिक रुचि थी। गणित भी उनका प्रिय विषय था। मुंबई से पढ़ाई पूरी करने के बाद भाभा सन् 1927 में इंग्लैंड के गॉनविल और केयस कॉलेज, कैंब्रिज में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने गए। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में रहकर सन् 1930 में उन्होंने यंत्र विज्ञान में ट्राइपोस प्राप्त किया। दो साल बाद उन्होंने गणित का ट्राइपोस भी प्रथम श्रेणी से पास कर लिया। सन् 1932-1934 के दौरान उन्हें गणित में राउज बाल ट्रैवलिंग छात्रवृत्ति भी मिली। इससे पहले सन् 1931-32 के दौरान उन्हें इंजीनियरींग में सैलोमंस छात्रवृत्ति मिली थी। हालांकि इंजीनियरिंग पढ़ने का निर्णय उनका नहीं था। यह परिवार की ख्वाहिश थी कि वे एक होनहार इंजीनियर बनें। होमी ने सबकी बातों का ध्यान रखते हुए, इंजीनियरिंग की पढ़ाई जरूर की, लेकिन अपने प्रिय विषय फिजिक्स से भी खुद को जोड़े रखा। न्यूक्लियर फिजिक्स के प्रति उनका लगाव जुनूनी स्तर तक था। उन्होंने कैंब्रिज से ही पिता को पत्र लिख कर अपने इरादे बता दिए थे कि फिजिक्स ही उनका अंतिम लक्ष्य है। शोधपत्रों का प्रकाशन कैम्ब्रिज में पॉल एड्रिएन मॉरिस डिराक ने भाभा को पढ़ाया था। डिराक कैम्ब्रिज में गणित के लुकासियन प्रोफेसर थे। इरविन श्रोडिंगर के साथ 1933 में उन्हें क्वांटम सिद्धांत पर उनके कार्यों के लिए संयुक्त रूप से भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला था। जब भाभा कैवेंडिश प्रयोगशाला में थे, तब वहाँ कई उत्कृष्ट आविष्कार हुए। वहाँ से उन्हें सन् 1934 में सैद्धांतिक भौतिकी में पी.एच.डी. की उपाधि मिली। भाभा ने यूरोप का दौरा किया और ज्यूरिख में वोल्फगांग पॉली तथा रोम में एनरिको फर्मी के साथ काम किया। उनका पहला शोधपत्र 1933 में प्रकाशित हुआ। इस शोधपत्र के कारण उन्हें 1934 में आइज़क न्यूटन छात्रवृत्ति मिली। उन्हें यह छात्रवृत्ति तीन साल तक मिली। जर्मनी में उन्होंने कॉस्मिक किरणों पर अध्ययन और प्रयोग किए। होमी भाभा को प्रसिद्ध वैज्ञानिक रुदरफोर्ड और नील्स बोर के साथ काम करने का अवसर मिला था। भाभा ने ज्यादातर काम कैम्ब्रिज में ही किया और केवल कुछ समय तक कोपेनहेगन में नील्स बोर के साथ काम किया था। कैम्ब्रिज में भाभा का कार्य मुख्य रूप से ब्रह्माण्ड किरणों पर केंद्रित था। भाभा और हाइटलर ने सन् 1937 में कॉस्मिक किरणों की बौछार की व्याख्या की थी। होमी भाभा ने कॉस्केट थ्योरी ऑफ इलेक्ट्रॉन का प्रतिपादन करने के साथ ही कॉस्मिक किरणों पर भी काम किया, जो किरणें पृथ्वी की ओर आते हुए वायुमंडल में प्रवेश करती हैं। उन्होंने कॉस्मिक किरणों की सरल व्याख्या की। एक खास वर्ग के प्राथमिक कणों के लिए 'मेसॉन' नाम का सुझाव भाभा ने फरवरी 1939 में 'नेचर' पत्रिका में दिया था। भाभा के अनुसंधान कार्यों के महत्व पर 1950 में नोबेल पुरस्कार प्राप्त सेसिल फ्रैंक पॉवेल ने लिखा है : “विद्युतचुम्बकीय प्रक्रिया के रूप में अंतरिक्ष किरण वर्षण को समझने में होमी भाभा का योगदान निर्णयात्मक था, तब तक इन प्रारम्भिक कणों के अस्तित्व का पता लग गया था। होमी भाभा इन कणों के लिए समूह-सिद्धांत का प्रयोग करनेवाले प्रथम व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे। होमी एक उत्कृष्ट सिद्धांतकार हैं और उनके शोधपत्र हमेशा उत्तम तरीके से लिखे होते हैं।" सन् 1939 में भाभा कैम्ब्रिज से कुछ दिनों की छुट्टी पर भारत आए थे। उसी दौरान दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया और उनका लौटना टल गया। भाभा सन् 1940 में बेंगलूर स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान से जुड़े। वहाँ सैद्धांतिक भौतिकी में उनके लिए सैद्धान्तिक रीडर का अलग पद सृजित किया गया था। उन दिनों सी. वी. रामन संस्थान के निदेशक थे। प्रो. सी. वी. रामन होमी भाभा से काफी प्रभावित थे। सन् 1944 में भाभा को प्रोफेसर बना दिया गया। उस दौरान विक्रम साराभाई भी कुछ समय के लिये वहाँ थे। वहाँ पर भाभा ने मुख्य रूप से कॉस्मिक किरणों पर होनेवाले अनुसंधान को दिशानिर्देश दिया। उन्होंने कॉस्मिक किरणों की खोज के लिए एक अलग विभाग की स्थापना की। कॉस्मिक किरणों के अनुसंधान से जुड़े सैद्धांतिक और प्रायोगिक पहलुओं पर काम करने के लिये उन्होंने युवा अनुसंधानकर्ताओं का एक समूह तैयार किया था। टाटा आधारभूत अनुसंधान संस्थान की शुरुआत उन्नीस सौ चालीस के दशक में जब भाभा भारतीय विज्ञान संस्थान में काम कर रहे थे, तब देश में ऐसा कोई संस्थान नहीं था, जहाँ नाभिकीय भौतिकी, कॉस्मिक किरणें, उच्च ऊर्जा भौतिकी जैसे भौतिकी के प्रमुख क्षेत्रों में अनुसंधान कार्य करने की सुविधाएँ हो। अतः भाभा ने मार्च 1944 में सर दोराबजी जमशेदजी टाटा ट्रस्ट को पत्र लिखकर आधुनिक सुविधाओं से युक्त अनुसंधानशाला खोलने का प्रस्ताव भेजा। अप्रैल 1944 में सर दोराबजी जमशेदजी टाटा ट्रस्ट के न्यासियों ने भाभा का प्रस्ताव मान लिया। उन्होंने संस्थान की वित्तीय जिम्मेदारी भी अपने ऊपर ले ली। मुम्बई को संस्थान के लिए सबसे उपयुक्त जगह माना गया। अंततः सन् 1945 में टाटा आधारभूत अनुसंधान संस्थान की शुरूआत हुई। एक भवन में किराए पर 540 वर्ग मीटर जगह लेकर संस्थान खोला गया। इसके बाद सन् 1948 में रॉयल यॉट क्लब के पुराने भवन में यह संस्थान आ गया। संस्थान के वर्तमान भवन का उद्धाटन पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जनवरी 1962 में किया था। नेहरू जी ने ही सन् 1954 में इस भवन की आधारशिला रखी थी। दूसरे साल से संस्थान को भारत सरकार से वित्तीय सहायता मिलने लगी। यह सहायता वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद् और प्राकृतिक एवं वैज्ञानिक अनुसंधान मंत्रालय के माध्यम से मिली। भाभा ने पहले उचित लोगों का चयन किया और फिर उन्हें आगे बढ़ने का अवसर प्रदान किया। परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में अनुसंधान को संगठित करने के लिये जो पहला कदम उठाया गया, वह था परमाणु ऊर्जा अनुसंधान परिषद् का गठन। यह परिषद् वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद् का ही अंग था। भाभा को इस नई परिषद् का अध्यक्ष बनाया गया। सरकार के एक अंग के रूप में वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग का गठन करने के लिए एस. एस. भटनागर ने परमाणु ऊर्जा अनुसंधान परिषद् को प्रस्तावित विभाग के अधीन करने का सुझाव दिया। लेकिन भाभा ने 26 अप्रैल 1948 को तत्कालीन प्रधानमंत्री को ' भारत में परमाणु अनुसंधान का संगठन ' शीर्षकयुक्त एक टिपण्णी में लिखा था कि परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को नए विभाग से अलग रखा जाना चाहिए तथा प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा आयोग का अपना सचिवालय हो और किसी अन्य सरकारी विभाग या मंत्रालय के सचिवालय का इस पर नियंत्रण न हो - प्रस्तावित वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग का भी नहीं। कुछ महीने में सरकार ने उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। इसके तत्काल बाद भारतीय परमाणु अधिनियम लाया गया और अगस्त 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग का गठन कर दिया गया। पहले परमाणु ऊर्जा आयोग में तीन सदस्य थे। भाभा को इसका अध्यक्ष बनाया गया। भारतीय नाभिकीय कार्यक्रम को सही राह पर लाने के लिये भाभा ने तीन जरुरी कदम उठाए थे : प्राकृतिक संसाधनों का सर्वेक्षण करना। परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में लगने वाले युरेनियम, थोरियम, बेरिलियम, ग्रैफाइट जैसे पदार्थों के सर्वेक्षण पर विशेष जोर दिया गया। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दाराशॉ नोशेरवान वाडिया की मदद से दिल्ली में दुर्लभ खनिज विभाग नाम से एक नई इकाई खोली गयी। भौतिकी, रसायन और जीवविज्ञान जैसे बुनियादी क्षेत्रों में अनुसंधानशालाएँ खोली जाएँ, इन अनुसंधानशालाओं में उच्चस्तरीय वैज्ञानिक अनुसंधान सुविधाएँ हों तथा प्रशिक्षण की व्यवस्था हो। खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए एक कार्यक्रम तैयार हुआ। टाटा आधारभूत अनुसंधान संस्थान में इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन इकाई की स्थापना की गई थी। टाटा के सहयोग से होमी भाभा का परमाणु शक्ति से बिजली बनाने का सपना साकार हुआ। भारत को परमाणु शक्ति संपन्न बनाने की महत्वाकांक्षा मूर्तरूप लेने लगी, जिसमें भारत सरकार तथा तत्कालीन मुम्बई सरकार का पूरा सहयोग मिला। नव गठित टाटा इन्स्टिट्यूट ऑफ फण्डामेंटल रिसर्च के वे महानिदेशक बने। उस समय विश्व में परमाणु शक्ति से बिजली बनाने वाले कम ही देश थे। जब हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिरा तब सारी दुनिया को परमाणु शक्ति का पता चला। होमी भाभा और जे.आर.डी. टाटा दोनो ही दूरदर्शी थें, उन्होंने केन्द्र को आगे बढ़ाया। इस केन्द्र में पाँच विभाग शुरू किये गये - भौतिकी, अभियांत्रिकी, धात्विक, इलेक्ट्रॉनिक और जीवविज्ञान। भाभा परमाणु शक्ति के खतरे से भी वाकिफ थे, अतः उन्होने वहाँ एक चिकित्सा विभाग तथा विकिरण सुरक्षा विभाग भी खोला। प्रकृति प्रेमी होमी भाभा के प्रयासों से ट्रॉम्बे संस्थान नीरस वैज्ञानिक संस्थान नही था, वहाँ चारो ओर हरे भरे पेड़-पौधे तथा फलदार वृक्ष संस्था को मनोरमता प्रदान करते हैं। बाद में भाभा ने महसूस किया कि टाटा आधारभूत अनुसंधान संस्थान में परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम से जुड़े पर्याप्त प्रौद्योगिकीय विकास कार्य नहीं हो सकते, तब उन्होंने सिर्फ इसी कार्य के लिए एक नई प्रयोगशाला स्थापित करने का निर्णय लिया। सन् 1954 में परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान की शुरूआत हुई। उसी साल परमाणु ऊर्जा विभाग की भी स्थापना की गई। भारत को बिना बाहरी सहायता से परमाणु शक्ति संपन्न बनाना, होमी भाभा का उद्देश्य था। मेहनती और सक्रिय लोगों को पसंद करने वाले होमी भाभा अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर अणुशक्ति की शान्ती पर बल देते थे। वे मित्र बनाने में भी उदार थे। निजी प्रतिष्ठा की लालसा उनके मन में बिलकुल न थी, एक बार केन्द्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने का प्रस्ताव मिला किन्तु उन्होंने नम्रतापूर्ण प्रस्ताव को अस्विकार कर दिया। मंत्री पद के वैभव से ज्यादा प्यार उन्हें विज्ञान से था। कनाडा-भारत रिएक्टर (सायरस) परियोजना अगस्त 1955 में संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल पर एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ था। जेनेवा में आयोजित इस ऐतिहासिक सम्मेलन का अध्यक्ष होमी भाभा को चुना गया था। वहां कनाडा ने भारत को परमाणु रिएक्टर बनाने में सहयोग देने का प्रस्ताव दिया, जिसको उचित समझते हुए भाभा ने वहीं से तार भेजकर पं. जवाहरलाल नेहरू से अनुमति माँगी। नेहरु जी ने समझौते की अनुमति दे दी, तब कनाडा के सहयोग से कनाडा-भारत रिएक्टर (सायरस) परियोजना प्रारंभ हुई। भाभा ने डॉ. सेठना को इस परियोजना का प्रमुख बनाया। सायरस परियोजना 10 जुलाई 1960 में तथा जरलीना परियोजना 14 जनवरी 1961 में प्रारंभ हुई। भारत का पहले रिएक्टर अप्सरा 6 अगस्त 1956 को भारत के पहले रिएक्टर अप्सरा ने कार्य़ करना प्रारंभ कर दिया था, जिसके लिए ईंधन ब्रिटेन ने दिया था। इस रिएक्टर का उपयोग न्यूट्रॉन भौतिकी, विकिरण, प्राणिशास्त्र, रसायन शास्त्र और रेडियोआइसोटोप के निर्माण में किया जाने लगा। 1200 इंजीनियरों और कुशल कारीगरों ने दिन-रात इसमें काम किया। कार्य पूरा होने पर भारत का इस क्षेत्र में आत्मविश्वास बढ़ा। रिएक्टरों के निर्माण से देश में परमाणु शक्ति से चलने वाले विद्युत संयत्रों की परियोजना का मार्ग प्रशस्त हुआ। तारापुर अणुशक्ति केन्द्र से बिजली का उत्पादन होने लगा। उन्होंने तारापुर के लिए पहला लाइट वॉटर रिएक्टर उस समय चालू किया जबकि प्रौद्योगिकी काफी नई थी। बाद में राजस्थान में राणाप्रताप सागर तथा तमिलनाडु में कलपक्कम में दो केन्द्र स्थापित किये गये। डॉ. भाभा विदेशी यूरेनियम पर निर्भर नही रहना चाहते थे। वे स्वदेशी थोरियम, स्वदेशी प्लूटोनियम आदि का उपयोग करना चाहते थे। विश्व में थोरियम का सबसे बङ़ा भंडार भारत में है। केरल के तट पर स्थित मोनाजाइट रेत को संशोधित करके थोरियम और फॉस्फेट को अलग-अलग करना प्रारंभ कर दिया। ट्रांबे में अपरिष्कृत थोरियम को हाइड्रोआक्साइड तथा यूरेनियम के संसाधन के लिए संयत्र लगाया गया। डॉ. होमी जहाँगीर भाभा के प्रयासों का ही परिणाम है कि कृषि, उद्योग और औषधि उद्योग तथा प्राणिशास्त्र के लिए आवश्यक लगभग 205 रेडियो आइसोटोप आज देश में उपलब्ध हैं। भाभा ने जल्दी नष्ट होने वाले खाद्य पदार्थों जैसे- मछली, फल, वनस्पति आदि को जीवाणुओं से बचाने के लिए विकिरण के प्रभाव को इस्तेमाल करने की उच्च प्राथमिकता दी और इस दिशा में शोध किया। बीजों के शुद्धीकरण पर भी जोर दिया ताकि अधिक से अधिक अनाज का उत्पादन किया जा सके। भूगर्भीय विस्फोटों तथा भूकंपों के प्रभावों का अध्ययन करने के लिए एक केन्द्र बंगलौर के पास खोला गया। विज्ञान के क्षेत्र में कार्य करने के लिए उन्होंने भारतीय वैज्ञानिकों से स्वदेश लौटने का आह्वान किया। उनके बुलाने पर कई वैज्ञानिक भारत आए। डॉ. भाभा को वैज्ञानिकों की परख थी। उन्होंने चुन-चुन कर कुशल वैज्ञानिकों को ट्रॉम्बे तथा अन्य संस्थानो में योग्यतानुसार पद तथा शोध की सुविधाएं दिलवायीं। उन्होंने योग्य और कुशल वैज्ञानिकों का एक समूह बना लिया था। लालफीताशाही से उन्हें सख्त चिढ़ थी तथा किसी के निधन पर काम बन्द करने या छुट्टी घोषित करने की प्रवृत्ति के वे सख्त खिलाफ थे। उनके अनुसार कड़ी मेहनत ही किसी व्यक्ति या संस्था के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है। रचनाधर्मिता को जीवन साथी मानने वाले भाभा आजीवन अविवाहित रहे। उन्होंने नाभिकीय भौतिकी में महत्वपूर्ण काम किये तथा मेसॉन नामक प्राथमिक तत्व की खोज करने वाले डॉ. भाभा संयुक्त राष्ट्रसंघ और अंतर्राष्ट्रय अणु शक्ति के कई वैज्ञानिक सलाहाकर मंडलों के सदस्य भी थे। देशभक्त होमी भाभा केवल अपने केन्द्र तक ही सीमित न थे, उन्होंने अन्य विज्ञान संस्थानो की भी हर तरह से सहायता की। सम्मान एवं पुरस्कार भाभा को सन् 1941 में रॉयल सोसाइटी का फेलो चुना गया। भाभा सन् 1951 में भारतीय विज्ञान कांग्रेस एसोसिएशन के संस्थान अध्यक्ष रहे। सन् 1963 में भाभा अमेरिका के नेशनल अकादमी ऑफ साइंसेज के विदेशी सदस्य और न्यूयॉर्क अकादमी ऑफ साइंसेज के आजीवन मानद सदस्य चुने गए। इसके बाद 1964 में मैड्रिड की रॉयल अकादमी ऑफ साइंसेज का उन्हें विदेशी-पत्र-व्यवहारी-परिषद् सदस्य बनाया गया। वर्ष 1960 से 1963 तक वे इंटरनेशनल यूनियन ऑफ प्योर एंड अप्लायड फिजिक्स के अध्यक्ष बने रहे। सन् 1943 में एडम्स पुरस्कार तथा कॉस्मिक किरणों पर उनके कार्यों के लिए कैम्ब्रिज फिलॉसॉफिकल सोसाइटी ने 1948 में उन्हें हॉपकिन्स पुरस्कार से सम्मानित किया। अनेक विश्व विद्यालयों ने भाभा को डॉक्टर ऑफ सांइस जैसी उपाधियों से विभूषित किया। भारत सरकार ने सन् 1954 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया था। होमी भाभा की तीन पुस्तकें क्वांम्टम थ्योरी, एलिमेंट्री फिज़िकल पार्टिकल्स एवं कॉस्मिक रेडिएशन बहुत चर्चित हैं। शास्त्रीय संगीत, मूर्तिकला तथा नृत्य आदि क्षेत्रों के विषयों पर भी उनकी अच्छी पकङ़ थी। वे आधुनिक चित्रकारों को प्रोत्साहित करने के लिए उनके चित्रों को खरीदकर ट्रॉम्बे स्थित संस्थान में सजाते थे। संगीत कार्यक्रमों में सदैव हिस्सा लेते थे और कला के दूसरे पक्ष पर भी पूरे अधिकार से बोलते थे, जितना कि विज्ञान पर। उनका मानना था कि सिर्फ विज्ञान ही देश को उन्नती के पथ पर ले जा सकता है। 24 जनवरी 1966 को अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की वैज्ञानिक सलाहकार समिति बैठक में भाग लेने वियना जाते समय आल्प्स पर्वत की मोंट ब्लॉक चोटी पर हुई विमान दुर्घटना में भाभा की मृत्यू हो गयी, उन्हें ले जाने वाला बोइंग विमान-707 कंचनजंगा बर्फीले तूफान में फँसकर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। उस समय वे टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान के निदेशक, परमाणु ऊर्जा विभाग में भारत सरकार के सचिव, परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष, और ट्राम्बे स्थित परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान के निदेशक थे। भारत सरकार ने 12 जनवरी 1967 को ट्रॉम्बे संस्थान का नामकरण उनके नाम पर 'भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र' कर दिया। डॉ. होमी भाभा का असामयिक निधन हो गया किन्तु उनका सपना साकार हो गया जब सन् 1974 में भारत ने परमाणु युक्ति का पोखरन में सफल परीक्षण करके परमाणु तकनीक की काबिलियत साबित कर दी। असाधारण प्रतिभा के धनि होमी भाभा सिर्फ सपने देखने में ही विश्वास नहीं करते थें, बल्कि उन्हें पूरा करने में जुट जाते थे। उनके अथक प्रयासों का ही परिणाम है कि आज भारत परमाणु तकनीक से सुसम्पन्न राष्ट्रों की श्रेणी में गिना जाता है। डॉ. भाभा उदार विचारधारा के थे। उनके व्यवहार में मानवीयता की झलक सदैव दृष्टिगोचर होती थी। मित्र बनाने में अग्रणी होमी भाभा लोगों की व्यक्तिगत समस्याओं को भी हल करने में सहयोग देते थे। परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए राष्ट्र सदा उनका ऋणी रहेगा। स्त्रोत: होमी भाभा विज्ञान शिक्षा केंद्र