देखरेख एवं सुरक्षा के जरूरतमंद बच्चे समाज का सबसे असुरक्षित हिस्सा है वे निर्भर है। सबसे कमजोर है और उनके अपने जीवन प्रक्रिया पर उनका नियंत्रण कम है। इनमें से कुछ बच्चें अपनी सामाजिक-आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों के कारण अन्य बच्चों की अपेक्षा अधिक कमजोर एवं अपेक्षित है। सुरक्षा और देखरेख की जरूरत वाले इन बच्चों को तीन स्थितियों में पाया जाता है। संकटग्रस्त परिवारों में सड़क पर संस्थाओं में सुरक्षा और देखरेख की जरूरतमंद बच्चों में कुछ असुरक्षित हिस्से निम्नलिखित है सड़क के बच्चे अनाथ, परित्यक्त और बेसहारा बच्चे कामकाजी बच्चे (श्रमिक बच्चे) शोषित/उत्पीड़ित बच्चे वे बच्चे जो वेश्यावृत्ति कराने व अवैध बाल व्यापर के शिकार हैं नशे की लत के शिकार बच्चे संघर्ष एवं आपदा के शिकार बच्चे संकटग्रस्त परिवारों के बच्चे अपाहिज बच्चे मानसिक रूप से बीमार बच्चे एच.आई.वी/एड्स से प्रभावित/संक्रमित बच्चे विधि का उलंघन करनेवाले किशोर सड़क के बच्चे सड़क के बच्चे अत्यंत असुरक्षित हिस्सा है, क्योंकि परिस्थितियों की वजह से वे सड़क पर रहने को मजबूर होते हैं, जहाँ कोई सुरक्षा, निगरानी व देखरेख सम्बन्धित वयस्कों से नहीं मिलता। सड़क के बच्चे नामक शब्द सड़क पर रहने वाले बच्चों के विभिन्न समूहों को समाहित करता है जो अलग परिस्थितियों और विभिन्न कारणों से आये है। प्रायः ये बच्चे रेलवे प्लेटफार्म, बस स्टेशन, गलियों, टैरिफक सिंग्नल और धार्मिक जगहों पर पाए जाते हैं। जीने के लिए इन्हें भीख मांगना, चोरी करना, जूते चमकाने, खाने की दुकानों और होटलों में इत्यादि काम करना पड़ता है। सड़क के बच्चे सर्वप्रथम कामकाजी बच्चे है, जिन्हें कठिन परिस्थितियों के कारण अपनी देखभाल के साथ-साथ परिवार आय में भी योगदान देना पड़ता है। इन बच्चों के परिवार हो सकते हैं लेकिन उससे सम्पर्क की प्रकृति और स्तर, रोज घर लौटने से लेकर, साल में कुछ समय तक का होता है। बच्चों के एक भिन्न समूह के लिए सड़क ही उनका घर है, जहाँ से वे अपने लिए भोजन, आश्रय, जीविका और साथी मित्र प्राप्त करते हैं उनके पारिवारिक सम्बन्ध होते है, लेकिन सिमित और अपर्याप्त। परित्यक्त और बेसहारा बच्चों का अपने परिवारों के साथ जितना भी सम्बन्ध नहीं होता। वे परित्यक्त इसलिए होते हैं कि उनकें पीछे गरीबी, मानसिक या शारीरिक अपंगता और कुछ मामलों में लिंग भेद जैसे कारक होते है। इन बच्चों को देखरेख और सुरक्षा की अत्यंत आवश्यकता होती है। लापता बच्चे या तो अपने घर से भागे हुए होते हैं या परिस्थितियों के शिकार होते है, जिस कारण अपने परिवार से अलग हो जाते हैं। परिवारों का पता नहीं चल पाने के कारण बच्चे सड़क पर ही रहने लगते हैं और इस प्रकार सड़क के बच्चों को श्रेणी में आ जाते है। निष्क्रिय परिवार, गरीबी, शोषण, घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न, उपेक्षा, शराबखोरी, ड्रग्स लेना जैसे कुछ कारक है जो बच्चों को घर छोड़ने और सड़क पर रहने को मजूबर करते हैं। वे लगातार शहरी जीवन के खतरों के सम्पर्क में रहते हैं, और शोषण, हिंसा और विभिन्न प्रकार के उत्पीड़न की परिधि में रहते है। सड़क के बच्चों के पहुँच स्वास्थ्य वृद्धि और विकास के लिए जरुरी बुनियादी संसाधनों तक नहीं होती है। शिक्षा, समुचित पोषण, वस्त्र, आश्रय और चिकित्सकीय देखरेख के उनके अधिकारों का पुरी तरह से हनन होता है। कामकाजी बच्चे/बाल मजदूर बाल मजदूरों के साथ-साथ अपरिपक्व वयस्कों की तरह जीवन जी रहे बच्चे बस थोड़े से मेहनताने के लिए घंटों उन परिस्थितियों में काम करते हैं जो उनके स्वास्थ्य व मानसिक और शारीरिक विकास को बर्बाद करते हैं। वे कभी कभी अपने परिवारों से अलग होते है और एक बेहतर भविष्य प्रदान करने वाली अर्थपूर्ण शिक्षा और प्रशिक्षण के अवसरों से लगातार वंचित होते हैं। आई.एल.ओ. 1983 बाजपेयी 2003। जब एक बच्चा/बच्ची अपने या अपने परिवार के लिए मजदूरी कमाने में लिप्त हो और इससे बाधित होती हो तब वह बाल मजदूर कहा जायेगा। इसमें हर प्रकार के कार्य शामिल होते हैं औपचारिक और अनौपचारिक, संगठित और असंगठित, परिवार के भीतर और बाहर यहाँ तक कि पारिवारिक कार्य जो बच्चे/बच्ची की शिक्षा, मनोरंजन, शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य के अधिकार से वंचित करता है उसे भी बालश्रम समझा जाता है। बच्चे के कार्य में लिप्त होने की कुछ स्थितियां निम्नलिखित है कृषि-बच्चे घंटों तक और कड़ी मेहनत से खेतों में काम करते हैं उन बच्चों का सामना आधुनिक मशीनों और रासायनिकों के खतरों से भी होता है। खतरनाक उद्योग/पेशा-जैसे शीशा तैयार करना, खनन निर्माण, कालीन बुनाई, जरी बनाना, पटाखा निर्माण और अन्य बालश्रम कानून भीतर सूचित है। छोटे औद्योगिक कार्यशालाएं और सेवा स्थापना। सड़क पर-कूड़ा चुनना, कुली, फेरीवाले और बाल वेश्याएं घरेलू कार्य-अधिकांशतः दिखाई व सुनाई नहीं देती इस प्रकार बड़े तौर पर शोषण और उत्पीड़न का सामना करते हैं। उन्हें मदद प्राप्त नहीं होता और बहुत से बच्चे/बच्चियां कठोर बंधक स्थिति में रहते है। बंधुआ मजदूर के रूप में 18 वर्ष से कम उम्र का कोई भी व्यक्ति जो घर का कर्ज चुकाने के लिए मजदूरी करता है, बंधुआ मजदूर है। बाल मजदूर कई तथ्यों के समायोजन का परिणाम है: गरीबी, अज्ञानता, निरक्षरता, अभिभावकों की बेरोजगारी, विद्यालयों तक पहुँच का नहीं होना और उनकी उपलब्धता तथा अप्रासंगिक विद्यालय पाठ्यक्रम के कारण विद्यालय छोड़ना, कार्य नियोक्ता इसलिए भी बच्चों का शोषण करते हैं क्योंकि वे सस्ते मजदूर होते है और शोषण के खिलाफ लड़ने में अयोग्य होते है। बाल मजदूरी से सम्बन्धित कानूनों को जबरदस्ती लागू करवाना बाल मजदूरी में सार्थक योगदान करता है। सभी बाल अधिकारों से वंचित होना बाल मजदूरी का एक बड़ा कारण है । तनावग्रस्त व असुरक्षित स्थितियों में लबे काम के घंटें बच्चों के शारीरिक व मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य को अपंग बना देते हैं। यह बच्चों/बच्चियों की गरिमा व आत्मसम्मान को दबा देता है और उन्हें एक स्वस्थ खुशहाल बचपन से वंचित करता है। शिक्षा की कमी एक वयस्क व अनाड़ी मजदूरी तबके की खराब रोजगार अवसरों के साथ रचना करता है। इस प्रकार बाल मजदूर गरीबी, बेरोजगारी, रोजगार क कभी और कमतर वेतन का एक चक्रव्यूह रच डालता है। उत्पीड़ित बच्चे अभिभावक, देखरेखकर्त्ता, मालिक और उन व्यक्तियों को शामिल करते हुए जो सरकारी/गैरसरकारी अंगों का प्रतिनिधित्व करते हैं बच्चों के साथ की गई बदसलूकी के फलस्वरूप बाल उत्पीड़न जानबुझ कर दी गई एक चोट ही, जो बच्चों के शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, मनो-सामाजिक विकास, अयोग्यता और मृत्यु का कारण बन सकता है। बाल उत्पीड़न की सामान्य परिभाषा में सामाजिक संस्थानों या व्यक्तिगत देखरेखकर्त्ता के द्वारा कोई भी बदसलूकी या अधिकार का हनन में शामिल है। शारीरिक उत्पीड़न: इसका अर्थ उन हिंसक क्रियाओं से है जो शारीरिक चोट, कटने, जलने, टूट फुट, जहर देना, भ्रूण हत्या और शिशु हत्या में दिखता है। शारीरिक उत्पीड़न के दूसरे रूप जबरन रक्तदान, चोट और बीमारी एक शोषक स्थिति का परिणाम है। भावनात्मक उत्पीड़न: यह अभिवावक या देखरेख करने वाले के सीधे नकार दिए जाने से पनपता है बुरा व्यवहार, प्रेम की कमी, देखभाल और अपमान कमी से पैदा होता है। इससे अपमान करना, डरावनी सजा देना, मौखिक गाली, दोष मढ़ना, छोटा बनाना, बच्चों को हिंसक बनाना, बच्चों को ड्रग्स व शराब लेने की छूट देना और उनकी मनोवैज्ञानिक जरूरतों की अवहेलना शामिल है। यौन उत्पीड़न: बाल यौन उत्पीड़न किसी भी प्रकार के शारीरिक, मानसिक या मौखिक उत्पीड़न बच्चों के बनिस्पत विश्वास या अधिकार को स्थिति में रह रहे व्यक्ति के द्वारा यौन दुर्भावना से प्रेरित होकर बच्चे का हनन करने के रूप में परिभाषित किया जाता है। यह उन निर्भर विकास के रूप से अपरिपक्व बच्चों व किशोरों जो समझदारीपूर्ण अनुमति देने में असक्षम है के साथ कोई भी यौन व्यवहार हो सकता है। बाल विवाह: बाल विवाह भी बाल उत्पीड़न का एक रूप है। भारत के बहुत से हिस्सों में 12-14 साल की लड़कियाँ का ब्याह कर दिया जाता है इससे पहले कि वे शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक रूप से विकसित हो सके। बहुत शीघ्र शादी से बहुत सी लड़कियां अपने सारे अधिकारों से, विद्यालय जाने से वंचित हो जाती है। वे घरेलू व बच्चा संभालने को जिम्मेदारी समझने लगती है जो उनके बौद्धिक व व्यक्तिगत विकास को नष्ट कर देता है और उन्हें उनके बचपन से वंचित कर देता है। उत्पीड़न/अवहेलना कई कारणों से हो सकता ही जैसे गरीवी, अज्ञानता, जरुरी संसाधनों को कमी और लिंग के आधार पर भेदभाव और हर प्रकार की शोषक स्थितियों से उत्पीड़न अवहेलना बच्चों के में पर कुछ मामलों में व्यक्तित्व की गड़बड़ियों की वजह बन सकता है। वह बच्चे जो यौन उत्पीड़ित होते हैं वे शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक यंत्रणा से पीड़ित हो सकते हैं। और लम्बे समय के लिए यंत्रणा से उपजा हुआ अवसाद, मानसिक त्राण, अलगाव और आत्मंह्तात्मक के शिकार जो सकते हैं। यौन समक्रमण, एच.आई.वी/एड्स या अनचाहा गर्भ बाल यौन उत्पीड़न के खतरनाक प्रभाव पैदा कर सकते हैं। कभी कभी उत्पीड़ित बच्चा/बच्ची दोषी बना दिए जाते हैं। उन्हें अपराधी महूसस करवाया जाता है, और यंत्रणा तथा सामाजिक बदनामी का सामना करना पड़ता है। परिणामस्वरूप/बच्चा/बच्ची लुटे हुए, अधिकारहीन क्रोधी, डरे हुए और अकेले महसूस करते हैं। बच्चे जो व्यावसायिक यौन शोषण के शिकार है व्यावसायिक यौन शोषण का अर्थ एक वयस्क द्वारा उसके भौतिक या मुद्रा लाभ के लिए बच्चा/बच्ची का यौन क्रियाओं के लिए इस्तेमाल करना है। जो इस व्यावसायिक शोषण से लाभ लेते है, उनमें, अभिभावक, परिजन, सामुदायिक सदस्य, दलाल इत्यादि भी शामिल होते है। इस विश्वव्यापी परिघटना का कारक गरीबी और अज्ञानता है। स्वयं परिवार अपने बच्चे का पारिवारिक आय में योगदान के लिए शोषण करते हैं। कुछ समुदाय ऐसे है जहाँ धार्मिक और सांस्कृतिक प्रणाली जैसे देवदासी या जोगिनी छोटी लड़कियों के यौन शोषण को वैधता प्रदान करते है, और उनमें से बहुत वेश्यावृत्ति में पड़ जाती है। व्यावसायिक यौन उत्पीड़न को इन रूपों में देखा जा सकता है। वेश्यावृत्ति: भौतिक या मुद्रा लाभ के लिए एक बच्चा या बच्ची का यौन क्रियाओं में इस्तेमाल। यौन पर्यटन: पिछले कुछ समय में तेजी से बढ़ता पर्यटन बाल यौन उद्योग के विस्तार का एक कारण बना है। भारत में मशहूर पर्यटन स्थानों पर बाल यौन शोषण की घटनाओं वृद्धि हुई है जहाँ बच्चे बाल यौन कुंठितों का शिकार बनते हैं। बच्चों को यौन पर्यटन के आकर्षण के लिए इस्तेमाल किया जाता है। बच्चों की अश्लील फिल्में: दृश्य सामग्रियों में अपमानजनक मुद्राओं में बच्चों का इस्तेमाल करना बाल यौन शोषण का एक अन्य रूप है। शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक उत्पीड़न के साथ ही साथ सामाजिक तथा पारिवारिक अस्वीकृति और बहिष्कार बच्चों के लिए यंत्रणा की वजह बनते हैं। घरेलू कार्यों, गोद लेना, बाल मजदूरी और अन्य उत्पीड़क स्थितियों के लिए बच्चों की तस्करी भी एक गंभीर चिता का विषय है। संस्थानों में उत्पीड़न बच्चे एक बच्चा जो संस्था में होता है वह 18 वर्ष से कम उम्र का कोई भी बच्चा हो सकता है जो एक ऐसे आवासीय संगठन में रहता है जिस पर बच्चे की सुरक्षा व देखभाल का भरोसा किया जाता है इसलिए बच्चों के लिए बने संस्थानों के लिए एक वैकल्पिक परिवार के रूप में कार्य करना आवश्यक है और इन्हें बच्चों के शारीरिक रूप से अच्छे भले होने के साथ ही साथ उसकी भावनात्मक और विकास से जुडी आवश्यकताओं को अवश्य महत्व प्रदान करना चाहिए। बहरलाल, संस्थानों में शारीरिक व यौन उत्पीड़न के मामलों में वृद्धि हुई है। बहुत सारे मामलों में स्वयं देखरेख करने वाले या वे जिन पर बच्चे के देखरेख का भरोसा किया जाता है, बच्चों के उत्पीड़क निकलते हैं। ऐसे विभिन्न मामले हैं जिनकी जानकारी नहीं मिलती व अपराध के दोषियों के खिलाफ कारवाई नहीं की जाती, यह एक गंभीर चिंता का विषय है। इस उत्पीड़न की व्यापकता शारीरिक दंडों मसलन पिटाई, डंडे से प्रहार करना, गाली गलौज करना, अश्लील टिप्पणियाँ करना, शारीरिक छुअन, छेड़खानी और बलात्कार तक पहुँच सकता है। आवासीय संस्थानों व आश्रयगृहों में बच्चों की देखभाल की गुणवत्ता में सुधार लाना एक ऐसी चुनौती है जिसे सम्बोधित करने की जरूरत है। वस्तु दुरुपयोग में लिप्त बच्चे वस्तु दुरुपयोग में ड्रग्स/शराब को चिकित्सकीय उपयोग के आलावा इस्तेमाल में लाना और मात्रा, क्षमता, बारम्बारता या शैली में ऐसे उपयोग करना, जिससे एक व्यक्ति को मानसिक/शारीरिक कार्य प्रणाली में क्षति पहुंचाती हो, जिससे सामाजिक व स्वास्थ्य रूप से नुकसान होता है, शामिल है। कुछ ड्रग्स मनोवैज्ञानिक निर्भरता पैदा करते है, जो द्ग्रस लेने की लगातार इच्छा से चरित्रार्थ होता है। दूसरे भी शारीरिक निर्भरता पैदा करते हैं जैसे कमतर मात्रा में या पहले से पर्याप्त मात्रा में लिए गए ड्रग्स अप्रभावी होते है और ड्रग्स लेने की मात्रा को बढ़ावा पड़ जाता है। नशे की लत का शिकार बच्चा 18 वर्ष से कम उम्र का एक व्यक्ति है जो या तो नशे की लत का शिकार है या ड्रग्स पर निर्भर है। नशे का लत दवाईयों, गैरकानूनी ड्रग्स, सिगरेट, खाद्य पदार्थ खाने के साथ प्रयोग लाने वाली चीजें, चिपकाने वाले पदार्थ, सफेदा, पेट्रोल/डीजल, जूते की पॉलिश और आधुनिक रसायनों की हो सकती है। कुछ तरल पदार्थों से निकलने वाली भाप बच्चे के दिमाग के उस हिस्से पर असर करती है, जिससे भूख, ठण्ड और अकेलेपन जैसे एहसास दब जाते है। बच्चे समाज के अवांछित तत्वों द्वारा नशे का प्रलोभन दिए जाने व संगठित ड्रग्स समूहों के द्वारा ड्रग्स व्यापार के लिए इस्तेमाल होने के खतरों के दायरों में होते हैं। वस्तु दुरुपयोग से ड्रग्स के प्रति जबर्दस्त शारीरिक व भावनात्मक निर्भरता पैदा होती है, जिससे लाइलाज दिमागी क्षति और कुछ मामलों में अचानक मृत्यु तक हो सकती है। आमतौर पर एक ही सिंरिंज का उपयोग करते हैं जो की एच.आई. वी./एड्स के खतरनाक ढंग से फैलने का एक बड़ा कारण बनता है। विवादों और आपदा स्थितियों में बच्चे संकट की स्थितियों जैसे युद्ध, विद्रोह, राजनैतिक विवाद, प्राकृतिक व मानव निर्मित आपदाएं और विस्थापन का परिवारों पर एक बड़ा असर पड़ता है, और इन स्थितियों में फंसे बच्चों पर विपरीत शारीरिक व भावनात्मक प्रभाव पैदा करने का कारण बनती है। ऐसे मौकों में अक्सर यह होता है कि बच्चों की जरूरत व उनके अधिकार को पूर्णतः नकार दिया जाता है। उनके जीवन जीने और सुरक्षा के बुनियादी अधिकार गंभीर संकट में होते हैं। विवाद एक ऐसी स्थिति है जिसमें दो या उसके अधिक समूहों के लोग आपस में सहमत नहीं होते, कोई समाधान नहीं ढूंढ सकते और अपने दृष्टिकोणों को बलपूर्वक एक दूसरे से मनवाने की कोशिश करते है। यूनिसेफ, के अनुसार विवाद दो प्रकार के होते हैं। राष्ट्रीय विवाद: ये आंतरिक विवाद हैं, जैसे गृह युद्ध, अपने नागरिकों के खिलाफ राजकीय हिंसा, नागरिक व्यावधान, प्रजातीय हिंसा, विद्रोह, अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा, राज्य के खिलाफ हिंसा, प्रखर कर रहे विद्रोही समूह अन्तर्राष्ट्रीय विवाद: ये आमतौर पर होने वाले युद्ध है। जिनमें व्यापक तौर पर जनक्षति होती है। मुक्ति का युद्ध, युद्ध जो राष्ट्रीय सीमाओं पर होते हैं। आपदायें: इसका अर्थ बड़े स्तर पर जीवन और संपत्तियों को क्षति और विनाश वातावरण में उपस्थित सभी को चोट पहुँचाना है। आपदायें दो प्रकार की होती है:- प्राकृतिक आपदायें: इनमें सूखा, बाढ़, सुनामी, भूकंप, चक्रवात तूफान शामिल है। मानव-निर्मित आपदायें: इनमें जंगल काटने से होने वाले भूक्षरण, भूमि रिसाव और बाढ़ तथा खतरनाक कचरे को वातावरण में मुक्त करने के कारण होने वाली औद्योगिक दुर्घटनाएँ, जिनसे हर प्रकार के जीवन पर विपरीत असर पैदा होता है, शामिल है। विस्थापन: यह व्यक्तियों का उनके घर और जमीनों से बहुत सारी वजहों से अलग किया जाना है। यह विपरीत रूप से बच्चे की बुनियादी सेवाओं तक पंहुच और सेवाओं जैसे स्वास्थ्य और पोषण, शिक्षा और कल्याण सेवाओं को प्रभावित करता है। यह बच्चे के बुनियादी मानवधिकारों जैसे घर और गरिमापूर्ण जीवन का हनन करता है। विकास्पूर्ण, आधारभूत संरचनात्मक या औद्योगिक प्रोजेक्ट लोगों को उनके पारिवारिक घरों, जमीनों, पेशा और समुदायों से विस्थापित करते हैं। विस्थापन के दूसरे रूप टूटे बिखरे हुए घर और झुग्गी फुटपाथ को ढाहना और वहाँ से निष्कासन जो एक महानगरीय परिघटना है। इनका सबका असुरक्षित बच्चों के जीवन पर बड़ा असर पड़ता है और यह उनकी स्थिरता, सुरक्षा, पहचान और सुरक्षा के एहसास के खोने का कारण बनता है। आपदायें मनोवैज्ञानिक क्षति, सदमा और सुरक्षा की हमेशा के लिए खत्म हो जाने वाली चेतना का भी कारण बन सकते हैं। संकटग्रस्त परिवारों के बच्चे संकटग्रस्त परिवार ऐसे परिवार होते हैं जिनकी सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक दबाव या किसी अन्य मनोवैज्ञानिक संकट के कारण बिखरने या उनके सम्बन्ध टूटने की सम्भावना रहती है। इन परिवारों के बच्चे अवहेलना, परित्याग और दरिद्रता को लेकर अधिक असुरक्षित रहते हैं। संकटग्रस्त इन परिवारों में से कुछ है एकल अभिभावकीय परिवार अभिवावक जिनके पास गर्रीबी के कारण अपनी अभिभावकीय भूमिका पूरी करने के लिए आर्थिक स्रोतों को कमी है। अभिभावक जो लगातार या समय-समय पर बीमार रहते हैं या मानसिक रूप से अक्षम होते हैं। अभिभावक जो अपराध या असामाजिक क्रियाओं में लिप्त रहते हैं। कैदियों के बच्चे विकलांगता के कारण भिन्न तरीके से सक्षम या अक्षम बच्चे भिन्न प्रकार से योग्य वह होते हैं जो विकलांगता के कारण सामान्य मानसिक व शारीरिक क्रिया करने में कठिनाई महसूस करते हैं उदाहरण के लिए, चलने में, सुनने में, बोलने में और देखने में कठिनाई। जब एक व्यक्ति की सामान्य क्रियाओं में यह विकलांगता दखल देता है तब इसे विकलांगता कहा जाता है। जिस का अर्थ है घूम-फिर न पाने से कार्य करने और कमाने में अयोग्यता। इस प्रकार के लोग पूरी तरह या आंशिक तौर पर सामान्य व्यक्तिगत या सामाजिक जीवन जीने में अक्षम होते हैं, और यह जन्मजात असमर्थता या शारीरिक या मानसिक क्षमताओं में कमी के फलस्वरूप होता है। बच्चे निम्नलिखित में से किसी भी चुनौती/असमर्थता से पीड़ित हो सकते हैं चलने फिरने में असमर्थता सुनने की असमर्थता बोलने की असमर्थता देखने की असमर्थता सीखने में असमर्थता मानसिक रूप से असमर्थता दिमागी तौर पर कमजोर होने से अनियंत्रित या सेरेब्रल पाल्सी इसके कारण हो सकते हैं: जन्मजात: समान रक्त सम्बन्ध में शादी जन्म के समय परिवार में किसी बीमारी का इतिहास जन्मजात बहरापन और क्रमोसोम सम्बन्धित असंतुलन इसके कुछ अनुवांशिक तथ्य है। वातावरण जन्य: गर्भ के दौरान मातृ स्वास्थ्य-ख़राब पोषण, छोटी उम्र, गर्भ के दौरान बिमारी भ्रूण को कुछ दवाईयां आसध्य क्षति पंहुचा सकती है। दुर्घटना और बीमारी बच्चों में असक्षमता का कारण बन सकते हैं। बच्चों की विशेष आवश्यकताओं का ध्यान और शिक्षा एक बड़ी चुनौती है, जबकि कुछ भिन्न रूप से योग्य बच्चे विशेष विद्यालयों में शिक्षित होते है, तब भी वे अपने हम उम्रों से अलग-थलग रहते हैं और उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाना कठिन होता है। यह अलगाव कमजोर स्वाभिमान, बर्बादी का एहसास, आत्मविश्वास की कमी और भेदभाव के एहसास को बढ़ावा के सकता है। भिन्न रूप से योग्य बच्चे उत्पीड़न अवहेलना और परित्याग जैसे मामलों में ज्यादा असुरक्षित होते हैं। परिपूर्ण शिक्षा संस्थानों तक पहुँच घूमने फिरने के लिए वातावरण को सुगम्य बनाना जैसे कुछ हस्तक्षेप हैं जिनकी जरूरत है। मानसिकता रूप से बीमारी बच्चा एक मानसिक रूप से बीमार बच्चा, 18 वर्ष से कम उम्र का व्यक्ति है जो मानसिक बीमारी से पीड़ित है। मानसिक बीमारी नामक शब्द में बहुत सी मनोवैज्ञानिक विकार शामिल है। यह एक ऐसी बीमारी है, जो बच्चे की सामान्य क्रियाओं को प्रभावित करती है। यह बीमारी बिना किसी लक्षण के दिखने से लेकर अयंत जटिल, अवसादित या निष्कासित होने तक खतरनाक पाई जाई है। यह बच्चे के दूसरों के साथ-व्यवहार करने के तरीकों पर असर दाल सकती है। मानसिक बीमारी एक असक्षमता है और इस स्थिति से ग्रस्त बच्चे इलाज में अच्छे नतीजे देते हैं। कुछ मानसिक बीमारियों और व्यवहारगत समस्याओं में अंगूठा चुसना, नाख़ून कुतरना, हकलाना, भगोड़ापन, झूठ बोलना, चोरी, गहरा अवसाद, मनोरोग, सिजिफेनिया और आत्महंतात्मक प्रवृतियाँ है। यह कारक जन्मजात तथ्यों तथा सख्त यंत्रनापूर्ण माहौल जैसे उत्पीड़न, उपेक्षा और शोषण का समन्वय है। इनमें अनेक तरह से हस्तक्षेप किया ज सकता है जैसे अस्पताल में भर्ती करना, मनोचिकित्सकीय सहयोग और लम्बी अवधि की मनोचिकित्सा और बाल निरीक्षण केंद्र में काउंसिलिंग। यह महत्वपूर्ण है कि मानसिक रूप से बीमार बच्चों में लक्षणों की पहचान हो, ताकि तुरन्त हस्तक्षेप व इलाज को उपलब्ध किया जा सके। एच.आई.वी./एड्स प्रभावित/संक्रमित बच्चे एच.आई.वी./एड्स को महामारी के तुलना में खतरनाक माना जाता है और यह एक गंभीर चिंता का विषय है एच.आई.वी./एड्स प्रभावित बच्चे अधिकांशतः प्रायः परिस्थितयों के शिकार होते हैं और उन्हें सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ सकता है। बच्चे जो इससे संक्रमित या प्रभावित हैं, उन्हें आवासीय देखरेख, गोद लेकर देखभाल, चिकित्सकीय निगरानी के रूप में और सुरक्षा के अन्य सभी रूपों में हस्तक्षेप की आवश्यकता है। कुछ बच्चे जो अधिक असुरक्षित है बच्चे जिनके बारे में निश्चित है कि वे वायरस से संक्रमित हैं बच्चे जो एच वाई वी पॉजिटिव मो से पैदा हुए हैं और वायरस को गर्भाशय से प्राप्त किया है। बच्चे जिन्हें बीमारी के कारण खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। ड्रग्स के आदी बच्चे बच्चे जो यौन रूप से उत्पीड़ित या शोषित है। एच आई वी अभिवावक/परिजन के यहाँ प्रभावित बच्चे अत्यंत संकटपूर्ण समुदायों में एच आई वी असुरक्षित बच्चे। कुछ समस्याएं जिनका सामना किया गया है। पूर्वाग्रह और सामाजिक बहिष्कार, भेदभाव. शोषण और उत्पीड़न का कारण बनते हैं। शिक्षण के पहुँच को ख़ारिज करना। संक्रमित अभिभावकों की कमाने की क्षमता घटती है और प्रायः बच्चों को आर्थिक दबावों के कारण कमाना पड़ता है जो बच्चों पर आश्रित परिवारों का कारण बनता है। बच्चों के लिये भावनात्मक व शारीरिक असुरक्षा। विधि का उल्लंघन करनेवाले किशोर क़ानूनी तौर पर अपराध को कानून के उल्लंघन के रूप में परिभाषित किया जाता है। किशोर अपराधी वह होते हैं जिनकी आयु 18 वर्ष से कम होती है और जिन पर अपराध करने का आरोप होता है जिन्हें किशोर न्याय प्रणाली प्रारूप के तहत पुलिस दे द्वारा बन्दी रखा जाता है। बच्चे नकारात्मक उत्पीड़क स्थिति से असुरक्षित होते हैं और प्रायः अपराध में शामिल होने के लिए वयस्कों के द्वारा उत्प्रेरित किये जाते हैं। उन्हें भी अनुकूल पुनर्वास के लिए संवेदनात्मक व सुरक्षात्मक मानकों की जरूरत होती है और ये भी बच्चे होते हैं जिसके लिए वे दोषी बनते हैं जिन्हें देखरेख व सुरक्षा की जरूरत होती है। कुछ चीजें जो अपराध कही जा सकती है: घर में घुस के चोरी करना व छोटी मोती चोरियां हत्या बलात्कार/छेड़खानी और यौन उत्पीड़न दूसरों को खतरनाक चोट देना या घायल कर देना दूसरे अल्प अपराध किशोर अपराध का कारण बनने वाले कुछ कारक: गरीबी-गरीबी बच्चों के बढ़ने व विकास के लिए सामाजिक-सांस्कृतिक व आर्थिक अवसरों से वंचित करती है। गरीबी से सम्बन्धित परिस्थतियों जैसे अत्यंत भूख, बीमारी, लत, अभिभावकीय अवहेलना स्थिति को अधिक बदतर बनाती है। ऐसे बच्चे दूसरों की तुलना में अपराध में लिप्त होने से ज्यादा बड़े संकट से घिरे होते है। परिवार-परिजनों की आपराधिक क्रियाएं बच्चों को उत्प्रेरित करती है और कभी-कभी वे स्वयं बच्चे की अपराध करने के लिए बाध्य करते हैं। समुचित दिशानिर्देश व अनुशासन का आभाव-अस्थिर अनुशासन, अभिभावकों में मतभिन्नता, उत्पीड़क अभिभावकत्व, एक कमजोर आत्मचित एवं व्यक्तित्व सम्बन्धित समस्याएँ पैदा कर सकती है, बच्चों को घर से बाहर नकारात्मक उत्प्रेणाओं के प्रति असुरक्षित बना सकती है। पारिवारिक स्थिति-संकटग्रस्त परिवारों का बिखराव, गंभीर पारिवारिक संकट, व्यवस्था, स्थानान्तरण और शहरीकरण सभी को कमजोर किया है। घर में तनाव, भावनात्मक व्यावधान और उत्पीड़क बच्चों को घर से अलग रहने के लिए दबाव बना सकता है और अपराधिक प्रभावों के प्रति असुरक्षित बना सकता है। उत्पीड़क के शिकार-शोधों से बाल उत्पीड़न और बाल अपचारिता के बीच एक सहसंबंध का पता चलता है। विद्यालय छोड़ना- नियमित रूप से विद्यालय न जाने के फलस्वरूप भोगोड़पन, अस्वस्थ, खाली क्रियाकलाप और जीविका के लिए मामूली अपराधों में लिप्त होने की बात सामने आती है। मिडिया में प्रदर्शन- मिडिया में दिखने वाली हिंसा के खतरे बच्चों में न सिर्फ शारीरिक आक्रामकता बढ़ाती है बल्कि उन्हें हिंसा के प्रति ज्यादा स्वीकार्य बनाती है। हम उम्रों का प्रभाव-किशोरावस्था में ड्रग्स, मदिरापान, जुआ, गलत यौनव्यवहार के साथ प्रयोग व शीघ्र धन की इच्छा, युवा गिरोहों में लिप्तता, हिंसा और अपराध की तरफ बढ़ाती है। सही यौन शिक्षा के अभाव के कारण युवा बच्चे यौन शोषण, छेड़छाड़ और यहाँ तक की बलात्कार में लिप्त हो जाते हैं। गैर-संस्थागत सेवाओं का औचित्य बच्चों की लम्बी अवधि के संस्थाकरण के कुछ नकारात्मक पक्ष भावनात्मक रूप से वंचित अलगाव का तवाव मातृत्व से वंचित गुमनामी और व्यक्तिगत ध्यान की कमी कमजोर आत्म प्रतिष्ठा समाज की मुख्यधारा व उसमें समायोजित होने में कठिनाई विश्वास के प्रति असफलता विकासत्मक देरी समाज से अलगाव एवं पृथक्कीकरण शारीरिक उत्पीड़न व यन्त्रणा अत्यधिक नियमबद्धता स्त्रोत: चाईल्डलाईन इंडिया फाउंडेशन