परिचय हिला सकी न तोप फिरंगी, न झुका सका कोई अभिमान, मिट्टी का यह लोहागढ़, है पूरे ब्रज की शान।" इतिहास की किताबों में साल 1803 से 1805 का दौर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के चरम उत्कर्ष का समय माना जाता है। लॉर्ड वेलेजली की 'सहायक संधि' के आगे भारत की बड़ी-बड़ी रियासतें घुटने टेक चुकी थीं। लेकिन इसी दौरान, दिल्ली और आगरा के ठीक बीच में स्थित भरतपुर रियासत में इतिहास का एक ऐसा पन्ना लिखा जा रहा था, जिसने गोरे जनरलों के घमंड को धूल में मिला दिया। कहने को तो भरतपुर रियासत ने भी अंग्रेजों से संधि की थी लेकिन जब बात शरणागत कि रक्षा कि आई तो उन्होंने शरणार्थी की रक्षा करना अपना कर्तव्य समझा और अग्रेंजों से युध्द लड़ा जिसमें अंग्रेजों को पराजित भी किया जिसकी गवाई ये लोहागढ़ का दुर्ग देता है। लोहागढ़ का इतिहास सन् 1733 भरतपुर के महान जाट महाराजा सूरजमल ने लोहागढ़ किले का निर्माण शुरू करवाया। राजपूत वास्तुकला के विपरीत, उन्होंने इस किले को किसी ऊंचे पहाड़ पर नहीं, बल्कि मैदानी इलाके पर बनाया। महाराजा सूरजमल एक सैन्य जानकार थे। उन्होंने किले की मुख्य पत्थरों की पक्की दीवार के बाहर 7 किलोमीटर लंबी और 30 फीट चौड़ी मिट्टी की एक विशाल सुरक्षात्मक दीवार बनवाई। इसके बाहर सुजान गंगा नहर खोदी गई, जिसमें 'मोती झील' का पानी लाकर भरा गया। इस गहरी खाई में उस दौर में खतरनाक मगरमच्छ पाले जाते थे ताकि पैदल सेना कभी किले की दीवार तक पहुँच ही न सके। अंग्रेजों से युध्द 2 जनवरी 1805 को जनरल लेक और भरतपुर के महाराजा के मध्य युध्द शुरु हुआ। मराठा शासक यशवंतराव होल्कर को शरण देने के कारण, ब्रिटिश जनरल जेरार्ड लेक अपनी तोपखाने की रेजिमेंट और हज़ारों सैनिकों के साथ भरतपुर की जमीन पर आ धमका।9 जनवरी 1805 को जब अंग्रेज़ों ध्दारा भारी बमबारी की गई तब भी वे दीवार में सिर्फ एक छोटा सा छेद ही कर पाए।इसलिए उन्होंने उसी रात कर्नल मेिटलैंड के नेतृत्व में किले पर धावा बोल दिया लेकिन वे कीचड़ और सुजान गंगा नहर के गहरे पानी को पार नहीं कर पाए। इस पहले ही हमले में 400 ब्रिटिश सैनिक मारे गए। 2 जनवरी से 22 फरवरी 1805 के बीच ब्रिटिश सेना ने किले पर एक के बाद एक चार बड़े हमले किए। इतिहास के दस्तावेजो के अनुसार भरतपुर के सैनिकों ने किले की दीवारों से अंग्रेज़ों के दागे गए तोप के गोलों को वापस खोदकर निकालकर उन्हें अपनी तोपों में भरकर वापस अंग्रेज़ों पर ही दागा था।लगातार छह सप्ताह तक चली इस घेराबंदी में ब्रिटिश सेना को भारी जान-माल का नुकसान हुआ। इतिहासकार दर्ज करते हैं कि इस लड़ाई में 3,200 से अधिक ब्रिटिश सैनिक और अधिकारी मारे गए और घायल हुए, जबकि भरतपुर की तरफ यह आंकड़ा बेहद कम था। ब्रिटिश सैन्य इतिहास में यह लॉर्ड लेक की सबसे बड़ी और शर्मनाक पराजय थी। आखिरकार, ब्रिटिश सेना को अपनी तोपें पीछे हटानी पड़ीं। मिट्टी का भौतिक विज्ञान इस किले को वैज्ञानिक विधि से बनाया गया।जहाँ अक्सर किलो की दीवारें तोपों के प्रहार से चटक कर टूट जाती हैं, वहाँ लोहागढ़ की संकुचित गीली मिट्टी के कारण तोप के गोलों की गतिज ऊर्जा पूरी तरह सूख जाती है। जिससे तोप के दहकते गोले मिट्टी में धंसकर ठंडे हो जाते थे और किले को कोई हानि नही होती थी निष्कर्ष इस किले को आज तक कोई जीत नहीं पाया इसलिए इसे "अजेय दुर्ग" कहते है यह अपने विशाल आकार में भरतपुर के गर्व को शांत छुपाए खड़ा है। हमें गर्व होना चाहिए अपनी मातृभूमि पर कि हमने इस पर जन्म लिया है। हमें अपने इतिहास से सीख लेनी चाहिए। और अपने स्वाभिमान की रक्षा करनी चाहिए।