परिचय बच्चों की वृद्धि और विकास के लिए गुणवत्तापूर्ण प्रारंभिक अनुभव महत्वपूर्ण होते हैं। शोधों से ज्ञात हुआ है कि सीखने के गुणवत्तापूर्ण प्रारंभिक अनुभवों का विद्यालय में समायोजन और बाद के वर्षों की शिक्षा एवं सीखने के स्तरों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। प्रारंभिक वर्षों में बच्चों के मस्तिष्क का तीव्रता से विकास होता है, उनकी सामाजिक और व्यक्तिगत आदतें तेज़ी से पनपती हैं और बच्चों के सर्वांगीण विकास की नींव पड़ती है। प्रारंभिक अवस्था में बच्चों के सीखने के स्तर में बढ़ोत्तरी करने के लिए यह आवश्यक है कि उन्हें पूर्व-प्राथमिक विद्यालय में गुणवत्तापूर्ण अनुभव प्रदान किये जाएँ। गुणवत्तापूर्ण पूर्व-प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराना संधारणीय विकास के लक्ष्य 2030 का भी एजेंडा है। इन वर्षों में हर बच्चे के लिए भावात्मक रूप से सहायक और प्रेरक खेलयुक्त परिवेश प्रदान करने के लिए निवेश करना अहम है। यह हर बच्चे का अधिकार ही नहीं, वरन जीवन के लिए एक सुदृढ़ आधार प्रदान करने का माध्यम भी है। बच्चे के जीवन के पहले आठ वर्ष निर्माणात्मक वर्ष होते हैं, जिन्हें मस्तिष्क की वृद्धि और विकास के लिए महत्वपूर्ण समय माना जाता है। हाल ही में हुए तंत्रिकाविज्ञान अनुसंधानों (ब्रेन रिसर्च) ने बच्चे के जीवन के प्रारंभिक वर्षों के महत्व की पुष्टि की है। अनुसंधानों से पता चला है कि प्रारंभिक बाल्यावस्था के वर्षों में सार्थक संज्ञानात्मक, भाषायी, सामाजिक और गत्यात्मक क्षमताओं के विकास के लिए कुछ विशिष्ट अवधियाँ’ महत्वपूर्ण होती हैं, जो बाद के जीवन की सफलता में योगदान देती हैं। यह अवस्था सामाजिक मूल्यों और व्यक्तिगत आदतों के निर्माण की नींव में भी महत्व रखती है। इस अवस्था में बच्चे अपने चारों ओर के लोगों और संसार के प्रति उसके रंगों, आकृतियों, ध्वनियों, आकारों और रूपों के प्रति मुग्ध एवं जिज्ञास होते हैं। दसरों से जड़ने और उनके साथ अपनी भावनाओं को साझा करने की यह योग्यता सीखने का विशेष आधार बनती है। बच्चों में संसार को अनुभव करने की योग्यता अधिक समृद्ध और विभिन्नता प्रदान करने वाली होती है। अपने परिवेश की खोजबीन करने हेतु बच्चे प्रेक्षण, प्रश्न पूछने, चर्चा करने, अनुमान लगाने, विश्लेषण करने, खोज करने, जाँच-पड़ताल करने और प्रयोग करने में व्यस्त हो जाते हैं। इस प्रक्रिया में वे व्यापक और विस्तृत संकल्पनाओं और विचारों की रचना करते हैं, उनमें सुधार करते हैं और उन्हें विकसित करते हैं। बच्चों को प्रेक्षण, खोजबीन और जाँच-पड़ताल के पर्याप्त अवसर देने की आवश्यकता होती है, ताकि वे अपने आस-पास के और व्यापक परिवेश की समझ विकसित कर सकें। छोटे बच्चे एक भावनात्मक रूप से सहायक और सक्षम परिवेश में सबसे अच्छी तरह सीखते हैं, जहाँ एक उत्तरदायी शिक्षक बच्चों के साथ सुरक्षित और सुदृढ़ संबंध बनाने में मदद करता है। ऐसे वातावरण में बच्चे खोजबीन करने, अभिव्यक्त करने, सीखने और आत्मविश्वास हासिल करने हेतु स्वतंत्रता का अनुभव करते हैं। साथ ही यह स्वभाविक न्याय (इक्विटी) को प्रोत्साहित करता है, विद्यालय की उपस्थिति में सुधार लाता है, मानव संसाधन में उच्च योगदान अर्पित करता है और समुदायों तथा समाजों को व्यापक लाभ भी पहुँचाता है। अत: प्रत्येक बच्चे को समर्थ बनाने वाला वातावरण सुनिश्चित करने के लिए इन प्रारंभिक वर्षों में निवेश करना महत्वपूर्ण होता है, जो कि न केवल उनका अधिकार है, बल्कि जीवनपर्यंत सीखने की नींव डालने का एक तरीका भी है। ऐसा बेहतर प्रावधान सुनिश्चित करके छोटे बच्चों को गुणवत्तापूर्ण पूर्व-प्राथमिक शिक्षा दी जा सकती है। भारत सरकार ने पूर्व-प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने के लिए कई प्रावधान किये हैं, जैसे स्वास्थ्य और देखभाल सुविधाओं की उपलब्धि, आधारिक संरचना, पाठ्यचर्या, शिक्षक-प्रशिक्षण और शिक्षणअधिगम को बढ़ावा देने के प्रयास। (राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986; राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005; राष्ट्रीय प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा नीति, 2013;राष्ट्रीय प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा पाठ्यचर्या की रूपरेखा, 2013 और प्रारंभि देखभाल और शिक्षा के लिए गुणवत्ता मानक, 2013)। अभी हाल में किये गए सर्वेक्षण के अनुसार देश में 3 से 8 वर्ष के बच्चों, अर्थात विद्यालय-पूर्व और प्रारंभिक विद्यालय शिक्षा (कक्षा 1 और 2) के लिए प्रावधानों तक पहुँच में वृद्धि हुई है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के लागू होने के साथ, अब सभी बच्चों से अपेक्षा की जाती है कि वे 6 वर्ष के होने पर विद्यालय आएँ। शोध द्वारा पता चलता है कि बच्चों की एक बड़ी संख्या अपर्याप्त विद्यालयी तैयारी के साथ प्राथमिक कक्षाओं में प्रवेश लेती है जिसकी वजह से उनके सीखने का स्तर कम रह जाता है तथा विद्यालय से बाहर होने की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं। साथ ही, राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसे पूर्व-प्राथमिक विद्यालय के लिए मानक प्रतिमान की आवश्यकता है जो लचीला हो और प्रासंगिकता के अनुसार कार्यान्वयनकर्ताओं द्वारा अनुकूल बनाया जा सके। प्रारंभिक वर्षों में बच्चों को विकास एवं आयु अनुरूप उपयुक्त सीखने के अवसर देने की आवश्यकता है जो उन्हें औपचारिक शिक्षा के लिए तैयार करते हैं और विद्यालय शिक्षा में प्रवेश को सहज और निर्बाध बनाते हैं। इस संदर्भ में, गुणवत्तापूर्ण पूर्व-प्राथमिक विद्यालय कार्यक्रम को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए एक दिशानिर्देश पुस्तिका विकसित करने की आवश्यकता महसूस की गई। यह दिशानिर्देश किसके लिए हैं यह दिशानिर्देश सरकारी और निजी, दोनों क्षेत्रों के शिक्षकों, शिक्षक-प्रशिक्षकों, नियोजकों, अनुसंधानकर्ताओं, प्रशासकों और पूर्व-प्राथमिक विद्यालयों के मालिकों के लिए हैं। यह दिशानिर्देश आवश्यक भौतिक आधारिक संरचनाओं, शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात, स्टाफ की योग्यताओं, वेतन और उनकी भूमिकाओं तथा उत्तरदायित्वों के बारे में जानकारी देते है। यह प्रवेश प्रक्रिया, सुरक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण के साथ-साथ बनाए जाने वाले रिकॉर्डों और रजिस्टरों पर प्रकाश डालते हैं। यह पाठ्यचर्या का संक्षिप्त परिचय देते हैं और समन्वयन तथा अभिसरण की आवश्यकता पर ध्यान केंद्रित करते हैं। यह दिशानिर्देश कक्षा 1 से पूर्व 3 वर्ष की पूर्व-प्राथमिक शिक्षा पर बात करते हैं। 3 वर्ष की आयु पूरी होने पर पूर्व-प्राथमिक विद्यालय मेंप्रवेश की अनुशंसा की गई है। यह दिशानिर्देश 3 वर्ष से कम आयु के बच्चों के संबंध में बात नहीं करते हैं। यह 3-6 वर्षों की आयु के बच्चों की शैक्षिकआवश्यकताओं पर बात करते हैं। पूर्व-प्राथमिक शिक्षा की परिभाषा पूर्व-प्राथमिक शिक्षा वह शिक्षा है जो 3-6 वर्ष के आयुवर्ग के बच्चों को दी जाती है। यह संयोजित शिक्षा का पहला स्तर है। पूर्व-प्राथमिक शिक्षा को प्री-स्कूल शिक्षा के नाम से भी जाना जाता है। यह सरकारी और निजी विद्यालयों में किसी भी एक व्यवस्था जैसे आँगनवाड़ी, नर्सरी स्कूल, प्री-स्कूल, प्रिपरेटरी स्कूल, किंडरगार्डन, मॉन्टेसरी स्कूल, और पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के नाम से दी जाती है। पूर्व-प्राथमिक शिक्षा की परिकल्पना पूर्व प्राथमिक शिक्षा 3-6 वर्ष के आयुवर्ग के सभी बच्चों के सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित करने के लिए सर्वव्यापक, न्यायसंगत, आनंददायक, समावेशी और संदर्भित सीखने के अवसरों की उपलब्धता को बढ़ावा देने पर विचार करती है। यह सब अभिभावकों और शिक्षकों द्वारा बच्चों को भावात्मक रूप से समर्पित, सांस्कृतिक रूप से स्थापित, बाल-अभिमुखी, प्रेरक अधिगम वातावरण उपलब्ध कराके सुनिश्चित किया जा सकता है। यह खेल और विकास संबंधी उपयुक्त पद्धतियों के माध्यम से जीवन भर सीखने के लिए प्रबल आधार निर्मित करके अभिव्यक्ति क्षमता को अधिकतम करने पर लक्षित होती है। यह स्वस्थ प्रवृत्ति, अच्छे मूल्य, विवेचनात्मक चिंतन, सहयोग, संप्रेषण, रचनात्मकता, प्रौद्योगिकी, साक्षरता तथा सामाजिक-भावात्मक विकास को विकसित करना और पूर्व-प्राथमिक विद्यालय से प्राथमिक विद्यालय में आना भी सुनिश्चित करती है। इससे बच्चे भविष्य में उत्पादक और संतोषप्रद जीवन प्राप्त करते हैं। पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के लक्ष्य पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के अति महत्वपूर्ण लक्ष्य हैं सर्वांगीण विकास और जीवनपर्यंत सीखने के लिए सुदृढ़ आधार उपलब्ध कराना। बच्चे को विद्यालय के लिए तैयार करना पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के उद्देश्य बाल-हितैषी वातावरण सुनिश्चित करना जहाँ प्रत्येक बच्चे का महत्व हो, उसे आदर मिले, वह सुरक्षा और सुदृढ़ता का अनुभव करे और एक सकारात्मक आत्मधारणा विकसित करे। अच्छे स्वास्थ्य, खुशहाली, पोषण, स्वस्थ आदतें और स्वच्छता के लिए ठोस आधार तैयार करना। बच्चों को प्रभावी संप्रेषक बनने और ग्रहणशीलतथा भावबोधक दोनों भाषाओं को विकसित करने में सक्षम बनाना। बच्चों को भागीदार शिक्षार्थी बनने, विवेचनात्मक रूप से सोचने, रचनात्मक, भागीदार, संप्रेषक बनने औरअपने आस-पास के परिवेश से जुड़ने में मदद करना। बच्चों द्वारा पूर्व-प्राथमिक से प्राथमिक विद्यालय में बदलाव को सहज रूप से समायोजित करना। अभिभावकों और समुदायों के साथ हर बच्चे के विकास के अवसर प्रदान करने हेतु एक जोड़ीदार के रूप में कार्य करना। पूर्व-प्राथमिक विद्यालयों के वर्तमान मॉडल देश में बच्चों के लिए विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम उपलब्ध हैं। वर्तमान मॉडलों में आँगनवाड़ी, निजी पूर्व-प्राथमिक विद्यालय (स्वचालित), पूर्व-प्राथमिक अभिभागों वाले सरकारी/निजी विद्यालय और सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में स्थित आँगनवाड़ियाँ शामिल हैं। वर्तमान अभिसरण के लिए अनुशंसाएँ एकीकृत बाल विकास योजना कार्यक्रम के अंतर्गत (एकल)चलने वाली आँगनवाड़ियाँ 3 से 6 वर्ष के मध्य आयु के बच्चों के लिए निजी, गैर-सरकारी संगठनों (एन.जी.ओ.) द्वारा चलाए जाने वाले (एकल) पूर्व-प्राथमिक विद्यालय प्राथमिक विद्यालयों के प्रांगण में चलने वाली (को-लोकेटड) आँगनवाड़ी प्राथमिक विद्यालयों के साथ जुड़े पूर्व-प्राथमिक अभिभागों युक्त सरकारी या निजी विद्यालय पूर्व-प्राथमिक और प्राथमिक विद्यालयों को सहज रूप से संयोजित करने के लिए उनके मध्य प्रबल अभिसरण और संबंध (पाठ्यचर्या, शिक्षणशास्त्र, भौतिक संसाधनों को साझा करना, संयुक्त गतिविधियाँ स्थापित करना।) प्राथमिक कक्षाओं के साथ संयोजन(लिंकेज) पूर्व-प्राथमिक और प्रारंभिक प्राथमिक कक्षाएँ शिक्षा के लिए, विद्यालय के लिए और जीवन के लिए बुनियादी स्तर का निर्माण करती हैं। 3-8 वर्ष की आयुवर्ग के बच्चे विकासात्मक सततता प्रदर्शित करते हैं, अत: पाठ्यचर्या, शिक्षणशास्त्र और सीखने के प्रतिफलों के बीच ऊर्ध्वमुखी संबंध होने की आवश्यकता है। इसके लिए संबंध के तीन क्षेत्रों की पहचान की गई है, जो हैं व्यवस्थाएँ, तंत्र और व्यक्ति। ऐसे संबंधों को निम्न प्रकार सुनिश्चित किया जा सकता है पूर्व-प्राथमिक विद्यालयों को प्राथमिक विद्यालयों के परिसर या उनके आस-पास स्थापित करना। कक्षा 1 और 2 की भौतिक व्यवस्थाओं को पूर्व-प्राथमिक विद्यालयों के समान ही नियोजित किया जाना चाहिए, जिसमें गतिविधि कोने, मुद्रित सामग्री से समृद्ध परिवेश और बच्चों के कार्य का प्रदर्शन हो। बैठने की व्यवस्था ऐसी हो, जिसमें बच्चे आपस में बातचीत कर सकें और अनुभव साझा कर सकें,समस्या-समाधान कौशल, सहन करने/सामना करने के कौशल विकसित कर सकें, नियमों का पालन करेंऔर सामाजिक तथा भावात्मक स्वस्थता की समझ प्राप्त कर सकें। सिखाने और सीखने में समान शिक्षणशास्त्रीय प्रक्रियाओं का उपयोग करने के साथ-साथ विद्यालय के भौतिक तथा सामाजिक-भावात्मक परिवेश (आधारिक-संरचना, संसाधनों, शिक्षक-बालक पारस्परिक क्रियाएँ, आदि) के विषय में अच्छी जानकारी बनाए रखें। पूर्व-प्राथमिक और प्राथमिक विद्यालय के शिक्षकों में की जाने वाली गतिविधियों और बच्चों के पोर्टफोलियो के माध्यम से उनकी प्रगति को साझा करने के लिए निरंतर बातचीत होनी चाहिए। प्राथमिक कक्षाओं के साथ संसाधनों को साझा करने और वार्षिक दिवस, खेलकूद दिवस, प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा दिवस, त्योहार, बाल मेला, वृक्षारोपण दिवस जैसी गतिविधियों को साथ-साथ करने की आवश्यकता है। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद