पूर्व प्राथमिक शिक्षा की भूमिका पूर्व प्राथमिक शिक्षा एक विशिष्ट प्रकार की शिक्षा है, पूर्व प्राथमिक शिक्षा को प्राथमिक शिक्षा के पूर्व की शिक्षा के रूप में स्वीकार करते हुए प्रत्येक प्राथमिक शिक्षा केंद्र में पूर्व प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था को अनिवार्य करना चाहिए।पूर्व प्राथमिक शिक्षा के लिए इस क्षेत्र में विशेष प्रशिक्षण प्राप्त शिक्षक/शिक्षिकाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। जिसके माध्यम से परिवार के साथ साथ स्कूल में भी बच्चों को पूर्व प्राथमिक शिक्षा मिल सके। पूर्व प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य (क) पूर्व प्राथमिक शिक्षा केंद्रों तथा प्राथमिक विदयालयों में सामंजस्य(जुड़ाव) होना चाहिए। (ख) पर्व प्राथमिक शिक्षा व प्राथमिक शिक्षा से संबंधित सभी प्रशिक्षण कार्यक्रमों में शिशु-उद्दीपन का तत्त्व जोड़ा जाए। पर्व प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में संदर्भ साहित्य तथा प्रशिक्षण सामग्री की कमी है, जिसका विकास किया जाना आवश्यक है। सीधे कक्षा 1 में प्रवेश लेने वाले प्रत्येक बच्चे को विद्यालयोन्मुखी (School Readiness) कार्यक्रम का लाभ मिलना चाहिए। 'स्कूल रेडिनेस' को कक्षा 1 के पाठयक्रम का अनिवार्य अंग भी बनाना चाहिए। पूर्व प्राथमिक शिक्षा एक विशिष्ट प्रकार की शिक्षा है, जिसका स्वरूप अन्य स्तरों पर दी जानेवाली शिक्षा से भिन्न है। इसीलिए इसे अधिक प्रभावी और गतिशील बनाने के लिए निम्नलिखित संगठन/संस्थाएं/विभागों को सक्रिय सहयोग देना चाहिए : ग्राम शिक्षा समिति नर्सरी स्कूल महिला मंडल सामाजिक कार्यकर्ता अभिभावक/समुदाय-संपर्क कार्यक्रम प्रमोसन के माध्यम मीडिया आकाशवाणी दूरदर्शन समाचारपत्र, पत्रिकाएं वीडियो फिल्में इंटरनेट अन्य माध्यम जैसे चार्ट्स, पोस्टर्स, नुक्कड़ नाटक आदि का प्रयोग भी किया जाना चाहिए। तीन-चार वर्ष की कोमल आयु में नर्सरी में दाखिले के लिए बच्चों की प्रवेश परीक्षा ली जाती है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा, शिक्षा का प्रारंभिक बिंदु है। पूर्व प्राथमिक कक्षा में प्रवेश लेने वाले बच्चे से किसी भी पूर्व ज्ञान की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। अतः इतने छोटे बच्चों की प्रवेश परीक्षा नहीं लेनी चाहिए। नर्सरी में प्रवेश के बाद 'थ्री आर्स' (3 Rs- Reading, Writing Arithematic) सीखने पर विशेष बल दिया जाता है। जबकि इतने छोटे बच्चों को हमें 'पढ़नें', 'लिखने' व 'गणित' सीखने के लिए तैयार करना चाहिए, उदाहरण के लिए लिखना शुरू करने से पहले हमें बच्चों को लिखने की तैयारी के लिए क्रियाएं करानी चाहिएं जैसे - मोती पिरोना, बिंदु से बिंदु जोड़ना, आड़ी-तिरछी रेखाएं खींचना। पूर्व प्राथमिक शिक्षा को प्राथमिक शिक्षा का लघु रूप (downward extension) समझकर बच्चों को इस स्तर पर पढ़ाने, लिखाने एवं गणित सिखाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। बच्चे जिज्ञासु एवं खोजी प्रवृत्ति के होते हैं, अतः उन्हें ऐसा अनुकूल वातावरण दिया जाना चाहिए, जिसमें वे विविध प्रकार के अनुभव स्वयं प्राप्त कर सकें तथा उनमें सही संबंधों का निर्माण हो सके। इतने छोटे बच्चों को गृहकार्य करने को दिया जाना उचित नहीं। पूर्व प्राथमिक शिक्षा का उद्देश्य स्कूल वातावरण को आनंददायक एवं रुचिकर बनाना है, 'थ्री आर्स' (पढ़ना, लिखना, गणित) को महत्त्व देना नहीं है, अत: गृहकार्य नहीं दिया जाना चाहिए। प्रायः यह पाया गया है कि बहुतसे नर्सरी स्कूल शिशु-शिक्षा का कार्यक्रम मनमाने ढंग से चलाते हैं। पढ़ने-लिखने व गणित का विधिवत शिक्षण दिया जाता है, जो बच्चों को लाभ पहुंचाने के स्थान पर हानि पहुंचाता है। इस संबंध में कानन बनना चाहिए कि वही व्यक्ति नर्सरी कक्षा में सिखा सकता है, जो पूर्व प्राथमिक शिक्षा का प्रशिक्षण प्राप्त कर चुका है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम में संदर्भ साहित्य, प्रचार साहित्य तथा शिक्षण सामग्री की आवश्यकता होती है। एक ऐसी किट तैयार करनी चाहिए, जिसमें सर्वांगीण विकास के सभी पक्षों से संबंधित खेलसामग्री हो। किट का मूल्य निर्धारित करके उसे सबके लिए सलभ कराया जाना चाहिए। कार्यक्रम में एकरूपता लाने के लिए पूर्व प्राथमिक शिक्षा का एक वार्षिक एवं दैनिक कार्यक्रम तैयार किया जाए, जिस पर सभी शिश शिक्षा संस्थान अमल करें। पूर्व प्राथमिक शिक्षण विधियों का प्रयोग कक्षा 1 और 2 में भी किया जाना चाहिए। कक्षा 1, 2 के शिक्षकों को भी बालकेंद्रित तथा रोचक शिक्षण विधियों में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्रो(रोमिला सोनी राजेन्द्र कपूर कृष्ण कान्त वशिष्ठ)