परिचय यदि हम पूर्व प्राथमिक शिक्षा के वर्तमान ढांचे को देखें तो पता चलता है कि एक ओर व्यक्तिगत प्रबंधतंत्र द्वारा व्यवसायिक स्तर पर शहरी क्षेत्रों में चलाए जा रहे नर्सरी स्कूलों की भरमार हो गई है । और दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों तथा शहर की झुग्गी-बस्ती में रहनेवाले बच्चों के लिए व्यवस्थित और सुनियोजित प्रारंभिक शिक्षा व्यवस्था का पूर्ण अभाव है। नर्सरी स्कूलों में से अधिकतर केवल प्राथमिक स्कूलों का लघु रूप बनकर रह गए हैं, जहां छोटे बच्चों को औपचारिक रूप से पढ़ने-लिखने तथा गणित की शिक्षा दी जाती है। इस तरह बच्चों पर अनावश्यक बोझ व दबाव पड़ता है।अतः आज आवश्यकता इस बात की है। कि इस आयुवर्ग के बच्चों की क्षमता, आवश्यकता तथा ग्रहणशीलता के स्तर को देखते हुए पूर्व प्राथमिक शिक्षा का एक ऐसा कार्यक्रम तैयार किया जाए, जो बच्चे के परिवेश व परिस्थितियों के अनुकूल हो। साथ ही वह उनके विकास को गति प्रदान करे।पूर्व प्राथमिक शिक्षा पर बल देने तथा इसके स्तर को ऊंचा उठाने में सुनियोजित कार्यक्रम का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा की आवश्यकता एवं महत्त्व प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्रियों तथा मनोवैज्ञानिकों ने इस बात की पुष्टि की है कि 0-6 वर्ष की आयु में बच्चों के विकास की गति तीव्र होती है तथा यही आयु संस्कारों के निर्माण के लिए सबसे उपयुक्त होती है। यदि बच्चे के सर्वांगीण विकास में इस अवस्था का सदुपयोग न किया जाए तो उसकी क्षतिपूर्ति कभी नहीं हो पाती। इस अवस्था में बच्चों की देखरेख तथा शिक्षा पर ध्यान देने से ही भविष्य में देश को सुयोग्य एवं कर्मठ नागरिक मिल सकते हैं। ऐसी परिस्थितियों में पूर्व प्राथमिक शिक्षा (4-6 वर्ष) की आवश्यकता स्वाभाविक है। विभिन्न शोधों से प्राप्त निष्कर्ष निम्न बातों का संकेत करते हैं, जिन्हें हम तीन भागों में बांट सकते हैं । पूर्व प्राथमिक शिक्षा की आवश्यकता 4-6 वर्ष के बच्चों के लिए (स्थानीय परिवेश के अनुसार 3 से 6 वर्ष के मध्य के दो वर्ष) प्राथमिक शिक्षा में योगदान के लिए अभिभावकों व समुदाय के लिए 4-6 वर्ष के बच्चों के लिए हमारे देश में बच्चों की एक बड़ी संख्या शिक्षा प्राप्त करने वाली प्रथम पीढ़ी की श्रेणी में आती है। परिवार में समृद्ध एवं उपयुक्त शैक्षिक वातावरण न होने से बच्चों को समुचित देखरेख और मार्गदर्शन मिल पाना संभव नहीं होता, बल्कि बहुत-सी गलत बातों को सीख लेने की संभावना भी रहती है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा में स्वच्छता और स्वस्थ आदतों के विकास पर बहुत अधिक बल दिया जाता है, क्योंकि 4-6 वर्ष की अवस्था सबसे अधिक संवेदनशील होती है अतः इस समय सीखी हुई आदतें प्रायः स्थायी होती हैं।स्वच्छता और स्वस्थ आदतें इस आयु में अच्छी प्रकार से सिखाई जा सकती हैं। पूर्व प्राथमिक शिक्षा के अंतर्गत रोचक, मनोरंजक तथा उद्देश्यपूर्ण खेल-क्रियाओं के माध्यम से बच्चों में अच्छी आदतों एवं नैतिक मूल्यों का विकास किया जा सकता है। इस प्रकार उनके विकास को उचित दिशा मिल सकती है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा द्वारा बच्चों को विकासोन्मुख और समृद्ध वातावरण दे सकते हैं। पूर्व प्राथमिक शिक्षा द्वारा शैक्षिक एवं आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए परिवारों के बच्चों के विकास को भी गति मिल सकती है। रोचक एवं शिक्षाप्रद खेल-क्रियाओं के माध्यम से शुरू करके पूर्वप्राथमिक शिक्षा, बच्चों में शिक्षा के प्रति रुचि को उत्पन्न करती है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा बच्चों में सुरक्षा व आत्मविश्वास की भावना का विकास करने में सहायता करती है। • छोटे बच्चों के बहुत से दोष/ बीमारियां यदि शुरू में पता चल जाएं, तो उनका इलाज होना सरल हो जाता है। यह केवल पूर्व प्राथमिक शिक्षा दवारा ही संभव है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा के माध्यम से बच्चों में छिपी प्रतिभाओं और कौशलों को उभारने में सहायता मिलती है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा बच्चे के संपूर्ण जीवन की तैयारी है। प्राथमिक शिक्षा में योगदान के लिए पूर्व प्राथमिक शिक्षा दवारा बच्चों को प्राथमिक शिक्षा के लिए तैयार किया जा सकता है, क्योंकि प्राथमिक विदयालयों में प्रवेश लेने वाले बच्चे शारीरिक, मानसिक और भाषायी विकास की दृष्टि से प्राथमिक शिक्षा के लिए तैयार नहीं होते। कई परिवारों में लड़कियों को विद्यालय जाने से रोक दिया जाता है, क्योंकि उन्हें अपने छोटे भाई-बहिनों की देखभाल करने के लिए घर पर ही रहना पड़ता है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा केंद्रों के खुल जाने से उनके छोटे भाई-बहिनों की शिक्षा की व्यवस्था हो जाती है और ये लड़कियां प्राथमिक विद्यालय जा सकती हैं। पूर्व प्राथमिक शिक्षा 'बालिका-शिक्षा' के प्रसार को बढ़ावा देकर शिक्षा के सार्वजनीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। जिन बच्चों को उचित पूर्व प्राथमिक शिक्षा प्राप्त हो जाती है, उनके विद्यालय में नामांकन और ठहराव की संभावना बढ़ जाती है। प्रारंभिक वर्षों में मिले उचित मार्ग-दर्शन से बच्चे के विकास व उसकी क्षमताओं को विकसित करने में सहायता मिलती है तथा प्राथमिक विद्यालय में बच्चे उचित रूप से समायोजन कर सकने में समर्थ होते हैं। पूर्व प्राथमिक शिक्षा प्राप्त बच्चे दूसरे बच्चों की अपेक्षा सरलता से सीख पाते हैं। उनकी शैक्षणिक उपलब्धि बढ़ जाती है तथा फेल होने की संभावना न के बरावर होती है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा 4-6 वर्ष के बच्चों की शिक्षा के प्रति अभिभावकों और समुदाय को जागरूक बनाती है। अभिभावकों व समुदाय के लिए पूर्व प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम माता-पिता के सर्वप्रथम शिक्षक होने के दायित्व को बल देती है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा के अंतर्गत अभिभावकों को अच्छी पूर्व प्राथमिक शिक्षा के महत्त्व व विधि की जानकारी दी जाती है। अभिभावकों को ऐसी जानकारी देना, जिसके द्वारा वे घर पर बच्चों में वांछनीय मूल्यों, संस्कारों व शिक्षा में सहायक गतिविधियां कराने में समर्थ हो सकें। पूर्व प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम अभिभावकों को बच्चों के हित में उचित निर्णय लेने की योग्यता, नवीन कौशलों को सीखने की योग्यता के लिए प्रोत्साहित करता है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम में अभिभावकों की सहभागिता केवल गुणात्मक सुधार लाने के लिए ही नहीं, बल्कि केंद्र संचालन. संसाधन जुटाना, एवं बच्चों की प्रगति का मूल्याकंन करने की क्षमता के लिए भी आवश्यक है। बच्चों की औपचारिक शिक्षा (पढ़ना, लिखना व गणित) तथा शैक्षणिक भार को कम करने के लिए अभिभावक महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। पूर्व प्राथमिक शिक्षा अभिभावकों को यह समझाने में मदद करती है कि औपचारिक शिक्षा (3 Rs) पर जोर देना इस अवस्था में बच्चों के विकास के लिए हानिकारक हो सकता है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम बच्चों के लिए कार्य करनेवाली स्वयंसेवी एवं सरकारी संस्थाओं, कार्यकर्ताओं, अभिभावकों एवं समुदाय को एक-जुट हो कर प्रारंभिक शिक्षा के सार्वजनीकरण के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक होता है। संक्षेप में, यह कार्यक्रम जीवनपर्यंत सीखने के लिए उत्तम नींव प्रदान करता है। इसीलिए यदि बच्चा बाद के वर्षों में अच्छे परिणाम प्रदर्शित करता है, तो शुरू में इस कार्यक्रम पर किया गया यह व्यय (खर्च) बहुत ही महत्त्वपूर्ण निवेश है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा के उददेश्य बच्चे में स्वस्थ आदतों का विकास और व्यक्तिगत समायोजन के लिए प्रमुख आवश्यक कौशलों का विकास, जैसे - कपड़े पहनना, भोजन करना, सफाई आदि। इसके द्वारा बच्चों में वांछित सामाजिक दृष्टिकोणों का विकास होता है, जिससे बच्चे खेलकूद और विभिन्न क्रियाओं में सहभागिता कर सकें तथा दूसरों के अधिकारों और विशेषाधिकारों के प्रति संवेदनशील बन सकें। अपने विचारों, भावनाओं तथा संवेगों को व्यक्त करने, समझने, स्वीकार करने तथा नियंत्रित करने में बच्चे की सहायता करके उसमें भावनात्मक/ संवेगात्मक परिपक्वता लाना। बच्चों में सौंदर्यबोध की भावना को बढ़ावा देना। बच्चे में जिज्ञासा जागृत करना तथा जिस वातावरण में वह रहता है, उसे समझने में मदद करना। बच्चे को भ्रमण, खोज तथा प्रयोग करने के अवसर देकर उसमें नवीन रुचियां जागृत करना । आत्माभिव्यक्ति के अवसर देकर बच्चे में स्वतंत्रता तथा सृजनात्मकता को प्रोत्साहित करना। अपने विचारों और भावनाओं को प्रवाह, स्पष्टता एवं शुद्धता के साथ व्यक्त करने की क्षमता विकसित करना । पूर्व प्राथमिक शिक्षा की विशेषताएं हर बच्चा विशिष्ट होता है। बच्चे के विकास का एक निर्धारित क्रम होता है। बच्चे के विकास पर उसके वंशानुक्रम, वातावरण एवं पालन-पोषणका प्रभाव पड़ता है। बच्चा बार-बार अभ्यास करके सीखता है। बच्चा आत्मकेंद्रित होता है तथा वह हर वस्तु को अपने ही दृष्टिकोण से देखता है। बच्चों में भिन्नता होती है। प्रत्येक बच्चे को अपनी शैली से सीखने के अधिकार को स्वीकार करना चाहिए। बच्चा अधिकतर अनुकरण द्वारा सीखता है। बच्चा अत्यंत क्रियाशील होता है। वह प्रशंसा व प्रोत्साहन चाहता हैं। सीखने के अवसर एवं प्रोत्साहन बच्चे को प्रेरित करते हैं। सीखने के लिए उनमें स्वाभाविक जिज्ञासा एवं उत्सुकता होती है और वे नवीन वस्तुओं में रुचि लेते हैं। उनमें अप्रत्यक्ष चिंतन शक्ति विकसित नहीं होती, अतः वे प्रत्यक्ष वस्तुओं और अनुभवों से ही सीखते हैं। बच्चों का विकास अपने पर्यावरण की सक्रिय खोज करने तथा उसका विविध प्रकार से प्रयोग करने से होता है, रटने से नहीं। वे क्रिया तथा खेल के माध्यम से ही सबसे अच्छी तरह सीख पाते हैं। उनका ध्यान-विस्तार बहुत कम होता है अर्थात वे किसी एक क्रिया पर अधिक समय तक ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते। वे अधिक समय तक चुपचाप नहीं बैठ पाते, क्योंकि इस आयु में शारीरिक रूप से कियाशील एवं गतिशील होते हैं। बड़े समूह में क्रियाकलाप करने के वे आदी नहीं होते, अतः छोटे समूहों में क्रियाकलाप में अधिक रुचि लेते हैं और उनसे लाभ भी उठाते हैं। सोर्स : राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्(रोमिला सोनी ,राजेन्द्र कपूर कृष्ण कान्त वशिष्ठ)