बाल विकास पूर्व प्राथमिक शिक्षा को समझने के लिए यह आवश्यक है की हम पहले बालक में होने वाले विकास के बारे में जान ले की बच्चा एक संपूर्ण व्यक्ति है जो सोचने, महसूस करने तथा अलगअलग प्रकार के व्यवहार करने की क्षमता रखता है। विकास का तात्पर्य स्वभाव, व्यवहार तथा शरीर में होने वाले बदलाव से है बाल विकास का अर्थ पूर्व प्राथमिक शिक्षा को समझने के लिए यह आवश्यक है कि बाल विकास के अर्थ को समझा जाए तथा यह भी जाना जाए कि बच्चे से हमारा अभिप्राय क्या है।बच्चा एक संपूर्ण व्यक्ति है जो सोचने, महसूस करने तथा अलगअलग प्रकार के व्यवहार करने की क्षमता रखता है। विकास का तात्पर्य स्वभाव, व्यवहार तथा शरीर में होने वाले बदलाव से है। विकास की संपूर्ण प्रक्रिया के द्वारा बच्चा अपने पर्यावरण में रहना तथा समायोजित होना सीखता है। बाल विकास का अर्थ बच्चों के विकास और बचपन में होने वाले परिवर्तनों से है। कुछ बदलाव ऐसे होते हैं, जिन्हें देखा और मापा जा सकता है तथा कुछ ऐसे, जिन्हें देखना और मापना थोड़ा मुश्किल होता है। बाल विकास में सामान्यतया जन्म से 12 साल तक की आयु को लिया जाता है। बाल विकास विभाजन इन 12 वर्षों का विभाजन इस प्रकार है शैशव काल (0-3 वर्ष ) पूर्व प्राथमिक शिक्षा काल ( 4-6 वर्ष ) प्राथमिक शिक्षा काल (6-12 वर्ष ) बाल विकास के अंतर्गत विकास के निम्न पहलुओं को लिया जाता है शारीरिक विकास मानसिक/संज्ञानात्मक / बौद्धिक विकास भाषा विकास सामाजिक एवं भावनात्मक विकास सृजनात्मक विकास सौंदर्यबोध विकास बाल विकास का क्रम विकास एक प्रक्रिया है, जो निरतंर चलती रहती है। विकास की गति आयु के आधार पर तीव्र या धीमी हो सकती है, परंतु यह कभी रुकती नहीं। विकास चरणों में होता है और प्रत्येक चरण का अगले चरण पर गहरा प्रभाव पड़ता है। प्रत्येक बच्चा, दूसरे बच्चे से भिन्न होता है। उसकी वृद्धि एवं विकास की अपनी अलग गति होती है। विकास के सभी पहलुओं का परस्पर संबंध होता है। यदि किसी एक विकास में कोई कमी रह जाए तो उसका प्रभाव बच्चे के दूसरे विकास पर अवश्य पड़ेगा। विभिन्न पहलुओं के सही विकास के लिए विशेष कालावधि होती है। इस समय में पर्यावरण एवं अनुभवों का विशेष प्रभाव होता है। विशेष आवश्यकता वाले बच्चे का भी विकास क्रम यही होता है। यह बात अलग है कि विशेष आवश्यकता वाले बच्चे का विकास धीमी गति से हो या उसका विकास किसी एक अवस्था में आकर थम जाए, पर क्रम यही रहता है।जन्म के पश्चात वातावरण का प्रभाव बच्चे के विकास पर बहुत अधिक पड़ता है। पहले जमाने में बच्चे का बोलचाल व व्यवहार मातापिता, भाई-बहिन और परिवार के अन्य सदस्यों के बीच होता था। इसलिए बच्चे के विकास, लालन-पालन, व्यवहार एवं संस्कार आदि में संयुक्त परिवारों या बड़े परिवारों का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान होता था। परिवार योगदान परिवार के सदस्यों की जिम्मेदारी होती थी बच्चों की मालिश करना, उनको नहलाना, लोरियां एवं कहानियां सुनाना, जिसके दवारा बच्चों में उचित नैतिक मूल्यों का विकास हो सके। थोड़े बड़े या लगभग 3 वर्ष का होने पर बच्चे अपने दैनिक कार्यों के प्रति सजग हो जाते थे।वे अपनों से बड़ों के व्यवहार का अनुकरण करके सीखते थे, इसीलिए पहले समय में 3-6 वर्ष के बच्चों के लिए पूर्व प्राथमिक शिक्षा का महत्त्व संस्थाओं के माध्यम से इतना अधिक नहीं था, जितना आजकल के सीमित परिवारों की परिस्थितियों में है। इसके कुछ प्रमुख कारण इस प्रकार हैं : शोध परिणामों के अनुसार पूर्व प्राथमिक शिक्षा प्राप्त बच्चों को प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने में सुगमता होती है और शिक्षा का पूरा लाभ लेकर व्यक्तित्व का वांछित विकास करने में मदद मिलती है। संयुक्त परिवार बड़ी तेजी से विघटित हो रहे हैं। संयुक्त परिवार के विघटन से दादा-दादी तथा अन्य सहयोगी भी माता-पिता का विकल्प बनकर बच्चों की देखभाल नहीं कर सकते। माता-पिता आजीविका कमाने के लिए अधिकतर समय घर से बाहर रहते हैं। आज की जीवन-शैली में तनाव बढ़ता जा रहा है। अड़ोस-पड़ोस का पर्यावरण भी उतना अच्छा नहीं रह गया है, क्योंकि संस्कारों एवं मानवीय मूल्यों का हास बहुत तेजी से हो रहा है। कामकाजी माताओं की संख्या में दिनोंदिन वृद्धि हो रही है। औद्योगीकरण के कारण परिवार आजीविका हेतु नगरों में आकर बस गए हैं। इन्हीं सब कारणों की वजह से पूर्व प्राथमिक शिक्षा का महत्त्व और भी बढ़ गया है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा का महत्त्व पूर्व प्राथमिक शिक्षा का अर्थ पूर्व प्राथमिक शिक्षा एक बाल-केंद्रित कार्यक्रम है, जिसमें बच्चे खेल दवारा ही सबसे अधिक सीखते हैं। खेल बच्चों के सर्वांगीण विकास में अमूल्य योगदान करता है। विकास की दृष्टि से विद्यालय-पूर्व स्तर के बच्चे अपने प्रत्यक्ष अनुभवों द्वारा सर्वाधिक सीखते हैं। पूर्व प्राथमिक शिक्षा स्वरूप विशेषताएं पूर्व प्राथमिक शिक्षा 4-6 वर्ष के बच्चों के लिए है। (स्थानीय परिवेश के अनुसार 3 से 6 वर्ष के मध्य के दो वर्ष की होनी चाहिए।) पूर्व प्राथमिक शिक्षा बच्चों के सर्वांगीण विकास अर्थात भाषायी, शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक तथा सामाजिक विकास के लिए उत्प्रेरक वातावरण प्रदान करती है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा बच्चों को प्राथमिक/औपचारिक शिक्षा के लिए तैयार करती है, किंतु पूर्व प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक शिक्षा का लघु रूप नहीं है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा एक ऐसा कार्यक्रम है, जो बच्चों को पढ़ने-लिखने व गणित सीखने के लिए तैयार करता है। पर्व प्राथमिक शिक्षा दवारा बच्चों को प्रत्यक्ष अनभव दिए जाते हैं, जिससे उनमें सीखने की प्रक्रिया से संबंधित कौशलों का विकास हो सके। पूर्व प्राथमिक शिक्षा के अनुभव बच्चों में आत्मविश्वास पैदा करते हैं,जिसके फलस्वरूप बच्चों में आंतरिक अनुशासन बढ़ता है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा की कार्यक्रम योजना परिवर्तनशील व लचीली होती है, जिसे बच्चों की रुचि, आयु व स्तर को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा एक ऐसा कार्यक्रम है, जो सामहिक क्रियाकलाप के लिए प्रोत्साहित करता है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा, परीक्षा उन्मुख कार्यक्रम नहीं है, जिसमें जो कुछ बच्चे सीखते हैं, उसके अंतिम परिणाम पर बल दिया जाए। पूर्व प्राथमिक शिक्षा, 4-6 वर्ष की अवस्था के बच्चे की विशेषताओं को समझने तथा उन्हें और अधिक पनपने का अवसर देता है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा, प्रत्येक बच्चे के महत्त्व को समझने के लिए प्रेरित करता है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा, बालक-बालिका, दोनों के लिए समान रूप से लाभकारी है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा, बच्चों में सदगुणों का विकास कर, उन्हें समाजोपयोगी नागरिक बनने में मदद करती है। स्त्राेत : राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्(एनसीईआरटी), रोमिला सोनी राजेन्द्र कपूर कृष्ण कान्त वशिष्ठ, अरविंदो मार्ग, नई दिल्ली।