भारत में भावनात्मक एकता का अर्थ तथा आवश्यकता भावनात्मक एकता का अर्थ – भावनात्मक एकता का अर्थ उस भावना के विकास से है जो राष्ट्र की विभिन्न जातियों, धर्मों तथा समूहों के लोगों के आपसी भेद-भावों को मिटाकर एवं सब को संवेगात्मक रूप से समन्वित राष्ट्र का प्रत्येक व्यक्ति अपने पारस्परिक भेद-भावों को भुलकर अपने निजी हितों की अपेक्षा राष्ट्र की आवश्यकताओं, आदर्शों एवं आकांक्षाओं को सर्वोपरि समझने लगता है। भारत भी एक राष्ट्र है तथा हम सभी जातियों, धर्मों एवं वर्गों के लोग इसके निवासी है। इस राष्ट्र की स्वतंत्रता की रक्षा करना हम सभी का सामूहिक उतरदायित्व है। पर ध्यान देने की बात है कि रक्षा तभी सम्भव है जब हम अपने पारस्परिक भेद-भावों से उपर उठकर एकता के सूत्र में बंध जायें तथा अपने ह्रदय में राष्ट्र प्रेम की ज्योति जलाते रहें। भावनात्मक एकता की आवश्यकता – 15 अगस्त सन 1947 ई० से पूर्व भारत राजनीति दासता के बंधन में बंधा हुआ था। उस समय अंग्रजों ने अपने राज्य के विस्तार एवं शासन को दृढ बनाने के लिये यहाँ के निवासियों में धर्म, भाषा तथा समाजिकता के आधार पर अनेक ढंगों से फुट डालने का प्रयास किया और वे सफल भी हुए। अब हम स्वतंत्र है, कैसे ? जब हम देश के सभी निवासियों में राष्ट्रीय एकता की भावना विकसित हुई और हम सब एकता के सूत्र में बन्ध गये। खेद का विषय है कि हमारे राष्ट्र में अब जातीयता, प्रान्तीयता तथा साम्प्रदायिकता आदि अनके विघटनकारी प्रवृतियाँ आवशयकता से अधिक प्रबल हो रही है। दक्षिणी भारत में एक ऐसा वर्ग है जो उतरी भारत में प्रथक होना चाहता है। हिन्दुओं और सिक्खों में भी मतभेद है। इसी प्रकार अनके स्थानों पर इन विघटनकारी प्रवृतियों के वशीभूत होकर अलग-अलग राज्यों की मांग की जा रही है। यही नहीं, सरकारी नौकरियों में भी जातीयता, प्रान्तीयता तथा साम्प्रदायिकता की भावनाओं के आधार पर ही अपने-अपने लोगों की नियुक्तियां की जा रही है। इन सब विघटनकारी प्रवृतियों के कारण चारों ओर मर-काट तथा लड़ाई-झगडे हो रहे हैं जिससे भारतीय जनतंत्र खतरे में पड़ गया है। ऐसी परिस्थितियों में इस बात की आवश्यकता है कि देश के सभी निवासियों को इस प्रकार की अंतर्राष्ट्रीय मनोवृतियों से बचाकर उनमें ऐसी अभिवृतियों का विकास किए जाये जिससे वे पुन: एकता के सूत्र में बन्ध जायें। इस महान कार्य को पूरा करने के लिए हमें प्रत्येक नागरिक में ऐसे संवेगों का विकास करना चाहिये जो पृथकता की अपेक्षा एकता का प्रोत्साहित करें। दुसरे शब्दों में, हमें प्रथककिकरण को बढ़ावा देने वाले समस्त धार्मिक, भाष्य एवं साम्प्रदायिक संवेगों को दबाकर राष्ट्रीय मस्तिष्क का निर्माण करना होगा। स्वर्गीय पं० नेहरु ने भी यही कहा था – “ हमें प्रान्तीयता, साम्प्रदायिकता तथा जातीयता की संकीर्णता से उपर उठकर भारतीय नागरिकों के बीच भावनात्मक एकता की स्थापना के लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये जिससे हम अपनी विभिन्नताओं को रखते हुए भी एक सुद्रढ़ एवं सबल भारतीय राष्ट्र का निर्माण कर सकें। शिक्षा तथा भावनात्मक एकता यदि किसी राष्ट्र में कोई परिवर्तन करना हो तो यह आवश्यक है कि उस राष्ट्र की जनता के मस्तिष्क को बदल दिया जाये। पर जनता के मस्तिष्क को बदलने का केवल शिक्षा की एक महत्वपूर्ण साधन है। इस दृष्टि से यदि भारत में सच्ची भावनात्मक एकता का विकास करना है तो हमें अपनी शिक्षा की व्यवस्था इसी उदेश्य को सामने रखते हुए करनी चाहिये। दुसरे शब्दों में, हमारी शिक्षा का उदेश्य यह होना चाहिये कि वह भारत वासियों में ऐसी भावात्मक एकता का संचार करे जिससे वे अपनी जाति , धर्म, वर्ग, तथा क्षेत्र की संकीर्ण आधारों पर उत्पन्न होने वाले भेद-भावों को भूल कर सम्पूर्ण भारत को अपना देश समझने लगे और समस्त भारतियों को अपना भाई। अत: हमारी शिक्षा ऐसी होनी चाहिये जो बालकों में जनतंत्रीय मूल्यों को विकसित कर के भारतीय समाज के रीती-रिवाजों, परम्पराओं तथा विश्वासों के परती आदर की भावना उत्पन्न करे, उनमें ऐसी उचित अभिरुचियों, दृष्टिकोण तथा संवेगों का विकास करे तथा उनमें सामान रूप से चिन्तन मनन एवं कार्य करने की आदतों का विकास करते हुए नैतिक एवं अध्यात्मिक मूल्यों को विकसित करे। ऐसी शिक्षा में राष्ट्रीय एकता की भावना अवश्य विकसित होगी जिसके परिणामस्वरूप संकीर्णता एवं भ्रष्टाचार का अन्त हो जायेगा और राष्ट्र दिन-प्रतिदिन उन्नति के शिखर पर चढ़ता रहेगा। भावात्मक एकता समिति उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि भावात्मक एकता को विकसति करने के लिए शिक्षा परम आवशयक है। अत: भारत के केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय ने सन 1961 में एक भावात्मक समिति स्थापित की जिसका उदेश्य ऐसे सुझावों को देना था जिनसे सभी विघटनकारी प्रवृतियों का अन्त हो जाये। इस समिति के अध्यक्ष स्वर्गीय डॉ सम्पूर्णानन्द ने देश की सभी विघटनकारी प्रवृतियों का वर्णन करते हुए कहा है – “देश में एकता और यह एकीकृत रहेगा भी, चाहे इसके निवासीयों में कितनी भी विभिन्नतायें क्यों न पाई जायें। अब आज राष्ट्रीय और भावात्मक एकता के लिए जो मांग की गई है वह उन विघटनकारी प्रवृतियों को दूर करने के लिए की गई है, जो देश की शकित को निर्बल बनाना चाहती है।” भावात्मक एकता समिति के सुझाव भावात्मक एकता समिति ने नागरिकों में भावात्मक एकता को विकसित करने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए – पाठ्यक्रम का पुनर्रचना – पाठ्यक्रम की पुनर्रचना की जाये। इस समबन्ध में राष्ट्र की आवश्यकताओं को धयन में रखते हुए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिये – प्राथमिक स्तर पर राष्ट्रीय गीत तथा अन्य राष्ट्रीय गानों, कविताओं तथा कहानियों को प्रोत्साहन दिया जाये। माध्यमिक स्तर पर सामाजिक अध्ययन, भाषा तथा साहित्य नैतिकता तथा धार्मिक निर्देशन एवं सहगामी क्रियायों को मुख्य स्थान दिया जाये। विश्वविधालय स्तर पर विभिन्न भाषाओं, साहित्यों तथा कलाओं एवं समाजिक विज्ञानों के अध्ययन पर बल दिया जाये। यही नहीं, शिक्षकों तथा छात्रों को देश के विभिन्न स्थानों में भ्रमण करने के लिए भी प्रोत्सहित किया जाये। पाठ्यक्रम सहगामी क्रियायें – विभिन्न स्तरों पर उपर्युक्त विषयों के अतिरिक्त ऐसी सहगामी तथा सांस्कृतिक क्रियायों को भी प्रोत्साहित किए जाये जिन्हें राष्ट्र के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण समझा जाता है| पाठ्य पुस्तक – वर्तमान पाठ्य पुस्तकों में संशोधन एवं सुधार किया जाये। उनमें से अराष्ट्रीय बातों को निकालकर केवल उन्हीं तत्वों को सम्मिलित किया जाये तो भावात्मक एकता के विकास में सहायता प्रदान करें। भाषा – समिति ने भाषा के सम्बन्ध में निम्नलिखित सुझाव दिये – कुछ क्षेत्रों में रोमन लिपि के प्रयोग की आज्ञा दी जाये। इससे हिंदी के ज्ञान में वृद्धि होगी। सम्पूर्ण राष्ट्र में अंतर्राष्ट्रीय अंकों का प्रयोग किया जाये। जिन क्षेत्रों में हिंदी नहीं बोली अथवा समझी जाती उनमें हिंदी क्षेत्रीय लिपि के द्वारा सीखने की छुट दी जाये। क्षेत्रीय भाषा तथा हिंदी शब्दकोष तैयार किये जायें तथा हिन्दी को पाठ्य-पुस्तकें क्षत्रिय लिपि में लिखी जायें। विश्वविधालय स्तर पर हिन्दी और अंग्रेजी का अधिक से अधिक अध्ययन किए जाये। भाषा में सम्बन्ध में नीति का निर्माण करते समय अल्पसंख्यकों का विशेष ध्यान रखा जाये। अन्य सुझाव – समिति ने निम्नलिखित अन्य सुझाव दिए – स्कूल का कार्यक्रम आरम्भ होने से पूर्व प्रार्थना अथवा दैनिक असेम्बली होनी चाहिये। इस असेम्बली में शिक्षकों अथवा बाहर से आमंत्रित किये हुए महापुरुषों द्वारा नैतिक अथवा लोगों के रहन-सहन के विषय में रोजाना लगभग 10 मिनट भाषण हों। स्कूल का प्रत्येक बालक वर्ष में एक बार अपने राष्ट्र की सेवा की प्रतिज्ञा ले। शिक्षक का स्थान भावात्मक एकता को विकसित करने के लिए शिक्षक का मुख्य स्थान है। इस दृष्टि से हमें ऐसी शिक्षकों की आवशयकता है जिनमें स्वयं भी यह भावना विकसित हो चुकी हो। दूसरे शब्दों में , केवल वही शिक्षक बालकों में भावात्मक एकता की भावना का विकास कर सकता है जो जातीयता, प्रान्तीयता तथा साम्प्रदायिकता एवं धर्म और भाषा आदि दूषित प्रवृतियों से उपर उठकर राष्ट्रीय एकता की भावना से ओत-प्रोत हो। अन्तर-सांस्कृतिक भावना का अर्थ तथा आवश्यकता अन्तर-सांस्कृतिक भावना का अर्थ- अन्तर-सांस्कृतिक भावना का अर्थ ऐसे दृष्टिकोण से विकसति हो जाने से है जिसके अनुसार व्यक्ति अपनी निजी संस्कृति के संकीर्ण दृष्टिकोण से उपर उठकर अपने देश तथा विश्व की विभिन्न संस्कृतियों के उन समान तत्वों की खोज कर डालता है जिनके द्वारा किसी देश की विभिन्न संस्कृतियों को एक राष्ट्रीय संस्कृति में बाँधा जा सकता है। ऐसे व्यापक दृष्टिकोण के विकसित हो जाने से व्यक्ति अन्य सभी समूहों एवं सम्प्रदायों के आदर्शों, मूल्य, रीती-रिवाजों तथा परम्पराओं एवं वेश-भूषा और भाषा को समझने का प्रयास करता है। परिणामस्वरूप वह किसी संस्कृति के तुच्छ एवं घ्रणित दृष्टि से देखते हुए सभी संस्कृतियों का आदर और सम्मान करने लगता है। संक्षेप में अन्तर-सांस्कृति भावना विकसित हो जाने से व्यक्ति हर प्रकार के सांस्कृतिक भेद-भावों तथा लडाई-झगड़ों से उपर उठ जाता है, जिससे राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय एकता बनी रहती है। अन्तर-सांस्कृतिक भावना के विकास की आवश्यकता – हमारा देश एक विशाल देश है। यहां पर विभिन्न समूहों एवं सम्प्रदायों के लोग निवास करते हैं। इन सभी समूहों तथा सम्प्रदायों की वेश-भूषा, रहन-सहन, रीती-रिवाज़ तथा परम्परायें एवं खान-पान के ढंग अलग-अलग हैं। इस सांस्कृतिक विभिन्नता के कारण इन सभी समूहों तथा सम्म्प्रदयों में परस्पर मत भेद एवं मनमुटाव बना रहता है। यह मनमुटाव राष्ट्रीय एकता के मार्ग में एक बहुत बड़ी बाधा है। इस बाधा से समस्त देश में चारों ओर अशान्ति बनी रहती है जिससे देश की सामाजिक तथा आर्थिक उन्नति नहीं हो पाती। ऐसी दशा में आवश्यक है कि यहां के सभी समूहों में अन्तर-सांस्कृतिक दृष्टिकोण को विकसति किया जाये जिससे विभिन्न संस्कृतियों के लोगों में परस्पर भेद-भाव, द्वेष तथा कट्टरता समाप्त हो जाये और सबमें परस्पर भाई चारे एवं सहयोग की भावना विकसित हो जाये। अन्तर-सांस्कृतिक भावना का विकास इसलिए भी आवशयक है कि हमारे देश में अल्प-संख्यकों की भी एक बहुत बड़ी संख्या रहती है। इन सबकी भी संस्कृतियाँ अलग-अलग है जिसके कारण इन सबमें भी आपसी मनमुटाव बना रहता है। यह मन-मुटाव जनतंत्र सफलता के मार्ग में बाधक है। भारतीय जनतंत्र को सफल बनाने के लिए मन-मुटाव का अन्त करना परम आवशयक है जी केवल अन्तर-सांस्कृतिक भावना के विकास द्वारा ही सम्भव है। ध्यान देने की बात है कि भारत तथा अन्य राष्ट्रों में केवल सांकृतिक भेद-भाव के आधार पर ही झगडे होते हैं। इन लड़ाई झगड़ों में जहाँ एक ओर हजारों नागरिकों का रक्तपात होता है वहाँ दूसरी ओर राष्ट्र भी उन्नति की दौड़ में पिछड़ जाता है। यदि सभी लोगों में अन्तर-सांस्कृतिक दृष्टिकोण विकसित हो जाये तो राष्ट्र सबल तथा सुद्रढ़ बन जायेगा एवं अंतर्राष्ट्रीय सद्भावना भी विकसित हो जायेगी। शिक्षा तथा अन्तर-सांस्कृतिक भावना अन्तर-संस्कृतिक भावना को विकसित करने के लिए शिक्षा एक महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली साधन है। शिक्षा के द्वारा हम बालक को जैसा चाहें वैसा ही बना सकते हैं। अत: शिक्षा के द्वारा हमें बालकों के सामने ऐसा वातावरण अपस्थित करना चाहिये जिससे रहते हुए वे दूसरी संस्कृतियों को समझ सकें तथा उसका आदर कर सकें। दुसरे शब्दों में, हमारी शिक्षा को बालकों में ऐसी प्रवृतियों का विकास करना चाहिये जिससे वे अन्य सभी समूहों के साथ परस्पर सहयोग के साथ रहते हुए एक नवीन संस्कृति का विकास कर सकें। संक्षेप में, शिक्षा बालकों के व्यवहार में इस प्रकार से परिवर्तन करे कि वे विभिन्न संस्कृतियों को समझकर उनकी सराहना कर सकें। शिक्षा तथा अन्तर-सांस्कृतिक भावना का विकास बालकों में अन्तर-सांस्कृतिक भावना को विकसित करने के लिए शिक्षक का महत्वपूर्ण स्थान है। परन्तु ध्यान देने की बात है कि अन्तर-सांस्कृतिक भावना को केवल वही शिक्षक विकसित किया जा सकता है, जिसका दृष्टिकोण स्वयं व्यापक हो तथा जिसे अपने विषय के ज्ञान के अतिरिक्त अन्य सभी समूहों की संस्कृति का पूर्ण ज्ञान हो। इस दृष्टि से अन्तर-सांस्कृतिक भावना विकसित करने के लिए शिक्षक ऐसा होना चाहिये जो संकीर्ण विचारों एवं विश्वासों के उपर उठकर किसी संस्कृति के प्रति ईर्ष्या तथा द्वेष न रखते हुए सभी संस्कृतियों के प्रति सद्विचार एवं सद्भावना रखता है। उक्त गुणों से ओत-प्रोत शिक्षक इस उदेश्य को आसानी से प्राप्त कर सकता है। शैक्षिक कार्यक्रम अन्तर-सांस्कृतिक भावना को विकसित करने के लिए निम्नलिखित शैक्षिक कार्यक्रम होना चाहिये – उस सभी सुझावों को कार्यरूप में परिणत किया जाये जो राष्ट्रीय एकता तथा भावात्मक एकता के लिए दिए गए हैं। पाठ्यक्रम में ऐसी विषयों को सम्मिलित किया जाये जिनके अध्ययन से अन्तर-सांस्कृतिक भावना का विकास हो सके। छात्रों के सामने ऐसा वातावरण प्रस्तुत किया जाये कि उनको विभिन्न संस्कृतियों का ज्ञान हो जाये| राष्ट्र भाषा को अनिवार्य कर दिया जाये। इससे राष्ट्र के सभी बालक एक-दुसरे के विचारों को समझ सकेंगे। परिणामस्वरूप वे अपने आपको एक ही राष्ट्र का अंग समझते हुए भारतीय संस्कृति से प्रेम करने लगेंगे। स्कूलों में सांस्कृतिक गोष्ठियों का आयोजन किया जाये। अपने तथा अन्य देशों के प्रसिद्ध व्यक्तियों के भाषण करायें जायें। इससे बालकों को विभिन्न संस्कृतियों का ज्ञान हो सकेगा| स्कूलों में किसी विशेष धर्म की शिक्षा न दी जाये। शिक्षकों, लेखकों, कलाकारों तथा संस्कृतिक –मंडलियों को राष्ट्र के विभिन्न भागों एवं विदेशों में भ्रमण करें के लिए प्रोत्साहित किया जाये। स्त्रोत: पोर्टल विषय सामग्री टीम