<h3 style="text-align: justify;">परिचय </h3> <p style="text-align: justify;">बच्चों में जन्म से ही सीखने की अद्भुत क्षमता और इच्छा होती है। अत: यह बहुत महत्वपूर्ण है कि बच्चों को खेलखेल में विभिन्न गतिविधियों द्वारा समृद्ध अनुभव दिए जाएँ जिससे वे समीक्षात्मक चिंतन और समस्या समाधान जैसे कौशल विकसित कर सकें और अपनी आयु तथा विकास के अनुरूप अपने बारे में समझ बना सकें। विकास के सभी घटक/आयाम, जैसे संज्ञानात्मक, सामाजिक-भावनात्मक, भाषा और साक्षरता, शारीरिक गत्यात्मक, रचनात्मक तथा सौन्दर्य बोध का परस्पर संबंध है इसलिए इन सभी के लिए गतिविधियों एवं अनुभवों को शैक्षणिक प्रक्रियाओं में शामिल किया जाना चाहिए। खोजबीन करने, समझ बनाने, प्रयोग करने और अनुभवों तथा जानकारी को सार्थक विषयवस्तु एवं कौशलों में बदलने के भरपूर अवसर दिए जाएँ।</p> <p style="text-align: justify;">इस पाठ्यचर्या का विकास इस अनुभवजन्य और सैद्धान्तिक समझ के आधार पर किया गया है कि बच्चे आमतौर पर 3 वर्ष की आयु तक पूर्व-प्राथमिक विद्यालय में जाने लायक हो जाते हैं। इस पाठ्यचर्या की परिकल्पना इस प्रकार से की गई है कि बच्चों को 3-6 वर्ष की आयु के दौरान कक्षा एक से पहले कम से कम तीन वर्ष की पूर्व-प्राथमिक शिक्षा मिल जाए।यद्यपि बच्चों के विकास के संदर्भ में विकास का एक सार्वभौमिक निश्चित क्रम बताया गया है तथापि यह भी देखने में आता है कि पूर्व-प्राथमिक विद्यालय में आने वाले बच्चे अपने संदर्भ और क्षमताओं के कारण भिन्न-भिन्न प्रकार के अनुभवों के साथ आते हैं। कक्षा में मौजूद विविधता का एक और बड़ा कारण यह भी है कि एक ही कक्षा में भिन्नभिन्न आयु वर्ग के बच्चे मौजूद होते हैं। इस विविधता के अनुरूप पाठ्यचर्या के क्रियान्वयन में पर्याप्त लचीलापन होना चाहिए, बच्चों के कालानुक्रमिक आयु से बँधना नहीं चाहिए। पाठ्यचर्या को शिक्षक अपने हिसाब से बाल अनुरूप बनाएँ। ___ बच्चों की आयु को और इस सच्चाई को ध्यान में रखते हुए कि वे पहली बार अपने घर से अलग नये वातावरण में कुछ समय बिताएँगे, उन्हें स्वच्छंद रूप से खेलने के भरपूर मौके दिए जाएँ, जिससे वे लोगों और नये वातावरण के प्रति अपनी पसंद विकसित कर सकें। इस प्रकार से धीरे-धीरे सुनियोजित गतिविधियों की ओर बढ़ा जा सकेगा।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>प्रस्तुत पाठ्यचर्या तीन मुख्य लक्ष्य</strong></p> <p style="text-align: justify;">विकसित किए जाने वाले आधारभूत कौशलों एवं अवधारणाओं, शिक्षकों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली शिक्षण प्रणाली तथा पूर्व-प्राथमिक 1, 2 और 3 के अंत में प्राप्त किए जाने वाले आरंभिक अधिगम प्रतिफलों को संबोधित करती है। पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के लक्ष्य बच्चों का सीखना और विकास समग्र रूप से होता है, स्वास्थ्य का क्षेत्र हो या फिर संज्ञानात्मक या व्यक्तिगतऔर सामाजिक विकास अथवा फिर खुशहाली, सभी में विकास और सीखने की प्रक्रिया साथ-साथ चलते हैं। बच्चे भिन्न-भिन्न समय पर, भिन्न-भिन्न तरीकों से और भिन्नभिन्न गति से सीखते हैं। पूर्व-प्राथमिक शिक्षा का उद्देश्य बच्चों में अंतर्निहित संभावनाओं के समुचित विकास को सुगम बनाना है और सर्वांगीण विकास एवं जीवनपर्यंत सीखने की नींव रखना है। प्रस्तुत पाठ्यचर्या निम्नलिखित तीन मुख्य लक्ष्यों के माध्यम से विकास के सभी क्षेत्रों को संबोधित करती है</p> <h3 style="text-align: justify;">लक्ष्य 1- बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाली को बनाए रखना</h3> <p style="text-align: justify;">बच्चों के सर्वोत्कृष्ट शारीरिक, सामाजिक-भावनात्मकऔर मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य तथा खुशहाली के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था का समय बहुत ही महत्वपूर्ण है। इन वर्षों के दौरान अगर बच्चों को सही अवसर और प्रोत्साहन मिले तो उनकी पाँचों इन्द्रियों का विकास होता है, उनकी सूक्ष्म तथा स्थूल माँसपेशियाँ व हड्डियाँ मज़बूत बनती हैं, आँखों और हाथों का समन्वयन बेहतर होता है जो लिखने की योग्यता विकसित करने के लिए आवश्यक है। साथ ही साथ जब बच्चे दूसरे बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा खेल आधारित गतिविधियों की शुरुआत करते हैं और उनमें शामिल होते हैं तो वह सामाजिक कौशलों का विकास करते हैं तथा पहली पहचान का बोध करने लगते हैं। बच्चों के बीच यह संलग्नता शुरुआती दौर में दो-दो के जोड़ों में धीरे-धीरे छोटे और उसके बाद बड़े समूहों में होती है जिसके द्वारा वह दूसरों के साथ सामंजस्यता के साथ खेलना, काम करना और रहना सीखते हैं। वे इस बात को भी पहचानने लगते हैं कि वे सभी एक-दूसरे से भिन्न हैं और इस तथ्य को भी समझने लगते हैं कि इन भिन्नताओं को न केवल स्वीकार किए जाने, बल्कि उनका आदर किए जाने की भी आवश्यकता है।</p> <p style="text-align: justify;">सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि बच्चों को अपनी विकसित होती हुई क्षमताओं और उपलब्धियों के प्रति स्वायतत्ता एवं विश्वास के बोध का अनुभव करने के अवसर मिले। इससे बच्चों में स्वस्थ आदतों का विकास होगा, जो अच्छे शारीरिक स्वास्थ्य और आत्मसम्मान तथा सकारात्मक आत्मबोध के विकास में मदद करेगा।यदि उनके स्वयं के प्रति सकारात्मक भाव को उचित रूप से पोषित किया जाता है तो उनके जीवनपर्यंत सकारात्मक बने रहने की संभावना बढ़ जाती है।अधिगम तथा खेल अनुभव ऐसे हों जो बच्चों के लिए आकर्षक और चुनौतीपूर्ण हों। ये अनुभव ऐसे होने चाहिए जिसमें बच्चों द्वारा असफलता की अपेक्षा सफलताओं के अनुभव के अवसर प्रदान करें।इस प्रकार का दृष्टिकोण उनमें नयी चीजों को सीखने की रुचि जाग्रत करने, नये और दिन-प्रतिदिन के कार्यों में संलग्न रहने तथा अपनी भावनाओं एवं प्रयासों के प्रति नियमितता का भाव प्रदर्शित करने में मदद करेगा। ये सभी कौशल जीवन में सफलता और खुशहाली में योगदान देते है।</p> <h4 style="text-align: justify;">उपयुक्त अनुभव एवं अवसर सुनिश्चित करना</h4> <p style="text-align: justify;">पूर्व-प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों को रुचिकर और आयु उपयुक्त बाह्य खेल गतिविधियों में भाग लेने के पर्याप्त एवं नियमित अवसर मिलने चाहिए। ये बाह्य खेल गतिविधियाँ इस प्रकार की हों जो स्थूल माँसपेशियों के विकास में योगदान दे सकें, जैसे गेंद पकड़ना (कैच करना), दौड़ना, कूदना, रस्सी कूदना, संतुलन बनाना आदि। बाह्य खेलों के साथ-साथ पूर्व-प्राथमिक विद्यालयों की दैनिक योजना में स्वछंद रूप से अंदर खेले जाने वाले खेलों के लिए भी समयऔर अवसर होने चाहिए। इन खेलों के लिए गतिविधि क्षेत्र (एक्टिविटी एरिआ) हों, जिनमें ब्लॉक से खेलना, जोड़-तोड़ करने वाले खेलों व कला संबंधी गतिविधियों के लिए भरपूर सामग्री हो। ये बच्चों की रचनात्मकता, कल्पनाशक्ति को पोषित करने में तो मदद करेंगे ही, साथ ही आँखों-हाथों के समन्वयन को भी सुदृढ़ करेंगे।खेल गतिविधियाँ बच्चों के सामाजिक संदर्भो के अनुसार होनी चाहिए। सरल से जटिल के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए उनकी योजना बनानी चाहिए। खेल गतिविधियाँ चुनौतीपूर्ण होने के साथ ऐसी भी होनी चाहिए जिसे ज्यादातर बच्चे समान प्रयासों द्वारा संपादित कर पाएँ। ये बच्चों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुरूप भी होनी चाहिए। स्वछंदखेल गतिविधियाँ बच्चों को अपनी रुचि प्रदर्शित करने, निर्णय लेने और दूसरों के अधिकार एवं परिप्रेक्ष्य को समझने के अवसर देती हैं। ये गतिविधियाँ सामाजिक रूप से वांछनीय व्यवहार (प्रो-सोशल बिहेवियर), जैसे अपनी बारी की प्रतीक्षा करना, साझा करना, दूसरों की मदद करना, अपनी और दूसरों की भावनाओं को पहचानना तथा संवेदनशील होना एवं तदानुभूति के विकास में सहयोग करती हैं। यदि हम बच्चों की रुचियों और प्राथमिकताओं का ध्यान रखते हैं तो बच्चों में नियमित रूप से काम करने की आदत बढ़ती है, काम को पूरा करने का भाव और कार्य संबंधी अच्छी आदतों का विकास होता है। भोजन का समय और शौच जाने के लिए छोटे-छोटे अवकाश आदि जैसे प्रावधान स्वास्थ्य संबंधी अच्छी आदतों के बनने में मदद करते हैं, जैसे हाथ धोना, दाँतों की साफ़-सफ़ाई, पोषक आहार लेना, चबा-चबाकर खाना, स्वच्छ जल पीना, अपने आस-पास के परिवेश को साफ़ रखना आदि। शिक्षक सुनिश्चित करें कि बच्चों को स्वछंद एवं सुरक्षित बाह्य एवं अंदर खेले जाने वाले खेलों में संलग्न करने के लिए पर्याप्त, आसानी से उपलब्ध, सुरक्षित, आयु-उपयुक्त एवं साफ़-सुथरे उपकरण/सामग्री मिले। अभिभावकों और बच्चों के साथ काम करने वाले अन्य लोगों की मदद से विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए उपयुक्त बदलाव किए जा सकते हैं। उपलब्ध सामग्री सभी बच्चों को बारी-बारी से खलने के लिए पर्याप्त होनी चाहिए ताकि उनमें सामाजिक कौशलों के विकास को बढ़ावा मिले, जैसे साझा करना और अपनी बारी की प्रतीक्षा करना। यह सुनिश्चित करना कि सभी बच्चे खेल में शामिल हैं और खेल रहे हैं तथा एक-दूसरे के साथ तालमेल बैठा रहे हैं।</p> <p style="text-align: justify;">शिक्षक की भूमिका एक योजनाकार और सुगमकर्ता की होनी चाहिए। वे एक ऐसे संतुलित कार्यक्रम की योजना बनाएँ जो बच्चों की अल्प अवधि तक ध्यान केंद्रित करने की क्षमता और बच्चों के खेलने-कूदने की ज़रूरत के अनुरूप हो। इसके साथ ही कार्यक्रम में आवश्यकतानुसार लचीलेपन का भी प्रावधान हो। शिक्षक को पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के उद्देश्यों और लक्ष्यों को ध्यान में रखकर आकर्षक और रुचिकर गतिविधियाँ बनानी चाहिए एवं वातावरण ऐसा हो जो बच्चों को सामग्री दूसरे बच्चों के साथ साझा करने तथा शिक्षक के साथ काम करने के लिए प्रेरित करे जिससे बच्चे उनमें दूसरे बच्चों और शिक्षक के साथ मिलकर काम कर सकें।</p> <p style="text-align: justify;">जब बच्चे खेलते हैं या खाना खाते हैं तो शिक्षक द्वारा उस समय का सदुपयोग अच्छी आदतें सिखाने के लिए किया जाना चाहिए, जैसे खेलकर चीजें जगह पर रखना और कमरे को गंदा न करना आदि। प्रभावशाली शिक्षक बच्चों के साथ सदैव मित्रवत व्यवहार करते हैं और परस्पर संवाद करते हैं। बच्चों की सोच-समझ को विस्तार देने और संवाद को प्रोत्साहित करने के लिए व्यक्तिगत रूप से उनके खेल व गतिविधियों के संबंध में प्रश्न पूछते हैं। इस बात का भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि उनके प्रश्न पूछने का तरीका ऐसा न हो कि वह अनुचित हस्तक्षेप या निर्देश जैसा लगे, बल्कि ऐसा हो कि बच्चों को पहल करने के लिए प्रेरित करे और उनकी कल्पनाओं को पंख (बढ़ावा) दें। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि शिक्षक बच्चों के प्रयासों की सराहना करें, प्रशंसा करें जिससे उनमें आत्मविश्वास और आत्मसम्मान का भाव पैदा हो।</p> <h3 style="text-align: justify;">लक्ष्य 2- बच्चे प्रभावशाली संप्रेषक बनें</h3> <p style="text-align: justify;">तीन वर्ष की आयु वाले बच्चे जब पूर्व-प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश लेते हैं तो आमतौर पर वे एकभाषी परिवेश से आते हैं। वे अपने घर की भाषा में मौखिक रूप से अपनी पसंद और नापसंद तथा आवश्यकताओं को ज़ाहिर करने की क्षमता रखते हैं जो उनके स्कूल की भी भाषा होती है। कुछ शिक्षित परिवारों में बच्चों को शैशवास्था (0–2 वर्ष) से ही पुस्तकों को देखने, कहानी सनुने, दूसरों को पढ़ते हुए देखने के अवसर मिल जाते हैं।</p> <p style="text-align: justify;"> पूर्व-प्राथमिक विद्यालय की पाठ्यचर्या इस प्रकार की हो कि वह बच्चों के इन सभी आरंभिक अनुभवों और बच्चों के संप्रेषण कौशलों को बढ़ावा दे। जिससे बच्चे अपने विचार और अपनी भावनाएँ मौखिक रूप से साझा कर सकें या अपने अनुभवों का अधिक प्रभावशाली तरीके से वर्णन कर सकें। यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चे सूचनाएँ प्राप्त और साझा कर सकें तथा समीक्षात्मक व सृजनात्मक चिंतन जैसे उच्चस्तरीय कौशलों का विकास कर सकें। धीरे-धीरे वे उस भाषा में समझ के साथ पढ़ना और लिखना भी सीख लेते हैं। हालाँकि, इस प्रकार की स्थिति उन्हीं पूर्व-प्राथमिक विद्यालयों में संभव होगी जहाँ बच्चों को निर्देश देने एवं उनसे संवाद करने की भाषा (माध्यम) वही होगी जो उनके घर में बोली जाती है अर्थात् वह भाषा जिसमें बच्चे को पूर्व-प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश के समय किसी प्रकार की दक्षता पहले से ही प्राप्त थी। यदि हम अपने देश के बहुभाषी संदर्भ पर दृष्टि डालें तो पता चलेगा कि बच्चों की एक बहुत बड़ी संख्या ऐसी है जिनके घर की भाषा विद्यालय या पूर्व-प्राथमिक विद्यालय में पठन-पाठन के माध्यम की भाषा से भिन्न है।यहाँ पर आदिवासी भाषाओं और क्षेत्रीय भाषाओं की बोलियों का संदर्भ शामिल है और अब तो महत्वपूर्ण बात यह है कि अंग्रेजी माध्यम वाले पूर्व-प्राथमिक विद्यालयों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जहाँ अधिकतर वे बच्चे आ रहे हैं जिनके घर में अंग्रेजी से परिचय या तो न के बराबरहै या फिर बहुत ही कम है। बच्चों में भाषा के मौखिक स्वरूप (बोलने के कौशल) को सुदृढ़ किए बिना पढ़नालिखना यान्त्रिक तरीके से होता है। शब्द के अक्षरों को अलग-अलग करके पढ़ना सीख पाते हैं लेकिन इस प्रकार के पठन में वे अर्थ ग्रहण नहीं कर पाते अर्थात् समझ के साथ नहीं पढ़ पाते हैं। चूँकि विद्यालय के सभी विषयों में भाषा प्रमुख है, इसलिए शुरुआती दौर की इस कमी का नकारात्मक प्रभाव बच्चों के बाद के प्रदर्शन पर पड़ता है। इस चुनौती के साथ-साथ एक और चुनौती यह है कि हमारे पास एक बहुत बड़ी संख्या में वे बच्चे आते हैं जो अपने परिवार के पहले सदस्य हैं जिन्हें विद्यालय आने का अवसर मिला है (प्रथम पीढ़ी के शिक्षार्थी) और जिनके घर में पढ़ाई-लिखाई का वातावरण नहीं है। ऐसा भी हो सकता है कि उन्होंने अपने घर में कभी किताबें न देखी हों या फिर अपने घर में कभी किसी को पढ़ते हुए भी न देखा हो। इस तरह के परिवेश से आने वाले बच्चों को जब विद्यालय/पूर्व-प्राथमिक विद्यालय में साक्षरता संबंधी गतिविधियों से जोड़ा जाता है तो वे बच्चे इन अनुभवों के साथ सार्थक व अर्थपूर्ण तरीके से नहीं जुड़ पाते हैं। पढ़नेलिखने के प्रति रुचि विकसित करने में असफल रहते हैं, साथ ही उनमें सीखने और इस क्षेत्र में सफलता अर्जित करने की प्रेरणा व उत्साह की कमी भी रहती है। आज के इस तकनीकी युग में इस बात की संभावनाएँ अधिक प्रबल हैं कि बच्चों ने पुस्तकें भले ही न देखी हों पर कम उम्र में ही वे मोबाइल फोन का उपयोग जानते हैं। इस प्रकार की चुनौतियों के संदर्भ में भाषा और साक्षरता की शिक्षण प्रणाली की रणनीतियों के पुनरावलोकन एवं बदलाव की आवश्यकता होगी। इन चुनौतियों को देखते हुए भाषा और साक्षरता के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव की आवश्यकता है। यह बहुत ही ज़रूरी है कि बच्चों को पूर्व-प्राथमिक विद्यालय/विद्यालय की भाषा में सहजता और दक्षता के साथ मौखिक रूप से संप्रेषण करना सिखाया जाए। उन्हें मुद्रित और लिखित सामग्री से परिचित करवाया जाए, परिचित संदर्भो में पठन एवं लेखन अर्थपूर्ण ढंग से करने योग्य बनाया जाए। पुस्तकों में और पढ़ना सीखने में रुचि विकसित की जाए।</p> <p style="text-align: justify;">यदि पूर्व-प्राथमिक अवस्था में ही भाषा के वाचन, पठन और लेखन कौशलों की मजबूत नींव रखी जाए तो यह बच्चों के शुरुआती दौर के सीखने का सबसे बड़ा प्रमाण चिह्न होगा। इसके अतिरिक्त, ध्वनियों को पहचानना और ध्वनि एवं दृश्य में संबंध स्थापित करने जैसे कौशलों के विकास के साथ सुगमता से पठन सामग्री को पढ़ना सीखने में बच्चों की मदद करना भी बहुत महत्वपूर्ण है। </p> <h4 style="text-align: justify;">उपयुक्त अनुभव और अवसर सुनिश्चित करना </h4> <p style="text-align: justify;">शिक्षण प्रणाली में उपयुक्त प्रकार का बदलाव यह माँग करता है कि शिक्षक साक्षरता को अलग से संबोधित न करें, बल्कि पठन-लेखन सिखाने का काम कक्षा में मौखिक भाषा कौशल के विकास के साथ-साथ ही करें। इन दोनों कौशलों (पठन-लेखन) को एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखना चाहिए। इन दोनों कौशलों की पारस्परिक निर्भरता को समझना ज़रूरी है क्योंकि भाषाई दक्षता आसानी सेऔर समझ (बोध) के साथ पठन कौशल को सुगम बनाती है, बच्चे को पठन के जितने अधिक अवसर दिए जाएँगे, बच्चे का शब्द-भंडार उतना ही समृद्ध होगा। यह बहुत ही महत्वपूर्ण है कि बच्चों के घर की भाषा को पूरा-पूरा सम्मान दिया जाए, क्योंकि बच्चों की पहचानऔर आरंभिक अवस्था के अनुभव का घर में बोले जानी वाली भाषा से गहरा संबंध होता है। घर की भाषा को महत्व दिया जाना ज़रूरी है। विद्यालय की भाषा के साथ-साथ बच्चों की भाषा का उपयोग करते हुए द्विभाषी पद्धति अपनाने से अर्थबोध और अधिगम में आसानी रहती है। विद्यालय की भाषा की ग्राह्यता भी सुगम हो जाती है। बच्चे प्रभावशाली तरीके से संप्रेषण करना सीख लेते हैं, बशर्ते उन्हें सुविधाजनक, गैर-आलोचनात्मक और तनावमुक्त वातावरण में दूसरे बच्चों तथा वयस्कों के साथ बात करनेसुनने, हावभाव के साथ अपने अनुभव साझा करने के भरपूर अवसर दिए जाएँ। इसलिए अध्यापकों को चाहिए कि वे द्विभाषिक या बहुभाषिक परिवेश कक्षा में बनाएँ जिससे सभी बच्चों को समान अवसर प्राप्त हो। उन्हें कुछ इस न प्रकार की गतिविधियों की योजना बनानी चाहिए जिनमें भाषा प्रयोग के विभिन्न स्वरूपों या विभिन्न उद्देश्यों की संभावनाएँ बनती हों, उदाहरण के तौर पर कहानी सुनाना, में वार्तालाप, अनुभवों को साझा करना, प्रश्न पूछना और । उत्तर देना या किसी कहानी को नाटक के रूप में प्रस्तुत ने करना। ये अवसर बच्चों के प्रभावशाली वाचन कौशल की नींव मज़बूत करेंगे, उनके शब्द-भंडार में वृद्धि करेंगे , और अपने आप को अभिव्यक्त करने में आत्मविश्वास पैदा करेंगे। पठन और लेखन सिखाने के आरंभिक दौर में | शिक्षक कुछ ऐसी गतिविधियों को आधार बनाएँ, जिनसे न बच्चे लेखन के साथ दिन-प्रतिदिन के परिचित कामों को जोड़ सकें, जैसे खरीददारी करने की सूची बनाना या व फिर बच्चों द्वारा बनाई/कही जा रही कहानी को श्यामपट्ट पर लिखते जाना। इससे बच्चों में यह समझ बनेगी कि बोले जा रहे शब्द लिखे भी जा सकते हैं (मुद्रित सामग्री बोली हुई भाषा का ही लिखित स्वरूप है)। बच्चों के चारों ओर मुद्रण समृद्ध परिवेश सुनिश्चित करने, जैसे शीर्षक लिखना, चित्रों की लेबलिंग करना, निर्देश लिखना या फिर बच्चों के नाम लिखना आदि से उनमें मुद्रण के प्रति जागरूकता विकसित करने में मदद मिलेगी। बच्चों में ध्वन्यात्मक जागरूकता का विकास करने से जुड़ी गतिविधियाँ इस प्रकार हैं अपने आस-पास की आवाज़ों को पहचानना और शब्दों में निहित ध्वनियों के स्वरूप (पैर्टन) को पहचानना, शब्दों की शुरू और अंत की ध्वनि की पहचान और चित्रों से मिलान, ध्वनि के साथ अक्षर की सही बनावट की पहचान आदि गतिविधियाँ बाद के चरण में पढ़ना और लिखना सीखने के लिए ज़रूरी हैं। गतिविधि-क्षेत्र के अनुभव, जैसे कहानी की किताबों को बोलकर-पढ़कर सुनाना या पुस्तक के पृष्ठ उलटनापलटना बहुत ही अनौपचारिक और आनंददायी होने चाहिए तथा तरह-तरह की पठन सामग्री, जैसे कॉमिक्स, पत्रिकाएँ, कहानियों की किताबें आसानी से सुलभ होनी चाहिए। कहानियों की पुस्तकें इस प्रकार की हों जिनमें शुरुआत में अधिक से अधिक चित्र हों फिर धीरे-धीरे उनमें लिखित सामग्री का समावेश होता जाए। यदि बच्चे पढ़ने का अभिनय करते हैं या फिर शब्दों के अक्षरों और मात्राओं को जोड़कर पढ़ने की चेष्टा करते हैं या किसी ‘साईट वर्ड' को अपने आप से पढ़ते हैं तो समझिए कि ये सब पठन के प्रति रुचि के बहुत महत्वपूर्ण संकेतक हैं। इन्हें प्रोत्साहन देते रहने की ज़रूरत है। सस्वर कहानियाँ सुनाने के बाद अगला चरण है कि बच्चे पूरी कक्षा में शिक्षक के साथ-साथ पढ़ें, यह छोटे समूह में या व्यक्तिगत रूप से भी किया जा सकता है। इससे बच्चों में स्वतंत्र रूप से पढ़ने की क्षमता का विकास होगा। अब तक वे प्राथमिक शिक्षा के प्रारंभिक चरण में भी पहुंच चुके होते हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">लक्ष्य 3- बच्चों का सीखने के प्रति उत्साह प्रदर्शित करना और अपने आस-पास के परिवेश से जुड़ना</h3> <p style="text-align: justify;">छोटे बच्चे बहुत ही जिज्ञासु होते हैं और अपने संसार के प्रति मंत्रमुग्ध रहते हैं-उसके रंग, आकृतियाँ, ध्वनियाँ, आकार और नमूनों के बारे में, किंतु वह सबसे अधिक आकर्षित लोगों के प्रति रहते हैं विशेषकर उनकी देखभाल करने वालों तथा आस-पास के लोगों के प्रति दूसरों के साथ जुड़ने और अपनी भावनाओं को साझा करने की क्षमता बच्चों में सीखने के विशेष अवसर प्रदान करती है,जो उनके सांस्कृतिक और सामाजिक जुड़ाव की आधारशिला है। पूर्व-प्राथमिक अवस्था में बच्चे अपने आस-पास की दुनिया को अपने ही परिप्रेक्ष्य से समझना आरंभ कर देते हैं। इस संदर्भ में एक उदाहरण प्रस्तुत है उनके सामने पाँच पेंसिलें कुछ इस प्रकार से बिखरी हुई हैं - कि वे अधिक स्थान घेर रही हैं और दूसरी तरफ़ पाँच पेंसिलें एकदम सटी हुई रखी हैं इस तरह वे कम स्थान घेर रही हैं। ऐसी परिस्थिति में बच्चे समझते हैं कि दसरी स्थिति में पेंसिलों की संख्या कम है, जबकि दोनों स्थितियों में पेंसिलों की संख्या बराबर है। जैसा उन्हें दिखता है, वही उनकी समझ का आधार होता है। अभी संख्या की अवधारणा विकसित होने की अवस्था में है। पूर्व-प्राथमिक शिक्षा का मुख्य लक्ष्य बच्चों को अधिक तार्किक चिंतन की ओर ले जाना है। उनको जैसा वे देख पा रहे हैं उससे कहीं आगे समझ के आधार पर अवधारणा बनाने के स्तर तक लाने में उनकी मदद करनी है। प्रत्यक्ष अनुभवों और भौतिक, सामाजिक व प्राकृतिक वातावरण के आधार पर अपने आस-पास के परिवेश से संबंधित अवधारणाएँ बनाने के लिए बच्चों की मदद करनी होगी। परिवेश को समझने के लिए एक ऐसे सुगठित ढाँचे की योजना बनाने कीआवश्यकता है जो बच्चों के परिवेश द्वारा, परिवेश के लिए, परिवेश की समझ विकसित करने में बच्चों की मदद करे।</p> <h4 style="text-align: justify;">गणितीय सोच और तार्किक चिंतन </h4> <p style="text-align: justify;">गणितीय सोच और तार्किक चिंतन संज्ञानात्मक विकास के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण आयाम है। अर्मूत, (एबस्ट्रैक्ट) नियम आधारित चिंतन की नींव उन गतिविधियों के माध्यम से मज़बूत होती है जो बच्चों के लिए अर्थपूर्ण हों। इस स्तर पर गणितीय सोच में वस्तुओं और उनकी मात्रा के साथ-साथ उनके स्थानिक संबंधों की समझ शामिल है। इस स्तर पर वस्तुओं की विशिष्ट विशेषताओं या उनके गुणों की समझ को शामिल नहीं किया गया है।</p> <p style="text-align: justify;">एक बार जब वस्तुओं, उनके स्थान विशेष के साथ संबंध और संख्या की समझ बन जाती है, तब इस समझ के आधार पर अपेक्षाकृत अधिक अमूर्त अवधारणाओं का विकास किया जाता है। पूर्ण संख्या अवधारणा के लिए मात्रा, आकार, दरी, लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाई के बोध (मात्रा कम-ज्यादा, दूरी-दूर-पास आदि) से संबंधित ज्ञान; इसके बाद अंकगणित और बीजगणित के संख्या बोध, आकृति और स्थान बोध के आधार पर ज्यामितिय समझ का विकास होता है। पूर्व-प्राथमिक पाठ्यचर्या गणितीय संकल्पनाओं के विकास के इस नियम को अनुभवआधारित शिक्षण प्रणाली युक्तियों के माध्यम से संबोधित करती है। उल्लेखनीय बात यह है कि इन गणितीय अनुभवों में भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। </p> <h4 style="text-align: justify;">उपयुक्त अनुभव और अवसर सुनिश्चित करना </h4> <p style="text-align: justify;">संज्ञानात्मक क्षेत्र में बच्चों का अधिगम उनकी पाँचों इन्द्रियों के भरपूर विकास द्वारा होना चाहिए। इसके साथ ही खोजबीन करने, प्रयोग करने, प्रश्न पूछने जैसे अवसरों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। यह सब बच्चों के पूर्व ज्ञानऔर आस-पास के परिवेश से जुड़ा होना चाहिए। इसके लिए ज़रूरी है कि शिक्षक की स्वयं की अन्वेषणपरक एवं जिज्ञासु प्रवृत्ति हो और उसमें इतना धैर्य भी हो जिससे कि वह बच्चों को प्रयोग एवं खोजबीन करने के आनंद का अनुभव लेने दे तथा इन अनुभवों के माध्यम से सीखने की अनुमति दे सके। शिक्षक को बच्चों की भौगोलिक और सामाजिक पृष्ठभूमि की भी समझ होनी चाहिए जिससे वह नये ज्ञान और अनुभवों को इससे जोड़ सकें। आदर्श स्थिति तो यह है कि शिक्षक द्वारा बच्चों को कक्षा के बाहर घुमाने के लिए ले जाना चाहिए और बाहर की दुनिया को प्रत्यक्ष रूप से समझने में उनकी मदद करनी चाहिए। जहाँ इस तरह की व्यवस्था संभव नहीं हो सकती, वहाँ शिक्षक की ओर से जो सर्वोत्तम किया जा सकता है, वह यह है कि शिक्षक ऐसी गतिविधियाँ सृजित करें जिनके द्वारा कक्षाओं के भीतर ही अवधारणाओं को अनुभव करने के अवसर दिए जा सकें। उदाहरण के तौर पर, वह कक्षा में भिन्न-भिन्न प्रकार की सब्जियाँ और फल लेकर रख सकते हैं, बच्चों को चखने, सँघने और छने के मौके दें, फिर उनके अनुभव सुनें और उन पर बातचीत करें। शिक्षक बच्चों को कक्षा में छोटे-छोटे गमले लाने के लिए कह सकते हैं, इस तरह से वह बच्चों को बीज से अंकुरण की प्रक्रिया का अनुभव कक्षा में ही दे सकते हैं। इसी प्रकार कुछ और गतिविधियाँ की जा सकती हैं, जैसे अभिभावकों से पूछ-पूछकर अपने वंश वृक्ष का चित्र बनाना। इससे परिवार की अवधारणा का बोध तो होगा ही, साथ ही सामाजिक संसार की भी समझ बेहतर तरीके से होगी। प्रत्येक चरण में अधिगम के आधारभूत सिद्धांत 'ज्ञात से अज्ञात की ओर’, ‘सरल से जटिल की ओर' और ‘परिचित से अपरिचित की ओर' का ही पालन करना चाहिए। यह बच्चों के सीखने की प्रक्रिया को सुदृढ़ करता है और सही दिशा प्रदान करता है।</p> <p style="text-align: justify;">शिक्षक निर्देशित गतिविधियों के रूप में इन गतिविधियों और अनुभवों को इस प्रकार तैयार करें कि जिनमें ब्लॉक निर्माण, जोड़-तोड़ करने के हस्तकौशल, डॉल कार्नर, पुस्तक कार्नर के खेल हों, जहाँ उन्हें केंद्र के बाहर और भीतर अपने सहपाठियों तथा दूसरे लोगों के साथ आपस में बातचीत करने के अवसर मिले। इससे उनकी अवधारणाएँ मज़बूत और परिष्कृत होंगी।अकसर ऐसा देखा गया है कि बच्चों में गणित के प्रति भय या अरुचि पैदा हो जाती है क्योंकि उनमें गणितीय अवधारणाओं की समझ परिवेश के साथ संबंध नहीं जोड़ पाती। इसलिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि पूर्व संख्या अवधारणा और संख्या बोध इस तरह से विकसित किया जाए कि बच्चे प्रतिदिन के क्रियाकलापों को परिवेश से जोड़ सकें। इस तरह से उन्हें गणित सीखने में सार्थकता का बोध होगा। परिणामस्वरूप सीखने में तो बेहतरी आएगी ही, साथ ही गणित सीखने के प्रति रुचि भी विकसित होगी। गणितीय अवधाणाओं और शब्द सामर्थ्य सिखाने व उनके सुदृढ़ीकरण के लिए कहानी, शिशुगीत और कुछ दूसरी खेल-आधारित गतिविधियों का उपयोग किया जा सकता है।</p> <p style="text-align: justify;">शिक्षक पूर्व संख्या अवधारणाओं को आधारभूत अनुभव के रूप में सिखाने के लिए निर्देशित गतिविधियों की एक विस्तृत श्रृंखला का उपयोग कर सकते हैं। इन निर्देशित गतिविधियों में बहुत से संज्ञानात्मक कौशल शामिल होने चाहिए, जैसे मिलान करना, वर्गीकरण और क्रम में रखना। ये कौशल पूर्व संख्या अवधारणाओं को सीखने का आधार प्रदान करते हैं। उदाहरण के तौर पर, क्रम के अनुसार रखने वाली गतिविधि में शुरू-शुरू में बच्चों को कहा जाए कि वे वस्तु को आकार या लंबाई के संदर्भ में तीन के स्तर तक क्रम में लगाएँ, उसके बाद पाँच के क्रम में लगाने के लिए कहें और धीरे-धीरे उसे जटिल बनाते जाएँ।</p> <p style="text-align: justify;">यह प्रक्रिया बच्चों को आगे की संख्याओं और आकृतियों को सीखने का उपयुक्त आधार प्रदान करेगी। इसके बाद भी इसी तरह की सरल प्रक्रियाओं की योजना बनाएँ और संख्या आकृतियों की अवधारणाओं को बच्चों के आस-पास के परिवेश से जोड़कर सीखने के मौके दें। </p> <h4 style="text-align: justify;">मुख्य अवधारणाएँ और कौशल </h4> <p style="text-align: justify;">प्रत्येक लक्ष्य के अंतर्गत मुख्य अवधारणाओं या कौशलों को भी रेखांकित किया गया है। शिक्षकों को चाहिए कि वे बच्चों के समग्र विकास के लक्ष्य को केंद्र में रखते हुए जब पाठ्यचर्या संचालित करें तो इन अवधारणाओं और कौशलों पर ध्यान अवश्य दें। शिक्षकों से अपेक्षा है कि वे इस बात को सुनिश्चित करें कि पाठ्यचर्या के क्रियान्वयन के दौरान इन अवधारणाओं व कौशलों के विकास के लिए विविध क्रियाकलापों का सहारा लिया जाए। </p> <h4 style="text-align: justify;">शैक्षणिक प्रक्रियाएँ </h4> <p style="text-align: justify;">शैक्षणिक प्रक्रियाएँ वे युक्तियाँ हैं जिनका उपयोग शिक्षक पाठ्यचर्या क्रियान्वयन के दौरान इस प्रकार से करते हैं कि बच्चे अन्वेषण करके, समस्या समाधान करके और समीक्षात्मक चिंतन के माध्यम से सीखने की प्रक्रिया से जुड़ते हैं।</p> <ul style="text-align: justify;"> <li>खेल</li> <li>शिक्षण प्रणाली</li> <li>परस्पर संवाद</li> <li>परिवेश</li> </ul> <p style="text-align: justify;">शैक्षणिक प्रक्रियाओं से तात्पर्य निर्देशन संबंधी ऐसी युक्तियों और तकनीकों से है जिनके कारण ‘सीखना' संभव हो पाता है जो विशेष सामाजिक एवं भौतिक संदर्भो में ज्ञान, कौशलों, दृष्टिकोण एवं प्रवृत्तियों के अर्जन हेतु अवसर सुलभ करवाती हैं।इस बात को ध्यान में रखना बहुत ही महत्वपूर्ण है कि आरंभिक बाल्यावस्था में शिक्षण प्रणाली की प्रक्रियाओं के मुख्य तीन घटक होते हैं— खेल, परस्पर संवाद और परिवेश। पाठ्यचर्या क्रियान्वयन के दौरान इन तीनों को संबोधित किया जाना चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">खेल </h3> <p style="text-align: justify;">खेल छोटे बच्चों के सीखने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण घटक है। खेल के द्वारा बच्चे यह प्रदर्शित करते हैं कि वे क्या सीख रहे हैं, उनकी रुचि किस बात/चीज़ में है और वे किस तरह के सरोकार रखते हैं। खेल को सार्वभौमिक रूप से बच्चों के सीखने का महत्वपूर्ण तरीका माना गया है। वे खेलना पंसद करते हैं और जब उन्हें खेल द्वारा अन्वेषण करने, प्रयोग करने की आज़ादी दी जाए तो खुशी अनुभव करते हैं।</p> <p style="text-align: justify;">पूर्व-प्राथमिक पाठ्यचर्या में खेल को माध्यम के रूप में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान देना चाहिए क्योंकि खेल ज्ञान बढ़ाने की दिशा में बच्चों को परिवेश एवं एक-दूसरे के साथ संवाद करने के अवसर देते हैं। मुक्त रूप से खेले जाने वाले खेल, निर्देशित खेल या सरंचनात्मक खेल हो सकते हैं। मुक्त खेल बच्चों द्वारा स्वयं ही शुरू किए जाते हैं और इन खेलों में वयस्कों की निगरानी व हस्तक्षेप बहुत ही कम होता है जबकि निर्देशित खेल किसी विशेष अधिगम उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए शिक्षक द्वारा शुरू करवाए जाते हैं। खेल के दौरान बच्चों का अवलोकन करते समय शिक्षकों को बच्चों के मौजूदा ज्ञान और समझ के बारे में पता चलता है। वे उन क्षेत्रों को भी चिह्नित कर लेते हैं, जहाँ-जहाँ विकास के आगे के चरण के लिए बच्चों को निर्देशित करने की ज़रूरत है।</p> <h3 style="text-align: justify;">परस्पर संवाद</h3> <p style="text-align: justify;">खेल-आधारित सीखने की प्रक्रियाओं में वयस्क, बच्चों के संगी-साथी, बड़े और भाई-बहन बहुत ही महत्वपूर्ण औरअभिन्न भूमिका अदा करते हैं। परस्पर संवाद तीन प्रकार के होते हैं <strong>1. साथियों</strong> <strong>के साथ, 2. बड़ों के साथ और 3. भिन्न-भिन्न प्रकार की सामग्री/वस्तुओं के साथ।</strong> संगी-साथियों के साथ परस्पर संवाद खेल में दूसरे बच्चों को शामिल करना सीखने की दृष्टि से महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है, क्योंकि बच्चे अवलोकन करते हैं, एक-दूसरे की नकल/अनुकरण करते हैं और जो भी देखते हैं, उसके आधार पर कुछ नया करते हैं। जब वे दूसरे बच्चों के साथ साझेदारी करते हैं, अपने खेल स्वयं बना लेते हैं, समस्याओं का समाधान ढूँढ़ते है, समन्यवयन करते हैं, तब सामाजिक और भावनात्मक कौशलों का अर्जन करते हैं। नियम-आधारित खेल खेलते समय बच्चों को अपनी बारी की प्रतीक्षा करनी पड़ती है, इस तरह से वे आत्मनियमन करना सीखते हैं।</p> <h4 style="text-align: justify;"> भिन्न-भिन्न प्रकार की सामग्री/वस्तुओं के साथ परस्पर संवाद</h4> <p style="text-align: justify;"> बच्चों को मुक्त और निर्देशित खेलों के दौरान विविध प्रकार की सामग्री और वस्तुओं से परस्पर संवाद करने के अवसर प्राप्त होते हैं। यह सुनिश्चित कर लेना बहुत ही ज़रूरी है कि सामग्री/वस्तुएँ बच्चों की आयु व विकासात्मक स्तर के अनुरूप हों। ये दूसरे बच्चों के साथ मिलकर खेलने और परस्पर संवाद करने, समाधान खोजने और नवाचार करने के अवसर देने वाली हों। गतिविधि क्षेत्र में इस प्रकार की सामग्री हो सकती है, जैसे— क्रेयॉन, गुड़िया, बनावट फल एवं सब्जियाँ, ब्लॉक, पज़ल, मनके मोती, मापक कप और चम्मचें, वर्ग (क्यूब), बटन, मापक फीता, वज़न मापने वाला यंत्र, डॉक्टर सैट, परिधान संबंधी सामग्री (सजनेसँवरने का सामान), पुस्तकें, मिट्टी आदि। इस प्रकार की सामग्री बच्चों को अभिनय वाले खेल खेलने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।</p> <p style="text-align: justify;">शिक्षक और अभिभावक परस्पर संवादों के माध्यम से बच्चों के पहले से सीखे गए कौशलों के साथ संबंध स्थापित करने में मदद करते हैं। वयस्क बच्चों को दिशानिर्देश तो देते ही देते हैं, साथ ही परिवेश को कुछ इस तरह से सृजित करते हैं कि वह अधिगम प्रक्रियाओं को प्रोत्साहित कर पाएँ। शिक्षक साभिप्राय योजनाबद्ध और विकास-अनुरूप पाठ्यचर्या के क्रियान्वयन द्वारा सीखने के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">परिवेश</h3> <p style="text-align: justify;"> बच्चे अपने परिवेश के साथ सतत रूप से परस्पर संवाद करते रहते हैं। वे जिस चीज़ को भी देखते हैं, उसे छूने की अदम्य लालसा उनमें होती है। इसी प्रकार वे सीखते हैं।विविध प्रकार की सामग्री और गतिविधियों के माध्यम से बच्चे वस्तुओं को जोड़-तोड़ करके, प्रश्न पूछकर, अनुमान लगाकर, सामान्यीकरण करके भौतिक, सामाजिक और प्राकृतिक परिवेश का अन्वेषण करते हैं। सीखने का परिवेश इस प्रकार का होना चाहिए जो उन्हें अपनी ओर लालायित करे, सुरक्षित हो और अनुमान लगाने के मौके देता हो। साथ ही साथ विकास के अनुरूप विविध प्रकार की सामग्री से सराहना करने, प्रोत्साहित करने और प्रतिक्रिया देने से विशेष आवश्यकता वाले बच्चों सहित सभी बच्चों में सकारात्मक छवि बनती है और आत्मविश्वास पैदा होता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">सीखने के आरंभिक प्रतिफल </h3> <p style="text-align: justify;">सीखने के आरंभिक प्रतिफलों से तात्पर्य छोटे बच्चों के अधिगम और विकास के प्रति अपेक्षाओं से है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि बच्चों को प्रत्येक वर्ष के अंत में क्या जान लेना चाहिए और वे क्या कर सकते हैं। शिक्षकों को चाहिए कि वे सीखने के प्रतिफलों को प्राप्त करने के लिए खेल, खोजबीन, अन्वेषण, समस्या समाधान के लिए विषयवस्तु, शिक्षण प्रणाली युक्तियों, गतिविधियों, अनुभवों और अवसरों में सुयोजन करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">पाठ्यचर्या की विशेषताएं </h3> <ul style="text-align: justify;"> <li>पाठ्यचर्या आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है ।</li> <li>पाठ्यचर्या गतिशील होती है।</li> <li> पाठ्यर्या, सन्तुलित व्यक्तित्व मूल्यांकन में सहायक ।</li> <li> पाठ्यचर्या, निर्देशन का महत्वपूर्ण अंग है। </li> <li>पाठ्यचर्या राष्ट्रीय शिक्षा नीति का व्यापक स्वरूप होती है।</li> <li>पाठ्यचर्या अध्ययन के प्रत्येक, पक्ष को प्रस्तुत करती है।</li> </ul> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत: पूर्व प्राथमिक शिक्षा के लिए दिशा-निर्देश,राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी), श्री अरविंदाे मार्ग, नई दिल्ली।</p>