परिचय सभी बच्चों का यह अधिकार है कि उन्हें सर्वांगीण विकास एवं वृद्धि के वे सभी अवसर मिलें जिनसे उनमें निहित क्षमताओं का भरपूर विकास हो सके। जीवन के आरंभिक वर्ष वृद्धि, विकास और सीखने की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। यह बात उन बच्चों पर भी लागू होती है, जिनकी शारीरिक अक्षमताओं के कारण उनकी कुछ विशिष्ट आवश्यकताएँ होती हैं। तंत्रिका विज्ञान के क्षेत्र में हुए शोध यह सिद्ध करते हैं कि उम्र के इस चरण में मस्तिष्क का विकास बहुत तेज़ी से होता है। बच्चों के जीवन के शुरुआती वर्षों में आस-पास का परिवेश उनके तंत्रिका तंत्र के विकास पर महत्वपूर्ण रूप से प्रभाव डालता है। साथ ही सही समय पर सर्वोत्तम उद्दीपन प्रदान करना मस्तिष्क की कोशिकाओं की रचना के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है, यह निर्धारित करता है कि व्यक्ति जीवनपर्यंत किस प्रकार से व्यवहार करेंगे, किस प्रकार की सोच रखेंगे और किस प्रकार से सीखेंगे। मस्तिष्क के भिन्न-भिन्न बहुआयामी घटक समन्वित तरीके से कार्य करते हैं और इससे विकास के सभी क्षेत्रों में कौशल एवं क्षमताएँ अर्जित करने को बढ़ावा मिलता है। तीन से छह वर्ष की आयु के दौरान बच्चों की जिन सर्वांगीण क्षमताओं का विकास होता है, वे विद्यालय में उनके समायोजन एवं उनके खुशहाल जीवन के लिए बहुत ही आवश्यक होती हैं। रचनात्मक खेलों, विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए निर्मित खेलों में किए गए परिवर्तनों तथा विकास उपयुक्त गतिविधियों के द्वारा बच्चों की स्मरण शक्ति का विकास होता है। इन गतिविधियों द्वारा वे ध्यान केंद्रित कर पाते हैं और अपने पर नियंत्रण रखना सीखते हैं।बच्चों में कार्य निष्पादन एवं आत्मनियमन की योग्यताएँ एक ऐसी नींव का काम करती हैं जिससे उनमें भरपूर आत्मविश्वास पैदा होता है और आगे के वर्षों में उनका सीखना भी बहुत आसान व कुशलता के साथ होता है। वे बड़ी सहजता से अपने साथियों के बीच और विभिन्न अधिगम शैलियों के साथ अनुकूलन करना सीख जाते हैं। यह भी बहुत महत्वपूर्ण है कि बच्चों को भावनात्मक रूप से संबल प्रदान करने वाला ऐसा वातावरण मिले जिससे वे शिक्षक के साथ स्वस्थ एवं सुरक्षित संबंध विकसित कर सकें। बच्चों को इस प्रकार का मुक्त परिवेश देना चाहिए कि वे खोजबीन कर सकें, सीख सकें, अभिव्यक्त कर सकें और स्वयं के प्रति सकारात्मक अवधारणा बना सकें। शोध यह प्रमाणित करते हैं कि पूर्व-प्राथमिक कार्यक्रमों में बच्चों की प्रतिभागिता लाभदायक हैं क्योंकि इससे बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य और शिक्षा तीनों पर ही सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह उनके वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए बहुत मायने रखती है यदि हम आर्थिक नज़रिए से भी देखें तो पूर्व-प्राथमिक विद्यालयी कार्यक्रमों में निवेश एक प्रकार से उच्च स्तरीय मानवीय संपदा की तैयारी है जिसके लिए सार्वजनिक सहभागिता की विशेष आवश्यकता है। पूर्व-प्राथमिक विद्यालयी कार्यक्रमों से न केवल बच्चों और परिवारों को फायदा होता है, बल्कि इससे सामाजिक असमानता भी कम होती है और इस प्रकार समुदाय और अंतत: पूरे समाज को लाभ पहुँचता है। इसलिए, प्रेरक अनुभव देने के लिए पर्याप्त अवसर प्रदान करना बच्चों के सीखने की योग्यताओं पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए, पूर्व-प्राथमिक पाठ्यचर्या का लक्ष्य ऐसा दृष्टिकोण विकसित करना है जिससे विकास के सभी क्षेत्रों में प्रत्येक बच्चे की स्वाभाविक क्षमताओं का विकास सुगमता से हो सके। पाठ्यचर्या, विकास की उन अवस्थाओं पर ध्यान देने पर बल देती है जब बच्चे पूछताछ करते हैं, खोजबीन करते हैं और अपने बारे मेऔर अधिक जानने का प्रयास करते हैं। साथ ही सीखने से जुड़ी उन प्रवृत्तियों और दक्षताओं की भी पहचान कर लेते हैं जो आगे आने वाले जीवन के लिए ज़रूरी हैं। इस पाठ्यचर्या का लक्ष्य यह भी है कि सीखने के प्रतिफलों के साथ विकास के सभी घटकों को इस प्रकार समेकित रूप में देखा जा सके जो इस आयु के बच्चों की स्वाभाविक अधिगम प्रक्रिया के ताने-बाने के साथ मेल खाते हों। पर्व-प्राथमिक शिक्षा की परिभाषा पूर्व-प्राथमिक शिक्षा वह शिक्षा है जो तीन से छह वर्ष के आयु समूह को दी जाती है। यह औपचारिक शिक्षा का प्रथम चरण है। इसे पूर्व प्राथमिक शिक्षा के नाम से भी जाना जाता है। पूर्व-प्राथमिक शिक्षा भिन्न-भिन्न स्वरूपों में दी जा रही है, जैसे आँगनवाड़ी, नर्सरी स्कूल, पूर्व-प्राथमिक विद्यालय, प्रीप्रेटरी स्कूल, किंडरगार्टन, मॉन्टेसरी स्कूल और सरकारी एवं निजी विद्यालयों के पूर्व प्राथमिक अनुभाग। पर्व-प्राथमिक शिक्षा की संकल्पना पूर्व-प्राथमिक शिक्षा की संकल्पना है कि तीन से छह वर्ष की आयु के सभी बच्चों का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित करने के लिए सार्वभौमिक, समतावादी, आनंददायी,समावेशित और बच्चों के परिवेश से मेल खाते सीखने के अवसरों को समुन्नत किया जाए। यह सब तभी संभव हो पाएगा जब अभिभावक और शिक्षक भावनात्मक रूप से समर्थन दें, संस्कृति से जुड़ें, बाल-केंद्रित प्रोत्साहनवर्धक अधिगम परिवेश सृजित करने में सहभागी बनें। इसका लक्ष्य है कि प्रत्येक बच्चे की क्षमताओं का उसके उच्चतम स्तर तक विकास हो ताकि खेल और विकासात्मक प्रतिमानों के अनुरूप अभ्यास द्वारा जीवनपर्यंत रहने वाले अधिगम की मज़बूत नींव तैयार हो सके। यह पाठ्यचर्या इस बात को भी महत्व देती है कि सकारात्मक दृष्टिकोण, अच्छे मूल्य, समीक्षात्मक चिंतन के कौशलों, सहयोग, संप्रेषण, रचनात्मकता, तकनीक, साक्षरता और सामाजिकभावनात्मक विकास भी हो। इस पाठ्यचर्या की यह भी सोच है कि जब बच्चे पूर्व-प्राथमिक विद्यालय से प्राथमिक विद्यालय की ओर कदम बढ़ाएँ तो उन्हें किसी प्रकार की भावनात्मक परेशानी न हो और वे भविष्य में रचनात्मक व संतोषप्रद जीवन का आनंद ले सकें। पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के व्यापक लक्ष्य पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के व्यापक लक्ष्य इस प्रकार हैं बच्चों का सर्वांगीण विकास और आजीवन सीखने हेतु मज़बूत नींव डालना। बच्चों को विद्यालय के लिए तैयार करना। पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के उद्देश्य एक ऐसे बाल अनुरूप वातावरण का निर्माण करना जहाँ सभी बच्चे अपना महत्व समझें, अपने आप को सम्मानित व सुरक्षित महसूस करें और स्वयं के प्रति सकारात्मक भाव रखें। बच्चों में बेहतर स्वास्थ्य, खुशहाली, पोषण, स्वच्छताएवं स्वास्थ्य संबंधी अच्छी आदतों के लिए मज़बूत नींव डालना। बच्चों को ऐसा परिवेश देना जो उन्हें प्रभावशाली संप्रेषक बनने में मददगार हो और जहाँ वे प्रभावशाली तरीके से सुनना-बोलना सीख सकें। बच्चों को लगन से सीखने वाला बनने, समीक्षात्मक रूप से सोच सकने, रचनात्मक बनने और अपने परिवेश से सहयोग. संवाद और जडाव स्थापित करसकने में मदद करना। पूर्व-प्राथमिक विद्यालय से प्राथमिक विद्यालय मेंसहज पारगमन के लिए तैयार करना। अभिभावकों और समुदाय के साथ भागीदार बनकर काम करना जिससे सभी बच्चों को पनपने के अवसर मिल सकें। पूर्व-प्राथमिक विद्यालयी बच्चों की विशेषताएँ पूर्व-प्राथमिक विद्यालय के बच्चे अपने परिवेश में रंगों,आकृतियों, ध्वनियों, आकारों और नमूनों के प्रति अत्यंत जिज्ञासु और उत्साही होते हैं। उनकी अपने आस-पास के परिवेश को जानने-समझने की और विभेदीकरण की क्षमता दिन-प्रतिदिन समृद्ध होती जाती है। यह आरंभिक अधिगम बड़ों और साथियों दोनों ही के साथ संप्रेषण से होता है जिसमें भाषा की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। बच्चों को इस प्रकार के हर अवसर उपलब्ध करवाने चाहिए जिससे वे अपने आस-पास और इससे भी कहीं आगे जाकर मानवीय, सामाजिक व सांस्कृतिक परिवेश को समझने के लिए प्रश्न कर सकें और खोजबीन कर सकें। अपने परिवेश की जाँच पड़ताल करते समय बच्चे अवलोकन करने, प्रश्न करने, चर्चा करने, अनुमान लगाने, विश्लेषण करने, खोजबीन और तरह-तरह के प्रयोग करने में लगे रहते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान वे तरह-तरह की अवधारणाओं तथा विचारों की रचना करते हैं, उनमें सुधार करते हैं और इस प्रकार अवधारणाओं के प्रति समझ बनाते हैं। वे अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना, एक-दूसरे के साथ मिलकर-साझा करने की आदत डालना, अपनी बारी की प्रतीक्षा करना और मित्रों के साथ सहयोग करना सीखते हैं। बच्चे यह बताने में सक्षम हो जाते हैं कि वे कब खुश पूर्व-प्राथमिक शिक्षा का महत्वहैं और कब उदास हैं। अपने प्रति भी उनकी समझ आकार लेने लगती है। इसलिए प्रस्तुत पाठ्यचर्या में इस प्रकार की विशिष्ट विषयवस्तु और शिक्षण कला को अंतर्निहित किया गया है जो बच्चों की आयु और विकासात्मक ज़रूरतों को पूरा कर सके, साथ ही दिशा निर्देशक सिद्धांतों के रूप में सैद्धान्तिक और अवधारणात्मक रूपरेखा का आधार बन सके। इस प्रकार से यह पाठ्यचर्या आयु विशेष में दिए जाने वाले अनुभवों में लचीलेपन का प्रावधान तो प्रस्तुत करती ही है, साथ ही नीति निर्धारण में विविधता का भी ध्यान रखती है। बहुस्तरीय, बहुआयु वर्ग वाली कक्षाओं की वास्तविकताओं को भी ध्यान में रखती है और पूर्व-प्राथमिक कक्षाओं से प्रारंभिक कक्षाओं में जाने की प्रक्रिया को सरल बनाती है। इसका परिणाम इस रूप में प्रतिबिंबित होता है कि बच्चे अपने ‘स्व’ की छवि के प्रति सकारात्मक भाव रखते हैं, अपने प्रति आत्मविश्वास पैदा करते हैं, बेहतर कार्य कर पाते हैं और इससे उनके विद्यालय में बने रहने की संभावना भी बढ़ जाती है। पूर्व-प्राथमिक पाठ्यचर्या के मार्गदर्शक सिद्धांत पूर्व-प्राथमिक शिक्षा की उभरती हुई ज़रूरतों और बदलते परिदृश्य के आलोक में यह प्रयास किया गया है कि मौजूदा पाठ्यचर्या समग्रतावादी, विकासात्मक प्रतिमानों के अनुरूप, बच्चों के सामाजिक संदर्भो से जुड़ी हो और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि खेल एवं गतिविधि आधारित हो। निम्नलिखित मार्गदर्शक सिद्धांत मौजूदा पाठ्यचर्या की रूपरेखा तय करते हैं सीखना सतत और संचयी होता है— जन्म के साथ ही सीखना आरंभ हो जाता है और यह प्रक्रिया आजीवन चलती रहती है। चूँकि बच्चे इन्द्रियों और उत्प्रेरणा के द्वारा सीखते हैं, इसलिए उनके विकास पर आरंभिक देखभाल और उत्प्रेरणा का समग्र और व्यापक रूप से प्रभाव पड़ता है। इसलिए यह आवश्यक है कि विशेष आवश्यकता वाले बच्चों सहित सभी बच्चों को आरंभिक वर्षों में ही समुचित उत्प्रेरणा देने के अवसर प्रदान किए जाएँ। तंत्रिका विज्ञान से प्राप्त साक्ष्य सिद्ध करते हैं किआरंभिक अधिगम आगामी जीवन की उपलब्धियों को प्रभावित करता है जीव तंत्रिका विज्ञान के क्षेत्र में हुए अनुसंधान दर्शाते हैं कि बच्चे के जीवन के शरुआती वर्षों में जिस प्रकार के अनभव दिए जाते हैं, बच्चे उन्हीं तरीकों से सीखते हैं। यद्यपि अनुवांशिकी की मस्तिष्क की रचना में बहुत बड़ी भूमिका है तथापि आगे के जीवन में मस्तिष्क किस प्रकार से कार्य करेगा, इसके लिए बच्चों के आरंभिकअनुभव बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। हर बच्चा अलग होता है और वह अपनी गति सेही बढ़ता, सीखता और विकसित होता है यद्यपि सभी बच्चों के विकास का आमतौर पर लगभग एक-सा ही अनुक्रम होता है, फिर भी यह सत्य है कि सभी बच्चे अपने आप में अद्वितीय हैं और अपनी गति के आधार पर क्षमताएँ और कौशल अर्जित करते हैं। एक अच्छे पूर्व-प्राथमिक विद्यालयी कार्यक्रम में बच्चों की विभिन्न क्षमताओं और विकास की अपनी गति का ध्यान रखा जाता है। अच्छा पूर्व-प्राथमिक विद्यालय कार्यक्रम यह भी सुनिश्चित करता है कि सभी बच्चों का उनकी पूरी क्षमताओं के साथ शारीरिक, सामाजिक, भावनात्मक, नैतिक और बौद्धिक विकास हो सके। यह पाठ्यचर्या विकास उन समुचित प्रक्रियाओं का पालन करती है जो बच्चों के द्वारा अधिकतम सीखने और उनके विकास में मदद करने के लिए उनकी आयु, अवस्था और संदर्भ के उपयुक्त हों। पाठ्यचर्या यह भी सुझाती है कि विकास के भिन्न-भिन्न चरणों में बच्चों की आवश्यकताओं को संबोधित करने वाली अनेक शिक्षण शैलियों का उपयोग किया जाए। सीखने और विकास का आधार खेल एवंगतिविधियाँ हैं— पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के लिए खेल एवं गतिविधियाँ सर्वश्रेष्ठ शिक्षण माध्यम हैं। ये गतिविधियाँ बच्चों को खोजबीन करने, प्रयोग करने, परिवेश को अपने अनुसार ढालने और अनुभव करने के अवसर प्रदान करती हैं। इस प्रकार बच्चे स्वयं ही ज्ञान का सृजन करते हैं। पाठयचर्या इस प्रकार की खेल गतिविधियों का सुझाव देती है जिनसे विभिन्न प्रकार के खेलों, जैसे स्वछंद व निर्देशित खेल, क्रियाशीलऔर दूसरे के द्वारा खिलाए जाने वाले खेल, भीतरी तथा बाह्य खेल, वैयक्तिक एवं सामूहिक खेल, संरचनात्मक व असंरचनात्मक खेलों के अनुपात में संतुलन बना रहता है। खेलों का अधिकांश भाग स्वयं प्रेरित खेलों एवं गतिविधियों पर आधारित होना चाहिए जो बच्चों की रुचि और इच्छा पर आधारित हो। बच्चों के सीखने के लिए बड़ों के साथ प्रतिक्रियात्मक और सहयोगी अंत:क्रिया (संवाद) अनिवार्य है— बच्चे अपने अभिभावकों, परिवार, शिक्षक व समाज के साथ अपने संबंधों के द्वारा सीखते हैं। संबंधों को बनाए रखने से बच्चों में सुरक्षा की भावना, आत्मविश्वास, कौतूहल और संवाद करने की क्षमता पैदा होती है। इन संबंधों और अंत:क्रिया के आधार पर बच्चे यह भी सीखते हैं कि अपनी भावनाओं को किस प्रकार नियंत्रित किया जाएऔर उन्हें समाज में उपयोगी तरीके से कैसे दूसरों से जोड़ा जाए। अनुभवजन्य अधिगम के लिए परिवेश निर्मितकरने से बच्चे सीखते हैं— बच्चे अपने परिवेश में प्रत्यक्ष व क्रियात्मक अनुभवों द्वारा सीखते हैं जो उन्हें अपने शिक्षक और साथियों के साथ पारस्परिक अंत:क्रिया करने और उनके निर्देशों के आधार पर अपने ज्ञान का सृजन करने में सहायक होते हैं। जब सीखना इस प्रकार से होगा तो वह स्थायी भी होगा। शुरुआती अवस्था में बच्चे अपने स्तर से आगे की जानकारी को भी जानने की कोशिश करते हैं, फिर वापस अपनी आयु अनुरूप जानकारी की खोजबीन करते हैं, पुन: आगे के स्तर की खोजबीन में जुट जाते हैं। इस प्रकार अधिगम का यह चक्र चलता ही रहता है। इस बात को सुनिश्चित करना बहुत ज़रूरी है कि बच्चों को उनके विकासात्मक प्रतिमानों के अनुरूप सामग्री, अनुभव और चुनौतियाँ दी जाएँ जिससे वे स्वयं ज्ञान का सृजन कर सकें। इस प्रक्रिया में कार्यों की पुनरावृत्ति भी होगी, अध्यापकों और अनुभवी मित्रों का मार्गदर्शन भी होगा। इससे सभी बच्चों को अपनी नैसर्गिक क्षमताओं का विकास करने का अवसर मिलेगा और वे स्वतंत्र रूप से काम करना भी सीखेंगे। पारस्परिक शिक्षण-अधिगम अनुभवों को समृद्ध करता है— बच्चों का आपस में एक-दूसरे के साथ काम करना, बच्चों का शिक्षक के साथ और सामग्री के साथ तरह-तरह के कार्य करना गुणवत्तापरक पूर्व-प्राथमिक शिक्षा का महत्वपूर्ण पहलू है। बच्चों के आपस में संवाद, परिवेशीय और सांस्कृतिक अनुभवों की विविधता तथा सार्थक संवाद सुदृढ़ ज्ञान के सृजन की नींव प्रदान करते हैं व उन्हें औपचारिक विद्यालय के लिए तैयार करते हैं। स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री का विकास और उपयोग सीखने के अवसरों को समृद्ध करता है स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों का उपयोग बच्चों को आरंभिक उत्प्रेरणा और शिक्षा देने में बहुत ही सहायक होता है। इससे स्थानीय रूप से महत्वपूर्ण मूल्यों और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के अन्य दूसरे पहलुओं का संरक्षण तो होता ही है, साथ ही ये अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। ये शिक्षक, बच्चों, अभिभावकों और समुदाय को सक्रिय एवं रचनात्मक शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में योगदान देने के अवसर भी प्रदान करते हैं। संदर्भ के प्रति संवेदनशीलता और विविधताओंकी सराहना अधिगम में सहायक होती हैं— यह बहुत आवश्यक है कि सभी बच्चों के सकारात्मक बिंदओं और क्षमताओं की पहचान की जाए जिससे कि उन्हें सीखने के अधिकतम अवसर दिए जा सकें। प्रत्येक बच्चे को हर शैक्षिक अनुभव और गतिविधि में शामिल करने की ज़रूरत है। विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को व्यक्तिगत रूप से निर्देश मिलने चाहिए जिससे बच्चे अपेक्षित कौशल, व्यवहार के तौर-तरीकेऔर अवधारणाओं को सीख सकें और उन्हें विकसित कर सकें। चूँकि समाजीकरण पूर्व-प्राथमिक शिक्षा का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है, इसलिए बच्चों को खेल, सामूहिक गतिविधियों और भिन्न-भिन्न प्रकार के संवादों में भाग लेने के भरपूर अवसर मिलने चाहिए। यह बहुत ही महत्वपूर्ण है कि सभी बच्चों को, चाहें वे किसी भी जाति, वंश, जेंडर, क्षमता, लैंगिक रुझान, अक्षमता, भाषा, संस्कृति, धर्म, सामाजिक-आर्थिक स्थिति के हों, समान रूप से सीखने के अवसर सुलभ हों। पाठ्यचर्या संबंधी निर्णय ज्ञान के उन संदर्भो और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि व अनुभवों को सम्मान व महत्व देने वाले हों जिन्हें बच्चे अपने संग पूर्व-प्राथमिक विद्यालय में लेकर आते हैं। इस तरह के अवसर भी दिए जाने चाहिए ताकि बच्चे एक-दसरे की सांस्कृतिक और समूह की समझ तथा अंतर्निहित विविधता को स्वीकार कर सकें। मातृभाषा/घर की भाषा ही शिक्षण का माध्यम होनी चाहिए भाषा का बच्चों की पहचान और भावनात्मक सुरक्षा से साथ घनिष्ठ संबध है। भाषा उन्हें अपने विचार और भावनाओं को स्वतंत्र रूप से अभिव्यक्त करने में सहायक है। हमारे जैसे बहुभाषी देश में सीखने-सिखाने की भाषा एक जटिल मुद्दा है। पूर्व-प्राथमिक विद्यालयों में आने वाले बच्चों के घरकी भाषा, विद्यालय की भाषा या फिर उस क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा से भिन्न हो सकती है। शोध यह दर्शाते हैं कि जिन बच्चों को पूर्व-प्राथमिक कार्यक्रम में अपनी मातृभाषा में बोलने के अवसर मिलते हैं, वे आसानी से किसी विषय पर समझ बना लेते हैं। बच्चों की मातृभाषा/घर की भाषा में शिक्षण को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किया गया है क्योंकि शुरुआती वर्षों में अवधारणाओं की समझ बनाने के लिए यही एक सर्वाधिक उपयुक्त तरीका है। यदि कक्षा का परिवेश ऐसा है जिसमें अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले बच्चे मौजूद हैं तो शिक्षक से अपेक्षा है कि वे अभिव्यक्ति के लिए हर भाषा को स्वीकृत करेंऔर फिर धीरे-धीरे विद्यालय की भाषा से उनका परिचय करवाएँ। सभी बच्चों को सांकेतिक भाषा से परिचित होने के मौके भी दिए जाने चाहिए। यह समावेशन की नीति की नींव डालने में मददगार होगा। - अधिगम में परिवार की सहभागिता योगदान देती है। बच्चों के अधिगम और विकास में अभिभावकोंऔर परिवार का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान होता है। पूर्व-प्राथमिक पाठ्यचर्या, पूर्व-प्राथमिक विद्यालयोंऔर घरों में परिवारों की सहभागिता और साझेदारी की अनुशंसा करती है। स्त्राेत: पूर्व प्राथमिक शिक्षा के लिए दिशा-निर्देश,राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी), श्री अरविंदाे मार्ग, नई दिल्ली।