पैकेज की आवश्यकता इस पैकेज की आवश्यकता क्यों है हम सभी जानते हैं कि बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम (आर.टी.ई. अधिनियम, 2009) अप्रैल-2010 से लागू किया जा चुका है। अधिनियम के अनुसार सी.सी.ई. को प्रत्येक बच्चे की प्रारंभिक शिक्षा पूरी होने तक लागू किया जाए। अतः आर.टी.ई. अधिनियम को इसकी मूल भावना में क्रियान्वित करने के लिए सतत और समग्र मूल्यांकन एक अनिवार्य आवश्यकता है। सी.सी.ई. को लागू करने में, शिक्षक एक केन्द्रीय भूमिका निभाते हैं। क्षेत्र के अनुभवों और शिक्षकों के साथ बातचीत से यह पता चला है कि उन्हें सी.सी.ई. को लागू करने में समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। यह देखा गया है कि शिक्षक आकलन को, जो कि सतत व समग्र मूल्यांकन का आवश्यक घटक है, शिक्षण अधिगम प्रक्रिया के साथ समावेशित करने के स्थान पर आँकड़ों का संकलन करने व बच्चों की जाँच के परिणामों के रिकार्ड रखने में अपना समूचा समय लगा देते हैं। आमतौर पर शिक्षक सी.सी.ई. को बाहरी गतिविधि के रूप में समझते हैं जिसे अलग से पाठ पूरा होने के बाद किया जाना चाहिए। आर.टी.ई. अधिनियम कक्षा आठवीं तक सभी सार्वजनिक परीक्षाओं का निषेध करता हैऔर इसके अनुसार नो डिटेंशन नीति’अवरोध रहित जारी रहनी चाहिए। यहाँ पर, यह स्पष्ट होना चाहिए कि नो डिटेंशन नीति' को लागू करने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि स्कूलों में सीखने-सिखाने की प्रक्रिया एकदम परोक्ष में चली जाए।इसके विपरीत, आर.टी.ई. के दृष्टिकोण को पूरा करने में, सी.सी.ई. सभी बच्चों का सीखना सुनिश्चित करके एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के दौरान किया जाने वाला आकलन बच्चों के सीखने में किसी भी तरह के सुधार के लिए आवश्यक व सामयिक फीडबैक (पृष्ठ पोषण) प्रदान करेगा। इस प्रकार सी.सी.ई. बच्चों की शिक्षा से जुड़े सभी लोगों को, बच्चे की स्वंय की प्रगति के साथसाथ उसकी उपलब्धियों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रोत्साहित करेगा। इसके अलावा यह भी पता चला है कि सी.सी.ई. को लागू करने से संबंधित विभिन्न शब्दों को लेकर कई भाँतियाँ हैं। ‘सतत' का अर्थ प्रायः शिक्षकों द्वारा जल्दी-जल्दी परीक्षण करना माना जा रहा है। कई विद्यालयों में सतत आकलन के नाम पर सभी विषयों में प्रति सप्ताह बच्चों के परीक्षण कराए जाते है। ‘समग्र' का अर्थ बच्चे के व्यवहार के विभिन्न पक्षों की अलग अलग जाँच करके जोड़कर देखना है। व्यक्तिगत-सामाजिक विशेषताओं (समानुभूति, सहयोग, स्व-अनुशासन, और किसी कार्य में पहल करना आदि) का भी अलग से आकलन किया जा रहा है और उसे चार/पाँच प्वाइंट स्केल में आँका जाता है जो कि अव्यवहारिक प्रतीत होता है। मूल्यांकन को रिकॉर्ड रखने भर की गतिविधि माना जा रहा है। परिणामस्वरूप शिक्षक बहुत अधिक असमंजस में हैं और उनकी शिकायत रहती है कि उनका सीखने-सिखाने के समय का अधिकतर भाग आकलन के लिए आँकड़े एकत्र करने में ही जाता है, जिसके कारण वास्तविक अर्थों में सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में जो समय लगना चाहिए, वह नही हो पा रहा है। मुख्य उद्देश्य इस पैकेज के मुख्य उद्देश्य हैं शिक्षा से जुड़े विभिन्न लोगों जैसे शिक्षक, प्रशासनिक अधिकारी, शिक्षक प्रशिक्षक आदिमें सतत और समग्र मूल्यांकन की संकल्पना की समझ का विकास करना। सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में, अभिन्न अंग के रूप में सतत और समग्र मूल्यांकन कैसे किया जाए-इसके उदाहरण देना। बच्चे की प्रगति के बारे में किस प्रकार की सूचना दर्ज की जाए, इस संबंध में शिक्षकों एवं शिक्षक प्रशिक्षकों को सुझाव देना। बच्चे की प्रगति के लिए किस प्रकार की रिपोर्टिंग उपयोगी होगी, इस संबंध में शिक्षकों का मार्गदर्शन करना। सतत और समग्र मूल्यांकन को लागू करने के लिए शिक्षक, शिक्षक प्रशिक्षक तथा प्रशासनिक अधिकारियों को एक मॉडल तथा विस्तृत दिशा-निर्देश देना। क्या है और क्या नहीं सतत और समग्र मूल्यांकन क्या है और क्या नहीं है आकलन और मूल्यांकन का मुख्य उद्देश्य बच्चे के सीखने में सुधार लाना है ताकि वे प्रगति कर सकें और उनका संपूर्ण विकास हो सके। सीखने-सिखाने के दौरान किए गए आकलन से उनके बारे में एकत्र की गई जानकारी शिक्षक को किसी भी विषय में बच्चे की क्षमताओं और सीखने में कमी की पहचान करने में सहायक होती है। यह शिक्षकों को बच्चों की जरुरतों के अनुसार पाठ्यक्रम व सीखने-सिखाने की प्रक्रिया को ढालने में मदद करता है। ये, यह भी दर्शाने में सहायक सिद्ध होता है कि बच्चों ने पाठ्यचर्या संबंधी अपेक्षाओं को किस सीमा तक प्राप्त किया है। सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के दौरान किए गए सतत आकलन हमें संकेत देते हैं कि बच्चों के सीखने में कहाँ-कहाँ कमी रह गई हैं जिसके आधार पर सीखने में सुधार के लिए शिक्षक उचित समय पर आवश्यक कदम उठा सकता है। साथ-साथ यह पता लगाने में भी कि बच्चों को सीखने में कहाँ कठिनाई हो रही है और कहाँ उन्हें विशेष मदद की ज़रूरत है। सतत आकलन (जिसे आम तौर पर संरचनात्मक आकलन भी कहा जाता है) के लिए किसी प्रकार के बने-बनाए परीक्षणों की आवश्यकता नहीं होती है, जो सभी बच्चों को एक साथ और एक ही समय में दिए जाते हैं। सतत आकलन में तो बच्चों को इस बात का भी नहीं चलता है कि उनका आकलन किया जा रहा है। इस प्रकार सतत आकलन का अर्थ बहुत जल्दी-जल्दी औपचारिक परीक्षण देना नहीं है। एक बहुत बड़ी भ्रांति संरचनात्मक आकलन (Formative Assessment) शब्द को लेकर है। बहुत सारे विद्यालयों के शिक्षक रिपोर्ट कार्ड में प्रत्येक तिमाही में बच्चों द्वारा किए जा रहे प्रोजेक्ट कार्य तथा अन्य गतिविधियों को संरचनात्मक आकलन के अन्तर्गत रिपोर्ट करते हैं। दरअसल संरचनात्मक सतत आकलन का तात्पर्य कदापि यह नहीं है कि उसे रिपोर्ट कार्ड में दर्ज करके सूचित किया जाए। संरचनात्मक शब्द संरचना शब्द से जुड़ा है अर्थात् सीखने की प्रक्रिया की संरचना। यह आकलन सीखने-सिखाने के दौरान बच्चों की प्रगति का निरीक्षण और उसमें सुधार लाने के लिए बनाया गया है। इसे सीखने का आकलन भी कहा जाता है। सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के दौरान बच्चे के सीखने के बारे में किसी भी प्रकार की जानकारी, उदाहरण के लिए, लिखित कार्य, मौखिक उत्तर या केवल बच्चे की गतिविधियों का अवलोकन आदि का प्रयोग संरचनात्मक रूप से बच्चे के सीखने में सुधार के लिए उपयोग में लाई जानी चाहिए। सी.सी.ई. के दूसरे घटक समग्र आकलन का अर्थ बच्चे की सर्वांगीण प्रगति के बारे में जानकारी से है। सीखने-सिखाने के संदर्भो में प्रगति एकल रूप में नहीं हो सकती जैसे संज्ञानात्मक पहलू, कौशल, वैयक्तिक एवं सामाजिक गुण आदि। एक अध्याय या विषय क्षेत्र के पूरा होने पर शिक्षिका यह जानना चाहेगी कि बच्चे ने उसकी अपेक्षानुसार अधिगम उपलब्धि प्राप्त कर ली है या नहीं। इसके लिए वह पाठ के उद्देश्य की पहचान कर सीखने के संकेतक निर्धारित करती है। शिक्षिका इन अपेक्षित संकेतकों के अनुरूप कुछ क्रियाकलापों को तैयार करती है। इन गतिविधियों की प्रकृति में विविधता होनी चाहिए। इन प्रश्नों/क्रिया-कलापों के द्वारा शिक्षक बच्चों का आकलन करेगा और वह एक प्रकार का समेकित आकलन (Summative Assessment) होगा। ये आकलन संबंधी आँकड़ों को शिक्षक दर्ज (रिकार्ड) करेंगे। इस प्रकार एक तिमाही में शिक्षक द्वारा आकलन के विविध प्रकार के आँकड़े बच्चे के व्यवहार के विभिन्न पहलुओं के बारे में एकत्र हो जाएंगे। ये आँकड़े यह बताएँगे कि बच्चे समूह में किस तरह से कार्य कर रहे थे और व्यक्तिगत रूप से काम करते समय उनके क्या तरीके थे जैसेः पेपर-पेंसिल परीक्षा देते समय, चित्र बनाते समय, चित्र पढ़ते समय, मौखिक अभिव्यक्ति के समय, कविता/गीत की रचना आदि के समय आदि। ये आँकड़े बच्चों के सीखने के साथ-साथ उनके व्यवहार के और सभी पहलुओं का आकलन करने में तो मददगार होंगे ही, साथ ही बच्चों के अधिगम (सीखने) व विकास की एक समग्र तस्वीर भी प्रस्तुत करेंगे। दूसरी भ्राँति बच्चों की व्यक्तिगत/सामाजिक गुणों के आकलन के संबंध में है। आमतौर पर इन गुणों जैसे समानुभूति, सहयोग, दूसरों के लिए चिंता (तदानुभूति), संवेदनशीलता आदि का आकलन ग्रेडिंग के पाँच प्वाइंट स्केल में किया जाता है। व्यक्तिगत एवं सामाजिक विशेषताओं (गुणों) का आकलन न तो विषय विशेष तक ही सीमित है और न ही इसके लिए कोई विशेष समय निर्धारित करने की ज़रूरत है। इसे प्रभावकारी रूप से विभिन्न स्थितियों जैसे सीखने-सिखाने के दौरान, कक्षा के बाहर तथा कक्षा के अंदर की गतिविधियों में, अन्य गतिविधियों तथा सहपाठियों के साथ बातचीत करने के दौरान देखा जा सकता है। इनका आकलन इन गुणों/विशेषताओं के होने अथवा न होने के संदर्भो में नहीं किया जाना चाहिए। इन गुणों के आकलन की व्याख्या इस प्रकार से की जानी चाहिए कि बच्चे इन गुणों को किस तरह से प्रदर्शित कर पाते हैं। इस प्रकार की रिपोर्टिंग गुणात्मक रूप से की जानी चाहिए। आकलन, मूल्यांकन की जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रमाण एकत्र करने का एक माध्यम है। आकलन का अभिप्राय अंतिम निर्णय से नहीं है। बल्कि यह एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा विभिन्न प्रेक्षणों (आंकड़ों) के मध्य तुलना की जाती है। मूल्यांकन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा बच्चों के विकास व सीखने में परिवर्तनों का पता लगाया जाता है। सही नतीजों पर पहुँचने के लिए इसे विश्वसनीय व वैद्य प्रमाणों, मान्य सबूतों पर आधारित होना चाहिए। एक अच्छा मूल्यांकन वह है जो किसी बच्चे की लगभग सभी उपलब्धियों की पूरी तस्वीर पेश करे और जो विभिन्न (एक से अधिक) स्रोतों पर आधारित हो। प्रायः ‘आकलन' और 'मूल्यांकन' इन दोनों शब्दों को एक दूसरे की जगह इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इन दोनों के उद्देश्य में अंतर है। आकलन का उद्देश्य सीखने के दौरान बच्चे की उपलब्धि की गुणवत्ता को परखना है। मूल्यांकन का केंद्र सीखने-सिखाने की निश्चित अवधि के बाद बच्चों के वास्तविक उपलब्धि स्तर को जाँचना है, बिना यह जाने कि बच्चे ने क्यों और कैसे यह स्तर प्राप्त किया। इस प्रकार मूल्यांकन, एक निर्धारित मानदंड के आधार पर बच्चे के कार्य की गुणवत्ता की जाँच करना है और उस गुणवत्ता को स्थापित करने के लिए उस स्तर को एक मूल्य विशेष देना है (जैसे-अंक अथवा ग्रेड)। इसलिए इसे सीखने का आकलन अथवा समेकित आकलन (समेटिव) भी कहा जाता है। आकलन प्रक्रिया आधारित है और मूल्याँकन उत्पाद आधारित। आम तौर पर यह माना जाता है कि मूल्यांकन का मुख्य उद्देश्य एक बच्चे की उपलब्धि से दूसरे बच्चे की उपलब्धि की तुलना करना अथवा उनके सीखने के स्तर के प्रति कोई एक निर्णय देना है। इन प्रक्रियाओं का लक्ष्य बच्चे की कमियों को बताना या यह उजागर करना है कि बच्चे क्या नहीं जानते हैं, बजाय इसके कि बच्चे के सीखने में सुधार की ओर ध्यान केंद्रित करना। सतत और समग्र मूल्यांकन की अन्तर्निहित भावना आकलन और मूल्यांकन दोनों की प्रक्रियाओं के द्वारा बच्चे के सीखने को समुन्नत करना है। यह बच्चे की प्रगति की तुलना उसकी स्वयं की पिछली प्रगति से करता है बजाय इसके कि किसी दूसरे बच्चे से उसकी प्रगति की तुलना करें। पाठ्यचर्या तथा सह-पाठ्यचर्या के क्षेत्रों को लेकर भी एक भ्रांति है। कला शिक्षा, स्वास्थ्य एवं शारीरिक शिक्षा तथा कार्य शिक्षा को अक्सर सह-पाठ्यचर्या या सह शैक्षणिक के क्षेत्रों के अंतर्गत रखते हैं जबकि भाषा, गणित, पर्यावरण अध्ययन. विज्ञान तथा सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों को पाठ्यचर्या के क्षेत्रों के अंतर्गत रखा जाता है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005 कला शिक्षा, स्वास्थ्य एवं शारीरिक शिक्षा को पाठ्यचर्या के क्षेत्र में स्थान देती है, हालाँकि उनकी आकलन की प्रकृति भिन्न हो सकती है (इसकी चर्चा कला शिक्षा के आकलन उपलब्धि पैकेज में की गई है)। शिक्षक सोचते हैं कि सतत व समग्र मूल्यांकन के लिए, प्रतिदिन उन्हें संकेतकों की एक बड़ी संख्या के आधार पर हर बच्चे की प्रगति का निरन्तर रिकॉर्ड रखना है। इस प्रकार की समझ सतत आकलन की अन्तर्निहित भावना से सर्वथा विपरीत है। शिक्षकों को सभी बच्चों का हर समय आकलन करने की ज़रूरत नहीं है न ही उन्हें बच्चों की प्रगति का विस्तृत रिकॉर्ड रखने और किसी दूसरे को रिपोर्ट देने की ज़रूरत है। सतत आकलन की प्रक्रिया न केवल शिक्षकों को अपनी शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में सुधार लाने के अवसर देती है बल्कि बच्चों को उचित समय पर पृष्ठ पोषण भी देती है। इसलिए शिक्षक अपनी डायरी/लॉगबुक में स्वयं निर्धारित प्रारूप के अनुसार सीखने-सिखाने में सुधार के लिए केवल वही बातें रिकॉर्ड करें जो उन्हें वास्तविक रूप में उपयोगी लगे। यह उनके सीखनेसिखाने की प्रक्रिया का संवर्द्वन करने में मददगार होगा। अक्सर यह भी एक गलत अवधारणा है कि सतत और समग्र मूल्यांकन के अनुसार प्रत्येक बच्चे को प्रोन्नति देनी है चाहे वह सीखेंया नहीं। सतत और समग्र मल्यांकन की अन्तर्निहित भावना यह है कि प्रत्येक बच्चे को सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के दौरान सीखने के भरपूर अवसर और सहायता मिले व जहाँ भी उसे फीडबैक और सहारे की जरूरत है, उसे मिले। इसका मतलब है कि यदि शिक्षक नियमित रूप से पूरे वर्ष भर आकलन की जांच करे और उन विधियों को अपनाए जिससे कि बच्चे के सीखने में सुधार हो तब वर्ष के अंत में बच्चे के असफल होने या न सीख पाने की नौबत ही नहीं आएगी। सतत् और समग्र मूल्यांकन को प्रायः गलती से पूरी तरह से शिक्षक की ही ज़िम्मेदारी समझ लिया जाता है। इसी वजह से सतत और समग्र मूल्यांकन को लागू करना असंभव लगता हैऔर शिक्षक अवास्तविक अपेक्षाओं के कारण स्वयं को बहुत अधिक बोझ से लदा हुआ महसूस करते हैं। इसके विपरीत सतत और समग्र मूल्यांकन का उद्देश्य शिक्षकों के बोझ को कम करने से है। वास्तव में सीसीई के अनुसार इसे लागू करना इससे संबंधित विभिन्न लोगो की संयुक्त जिम्मेदारी है जैसे-प्रशासक, अभिभावक, बच्चे और शिक्षक। बच्चों द्वारा अपने स्वयं के कार्यों, अपने सहपाठियों के कार्यों के आकलन का उत्तरदायित्व लेने की जरूरत है तथा सीखने में एक दूसरे को मदद करना भी ज़रूरी है। कुछ बच्चे इस लक्ष्य को पाने में शिक्षक की मदद के लिए अच्छे स्रोत साबित हो सकते हैं। स्त्राेत: पूर्व प्राथमिक शिक्षा के लिए दिशा-निर्देश,राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी), श्री अरविंदाे मार्ग, नई दिल्ली।