अपामार्ग(Achyranthes aspera linn) स्वरूप जंगली वनस्पति, क्षुप, पर्व मोटी, पत्ते गोलनुकीले, लम्बा पुष्प दण्ड, लाल-गुलाबी पुष्प, उसी दण्ड पर छोटे-छोटे काँटेदार फल लगते हैं। पंचांग का उपयोग किया जाता है। उपयोग पत्तों को चबाने से दंतशूल ठीक होता है। मसूड़ों में रक्त स्राव रोकने के लिए दातून का प्रयोग किया जाता है। अर्श, कृमि रोग, शिरः शूल, अश्मरी में, मूत्र कृच्छ में-बकरी के दूध में मूल (जड़) घिसकर पिलाने से लाभ होता है। कामला में-मूल को छाँछ में घिसकर तथा पीपर मूल का चूर्ण मिलाकर पिलाया जाता है। खाँसी, जुकाम में-इसके पत्तों की राख में मधु मिलाकर सेवन लाभकारी होता है। घृतकुमारी(Aloe-barbdensis Mill) स्वरूप छोटा क्षुप, मांसल पत्ते, मोटे मालाकार १-२ फीट लम्बे दंतुर (इनके अंदर घी के समान गूदा होता है। उपयोग मलेरियल ज्वर में-पत्तों के एक चम्मच रस में चार दाने काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर सेवन लाभकारी होता है। कामला में-दो तोला रस में इतना ही मूली का रस मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है । टांसिल में-इसके रस में हल्दी का चूर्ण मिलाकर सेवन करना चाहिए। शतावर (Asparagus racemosus willd ) स्वरूप काँटेदार क्षुप, आरोहणशील लता, पत्राभास, कांड के गुच्छे, पत्रों के स्थान पर काँटे होते हैं । सफेद छोटे पुष्प। उपयोग मूत्र में रक्त आना-मूल (जड़) के चूर्ण में समभाग गोक्षुरू चूर्ण मिलाकर इस एक चम्मच चूर्ण को दूध में उबालकर पिलाने से लाभ। रक्तातिसार में-मूल का चूर्ण बकरी के दूध से पिलाना चाहिए। स्वरभेद में(जुकाम के कारण)-मूल के चूर्ण को गोमूत्र में मिलाकर सेवन से लाभ। स्त्रीरोगों में-चूर्ण का सेवन दूध के साथ करने से लाभ होता है। कालमेघ(Andrographis paniculata Nees) स्वरूप छोटा क्षुप, पतली विपरीत शाखाएँ, पत्र विपरीत मालाकार, पुष्प सफेद तथा पंखुड़ियाँ बैंगनी छींटवाली। उपयोग अम्लपित्त में-पंचांग के क्वाथ में मधु मिलाकर सेवन से लाभ। उदरशूल तथा अजीर्णता में-पत्तों के रस में कालीमिर्च, सेंधा नमक व हींग मिलाकर सेवन से लाभ होता है।वनस्पतियों का जीवन श्रेष्ठ है, क्योंकि इनके द्वारा सब प्राणियों को सहारा मिलता है, उनका निर्वाह होता है। जैसे किसी सज्जन पुरुष के घर से कोई याजक खाली हाथ नहीं लौटता, वैसे ही इन वृक्षों से भी सभी को कुछ न कुछ मिल ही जाता है। -श्रीमद्भागवत पुराण पुनर्नवा-बोरहाविया डीफ्युजा( Boerhaavia diffusa Linn ) स्वरूप फैलने वाला क्षुप, कांड लालिमा लिये हुए, पर्व संधि पर मोटा, संधि पर छोटे-छोटे पत्ते, पुष्प छोटे एवं गुलाबी रंग के। उपयोग अश्मरी में-मूल (जड़) को दूध में उबालकर पिलाने से अश्मरी नष्ट होती है। पाण्डुरोग में-पंचांग के स्वरस में हरड़ का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से रोग ठीक होता है। मूत्रावरोध में-पंचांग का सेवन लाभकारी। कामला में-मूल का क्वाथ प्रतिदिन सेवन करने से लाभ होता है। मदार (Calotropis procera (Aif) ) स्वरूप क्षुप ६ से ८ इंच, पत्र अण्डाकार विपरीत, मोम जैसा सफेद आवरण, पुष्प सुगंधित गुच्छों में, दल खण्डों के ऊपर जामनी रंग के दाग होते हैं। उपयोग इसके दुग्ध प्रयोग से उदर रोग, प्लीहा, यकृत वृद्धि में लाभ होता है। चर्म रोगों में-पत्तों के रस में हल्दी मिलाकर तेल में पकाकर लगाने से लाभ मिलता है। खाँसी में-बताशों में पत्तों से टपकायें हुए दूध की दो-तीन बूंदें खिलाने से लाभ, ऊपर से काली द्राक्षा खिलानी चाहिए। शिक्षा की जड़ें कड़वी तथा फल मीठे होते हैं। जलनीम (Bacopa monieri Linn) स्वरूप मांसल प्रसरी क्षुप, पत्र काले चिह्नों से युक्त, कुंठिताग्र, पुष्प श्वेत जामुनी। उपयोग स्वरस का प्रयोग आमवात में लाभकारी। अवसाद मानसिक रोग, बच्चों की खाँसी में पत्तों का चूर्ण या स्वरस लाभकारी। मण्डूकपर्णी Centella asiatica (Linn) स्वरूप प्रसरी क्षुप, पर्व मूल युक्त, पत्ते गोल वृक्काकार। उपयोग बच्चों के आमरोग में-पत्तों के स्वरस में जीरा तथा मिश्री मिलाकर पिलाने से लाभ होता है। बच्चों के शब्द उच्चारण के लिए पत्रों को चबाने से लाभ।स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए पंचांग का चूर्ण दूध के साथ सेवन से लाभ होता है। ब्राह्मी (Centella rotundifolia) स्वरूप प्रसरण शील क्षुप, पर्व मूल युक्त, पत्र लम्बवृत्त वाले, पत्र गोल वृक्काकार, धार कुंठित दंत वाले।। उपयोग मानसिक अवसाद-पत्रों का चूर्ण सेवन से लाभ। स्मरण शक्ति बढ़ाने में उपयोगी। अनिद्रा रोगों में-पंचांग का चूर्ण दूध के साथ सेवन से लाभ। सफेद मूसली (Chlorophytum borivilianum Sant &