शरपुंखा-टॅफरोशिया परप्युरिया(Tephrosia purpurea Linn ) स्वरूप २-३ फुट ऊँचा क्षुप, कांड चिकना या रोमश, संयुक्त पक्षवत पत्रक पुष्प २१-२३ पत्ते तोड़ने से बाण के पुंख के आकार के समान टूटते हैं। पुष्प लाल या जामुनी मंजरियों में, फल मुड़ा हुआ चिकना होता है। उपयोग उदर शूल में-ताजे मूल की छाल काली मिर्च के साथ पीसकर गोली बनाकर सेवन गुणकारी है। प्लीहा वृद्धि में- इसके पंचांग का चूर्ण १/४-१/२ तोला प्रतिदिन सेवन करें या इसके जड़ की दातून चबाकर रस उदर में उतारने से प्लीहा रोग ठीक हो जाता है। जल पीपल (Phyla nodiflora (L) Greene) स्वरूप प्रसरी क्षुप, पत्ते विपरीत आरावत्। दंतुर कुंठिताग्र, पुष्प छोटे सफेद, जो मुंडकाकार व्यूह में आते हैं। उपयोग पत्तों का फांट-बच्चों के अजीर्ण अतिसार में लाभ। आन्तरिक घाव में सूजन पर इसकी पोल्टिस बाँधने से जलन कम होकर जल्दी पकती है। अजवायन पत्ता (पाषाण भेद) (Coleus aromaticus Benth) स्वरूप रोमश मांसल लघुगुल्म, पत्ते मोटे सुगंधित रोमश दंतूर, स्वाद में कटु, पुष्प हल्के, नीले रंग के। उपयोग अश्मरी जन्य मूत्र कृच्छ में-इसके मूल का क्वाथ सेवन । शुक्राश्मरी-पंचांग के क्वाथ का सेवन कुपचन तथा आध्मान में। उदर शूल में-पत्तों के सेवन से लाभ। शिरःशूल मेंपत्तों को पीसकर सिर पर लेप करने से लाभ। दवना (दौना) (Artemissia vulgaris Linn) स्वरूप गुल्म एक से दो मीटर लंबा, पत्ते अति खंडित, खंड पतले सुगंधित पुष्प हरे मंजरियों में होते हैं। उपयोग कृमि रोग में-पत्तों के स्वरस के सेवन से बच्चों के कृमि नष्ट होते हैं। उदर शूल तथा अजीर्णता में-पत्तों के स्वरस का सेवन । दुष्ट व्रण-इसके पंचांग के क्वाथ से व्रण को धोने से दर्द कम होकर व्रण ठीक हो जाता है। कृमि रोग में-इसके पंचांग का चूर्ण रातभर जल में भिगोकर प्रातः छानकर, भोजन के पश्चात् इस जल को पीने से थोड़ी ही देर में कृमि बाहर निकल आते हैं। शमी (छुयोंकर) (Prosopis spiciger L. Syn. P. Cinerari) स्वरूप काँटेदार छोटा वृक्ष, पतली शाखायें, कांटे सीधे चिपटे, पत्ते द्विपक्षवत, उपपक्ष दो जोड़े, पत्रक ८-१२ जोड़े, फली लंबी बीच-बीच में, पुष्प पीताभ छोटी मंजरियों में। उपयोग गर्भपात रोकने के लिए इसके पुष्पों का चूर्ण मिश्री मिलाकर गर्भवती महिलाओं को खिलाया जाता है। शरीर से अनचाहे बालों को निकालने के लिए इसकी पत्तों सहित टहनियों को जलाकर इसकी राखा का प्रयोग किया जाता है। छोटी दुग्धी (Euphorbia prostrata) स्वरूप छोटा भूप्रसरी क्षुप, हरा या जामुनी काला। पुष्प छोटे तथा समूह में, पत्ते केवल अग्र पर दंतुर। उपयोग इसकी जड़ को चबाने से उल्टी रुक जाती है। इसके अतिरिक्त दंतशूल में लाभ होता है। धतूरा (Datura innoxia Linn & Syn) स्वरूप छोटा वृक्ष, शाखायें हरी-श्वेत, पत्ते लहरदार असम दंतुर छोटे-बड़े युग्म में, पुष्प सफेद, बाहर से बैंगनी रंग के फल गोल बाहरी सतह पर बैंगनी रंग के छोटे-छोटे कांटे होते हैं। उपयोग :-आमवात, नाड़ीशूल, संधिशोथ में-पत्तों के क्वाथ का सेवन से लाभ। बाल झड़ने में-इसके पत्तों के स्वरस का लेप कर, कुछ समय पश्चात् सिर धो दें, लाभ होगा। पागल कुत्ते के काटने में-इसके बीज का चूर्ण, (एक रत्ती) पुनर्नवा सफेद ३ तोला चूर्ण, दोनों को मिलाकर शीतल जल के साथ सेवन से लाभ होता है। बिल्व (Aegle marmelos Corr.) स्वरूप छोटा वृक्ष, शाखायें लंबे कंटक युक्त, पत्ते संयुक्त तीन पत्रक। पुष्प हरे-सफेद, फल गोल बाहर से कठिन तथा अंदर से मांसल। उपयोग फल का शर्बत कुपचन आध्मान, अर्श विबंध में नित्य प्रातः सेवन । मधुमेह-ताजे पत्तों का स्वरस १-२ तोला। प्रवाहिका में-फल की मज्जा+तिल समभाग दोनों को पीसकर कल्क बना लें। इसका सेवन घी, दही, मलाई के साथ। स्त्रोत : उद्यान एवं जड़-बूटी विभाग, युग निर्माण योजना विस्तार ट्रस्ट, मथुरा।