<div id="MiddleColumn_internal"> <h3>भूमिका</h3> <p style="text-align: justify;">शांति या सुख का अनुभव करना या बोध करना अलौकिक ज्ञान प्राप्त करने जैसा है, यह तभी संभव है, जब आप पूर्णतः स्वस्थ हों। अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त करने के यूँ तो कई तरीके हैं, उनमें से ही एक आसान तरीका है योगासन व प्राणायाम करना।</p> <p style="text-align: justify;">पदमासन को कमलासन भी कहते हैं क्योंकि इस आसन में बैठने के बाद व्यक्ति की मुद्रा कमल के समान बन जाती है। इसलिए इसे कमलासन कहते हैं। ध्यान लगाने के लिए यह एक महत्वपूर्ण आसन है तथा योगी, ऋषिमुनि अधिकतर इसी आसन में बैठकर योग साधना करते रहें हैं। यह आसन मन को प्रसन्न करता है तथा चिंता को दूर कर एकाग्रता के प्राप्ति में लाभकारी होता है।</p> <p style="text-align: justify;">इस आसन को साफ-स्वच्छ, शांत व हवादार जगहो पर करें जिससे की ध्यान भंग न हो। पदमासन के लिए चटाई दरी या घास पर आसन लगाकर बैठ जाएं। फिर अपने बाएं पैर को घुटनों से मोड़कर दाईं जांघ पर रखें और दाएं पैर को घुटनों से मोड़कर बाईं जांघ पर रखें। दोनों पैरों को इस प्रकार से रखें की दोनों पैरों की एड़ियां पेट को छूएं। आपकी दोनों जांघ और घुटने जमीन से लगे रहें। इस स्थिति में आने के बाद अपनी पीठ, छाती, सिर, गर्दन तथा रीढ़ की हड्डी बिल्कुल सीधा रखें। दोनों हाथों को घुटनों के पास लगाकर ज्ञान मुद्रा बनाएं। अब अपनी आंखों को बंद कर लें या खुली या अधखुली रखें। आरम्भ में पदमासन की स्थिति 5 से 10 मिनट तक रखें। बाद में यह समय धीरे-धीरे बढ़ाते हुए 1 घंटे तक इस आसन को करें। पदमासन में पूर्ण रूप से बैठने के बाद अपने मन को एकाग्र करें और अपने अंदर के चक्रों को जगाएं तथा कल्पना करें कि आप के अंदर के बुरे विचार दूर होकर आपके हृदय व मन में स्वच्छ, शांत व सुगंधित वायु का प्रवाह हो रहा है।</p> <p style="text-align: justify;">पदमासन को अंग्रेजी में लोटस पोज भी कहते हैं। यह आसन पेट को दुरुस्‍त और दिमाग की एकाग्रता बढाने के लिये लाभकारी माना जाता है। इसे पदमासन इसलिये कहते हैं क्‍योंकि इस आसन में बैठने के बाद हमारी मुद्रा बिल्‍कुल कमल की भांति बन जाती है। इसलिए इसे कमलासन भी कहते हैं। इस आसन को करना बड़ा ही आसान है, इसलिये आप इसे बिस्‍तर पर बैठे - बैठे भी कर सकते हैं। यह आसन मन को प्रसन्न करता है तथा चिंता को दूर कर एकाग्रता के प्राप्ति में लाभकारी होता है। गर्दन में दर्द रहता है तो करें ये आसन पुराने जमाने में योगी और ऋषिमुनि आदि इसी आसन में बैठ कर अपना ध्‍यान लगया करते थे। यह आसान उन लोगों को नहीं करना चाहिये जिसके पैरों में दर्द हो। साइटिका अथवा रीढ़ के निचले भाग के आसपास किसी प्रकार का दर्द हो या घुटने की गंभीर बीमारी में इसका अभ्यास न करें। एक बात जरुर ध्‍यान रखें कि पैरों में किसी भी प्रकार का अत्यधिक कष्ट हो तो यह आसन न करें। आँखे दीर्घ काल तक खुली रहने से आँखों की तरलता नष्ट होकर उनमें विकार पैदा हो जाने की संभावना रहती है</p> <h3>पदमासन की विधि</h3> <ol style="text-align: justify;"> <li>जमीन पर बैठकर बाएँ पैर की एड़ी को दाईं जंघा पर इस प्रकार रखते हैं कि एड़ी नाभि के पास आ जाएँ। इसके बाद दाएँ पाँव को उठाकर बाईं जंघा पर इस प्रकार रखें कि दोनों एड़ियाँ नाभि के पास आपस में मिल जाएँ।</li> <li>मेरुदण्ड सहित कमर से ऊपरी भाग को पूर्णतया सीधा रखें। ध्यान रहे कि दोनों घुटने जमीन से उठने न पाएँ। तत्पश्चात दोनों हाथों की हथेलियों को गोद में रखते हुए स्थिर रहें। इसको पुनः पाँव बदलकर भी करना चाहिए।</li> <li>फिर दृष्टि को नासाग्रभाग पर स्थिर करके शांत बैठ जाएँ।</li> <li>पीठ, कमर, गला, सिर, पृष्ठवंश सीधा समरेखा में रखिए, चाहे अपनी दृष्टि भूमध्य पर अथवा नासिकाग्र पर रखिए, किंवा किसी बाह्य बिंदु पर भी रख सकते हैं। इस आसन को पदमासन या कमलासन भी कहते हैं</li> </ol> <p style="text-align: justify;"> </p> <h3>अर्ध पदमासन</h3> <p style="text-align: justify;">कभी कभी जंघाएँ इतनी मोटी होती हैं कि उनके दोनों पाँव दोनों जंघाओं पर किसी भी तरह नहीं आ पाते हैं। शुरू में वे इस आसन को नहीं कर सकते। इन्हें शुरू में "अर्ध पदमासन" लगाना चाहिए और फिर पदमासन लगाने का प्रयत्न करना चाहिए। एक ही पाँव दूसरे पाँव की जंघा पर रखने से अर्ध पदमासन होता है। पाँवों के हेर-फेर से दोनों ओर के आसन इसप्रकार ही बन सकते हैं। पूर्ण पदमासन से पाँवों की नस-नाड़ियाँ शुद्ध होती हैं, और ध्यानादि के लिए एक ही आसन पर अधिक देर तक बैठना सुगम होता है। पदमासन में बैठकर पेट की पसलियों को ऊपर खींचने से कुछ देर वहाँ ऊपर ही रखने से पाचन-शक्ति बढ़ जाती है और पेट की आम-वायु दूर होती है।</p> <p style="text-align: justify;">पदमासन में बैठकर कंठमूल में ठोड़ी लगाने से और पृष्ठवंश सीधा रखने से मस्तिष्क का मज्जा-प्रवाह बढ़ता है, इसी कारण इससे विचार-शक्तिबढ़ती है। कई लोग इस पदमासन को करने के समय हाथ बीच में रखते हैं, बहुत-से अपने हाथों को ऊपर करके सिर के ऊपर हाथ जोड़कर नमस्कार करते हैं, और हाथ वैसे ही वहाँ रखते हैं। इसको "पर्वतासन" कहते हैं। इससे पेट और छाती के स्नायुओं में अच्छी प्रकार ऊपर का खिंचाव आता है, और उक्त स्नायुओं को लाभ पहुँचता है। इसको पर्वतासन इसलिए कहते हैं कि इसकी शक्ल पर्वत जैसी बनती है। दो-चार मिनट इस आसन में बैठ जाने से छाती और पेट के स्नायुओं में अच्छी तरह खिंचाव होता है।</p> <p style="text-align: justify;">हाथ ऊपर, नीचे, बीच में और तिरछा करके सीधा बाहर खींचते हैं। एक ही समय में विभिन्ना आसनों के भागों को मिलाने से बड़े लाभ होते हैं। ताड़ासन के हाथों का खिंचाव दोनों का तथा एक-एक का भी हो सकता है। पदमासन में बैठकर दायाँ हाथ बाएँ घुटने पर रखिए और अपना घड़ बाईं ओर घुमाइए, चाहे बायाँ हाथ ज़मीन पर सहारे के लिए रखकर अपनी छाती जितनी पीठ की ओर जा सकती है, उतनी घुमाइए। ऐसा करने से कमर और पेट के स्नायुओं पर अच्छी तरह खिंचाव आ जाएगा। छाती जितनी पीछे की ओर जाना संभव है, उतनी जाने के बाद वहाँ ही ठहर जाइए।</p> <p style="text-align: justify;">ध्यान रखिए कि पदमासन के पाँव जहाँ थे वहाँ ही स्थिर रहने चाहिए और कमर के ऊपर का ही भाग घूमाना चाहिए। इसी प्रकार दूसरी ओर भी घुमा सकते हैं। गर्दन भी पीठ की ओर जितनी अधिक घुमाई जा सकती है उतनी अधिक घुमानी चाहिए। पेट को ठीक करने के लिए यह आसन अत्यंत सुगम है और अति लाभदायक है। धड़ घुमाने अर्थात्‌ धड़ का भ्रमण करने के लिए इसको "भ्रमरासन" कहते हैं। इसके करने से पेट के कई दोष दूर होते हैं। यद्यपि यह आसन सुगम है तथापि इसका अत्यंत महत्व है और यह अत्यंत लाभदायक भी है। इस आसन में ठोड़ी कंठमूल में डटकर लगाने से बहुत आरोग्य मिलता है। इससे स्त्री-पुरुष अपना आरोग्य बढ़ा सकते हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">पदमासन के लाभ</h3> <ol> <li>यह आसन पाँवों की वातादि अनेक व्याधियों को दूर करता है। विशेष कर कटिभाग तथा टाँगों की संधि एवं तत्संबंधित नस-नाड़ियों को लचक, दृढ़ और स्फूर्तियुक्त बनाता है।</li> <li>श्वसन क्रिया को सम रखता है। इन्द्रिय और मन को शांत एवं एकाग्र करता है।</li> <li>इससे बुद्धि बढ़ती एवं सात्विक होती है। चित्त में स्थिरता आती है। स्मरण शक्ति एवं विचार शक्ति बढ़ती है। वीर्य वृद्धि होती है। सन्धिवात ठीक होता है।</li> <li>बैठकर किए जाने वाले आसनों में पदमासन को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इससे योगी लंबे समय तक ध्यानमग्न रह सकता है। पदमासन सिद्ध करने वालों को मानसिक और शारीरिक लाभ दोनों हासिल हो जाते हैं। पाचन शक्ति ठीक होती है और नाड़ियाँ शुद्ध होती हैं।</li> <li>इस आसन से शरीर में एकाग्रता व स्थिरता आती है। इस आसन से मेरूदण्ड (रीढ़ की हड्डी) मजबूत बनती है तथा कमर के सभीभाग की नसें व नाड़ियां शक्तिशाली व लचकदार बनती है। इस आसन के द्वारा सांस क्रिया ठीक होती है। यह आसन मानसिक काम करने वालों के लिए भी अधिक लाभकारी है। इस आसन में बैठकर भू-मध्य (दोनों भौंहों के बीच) के भाग में ध्यान करने से मन को एकाग्र करने में सफलता मिलती है। यह आसन मन को प्रसन्न रखता है, शरीर को शक्ति देता है तथा चेहरे की उदासी व कष्ट को दूर करता है।</li> <li>यह आसन अनिद्रा को दूर करता है, भूख को बढ़ाता है, पीठ व गले के रोग से बचाव करता है तथा घुटनों व पैरों का दर्द, सन्धिवात लाभ पहुंचाता है।</li> <li>यह आसन पाचनशक्ति को बढ़ाती है, पेट की पेशियों को मजबूत करता है तथा कब्ज, गठिया, फीलपांव के रोगों को दूर करता है</li> <li>यह मांसपेशियों को मुलायम बनाता है तथा जांघ व पिंडलियों को अधिक मजबूत बनाता है। यह आसन सुशुम्ना नाड़ी को सीधा करता है और वायु को शक्ति देता है।</li> <li>पदमासन से नपुंसकता में लाभ मिलता है। इससे शरीर में वात, पित्त और कफ के दोष दूर होते हैं |</li> <li style="text-align: justify;">पदमासन लगाने से रीढ़ की हड्डी सीधी रहती है। इसका नियमित अभ्यास करने से रीढ़ की हड्डी को सीधा रखने की आदत बनती है यानी पॉश्चर सुधरता है।</li> <li style="text-align: justify;">शरीर में विषैले पदार्थों का जमावड़ा कई बीमारियों का कारण बनता है। कुछ देर पदमासन में बैठने के बाद आसन खोलने पर जोड़ों में रक्त का प्रवाह तेज़ हो जाता है।जमा विषैले पदार्थ और संक्रमण खून के तेज़ प्रवाह के साथ बह जाते हैं जिससे बीमारियों का ख़तरा कम हो जाता है।</li> <li style="text-align: justify;">माहवारी की तकलीफों को दूर करने में सहायक है।</li> <li style="text-align: justify;">यह आसन लगाने से रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से पर जो प्रभाव पड़ता है,वह पूरे तंत्रिका तंत्र के लिए आरामदायक होता है।</li> <li style="text-align: justify;">पदमासन से एकाग्रता बढ़ती है। इस आसन पर हुए शोध अध्ययनों से मालूम हुआ है कि इससे ब्रह्मचर्य साधने में आसानी होती है|</li> <li style="text-align: justify;">ध्यान मुद्रा में किया गया पदमासन एक बेहतर आसन है जो आपके चित्त को एकाग्र करता है। चित्त की एकाग्रता से आप अपने सहयोगी के साथ पूरी सघनता से जुड़ते हैं। इस जुड़ाव से संतुष्टि का अहसास होता है।</li> <li style="text-align: justify;">इस आसन से कूल्हों के जाइंट, माँसमेशियाँ, पेट, मूत्राशय और घुटनों में खिंचाव होता है जिससे इनमें मजबूती आती है और यह सेहतमंद बने रहते हैं। इस मजबूती के कारण उत्तेजना का संचार होता है।</li> </ol> <h3 style="text-align: justify;">ध्यान देने योग्य बातें</h3> <ol style="text-align: justify;"> <li>स्मरण रहे कि ध्यान, समाधि आदि में बैठने वाले आसनों में मेरुदण्ड, कटिभाग और सिर को सीधा रखा जाता है और स्थिरतापूर्वक बैठना होता है।</li> <li>ध्यान समाधि के काल में नेत्र बंद कर लेना चाहिए। आँखे दीर्घ काल तक खुली रहने से आँखों की तरलता नष्ट होकर उनमें विकार पैदा हो जाने की संभावना रहती है।</li> <li>ध्यान लगाने के लिए एक घड़ी तक निश्चल बैठना जरूरी होता है। एक अनुमान है कि एक घड़ी ४५ मिनट की होती है। ४५ मिनट तक निश्चल बैठना तभी संभव है जब पैरों से लेकर नितंब तक कोई रक्त नलिका में रक्त प्रवाह बाधित न हो। पदमासन इसके लिए उपयुक्त आसन है।</li> <li>शरीर के साथ अनावश्यक जबरदस्ती न करें। जितना संभव हो, उतना ही आसन करें।</li> </ol> <p style="text-align: justify;">स्रोत: योगाभ्यास, विकिपीडिया</p> </div>