ध्यान लगातार चिंतन-मनन की एक क्रिया है। शारीरिक स्थिति कोई भी ध्यानात्मक आसन। अभ्यास विधि सर्वप्रथम किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठ जाएं । मेरुदण्ड को बिना किसी प्रकार का कष्ट दिए सीधा रखें। निम्नानुसार ज्ञान मुद्रा में बैठे अंगूठे और तर्जनी अंगुली के सिरों को आपस में स्पृश कराएं। अन्य तीन अंगुलियां सीधी और आरामदायक स्थिति में होनी चाहिए। तीनों अंगुलियां एक-दूसरे के अगल-बगल हों और वे एक-दूसरे को स्पर्श करती हों। ऊपर की ओर खुली हुई हथेली को घुटनों पर रखें। हाथों एवं कधों को ढीला और शिथिल कर देना चाहिए। आंखे बंद करके मुख को थोड़ा ऊपर की उठाकर बैठ जाएं । मुख को थोड़ा सा ऊपर की दिशा में उठाकर एकाग्रचित्त मुद्रा में बैठ जाएं। बिना किसी पर विशेष ध्यान केंद्रित किए केवल अपनी भौंहों के बीच हल्का सा ध्यान केंद्रित करें और अपनी आती-जाती श्वासों को महसूस करें। पूर्व विचारों को छोड़ने का प्रयास करें। पवित्र व निर्मल विचार मन में लाने का प्रयास करें। जरुरी बातें ध्यान अभ्यास की प्रारंभिक अवस्था में मन को प्रसन्नचित्त करने वाला संगीत बजाया जा सकता है। जितने अधिक समय तक सम्भव हो, इस स्थिति में रुकना चाहिए। लाभ ध्यान योगाभ्यास का सबसे महत्वपूर्ण घटक है। यह अभ्यासकर्ता को नकारात्मक भावनाओं से दूर रखता है, भय, क्रोध, अवसाद, चिंता दूर करता है और सकारात्मक भावनाएं विकसित करने में सहायता करता है। मस्तिष्क को शांत और निश्चल रखता है। एकाग्रता, स्मृति, विचारों की स्पष्टता और मनोबल को बढ़ाता है। पूरे शरीर और मस्तिष्क को पर्याप्त आराम देते हुए उन्हें तरोताजा करता है। ध्यान आत्म अनुभूति की ओर ले जाता है। स्त्रोत : आर्येुवेद,योग व प्राकृतिक चिकित्सा,यूनानी,सिद्ध एवं होम्योपैथी(आयुष),मंत्रालय, भारत सरकार।