परिचय कोढ़ एक छुतहा बीमारी है। रोगी के चमड़ी छूने उसके छीकने, खासने या थूकने से बीमारी फैलिती है। कोढ़ रोग के कीटाणु चमड़ी पर अपना असर छोड़ते हैं। शक होने पर सुन्न हुए धब्बे की जाँच जरूर करवा लें। चमड़ी के तह में कीटाणु बसते हैं, उसकी जाँच जरूरी है हर तरह की जाँच अस्पताल में होती है, कुष्ट रोगों के लिए खास अस्पतालों की भी इन्तजाम है। पीला धब्बा, दाग जैसा धब्बा पर खास ख्याल रखें। लक्षण कोढ़ से चमड़ी पर सबसे ज्यादा असर पड़ता है चमड़ी को छूने से रोगी पर कोई असर नहीं पड़ता कोढ़ से पावों का लकवा भी हो सकता है बदन के किसी हिस्से में चमड़ी पर धब्बा हो सकता है – हाथ, पांव, चेहरा, कान, कलाई, घुटना। शुरुआत में बाहर की ओर उगे बल उड़ जाते हैं, फिर सारी भोंहें सापक हो जाती है नक् के छेद मोटे और सख्त हो जाते हैं नक् से खून भी बह सकता है साँस लेने में कठिनाई होती है नाक की हड्डी गल सकती है हाथों और पावों के पंजे में लकवा हो सकता है। उपचार सभी तरह के कोढ़ के रोगी का इलाज हो सकता है इलाज में कई साल लग सकते हैं, कभी-कभी जीवन भर धीरज रख कर इस रोग का इलाज जरूर करावें। बचाव पावों और हाथों को आग से बचावें, उन्हें करने से भी बचाएं नंगे पांव नहीं चलें खाना बनाते समय आग के बहुत पास न बैठें बीड़ी, सिगरेट, हुक्का न पिएं रात के समय बदन को ठीक से देखें – कोई धब्बा तो नहीं है, कोई अंग सुन्न तो नहीं होगा। आँखों का विशेष ख्याल रखें, धूल न घुसने दें। उन्हें साफ रखें। धून न घुसने दें और आँखों पर मक्खियां न बैठने दें। स्त्रोत: संसर्ग, ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान