हिमघात बर्फीली प्रदेशो में और सर्दीयों के दिनो में उत्तरी भारत में अक्सर यह हादसा हो सकता है। बर्फीली ठंड में शरीर का ज्यादा देर रहने से तपमान गिरते जाता है। शरीर का अंदरुनी तापमान सामान्यत: ३६०C से कम होना हानिकारक होता है। शरीर का अंदरुनी तापमान ३५०C डिग्री से गिरने पर शीतघात के असर दिखाई देते है। अंदरुनी तापमान गुदा में नापा जा सकता है। ३२०C से ३५०C डिग्री तक सौम्य शीतघात होता है। २८०C से ३२०C तक मध्यम शीतघात और २८०C के नीचे तीव्र शीतघात कहा जाता है। हिमघात के लक्षण शीतघात के चलते सबसे सामान्य लक्षण है बोलचाल या बर्ताव में बदलाव, लेकिन इसको और लोग ही समझ सकते है। मनोस्थिती बिगडना, भावनाहीन सा होना, अलिप्त बर्ताव, असंगत बोलचाल, और ठंडको न पहचानना आदि लक्षण दिखाई देते है। नाडी पहले तेज होती है, फिर धीमी चलती है। कंपकंपी होती है। शीतघात गहरा होने पर नाडी और श्वासगति धीमी होती है। चमडी रंगहीन या भूरी बनती है। कंपकंपी जोरसे चलता है और उसे रोकना असंभव होता है। तापमान ३२०C के नीचे जाएँ तब कंपकंपी थम जाती है और बेहोशी आती है। पर्याप्त घर या कपडों की कमी, ६५ वर्ष से ज्यादा आयु, बीमार व्यक्ति आदि इसके शिकार होते है। बर्फीली प्रदेशो में सेना के जवान या चरवाहे इसकी चपेट में आ सकते है। अब मांसपेशीयॉं अकडने लगती है। साँस हर मिनट कम होती है, वैसे ही नाडी भी मिनट को १-२ इतनी कम होती है, वैसे ही नाडी भी मिनट को १-२ की गति से चलती है। यह बहुत ही खतरनाक स्थिती होती है। आदमी जिंदा है या मृत यह भी तय करना मुश्किल होता है। प्रथमोपचार आहत व्यक्ति को पहिले किसी तंबू या घर में ले जाएँ जहॉं तपमान नियंत्रित हो। अब भीगे कपडे उतारकर जल्दी गर्म कपडो में उसे लपेट ले। कपडे, स्लीपींग बॅग, चद्दर, गद्दी जो भी मिले इस्तेमाल करे। सबके उपर पॉलिथिन कपडा भी लगाएँ, जिससे शरीर की उर्जा संरक्षित होती है। अब गर्म पानी के बोतल पॅक करके गर्दन, बगले और जांघो में लगाएँ। हाथ पैर सेंकने का अभी काम नहीं, कोई शराब या तम्बाकू ना दे। आदमी को कोई हलचल करने ना दें। स्त्रोत: भारत स्वास्थ्य