<div id="MiddleColumn_internal"> <h3 style="text-align: justify; ">राज्य सरकारों तथा केन्द्र सरकार की भूमिका</h3> <p style="text-align: justify; ">अफीम पोस्त (पापावेर सोमिनीफेरम) तथा कैनाविस (कैनाविस सटीवा) की अवैध खेती एनडीपीएस अधिनियम के अंतर्गत अपराध है। लाइसेंस के लिए अफीम पोस्त की खेती करने वाले को धारा 18 के अंतर्गत दंडित किया जा सकता है, जबकि कैनाविस की खेती करने वाले को धारा 20 के अंतर्गत दंडित किया जा सकता है। धारा 44 के अनुसार, धारा 41,42 या 43 के अंतर्गत अधिकृत केन्द्र सरकार एंव राज्य सरकारों के सभी अधिकारियों को अवैध खेती के अपराधों के संबंध में प्रवेश, तलाशी जब्ती एवं गिरफ्तारी का अधिकार है। कोई महानगर मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी का न्यायिक मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में अधिकृत कोई मजिस्ट्रेट या धारा 42 के अंतर्गत अधिकृत राजपत्रित रैक का कोई अधिकारी अफीम पोस्त केनाविस या कोका के किसी पौधों को कुर्क कर सकता है। जिसके बारे में उसके पास विश्वास करने का कारण हो कि उस अवैध ढंग से उगाया गया है तथा ऐसा करते समय वह ऐसा आदेश प्राप्ति कर सकता है जिसे वह उपलब्धता समझे जिनमें फसल को नष्ट करने का आदेश शामिल है (धारा 48)।</p> <p style="text-align: justify; ">धारा 46 के अंतर्गत भूधारी का यह दायित्व है कि वे पुलिस के या धारा 42 में उल्लिखित विभाग के किसी अधिकारी को अपनी भूमि में अवैध खेती की सूचना दें तथा ऐसे भूधारी को दंडित किया जा सकता है जो जानबूझकर ऐसी सूचना नही देता है। एनडीपीएस अधिनियम का यह प्रावधान समान रुप से सरकार के अधिकारियों पर भी लागू होता है, जब सरकारी स्वामित्व वाली भूमि पर ऐसी अवैध खेती होती हो । धारा 47 के अंतर्गत सरकार के प्रत्येक अधिकारी तथा प्रत्येक पंच, सरपंच एवं अन्य ग्राम अधिकारी का यह दायित्व है कि वे पुलिस के 41 धारा 42 में उल्लिखित विभागों को किसी अधिकारी को अवैध खेती की तत्काल सूचना दें जब यह उसकी जानकारी में आए तथा सरकार के किसी अधिकारी पंच या संरपंच तथा अन्य ग्राम अधिकारी को, जो ऐसी सूचना नही देता है अवैध खेती के संबंध में दंडित किया जाना संभव है।</p> <p style="text-align: justify; ">इन कानूनी प्रावधानों के बावजूद, अफीम पोस्त एवं कैनाविस की अवैध खेती के मामले नोटिस किए गए हैं। भारत सरकार ऐसी अवैध खेती को गंभीर सरोकार का मामला मानती है। केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकारें इस सरपंच से निपटने के लिए साथ मिलकर काय करना जारी रखेगी तथा एनडीपीएस अधिनियम की धारा 47 के अंतर्गत अपने दायित्व के निर्वाह के लिए अपने नियंत्रणाधीन सभी अधिकारियों को निदेश जारी करेगी । केन्द्र सरकार तथा प्रत्येक राज्य सरकार एक अपना अधिक नोडल अधिकारी पदनामित करेगी जिन्हें ऐसे अधिकारी रिपोर्ट करेंगे जिनको किसी अवैध खेती की जानकारी मिलती है। उन्हें वे नोडल अधिकारियों के नाम व संपर्क ब्यौरा व्यापक रुप से प्रचारित करेंगे जिससे कि न केवल अधिकारी, पंच, संरपंच एवं भूमि धारक बल्कि सामान्य जनता भी अवैध खेती के बारे में सूचना उपलब्ध करा सके। केन्द्र व राज्य सरकारें शून्य सहनशीलता की नीति का पालन करेंगे एवं अवैध खेती में शामिल किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध अनेक कड़ी संभव कार्रवाई करेंगे। स्वापक नियंत्रण ब्यूरो एवं केन्द्रीय स्वापक ब्यूरो तथा संबंधित राज्य सरकारें अपने संबंधित नियंत्रण के अंतर्गत स्वापक औषधि एवं मन -प्रभावी पदार्थ अधिनियम की धारा 47 का उल्लंधन करने वाले अधिकारियों के विरुद्ध पर भी कार्रवाई करेगी।</p> <h3 style="text-align: justify; "><span style="text-align: justify; ">अवैध खेती की समस्या से निपटने का दायित्व </span></h3> <p style="text-align: justify; "><span style="text-align: justify; "></span>अवैध खेती की समस्या से निपटने का संपूर्ण दायित्व केन्द्र सरकार पर होगा। केन्द्रीय आर्थिक आसूचना ब्यूरो (सीईआईबी) अवैध अपील पोस्त की खेती का उपग्रह से सर्वेक्षण जोर शोर से जारी रखेगा तथा वह स्वापक नियंत्रण ब्यूरो एवं केन्द्रीय स्वापक ब्यूरो को भी वे चित्र देगा। स्वापक नियंत्रण ब्यूरो केन्द्रीय स्वापक ब्यूरो एवं राज्य प्राधिकारियों के साथ समन्वय करते हुए नष्ट करने का अभियान चलाएगा। खेतों से संबंधित आसूचना इकट्ठा करने और अवैध खेती को नष्ट करने एवं उन्हें गिरफ्तार करने व दोषियों पर मुकदमा चलाने की जिम्मेदारी प्राथमिक रुप से राज्य सरकारों की है। राज्य सरकारें सभी आवश्यक सहायता व सुरक्षा किसी भी केन्द्रीय औषधि कानून प्रवर्तन एजेंसियों को उनके अवैध फसल को नष्ट करने के अभियान में देगी। खेतों के स्तर पर जहां तक संभव हो केन्द्र व राज्य सरकारों के बीच संयुक्त अभियान अवैध अफीम पोस्त एवं कैनाबीस खेती की पहचान करने व नष्ट करने के लिए चलाए जाएंगे।</p> <h3 style="text-align: justify; ">वैकल्पिक विकास</h3> <p style="text-align: justify; ">अवैध रुप से अफीम पोस्त की पारंपरिक रुप खेती करने वाले किसानों को इससे दूर रखने का तरीका वैकल्पिक विकास है तथा उनकी जीविका पूरी तरह से इस पर ही निर्भर करती है। ऐसे स्थानों में मात्र कानून लागू करना तथा फसल को नष्ट करने से ही काम नही चलेगा। कृषकों को प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए तथा उन्हें जीविका के वैकल्पिक उपाय विकसित करने में सहायता की जानी चाहिए। स्वर्णिम त्रिभुज के कुछ देश जैसे लाओस व थाईलैंड में वैकल्पिक विकास के कार्यक्रम काफी सफल रहे हैं। तथा वैल्पिक विकास कार्यक्रमों के बड़ी निधियों को इस कार्य में लगाए जाने की आवश्कयता है क्योंकि स्थानीय जनता की पूर्ण जीविका इस पर ही निर्भर है। दूसरे यह स्थानीय जनता के जीवन के तरीके को बदलने से जुड़ा है तथा इसमें काफी समय लगता है। वैकल्पिक विकास कार्यक्रम को लागू करना है तथा लंबे समय के लिए लगातार पैसा लगाने की आवश्यकता होगी।</p> <p style="text-align: justify; ">वैकल्पिक विकास के औचित्य को सिद्ध करने के लिए दो मुख्य पूर्व आवश्यकताएं है-</p> <ol> <li>कृषक का जीविका के लिए अवैध खेती पर निर्भर होना चाहिए; तथा</li> <li>यह पारंपरिक रीति होनी चाहिए तथा किसान जीवित रहने के किसी और तरीके को न जानते हो। यदि ये दो परिप्रेक्ष्यों पर विचार नहीं किया जाता है, तो वैकल्पिक विकास कार्यक्रम सरकार के लिए प्रति उत्पादक हो जाएंगे जो उन क्षेत्रों को जहां कृषकों ने अवैध खेती बड़े व शीघ्र फायदे के लिए करनी शुरु कर दी है। बदले में यह दूसरे क्षेत्रों एवं समुदायों तथा उनके नेताओं के लिए अवैध कृषि कार्य आरंभ करने हेतु प्रोत्साहित कर सकता है ताकि अवैध कृषि कार्य क्षेत्र का दर्जा प्राप्त हो सके तथा उन्हें अपने क्षेत्र के लिए अधिक निधि प्राप्त हो सके । भारत में कुछ आइसोलेटेड पॉकेट्स को छोड़कर अफीम पोस्त अथवा केनवीस की खेती की परम्परा नहीं है न ही स्थानीय समुदाय इस पर पूरी तरह निर्भर हैं प्राय - अवैध खेती धन अर्जित करने का सहज उपाय है।</li> </ol> <p style="text-align: justify; ">वैकल्पिक विकास से संबंधित हमारी नीति निम्न प्रकार है -</p> <p style="text-align: justify; ">(क) अवैध खेती का मुकाबला करने का मुख्य उपाय खेती को नष्ट करना है। तथा अपराधियों को एनडीपीएस अधिनियम के तहत सजा देना ।</p> <p style="text-align: justify; ">(ख) यदि ऐसे पॉकेट्स हैं, जहां अवैध खेती की लंबी परम्परा रही है तथा इस पर स्थानीय समुदाय की आजीविका पूरी तरह निर्भर है तो ऐसे क्षेत्रों को सावधानीपूर्वक अध्ययन के बाद केन्द्र सरकार (राजस्व विभाग) एनसीबी तथा संबंधित राज्य सरकार के बीच आपसी परामर्श के माध्यम सेचिह्नित किया जा सकता है ।</p> <p style="text-align: justify; ">(ग) एक बार जब इन क्षेत्रों को एक राज्य में चिह्नित कर लिया जाता है, जैसा ऊपर (ख) में वर्णित है, तो फिर सूची में किसी नये क्षेत्र को जोड़ा नहीं जा सकता है क्योंकि नया क्षेत्र तुरंत परम्परागत अवैध कृषि क्षेत्र नहीं बन सकता ।</p> <p style="text-align: justify; ">ऊपर (ख) में चिह्नित क्षेत्रों में वैकल्पिक विकास कार्यक्रम का आरंभ समुचित विचार के पश्चात किया जाता है और जब एक बार किसी एक क्षेत्र में कार्यक्रम आरंभ हो जाता है तो यह तब तक जारी रहता है जब तक कि संपूर्ण जनसंख्या अवैध खेती से पूरी तरह विमुक्त नहीं हो जाती।</p> <p style="text-align: justify; ">(ङ) कोई भी वैकल्पिक विकास कार्यक्रम एनसीबी द्वारा समन्वित किया जाएगा।</p> <h3 style="text-align: justify; ">भांग के पौधे की अपोषित वृद्धि</h3> <p style="text-align: justify; ">हमारे देश के कई भागों में तथा विश्व में भांग का पौधा जंगली रूप से विकसित होता है । पहाड़ी क्षेत्रों में जहां ठंडी जलवायु होती है, भांग की वृद्धि तेजी से होती है । भांग की अपोषित वृद्धि को राज्य सरकार के अधिकारियों द्वारा नष्ट किया जाएगा, जिसके लिए उन्हें एनडीपीएस एक्ट के अंतर्गत शक्ति प्रदान की गई है । जंगली रूप से विकसित भांग के पौधे के उपयोग की अनुमति केवल इसकी पत्तियों द्वारा भांग के उत्पादन को छोड़कर किसी अन्य उद्देश्य के लिए नहीं दी जाएगी जैसा कि अनुच्छेद 21 में वर्णित है ।</p> स्रोत: <a class="external_link ext-link-icon external-link" href="http://www.dor.gov.in/" target="_blank" title=" राजस्व विभाग, वित्त मंत्रालय, भारत सरकार (नए विंडोज में खुलने वाली अन्य वेबसाइट लिंक)"> राजस्व विभाग, वित्त मंत्रालय, भारत सरकार</a></div>