गुहेरी (स्टाई) पलकों के बालों की जड़ों या पलकों की तेल ग्रंथियों में पीप इकट्ठी हो जाने को गुहेरी (स्टाई) कहते हैं। यह शरीर की बीमारियों से लड़ने (प्रतिरोध) की ताकत के कम हो जाने का सूचक हो सकता है। सबसे पहले पलकों पर छोटा सा लाल दाना या सूजन हो सकती है इससे थोड़ी सी मुश्किल होती है। यह या तो इसी समय ठीक हो सकती है, या कभी कभार पीप से भर कर पूरी गुहेरी बन सकती है जो अन्तत: फूट भी सकती है। इसके बाद यह अक्सर ठीक होती है। कभीकभी यह और फैल सकती है। इलाज अगर पहले से ही पस बन गया हो तो बाल उखाड़ने से (अगर गुहेरी बालों के जड़ में है तो) और साफ गुनगुने पानी से धोने से गुहेरी बनना रोका जा सकता है। टैटरासाइकलीन या कोट्रीमोक्स जैसे बैक्टीरिया रोधी दवाइयॉं खाने से भी इस संक्रमण को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। घरेलू नुस्खा औषधियों का इलाज – गुहेरी की जगह पर लहसन का रस या आम की ताज़ी पत्तियों का दूध लगाने से ये ठीक हो सकती है। आँखे आना नेत्रश्लेष्मा के शोथ को सामान्य भाषा में आँखे आना कहते हैं। यह शोथ कीटाणुओं, एलर्जी करने वाले व विकार पैदा करने वाले पदार्थो से हो जाता है। आमतौर पर इसका कारण पता कर पाना मुश्किल होता है। साधारणतय इससे दोनों आँखों पर असर होता है। कुछ बैक्टीरिया और वायरस यह संक्रमण पैदा करते हैं। यह रोग कोई भी चीज़ों जैसे रोगी द्वारा इस्तेमाल किए गए रूमाल या तोलिया से या तैरने के दौरान हौदे के पानी से फैल सकता है। इसलिए जो व्यक्ति जाँच कर रहा हो उसे सावधानी बरतनी चाहिए। संक्रमण वाला नेत्रशोथ अक्सर खूब फैल जाता है। असल में इस तरह रोग के महामारी जैसे फैल जाने से ही यह पता चलता है कि यह संक्रमण वाला नेत्रशोथ है। संक्रमण तेज़ी से परिवार के सदस्यों और अन्य सम्पर्क में आने वाले लोगों में फैल जाता है। अगर प्रसूती के दौरान योनि मार्ग में कीटाणु उपस्थित हों तो नवजात शिशु को २-७ दिनो में नेत्रशोथ हो सकता है। नवजात शिशुओं में नेत्रशोथ आमतौर पर सुजाक (गोनोरिया) के कारण होता है। इसके और भी कारक जीवाणु है। जन्म के समय हुए नेत्रशोथ पर ध्यान न दिए जाने से बच्चा अन्धा भी हो सकता है। इसलिये १० दिनतक नवजात शिशु का आँख का ध्यान भी रखना चाहिये। चिकित्सीय लक्षण आँखों में कुछ चीज-कंकर जाने का अहसान होना, आँखों का लाल हो जाना, उनमें पानी आना, दर्द होना ये आम लक्षण है। इसके साथ नेत्रश्लेष्मा में सूजन होना, रोशनी का सामना करने में मुश्किल होना और आखों में से चिपचिपा पदार्थ निकलना जिससे आँख खोलने में मुश्किल हो, ये भी लक्षण हैं। नेत्रशोथ का निदान साधारणतय आसान होता है। संक्रमण वाले नेत्रशोथ में पीप निकलता है। यह अक्सर एक व्यक्ति से दूसरे में फैल जाता है। एलर्जी से होने वाला रोग एक व्यक्ति से दूसरे में नहीं फैलता। एलर्जी से होने वाले कंजंकटिवाईटिस में पानी जैसा पदार्थ निकलता है, पीप नहीं। परन्तु इसमें भी अतिरिक्त संक्रमण होने का खतरा रहता है। नेत्रशोथ की जाँच के समय कॉर्निया को देखना ज़रूरी होता है। यह पक्का कर लें कि कॉर्निया सुरक्षित है और इसमें छोटा सा भी घाव नहीं है। नेत्रशोथ की स्थिति में कॉर्निया में घाव होने की काफी सम्भावना होती है। इस पर ध्यान न देने से कॉर्निया अपारदर्शी हो सकता है। इससे उस आँख में आँशिक या पूर्ण अन्धापन हो सकता है। अगर कॉर्निया सुरक्षित है तो नेत्रशोथ का इलाज मुश्किल नहीं है। एक आँख के नेत्रशोथ पर भी ध्यान दिया जाना ज़रूरी है। यह मूलत: कॉर्निया की समस्या हो सकती है। इलाज – संक्रमण वाला नेत्रशोथ चिकित्सीय जाँच में बैक्टीरिया और वायरस दोनों से होने वाला नेत्रशोथ एक जैसा लगता है। बैक्टीरिया से होने वाले नेत्रशोथ में आँखों के बैक्टीरिया रोधी तरल दवाई या ऑइंटमेन्ट से काफी असर होता है। पर इस तरह के इलाज से वायरस से हुए नेत्रशोथ में कोई फायदा नहीं होता। रोहे वाला नेत्रशोथ एक चिरकारी स्थिति है जो टैट्रासाक्लीन ऑइंटमेन्ट के लगातार इस्तेमाल से ठीक हो सकती है। बैक्टीरिया से होने वाले नेत्रशोथ और रोहे वाले नेत्रशोथ दोनों के लिए ही टैट्रासाइक्लीन एक असरकारक दवा है। संक्रमण के स्थान पर टैट्रासाइक्लीन का इस्तेमाल बच्चों के लिए भी सुरक्षित है। अगर नेत्रशोथ संक्रामक हो गया है तो इसके इलाज के लिए खास बैक्टीरिया रोधी दवाई की ज़रूरत होगी। आपका स्वास्थ्य केन्द्र आपको इसके चुनाव में मदद करेगा। एलर्जी एलर्जी से होने वाले नेत्रशोथ में खुजली होती है और उससे पानी जैसा द्रव निकलता है। इलाज के लिए स्टीरॉएड (आँखों की दवा) का इस्तेमाल होता है। आमतौर पर एलर्जी का असल कारण पता नहीं लग पाता। एलर्जी आसानी से टाली भी नहीं जा सकती। एलर्जी करने वाले कुछ आम पदार्थ हैं विभिन्न पौधों के परागकण और घर की धूल। पर स्टीरॉएड का बेतरीका इस्तेमाल आँखों को नुकसान पहुँचा सकता है। अगर कॉर्निया में घाव हो तो स्टीरॉएड का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। ऐसे में रोगी को डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए। विकार पैदा करने वाले पदार्थ यह नेत्रशोथ आमतौर पर ऐसे पदार्थ आँख में से निकाल देने से ठीक हो जाता है। आँखों को पानी से धोना मददगार और आराम पहुँचाने वाला होता है। तपेदिक वाला नेत्रशोथ चिकित्सीय जाँच में बैक्टीरिया और वायरस दोनों से होने वाला नेत्रशोथ एक जैसा लगता है। बैक्टीरिया से होने वाले नेत्रशोथ में आँखों के बैक्टीरिया रोधी तरल दवाई या ऑइंटमेन्ट से काफी असर होता है। पर इस तरह के इलाज से वायरस से हुए नेत्रशोथ में कोई फायदा नहीं होता। रोहे वाला नेत्रशोथ एक चिरकारी स्थिति है जो टैट्रासाक्लीन ऑइंटमेन्ट के लगातार इस्तेमाल से ठीक हो सकती है। बैक्टीरिया से होने वाले नेत्रशोथ और रोहे वाले नेत्रशोथ दोनों के लिए ही टैट्रासाइक्लीन एक असरकारक दवा है। संक्रमण के स्थान पर टैट्रासाइक्लीन का इस्तेमाल बच्चों के लिए भी सुरक्षित है। अगर नेत्रशोथ संक्रामक हो गया है तो इसके इलाज के लिए खास बैक्टीरिया रोधी दवाई की ज़रूरत होगी। आपका स्वास्थ्य केन्द्र आपको इसके चुनाव में मदद करेगा। इलाज – संक्रमण वाला नेत्रशोथ यह एक तरह का चिरकारी नेत्रशोथ है जो टी.बी. वाले जीवाणुओं से होता है। सभी तरह के चिरकारी नेत्रशोथ में विशेषज्ञ की सलाह ज़रूरी होती है। नवजात शिशुओं में नेत्रशोथ नवजात शिशुओं में नेत्रशोथ आमतौर पर सुजाक के कारण होता है और इसलिए इसमें सलफा और पैनिसिलीन (आँख में डालने की) दवाई से फायदा होता है। कम से कम दो से तीन दिनों तक लगातार हर दो घण्टों में आँखों में दवाई डालें। इतने समय में बीमारी लगभग दूर हो जानी चाहिए। अगर राहत न हों तो डॉक्टर की सलाह लेने में न हिचकिचाएँ। पहले ४८ घण्टों में हर एक नवजात शिशु की जाँच करें। हर्बल इलाज एरण्ड का तेल नेत्रशोथ के लिए एक अच्छा इलाज है। एक या दो बार एरण्ड का तेल लगाने से सभी तरह के नेत्रशोथ जैसे संक्रमण में फायदा होता है। यह पक्का कर लें कि कॉर्निया में छाला नहीं है। एरण्ड का तेल लगाते समय सफाई का पूरा ध्यान रखें। इसे काजल जैसे पलकों के किनारे पर लगाना चाहिए। आँख में इसकी एक परत फैल जाएगी। कुछ ही मिनटों में इसका लाभ महसूस होने लगेगा। रात को लगाने से आमतौर पर सुबह तक फायदा हो जाता है। दोनों आँखों में एरण्ड का तेल लगाने से एक दूसरे के सम्पर्क से संक्रमण से बचाव होता है। यह तेल छूत फैलने के दिनो में लगाने से बीमारी से बचाव में मदद करता है। रोहे कारण और फैलाव परोहे नेत्रश्लेष्मा और पलकों का सूक्ष्म जीवाणुओं (क्लैमीडिया) से होने वाला संक्रमण है। यह बाद में कॉर्निया में भी फैल जाता है। यह एक चिरकारी रोग है और समुदाय में फैल सकता है। बहुत से विकासशील देशों में रोहे अन्धेपन का एक प्रमुख कारण हैं। स्वच्छता की कमी इस रोग के फैलने का कारण है। घर में पाई जाने वाली मक्खी इस संक्रमण को फैलाने में मददगार है। रोगियों द्वारा इस्तेमाल की गई चीज़ों जैसे रूमाल आदि से भी जीवाणु फैलते हैं। लक्षण रोहे के शुरुआत में ऐसा लगता है जैसे आँख में कुछ चला गया हो। ऐसा पलक के नेत्रश्लेष्मा में पुटक होने के कारण लगता है, जो कि छोटे से दाने जैसे लगते हैं। आँख में से पानी निकलता है और खुजली होती हैं। आँख लाल भी हो सकती है। कॉर्निया में छाले भी हो सकते हैं। कॉर्निया पर खून की वाहिकाएँ बनने लगती हैं। इसे पैनस कहते हैं। बाद में पलकें सिकुड़कर ऊपर की ओर मुड़ सकती हैं। एक से दो हफ्ते के बाद कॉर्निया छालों के कारण अपारदर्शी हो सकता है। बीमारी का निदान शुरुआती स्थिति में ही हो जाना चाहिए। इलाज तीन से चार हफ्ते पर टैट्रासाइक्लीन मरहम लगाना। यह मुँह से भी लेना पडता है। चूँकि यह बीमारी चिरकारी है, इसलिए २-३ हप्तों तक इलाज जारी रखना ज़रूरी है। अगर पलकों के आकार में खराबी आ जाए तो आपरेशन ही एकमात्र इलाज है। नेत्रदान नेत्रदान (आँखों का दान), सामुदायिक नेत्र-स्वास्थ्य कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण भाग होता है। कॉर्निया अपारदर्शी हो जाने के कारण हज़ारों लोग अन्धेपन का शिकार हो जाते हैं। कॉर्नियल प्रत्यारोपण में रोगी के खराब कॉर्निया की जगह किसी का स्वस्थ कॉर्निया लगा दिया जाता है। दुख की बात यह है कि पर्याप्त संख्या में आँखों के बैंक व नेत्रदान करने वाले लोग उपलब्ध नहीं है। नेत्रदान करने के लिए एक व्यक्ति को रज़ामन्दी के एक फॉर्म पर हस्ताक्षर करने पड़ते हैं। हर स्थानीय आँखों के बैंक में ऐसे फॉर्म होते हैं। दानकर्ता के मरने के बाद तुरन्त बैंक को सूचना दिए जाने की ज़रूरत होती है। और इस बीच मृत्यु के बाद के क्षय को रोकने के लिए आँखों पर बर्फ या कुछ ठण्डे फाहे आदि रख दिए जाने चाहिए। आँखों के बैंक के सर्जन आ कर नेत्रगोल निकाल ले जाते हैं और पलकों को सिल देते हैं। नेत्रगोल को फ्रिज में रख देते हैं। और फिर कॉर्निया लगाने के लिए सूची से दो अन्धे लोगों को बुलाया जाता है। इस तरह से एक व्यक्ति के नेत्र दान से दो लोगों को फायदा होता है। कॉर्निया प्रत्यारोपण के आपरेशन के बाद अधिक देखभाल की ज़रूरत होती है। जिन का दृष्टीपटल खराब हो चुका है, कार्निया के बदले जाने से फायदा नहीं होगा। यह जरुरी है कि लोगों को नेत्रदान करने के लिए उत्साहित किया जाए। स्थानीय सामाजिक समूहों और आँखों के बैंक की इसमें बड़ी भूमिका है। कॉर्निया में छाला या इसका अपारदर्शी होना कॉर्निया एक बहुत अधिक नाजुक भाग है। यह पूरी तरह से पारदर्शी रहे इसलिए इसमें खून का बहाव भी नहीं होता। आँख में छाला होना एक गम्भीर समस्या है। इससे कॉर्निया अपारदर्शी होकर अन्धापन भी हो सकता है। इसके लिए उचित और पर्याप्त देखभाल की ज़रूरत होती है। कॉर्निया में छाला बाहरी कणों के आँख में चले जाने, संक्रमण या विटामिन ए की कमी से हो जाता है। अगर ध्यान से देखा नहीं तो छाला नजर नही आता। जब भी आँख लाल हो जाए या उसमें दर्द हो तो ठीक सी रोशनी में कॉर्निया की जाँच ज़रूरी है। दर्द और रोशनी से परेशानी इसके प्रधान लक्षण हैं। जाँच करने से पहले तनु (हल्के) ज़ाईलोकेन की एक बूँद डाल लें। ज़ाईलोकेन एक स्थानीय निश्चेतक है। अगर आपके पास फ्लोरोसीन की बूँदें हैं तो इससे छाले की जाँच और भी आसान हो जाती है। इस दवाई से छाले हरे और चमकदार दिखने लगते हैं। इलाज इलाज में बैक्टीरिया रोधी दवाई की बूँदें हर आधे घण्टे में डालना जरुरी है। इसी के साथ आँखों पर पैड रखना और खाने की एण्टी बायोटिक और शोथरोधी दवाई लेना चाहिए । आँख के डॉक्टर को जरुर दिखाना चाहिए। अगर छाला गहरा है तो इससे छेद भी हो सकता हैं। कॉर्निया में छाला होने पर अच्छी देखभाल की ज़रूरत होती है क्योंकि इलाज के बाद भी अपारदर्शिता हो सकती है। कॉर्निया के छाला से आँशिक या पूरी तरह से दागदार (ल्यूकोमा) या अपारदर्शिता होने की सम्भावना होती हैं। ठीक होने पर भी धुँधला सा दाग छूट सकता है। छोटा मोटा और उथला छाला पूरी तरह से ठीक हो जाता है। अपारदर्शिता स्थाई होती है। कार्निया के घाव के कारण हुए अन्धेपन में केवल कॉर्निया के प्रत्यारोपण से आँखों की रोशनी वापस आ सकती है। मोतियाबिन्द कारण और प्रक्रिया मोतियाबिन्द आमतौर पर बूढ़े लोगों में होता है। कभी कभी नवजात शिशु को भी मोतियाबिंद हो सकता है। ऐसा तब होता है जब गर्भ के दौरान मॉं को जरमन मीज़लस का संक्रमण हुआ हो। बूढ़े लोगों में मोतियाबिन्द उम्र के कारण होता है पर रोहे और डायबटीज़ भी इसका कारण हो सकते हैं। मोतियाबिन्द में लैंस का पदार्थ (जो कि प्रोटीन होता है) स्कन्दन के कारण सफेद हो जाता है। आमतौर पर यह प्रक्रिया लैंस के केन्द्र से शुरू होती है। कभी कभी सफेद होने की प्रक्रिया बाहरी परतों से भी शुरू होती है। ऐसा संक्रमण की स्थिति में होता है। इस प्रक्रिया को जिसे मोतियाबिन्द का पकना भी कहते हैं, कई महीने या साल भी लग सकते हैं। लक्षण रोहे के शुरुआत में ऐसा लगता है जैसे आँख में कुछ चला गया हो। ऐसा पलक के नेत्रश्लेष्मा में पुटक होने के कारण लगता है, जो कि छोटे से दाने जैसे लगते हैं। आँख में से पानी निकलता है और खुजली होती हैं। आँख लाल भी हो सकती है। कॉर्निया में छाले भी हो सकते हैं। कॉर्निया पर खून की वाहिकाएँ बनने लगती हैं। इसे पैनस कहते हैं। बाद में पलकें सिकुड़कर ऊपर की ओर मुड़ सकती हैं। एक से दो हफ्ते के बाद कॉर्निया छालों के कारण अपारदर्शी हो सकता है। बीमारी का निदान शुरुआती स्थिति में ही हो जाना चाहिए। इलाज आपरेशन के आधुनिक तरीकों में लैंस बदल दिया जाता है। इससे मोतियाबिन्द के इलाज और सामान्य दृष्टि की बहाली को काफी सरल बना दिया है। सरकारी अस्पतालों में अब ये ऑपरेशन सबको मुफ्त उपलब्ध है। मोतियाबिन्द का ऑपरेशन मोतियाबिन्द ऑपरेशन का पुराना तरीका अभी बिलकुल बदला है। इसके पहले मोतियाबिंद निकाल कर चश्मा दिया जाता था। आजकल मोतियाबिंद निकालकर उसी जगह प्लॅस्टिक का लेन्स बिठाया जाता है। इससे चश्मा बिलकुल ही जरुरी नही। भारत में अंधेपन की समस्या में लगभग ६०% समस्या मोतियाबिंद की होती है इसलिये मोतियाबिन्द का ऑपरेशन बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसका तकनीक काफी प्रगत हुआ है। इस ऑपरेशन के दो तरीके है। टाँका का सामान्य ऑपरेशन इसमें कॉर्निया के बाजू में छेद लेकर पुरा मोतियाबिन्द निकाला जाता है। इसकी जगह नया लेन्स बिठाया जाता है। इस ऑपरेशन में छेद बडा होने के कारण टाँका डालना पडता है जिसको ठीक होने के लिये कुछ दिन लगते है। यह ऑपरेशन काफी प्रचार में है और सरकारी अस्पतालों में मुफ्त में किया जाता है। निजी अस्पतालों में इसके लिये ५०० से लेकर १०००० तक खर्चा आता है। ऑपरेशन के बाद उसी दिन घर जा सकते है। बगैर टांके का फेको तरीका इस ऑपरेशन में छेद सिर्फ ३-५ मि.मी. का होता है। इसके द्वारा एक सूक्ष्म अवजार डालकर मोतियाबिंद तोडकर खींचा जाता है। इस तरीके से मोतियॉंबिंद बिलकुल छोटे छेद से निकालते है उसकी जगह अब प्लॅस्टिक का लेन्स मोड़कर अंदर डालके खोला जाता है। इस तरीके में टाँका नहीं लगता। इसी कारण जख्म जल्दी भर आता है। ऑपरेशन के बाद तुरंत घर जा सकते है। इस ऑपरेशन को लगभग दुगना खर्चा अता है। कृत्रिम लेन्स कृत्रिम लेन्स ऊँचे दर्जे के प्लॅस्टिक का बनता है। इसमें कई प्रकार है। यह लचीला भी होता है। इसके होते हुए अब चश्मे की जरुरत नहीं रही। ऑपरेशन के बाद लगभग ९८% लोगों को पूर्णतया दृष्टीलाभ होता है। लेकिन कुछ लोगों रे में समस्या होती है। खास करके टॉंचे के ऑपरेशन के बाद लेन्स के पिछवाडे धुंदलापन हो सकता है। इसके लिये लेज़र किरणों से ईलाज किया जाता है। मोतियाबिन्द जल्दी न हो इसलिये खाने में लहसून पर्याप्त हो ऐसा कुछ विशेषज्ञ मानते है। हमारे देश में कडी धूप के कारण मोतियाबिंद जादा पैमाने पर जल्दी होता है इसलिये धूप में काम करते समय काले चश्मे गॉगल लगाना उचित होगा। वैसे आँखोंपर छॉंव देने वाली कॅप (टोपी) इस्तेमाल करना भी एक विकल्प है। कॉम्प्युटर और टी.व्ही. के किरणों के कारण मोतियाबिन्द जल्दी होता है। एल.सी.डी स्क्रीन के कारण यह असर टाला जा सकता है। दृष्टी पटल की बीमारियाँ दृष्टी पटल नेत्र गोल के पिछली दिवार में होता है। यह बहुत संवेदनाशील उतक से बना होता है। इसके जरिए रोशनी और प्रतिमा की संवेदना नेत्रतंत्रिका के जरिए मस्तिष्क में पहुँचते है। दृष्टीपटल खासकर अतिरक्तचाप और मधुमेह के कारण जल्दी खराब होता है जिससे नजर धुंदली होती है। इसलिये इन बीमारियों में नियमित रूप से नेत्र पटल की जाँच करना जरुरी है। इसके लिये डॉक्टर ऑफ्थैल्स्कोप इस्तेमाल करते है। दृष्टी पटल जगह से सटकना कभीकभी दृष्टी पटल अपनी जगह से सटककर नेत्र गोल में घुस जाता है। इसके मुख्य लक्षण होते है आँख के कुछ हिस्सों में अंधेरा छाना और दृष्टी का परीक्षेत्र कम होना। इस बीमारी के कई कारण है। आजकल लेज़र ऑपरेशन के जरिए इसका अच्छा इलाज हो सकता है। इसी कारण दृष्टीपटल सर्जन भी अलग हुआ करते है। नवजात बच्चों में दृष्टीपटल दोष नौ महिने से कम समय में प्रसुती हो तब दृष्टीपटल बीमारी की संभावना होती है। खास कर के आठ महिने के पहिले हुए बच्चों का दृष्टीपटल कमजोर होता है। इस दृष्टी पटल में रक्तवाहिकाओं का जाल अधुरा होता है और इसमें कुछ दोष होते है। इस कारण से इन बच्चों का दृष्टीपटल जगह से छुटने की जादा संभावना है। इसके लिए अपुरे समय की बच्चों की दृष्टीपटल की जाँच २-३ हप्तों में होनी चाहिये और आगे भी समय समय जाँच जरुरी है। इसलिये भी लेज़र ऑपरेशन से इलाज हो सकते है। कभी कभी और भी ऑपरेशन करने पडते है। इलाज के बाद दृष्टी प्राप्त होने की संभावना भी सौ प्रतिशत नही होती। अनुवंशिक अंधापन कुछ बच्चों में जनन से ही दृष्टीपटल कम विकसित होता है। भारत में इसका ज्यादातर कारण है नजदीक के रिश्तो में शादी होना। ऐसे शादी के बाद होनेवाले बच्चो में दोनो तरफ से दोषपूर्ण जीन आने के कारण अंधापन की संभावना होती है। इसलिये ऐसे रिश्ते नही करने चाहिये जैसे ममेरे या चचेरे भाई बहन आदी। इस बीमारी का कोई भी इलाज आज उपलब्ध नहीं है। अंधापन और पुनर्वास बचपन या युवावस्था में किसी कारण दोनो आँखों को अंधत्व हो तब विशेषज्ञ को दिखाकर दृष्टीहीनता का सही नापन जरुरी है। अंधत्व के प्रमाण के अनुसार पुनर्वास की और शिक्षा की बहाली करना बिलकुल जरुरी है। यद्यपी ऐसी सेवाएँ हमारे देश में कम है फिर भी इसके लिए अनेक संघटन और सरकारी योजनाएँ लाभकारी है। ऐसे बच्चों की और युवकों की शिक्षा का सही इंतजाम अंधत्व के मात्रा के अनुसार किया जाता है। अंशत: अंधापन हो तब सामान्य स्कूलों में विशेष मदद के साथ इंतजाम कर सकते है। इसी के साथ शारीरिक सुरक्षितता और मनोवैज्ञानिक साहायता और मार्गदर्शन जरुरी होता है। बाद में भी ऐसे काम जीवनी के लिए चुनना जरुरी है जिसमे सुरक्षा और कुशलता प्राप्त हो। अंधापन ज्यादा या पूरा हो तब ब्रेल लिपी के जरिए पढाई हो सकती है। ऐसे बच्चे भी बिलकुल उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकते है। इसके लिए नॅशनल असोसिएशन ऑफ ब्लाईंड ऐसा संघटन भी साहायता के लिए मौजूद है। अन्य संघटन भी है। अंधों के लिए दया या करुणा दिखाना एक तरह से उनके मनोबल को चोट पहुँचाना है लेकिन उनका उचित सन्मान और साहायता करना हर किसी का कर्तव्य है। अश्रुथैली की सूजन आँखों के नाक के नजदिक वाले कोने में निचले पलक में अश्रुथैली होती है। इनसे आँसू का पानी नाक में चला जाता है। कभी कभी संक्रमण के कारण इसकी सूजन हो जाती है। इससे आँखों में से पानी निकलने लगता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पानी बाहर (नाक में) जाने का सही रास्ता बंद हो गया। इस स्थिति को डेकरोसिसटाईटिस कहते हैं। यह आमतौर पर शीघ्र शोथ से शुरू होता है। यह बीमारी सामान्यत: अपने आप ही सुधर जाती है या फिर दवाइयों से ठीक हो जाती है। कभीकभी ये चिरकारी रोग हो जाता है। इससे आँसुओं का रास्ता बन्द होकर ऑंसू बहते रहते है। लक्षण रोग की शुरुआत में आँख में दर्द और बेआरामी से होती है। फिर बाधित आँख में से पानी निकलने लगता है। पास ही में स्थित नेत्रश्लेष्मा पर लाली दिखाई देने लगती है। जिस आँसू थैली में शोथ हो उसे दबाने पर उसमें से चिपचिपा पीप निकलता है। इलाज – उग्रस्थिति आँखों में बार-बार एन्टीबैक्टीरियल दवाई की बूँदें डाली जानी चाहिए। टैट्रासाईक्लीन या कोट्रीमाक्स जैसी एन्टीबैक्टीरियल दवा का प्रयोग जरुरी है। ऐस्पीरन जैसी शोथ रोधी दवा का प्रयोग करे। अच्छे इलाज से एक हफ्ते में आराम आ जाता है। चिरकारी अश्रू-कोश सूजन इसके लिए विशेषज्ञ की सलाह की ज़रूरत होती है। सिरिंज पर नोज़ल लगाकर आँसू के थैली को धोया जाता है। बाकि इलाज जीवाणुरोधी और शोथरोधी होता है। यह ज़्यादा समय के लिए चलता है। थैली बिलकुल बंद हो तो छोटासा ऑपरेशन कर के ठीक किया जाता है। ग्लॉकोमा नेत्रगोल में जो द्रव होता है, उसका एक अंदरुनी दबाव होता, जैसे रक्तचाप होता है। यह सामान्य होना चाहिये। नेत्रगोल पर अंदरुनी दवाब बढ़ जानेसे ग्लॉकोमा (सबजमोतिया) रोग होता है। इससे आँख के आकार पर भी असर पड़ सकता है। अगर इसका समय से इलाज न हो तो इससे अन्धत्व भी हो सकता है। इससे दृष्टिक्षेत्र धीरे-धीरे सिमट जाता है। इसके मुख्य लक्षण हैं- आँखों में भंयकर दर्द होना, आँखों का लाल होना, सिर में दर्द और देखने के क्षेत्र में कमी। कभी-कभी साथ में उल्टियॉं भी आती हैं। ऐसी शिकायतों में आँखों का दवाब कम करने की ज़रूरत होती है। यह अक्सर एक ही आँख में हो सकता है। कुछ लोगों में ग्लॉकोमा के लक्षण न होने पर भी आँखों का तनाव बढ़ा हुआ हो सकता है। और इससे तो आँखों की रोशनी हमेशा के लिए जा सकती हैं। उँगलियों से नेत्रगोल के तनाव की जाँच करने के लिए अनुभव की ज़रूरत होती है। आँखों के विशेषज्ञ एक इसके लिए टोनोमीटर का इस्तेमाल करते हैं। इस टोनोमीटर को कॉर्निया के ऊपर रखा जाता है। और साथ लगे एक स्केल पर सूई घूमती है। स्वास्थ्य कार्यकर्ता के लिए केवल इतना ज़रूरी है कि वे ग्लॉकोमा होने की सम्भावना पकड़ पाएँ और ऐसे मामलों में रोगी को विशेषज्ञ के पास भेज दें। अनुभवी स्वास्थ्य कार्यकर्ता अपनी उँगलियों से भी तनाव समझ सकते है। ग्लॉकोमा रोधी दवाइयॉं उपलब्ध है, जैसे मुँह से ली जाने वाली ऐसीटाज़ोलामाइड और आँखों में टीमोलोल या पीलोर्कापिन द्रव। कुछ मामलों में आपरेशन की भी ज़रूरत होती है। टेरीज़ियम टेरीज़ियम याने कॉर्निया के ऊपर नेत्रश्लेष्मा का बढना। आँखो के कॉर्निया के उपर यह बेल की तरह छा जाता है। यह प्रक्रिया बरसों तक चलती है। अन्तत: आँखों की रोशनी को प्रभावित करती है। अगर यह पुतली तक फैल जाए तो इसमें भी आपरेशन की ज़रूरत होती है। चोट आँखों में कई तरह की चोटें लग सकती हैं। चोट लगने का सबसे आम ज़रिया है किसी बाहरी कण का आँख में घुस जाना, जैसे लोहे का बुरादा, रेत, धूल, लकड़ी का बुरादा या अनाज की भूँसी। गॉंवों में मवेशिया की पूँछ से भी कभीकभी आँख में चोट लगती है। कहीं गिर जाने या झाड़ियों में से गुज़रते हुए कॉंटे या पत्तियों आदि से भी आँख में चोट लग जाती है। मवेशियों के सींगों से काफी बुरी चोटें लग सकती हैं। मोटरसायकल पर बिना चश्मे के घूमना भी चोट को बुलावा देता है। आँखों में चोटों की कितनी गहराई या गम्भीरता में काफी अंतर हो सकता है। कुछ चोटों से आँख का बड़ा हिस्सा प्रभावित होता है। कुछ चोटे इतनी छोटी होती हैं कि इन्हें आँख को ध्यान से देखने से ही पता चलता है। कुछ चोटों का असर काफी अन्दर तक होता है। सामान्य कायचिकित्सक (सामान्य डॉक्टर) के लिए भी अक्सर यह पता लगा पाना मुश्किल होता है कि चोट कितनी गहरी है। इसके लिये विशेषज्ञ की ज़रूरत होती है। लोगों को बताया जाना चाहिए कि आँखों की चोटों से बचें। लेथ मशीन चलाने वाले, वैल्डिग का काम करने वाले या मोटरसाइकिल चलाने वाले चोट से बचने के लिए चश्मा पहनना चाहिए। गॉंव में लोगों को खासकर मवेशियों के सींगों से लगने वाली चोटों के प्रति काफी सावधान रहना चाहिए। रोगी को आँखों के विशेषज्ञ के पास भेजने से पहले उसकी आँख में एन्टीसेप्टिक दवाई की बूँदें डाल दी जानी चाहिए और पट्टी बॉंध दी जानी चाहिए। स्त्रोत: भारत स्वास्थ्य