परिचय शिशु जन्म का समय अत्यंत नाजुक होता है अत: कुछ कारक या दशाएँ शिशु के विकास पर प्रभाव डालती हैं । ऑक्सीजन वंचना जन्म के समय कुछ शिशुओं को एनाक्सिया या ऑक्सीजन अल्पता की समस्या से ग्रस्त होना पड़ता है । कभी – कभी जन्म के तुरंत बाद श्वसन क्रिया प्रारंभ न होने के कारण ऐसा होता है। यद्यपि नवजात, वयस्कों की तुलना में ऐसी स्थिति में अधिक समय तक जीवित रह सकता है परन्तु तीन मिनट से अधिक होने ऑक्सीजन के अभाव में मस्तिष्क के क्षत होने का भय रहता है। ऑक्सीजन वंचना लेबर के समय भी संभव है। इसका मुख्य कारण अम्बिलिकल कार्ड में ऐठन है जो गर्भ में ब्रीच संस्थिति में, शिशु के उल्टे रहने के कारण होती है। ऐसी दशा में जन्म के समय, चिकित्सा द्वारा सिजेरियन शिशु का जन्म कराया जाता है। ऑक्सीजन वंचना का तीसरा कारण हैं, प्लेसेंटा प्रिविया अथार्त प्लेसेंटा का सयम से पूर्व ही अलग हो जाना। ऐसी दशा में जन्म का तुरंत होना आवश्यक हो जाता है। इस अलगाव के स्पष्ट कारण तो प्राप्त नहीं हैं। परंतु गर्भकाल में धूम्रपान को एक प्रमुख कारण बताया गया है (क्रेमर एवं अन्य, 1991)। समय से पूर्व शिशु का जन्म गर्भकाल की पूर्ण अवधि के तीन सप्ताह पूर्व जन्मे एवं साढ़े पांच पौंड या उससे भी कम शारीरिक भार वाली शिशुओं को अपरिपक्व शिशु कहा जाता है। जन्म के समय शिशु के भार के आधार पर उसके जीवित रहने के संभवना व्यक्त की जा सकती है। ऐसे शिशुओं में विभिन्न प्रकार की समस्याएँ, बीमारियाँ, अतिसक्रियता, गयात्मक संयोजन एवं स्थूल अधिगम दोष पाये जाते हैं कुछ समस्याएँ बाल्यावस्था तक जारी रहती है (मैकर्मिक एवं अन्य, 1990, सिगेल एवं अन्य 1991)। इसका कारण कुपोषण, हानिकारक परिवेश का असर, औषिधिय देखरेख का अभाव इत्यादि हो सकता है। यदि गर्भ में जुड़वें बच्चें हैं तो भी अपरिपक्वता पायी जाती है। गर्भाशय में 20 सप्ताह के पश्चात जुड़वे बच्चे का भार एवं विकास सामान्य से कम होता एवं गर्भाशय में स्थान के अभाव के कारण समय से 3 सप्ताह पूर्व ही इनका जन्म हो जाता है। निम्न जन्म – भार निम्न जन्म भार वाली शिशुओं को स्वास्थ्य संबंधी विविध समस्याओं का सामना करना पड़ता है परंतु 50% शिशु समान्य शिशुओं की भांति, सामान्य ढंग से विकसित होने लगते हैं समय पूर्व शिशुओं की भांति, एक श्रेणी उन शिशुओं की होती है जो पूर्ण अवधि पर जन्म लेने के के बावजूद निम्न शारीरिक भार वाले होते हैं। इन बच्चों में गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न हो सकती है, जैसे प्रथम वर्ष में ही मृत्यु की सम्भवना, या छूआ छूत का रोग या मस्तिष्क के क्षतिग्रस्त होने का भी भय होता है (टिवार्ग एवं अन्य, 1988)। मध्य बाल्यावस्था तक ये निम्न बौद्धिक स्तर, निम्न अवधानक्षमता एवं निम्न उपलब्धि वाले पाये जाते हैं। कुपोषण, प्लेसेंटा का प्रकार्य रहित होना एवं शिशु में स्वत: दोष, इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं। इन बच्चों का वाह्य आकार – प्रकार एवं विकास सामान्य बच्चे की तुलना में अटपटा एवं भद्दा होता है। इनकी निम्न अनूक्रियाशिलता के कारण देखभाल अरूचिकर एवं जटिल होती है। ऐसे बच्चे माता- पिता द्वारा बाल दुर्व्यवहार के शिकार हो सकते हैं। इसके प्रति निम्न सामाजिक एवं आर्थिक स्तर की माताएं अपनी दिनचर्या की बाधित होने के कारण इन्हें अलग- थलग करके, इनके प्रति निषेधात्मक व्यवहार दर्शाती है। इससे बच्चे का संज्ञानात्मक एवं व्यवहारपरक विकास अवरूद्ध हो जाता है (कोहेन एवं पार्मली, 1983)। माँ बच्चे का सम्बद्ध जो उपरोक्त कारणों से निषेधात्मक होता है, उचित हस्तक्षेप की सहायता से दूर किया जा सकता है। स्त्रोत: ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान