माहवारी से सम्बन्धित रूढ़ियाँ परम्परागत रूप से हमारे देश में माहवारी को अशुद्ध माना जाता है| कई जगहों पर तो स्त्री को अलग रहने के लिए कहा जाता है| इस अवधि में वह अछूत बन जाती है| इस समय उसे लोगों मो छूने, पूजा करने या रसोई में जाने से रोका जाता है| अलग थलग किये जाने से उसके मन पर बुरा असर पड़ता है| महिलाओं और लड़कियों के लिए यह रिवाज बड़ा ही असुविधाजनक है| हमें चाहिए कि लोगों को माहवारी की वास्तविकता बताएं और उन्हें समझाएं कि इसके दौरान स्त्रियों को अलग करने की कोई जरुरत नहीं है| शरीर की रचना और माहवारी का कारण समझ लेने के बाद इस रूढ़ि को मानने कोई आधार नहीं रह जाता है| हाँ माहवारी के दिनों में संभोग से बचने का रिवाज ठीक है| उन दिनों में संभोग करने से संक्रमण का खतरा बढता है| इसके अलावा खून डिम्ब नालों की ओर जा सकता है| इसलिए स्त्री को अशुद्ध मानने का विचार त्याग देना चाहिए परन्तु माहवारी हो रही तो स्वास्थ्य सिधान्तों के अंतर्गत संभोग से बचना उचित होगा| मासिक धर्म शुद्धिकरण के रूप में असलियत तो यह है कि हर महीने के शरीर से होने वाला यह रक्तस्राव उसके गर्भाशय को शुद्ध बनाता है| यह उसकी अंदरूनी झिल्ली के साथ ही गर्भाशय के छोटे मोटे संक्रमण भी साफ कर देता है| इस तरह संक्रमण के पुराने और असाध्य होने से बचाव हो जाता है| यहाँ यह याद दिला देना उचित होगा कि गर्भाशय की झिल्ली के गिरने में डिम्बनालों की कोई भूमिका नहीं होती| इसलिए डिम्बनालों में संक्रमण पुराना होकर गंभीर रूप ले सकता है| स्रोत:- जननी/ जेवियर समाज सेवा संस्थान, राँची|