जावा सिट्रोनेला (सिन्बोपोगोन विन्टेरीएनस) को आमतौर पर जावा घास के नाम से जाना जाता है। यह एक महत्वपूर्ण सगंधीय बहुवर्षीय घास है। इसके पत्तों से तेल निकाला जाता है। भारत में जावा सिट्रोनेला की खेती मुख्यतः असोम, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, गोवा, केरल तथा मध्य प्रदेश में हो रही है। व्यावसायिक फसल होने के साथ-साथ यह एक भूमि सुधारक फसल भी है। जावा घास की पत्तियों से तेल आसवित किया जाता है। इसके मुख्य रासायनिक घटक सिट्रोनिलेल (32-45 प्रतिशत), सिट्रोनिलोल (11-15 प्रतिशत), जिरेनियाल (12-18 प्रतिशत), सिट्रोनिलेल एसिटेट (2-4 प्रतिशत) और एलिमिसीन इत्यादि हैं। इस तेल का उपयोग सौन्दर्य प्रसाधनों, साबुन, सुगंध उद्योग एवं मच्छर भगाने वाले उत्पादों इत्यादि में बहुतायत से किया जाता है। यह पौधा बुखार, गठियावात, मामूली संक्रमण, पेट एवं अनिद्रा संबंधी समस्याओं के उपचार में उपयोग होता है। जावा सिट्रोनेला पोएसी कुल की एक बहुवर्षीय घास है। इसकी पत्तियां नीबू घास एवं पामारोजा की तुलना में ज्यादा चौड़ी होती हैं।। यह एक शाकीय पौधा है। इसकी ऊंचाई लगभग 1.5 से 2 मीटर तक होती है। पत्तियां अलग-अलग, लंबी, रेखीय, अरोमिल, अंदर की तरफ लाल रंग की 40-80 सें.मी. लंबी और 1.5 से 2.5 सें.मी. चैड़ी होती हैं।। इसमें सितंबर-नवंबर में पुष्प खिलते हैं। तथा फल अपै्रल से जून में आते आते हैं। इसकी जड़ें रेशेदार होती हैं। दो प्रकार के सिट्रोनेला जावा सिट्रोनेला सिलोन सिट्रोनेला जावा सिट्रोनेला उन्नत प्रजातियां जोरहट सी-2, 5, जावा-2, सीमैप- बायो-13, मंजुषा, मंदाकिनी, मंजरी, सीमैप-बायो-13 मृदा जावा सिट्रोनेला की खेती के लिए समुचित जल निकासी वाली बलुई दोमट या दोमट मृदा उपयुक्त होती है। इसके लिए भूमि का पी-एच 5-7 के बीच सर्वोत्तम रहता है। अम्लीय एवं क्षारीय भूमि में भी इसकी खेती की जा सकती है। जलवायु जावा सिट्रोनेला की खेती के लिए समशीतोष्ण एवं उष्ण जलवायु उपयुक्त होती है। इसकी खेती के लिए गर्म जलवायु (10-35 डिग्री सेल्सियस तापमान), तेज धूप, 70-80 प्रतिशत आर्द्रता एवं 200-250 सें.मी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रा बेहतर होते हैं। अधिक सर्दी एवं छायादार वाले स्थानों पर इस फसल की वृद्धि कम होती है। प्रवर्धन सिट्रोनेला घास का प्रवर्धन कल्लों द्वारा किया जाता है। एक या अधिक वर्ष पुरानी फसल के जुट्ठों (क्लम्प) को उखाड़कर उनसे एक-एक स्वस्थ कल्ले को अलग कर लिया जाता है। इस कल्ले के नीचे सूखी पत्तियों एवं लगभग 4-5 सें.मी. लंबी जड़ छोड़कर शेष जड़ को काटने के बाद ऊपर से लगभग 15 सें.मी. पत्तियां काट देनी चाहिए। इस प्रकार प्रवर्धन के लिए कल्ला तैयार हो जाता है। एक वर्ष के स्वस्थ पौधे से लगभग 60-80 कल्ले तैयार हो जाते हैं।। जावा घास सिट्रोनेला की रोपाई बरसात के आरंभ में जुलाई से अगस्त की जाती है। यदि सिंचाई के पर्याप्त साधन उपलब्ध हों तो फरवरी-मार्च एवं अक्टूबर-नवंबर में भी इनकी रोपाई की जा सकती है। जुलाई के प्रारंभ में 60 सें.मी. × 30 सें.मी. के अंतर से कल्ले 15-20 सें.मी. की गहराई पर पंक्ति में लगाए जाते हैं। कम उपजाऊ भूमि में कल्लों को 60 सें.मी. × 45 सें.मी. की दूरी पर लगाना चाहिए। एक हैक्टर में 50,000 कल्ले पर्याप्त होते हैं रोपाई करते समय कल्ले को पूर्णतः जमीन के अंदर दबा देना चाहिए। कलम की कोई भी इंटरनोड (गांठें) भूमि के ऊपर नहीं रहनी चाहिए। नई जड़ों का विकास इन्हीं गांठों से होता है। रोपाई के उपरांत लगभग 30 दिनों तक भूमि में नमी की कमी नहीं होनी चाहिये। प्रायः रोपाई से लगभग 2-3 सप्ताह के भीतर कल्ले से पत्तियां निकलनी शुरू हो जाती हैं।। सिट्रोनेला की रोपाई के समय यह ध्यान देना आवश्यक है कि इसका जमाव केवल 75-80 प्रतिशत तक ही होता है। अतः खाली बची हुई जगह को दोबारा नए कल्लों से भर देना चाहिए। खाद एवं उर्वरक जावा घास की खेती करने के लिए जैविक खाद 20 टन प्रति हैक्टर पर्याप्त होती है। एनपीके 200-250 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर, खेत की तैयारी अथवा गड्ढों की भराई के समय मृदा में डाल देते हैं। यूरिया का 250 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर प्रतिवर्ष की दर से खड़ी फसल में प्रत्येक कटाई के बाद समय-समय पर तीन बार छिड़काव किया जाता है। सिंचाई अच्छी उपज एवं पत्तियों की अधिक पैदावार के लिए खेत में पर्याप्त नमी की आवश्यकता होती है। रोपाई से लेकर 3-4 महीनों तक मृदा में नमी की कमी नहीं होनी चाहिए। फसल को वर्षभर में 6-8 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। प्रायः गर्मी में 10 से 15 दिनों के अंतराल पर तथा सर्दियों में 20-30 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करना लाभप्रद रहता है। वर्षा होने पर सिंचाई नहीं करनी चाहिए। खरपतवार नियंत्रण जावा घास की रोपाई उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में जुलाई-अगस्त में की जाती है। फसल रोपने के 20-25 दिनों बाद पहली निराई-गुड़ाई तथा 60-65 दिनों बाद दूसरी निराई-गुड़ाई करनी चाहिए। प्रत्येक निराई और कटाई के बाद पौधों पर हल्की मिट्टी चढ़ानी चाहिए। रासायनिक खरपतवार नियंत्रक के रूप में डाइयूरॉन 80 प्रतिशत डब्ल्यूपी एक कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से रोपाई के 20-25 दिनों बाद और ऑक्सीफ्लोरफेन 23.5 प्रतिशत ई.सी. का रोपाई से पहले 200 लीटर पानी के साथ 250 ग्राम प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करना चाहिए। कटाई रोपाई के लगभग 120 दिनों के उपरांत यह फसल प्रथम कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसके बाद 75 से 90दिनों के अंतराल पर आगामी कटाइयां की जाती हैं।। फसल की कटाई भूमि की सतह से लगभग 20 सें.मी. ऊपर से प्रातःकाल के समय करनी चाहिए। इस प्रकार जावा घास से लगातार 5 वर्षों तक प्रतिवर्ष 3-4 फसलें ली जा सकती हैं।। वर्षा ऋतु में फसल की कटाई नहीं करनी चाहिए। स्त्राेत : मधुलिका पाण्डेय, औषधीय एवं सगंध पादप संस्थान, गैरसैंण-२४६४३१ (उत्तराखंड), उत्तराखंड औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, भरसार (उत्तराखंड),और निर्देश कुमार, गाेविन्द बल्लभ पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंन्तनगर, ऊधम सिंह नगर-263145 (उत्तराखंड)